बृहदारण्यक उपनिषद् (3.9.1-2) में शाकल्य पूछते हैं कि देवता कितने हैं, और याज्ञवल्क्य बताते हैं कि देवता तैंतीस हैं: 8 वसु, 11 रुद्र और 12 आदित्य, ये इकतीस, और इंद्र तथा प्रजापति मिलकर तैंतीस। शतपथ ब्राह्मण (11.6.3.5) में भी यही उत्तर है। ‘कोटि’ शब्द के कोश में दो अर्थ हैं, प्रकार (श्रेणी) और करोड़, इसलिए ‘33 कोटि’ दोनों तरह पढ़ा जाता है।
| # | नाम | बृहदारण्यक में कौन (3.9.3-6) | महाभारत में नाम (आदि पर्व) |
|---|---|---|---|
| 1 | 8 वसु | अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य (सूर्य), द्युलोक, चंद्रमा और नक्षत्र; इन्हीं में यह सब (वसु) रखा है, इसलिए वसु (3.9.3) | धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास (1.60.17) |
| 2 | 11 रुद्र | पुरुष के दस प्राण और ग्यारहवाँ आत्मा; शरीर छोड़ते समय ये रुलाते (रोदयन्ति) हैं, इसलिए रुद्र (3.9.4) | मृगव्याध, शर्व, निर्ऋति, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु और भव (1.60.1-3) |
| 3 | 12 आदित्य | वर्ष के बारह महीने; ये सब कुछ लेते (आददाना) हुए चलते हैं, इसलिए आदित्य (3.9.5) | धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र (इंद्र), वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु (1.59.14-16) |
| 4 | इंद्र | स्तनयित्नु (गरजता मेघ), यानी अशनि, वज्र (3.9.6) | बारह आदित्यों में शक्र नाम से |
| 5 | प्रजापति | यज्ञ, यानी पशु (3.9.6) | — |
याज्ञवल्क्य और शाकल्य का संवाद
राजा जनक के यज्ञ में (3.1.1) विदग्ध शाकल्य ने याज्ञवल्क्य से पूछा कि देवता कितने हैं। याज्ञवल्क्य ने पहले वैश्वदेव की निविद् में गिने देवता बताए: तीन सौ तीन और तीन हज़ार तीन। बार-बार पूछने पर उत्तर घटता गया: तैंतीस, छह, तीन, दो, डेढ़ और एक (3.9.1)। फिर उन्होंने समझाया कि हज़ारों की गिनती इन देवताओं की महिमा भर है, देवता तो तैंतीस ही हैं (3.9.2)।
आगे के मंत्र छोटी गिनतियाँ भी समझाते हैं: छह देवता अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य और द्युलोक हैं (3.9.7); तीन देवता तीन लोक हैं, दो अन्न और प्राण, और डेढ़ वह जो बहता है, यानी वायु (3.9.8); और एक देवता प्राण है, जिसे ब्रह्म कहते हैं (3.9.9)।
‘कोटि’ के दो अर्थ
हिंदी शब्दसागर में ‘कोटि’ के दोनों अर्थ हैं: संज्ञा के रूप में ‘वर्ण, श्रेणी, दरजा’, और विशेषण के रूप में ‘सौ लाख की संख्या, करोड़’। इसलिए ‘33 कोटि देवता’ को कुछ लोग 33 प्रकार (श्रेणी) के देवता पढ़ते हैं और कुछ 33 करोड़ देवता। बृहदारण्यक और शतपथ ब्राह्मण के इस प्रसंग में ‘कोटि’ शब्द नहीं आता; वहाँ गिनती 33 देवताओं की है और बड़ी गिनती (3,306) को उनकी महिमा कहा गया है।
स्रोतों में अंतर
- रामायण की गिनती: वाल्मीकि रामायण (3.13.14-15, बड़ौदा संस्करण) में जटायु कहते हैं कि अदिति से तैंतीस देवता जन्मे: आदित्य, वसु, रुद्र और दोनों अश्विनीकुमार। यहाँ इंद्र और प्रजापति की जगह दो अश्विनीकुमार गिने गए हैं।
- शतपथ ब्राह्मण (11.6.3.4-5) में यही संवाद है, पर उसमें छह वाली गिनती नहीं आती: वहाँ उत्तर 3,306, 33, 3, 2, डेढ़ और 1 है।
- वसुओं के नाम: महाभारत (1.60.17) की सूची में अह है; विष्णु पुराण (1.15.110) उसकी जगह आप गिनता है।
- रुद्रों के नाम ग्रंथ-ग्रंथ में सबसे ज़्यादा बदलते हैं: विष्णु पुराण (1.15.121-123) अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, मृगव्याध, शर्व और कपाली के साथ हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी और रैवत जैसे नाम देता है, जो महाभारत की सूची में नहीं हैं।
- आदित्यों के बारह नाम महाभारत (1.59.15-16) और विष्णु पुराण (1.15.130-131) में एक ही हैं (महाभारत में अंश, विष्णु पुराण में अंशु)। महाभारत विष्णु को आदित्यों में सबसे छोटा पर गुणों में सबसे बड़ा कहता है (1.59.16)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
33 कोटि देवता कौन से हैं?
बृहदारण्यक उपनिषद् (3.9.2) के अनुसार 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, इंद्र और प्रजापति। उपनिषद् वसुओं को अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चंद्रमा और नक्षत्र, रुद्रों को दस प्राण और आत्मा, और आदित्यों को वर्ष के बारह महीने बताता है।
33 कोटि का मतलब 33 करोड़ है या 33 प्रकार?
कोश में ‘कोटि’ के दोनों अर्थ मिलते हैं: श्रेणी (प्रकार) और करोड़ (हिंदी शब्दसागर)। जिन ग्रंथों में यह गिनती है, बृहदारण्यक उपनिषद् (3.9) और शतपथ ब्राह्मण (11.6.3), वे 33 देवता गिनाते हैं और 3,306 जैसी बड़ी गिनती को उनकी महिमा कहते हैं।
8 वसु के नाम क्या हैं?
बृहदारण्यक (3.9.3) में: अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चंद्रमा और नक्षत्र। महाभारत (1.60.17) में: धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास; विष्णु पुराण (1.15.110) अह की जगह आप गिनता है।
11 रुद्र के नाम क्या हैं?
बृहदारण्यक (3.9.4) रुद्रों को पुरुष के दस प्राण और ग्यारहवाँ आत्मा कहता है। महाभारत (1.60.1-3) ग्यारह रुद्रों के ये नाम देता है: मृगव्याध, शर्व, निर्ऋति, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु और भव। विष्णु पुराण (1.15.121-123) के नाम इससे काफ़ी अलग हैं।
12 आदित्य के नाम क्या हैं?
महाभारत (1.59.15-16) और विष्णु पुराण (1.15.130-131) दोनों में: धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र (इंद्र), वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु। ये अदिति के पुत्र हैं। बृहदारण्यक (3.9.5) आदित्यों को वर्ष के बारह महीने कहता है।
स्रोत
- बृहदारण्यक उपनिषद् 3.1.1 और 3.9.1-9 (काण्व पाठ, sanskritdocuments.org)
- शतपथ ब्राह्मण 11.6.3.3-7 (माध्यन्दिन पाठ, GRETIL)
- महाभारत, आदि पर्व 1.59.14-16 और 1.60.1-3, 16-17 (भंडारकर संस्करण, GRETIL)
- विष्णु पुराण 1.15.109-131 (संस्कृत पाठ, GRETIL)
- वाल्मीकि रामायण 3.13.14-15 (बड़ौदा संस्करण, GRETIL)
- हिंदी शब्दसागर, ‘कोटि’, पृ. 1055 (dsal.uchicago.edu)
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