विष्णु पुराण (3.1.30-32) के अनुसार वर्तमान, यानी वैवस्वत मनु के सातवें मन्वंतर के सप्तर्षि हैं: वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज। यही सात नाम बृहदारण्यक उपनिषद् (2.2.4) में भी हैं। आकाश के सप्तर्षि-मंडल के तारों के नाम परंपरा में दूसरी सूची से दिए जाते हैं: मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ।
| नाम | शास्त्रों में पहचान |
|---|---|
| वसिष्ठ | इक्ष्वाकु वंश के राजपुरोहित, दशरथ और राम के कुलगुरु (वाल्मीकि रामायण 1.11, 2.5) |
| कश्यप | दक्ष ने अपनी तेरह पुत्रियाँ उन्हें ब्याहीं, जिनमें अदिति, दिति और दनु हैं (विष्णु पुराण 1.15.77, 1.15.124) |
| अत्रि | पत्नी अनसूया; पुत्र दत्तात्रेय, दुर्वासा और सोम (भागवत 4.1.15) |
| जमदग्नि | रेणुका के पति और परशुराम के पिता (भागवत 9.15.11-13) |
| गौतम | अहल्या के पति, जिनके आश्रम में राम ने अहल्या का उद्धार किया (वाल्मीकि रामायण 1.47-48) |
| विश्वामित्र | परंपरा गायत्री मंत्र (ऋग्वेद 3.62.10) का ऋषि इन्हें मानती है; यज्ञ-रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को साथ ले गए (वाल्मीकि रामायण 1.18-21) |
| भरद्वाज | प्रयाग में उनका आश्रम, जहाँ वनवास जाते हुए राम ठहरे (वाल्मीकि रामायण 2.48); द्रोणाचार्य के पिता (महाभारत 1.57.89) |
हर मन्वंतर के अलग सप्तर्षि
विष्णु पुराण (3.1) हर मन्वंतर के मनु, इंद्र, देवता और सप्तर्षि अलग-अलग बताता है, और आगे आने वाले मन्वंतरों के सप्तर्षि भी (3.2)। अभी सातवाँ, वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है (3.1.30), और ऊपर की सूची इसी की है।
बृहदारण्यक उपनिषद् में सप्तर्षि
बृहदारण्यक (2.2.3) कहता है कि सिर रूपी पात्र के किनारे बैठे सात ऋषि प्राण, यानी इंद्रियाँ हैं। अगला मंत्र (2.2.4) उनके नाम लेता है: गौतम और भरद्वाज, विश्वामित्र और जमदग्नि, वसिष्ठ और कश्यप, और वाणी को अत्रि कहता है।
आकाश के सप्तर्षि
उत्तर दिशा के आकाश में सात चमकीले तारों का समूह सप्तर्षि-मंडल कहलाता है, जिसे पश्चिम में अर्सा मेजर (Big Dipper) का भाग कहते हैं। शतपथ ब्राह्मण (2.1.2.4) कहता है कि सप्तर्षियों को पहले ‘ऋक्ष’ (भालू) कहा जाता था और कृत्तिकाएँ उनकी पत्नियाँ थीं। विष्णु पुराण (4.24.105-106) आकाश के सप्तर्षियों को सौ-सौ वर्ष एक नक्षत्र में रहता बताता है, और परीक्षित के समय उन्हें मघा में।
परंपरा में इन सात तारों के नाम क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वसिष्ठ और मरीचि दिए जाते हैं, और वसिष्ठ के पास के मंद तारे को उनकी पत्नी अरुंधती।
स्रोतों में अंतर
- महाभारत (शांति पर्व 12.322.26-27, समीक्षित संस्करण) सात ‘चित्रशिखंडी’ ऋषि गिनाता है: मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ। आकाश के तारों के नाम इसी सूची से हैं।
- नामों का क्रम ग्रंथ के अनुसार बदलता है: विष्णु पुराण वसिष्ठ से आरंभ करता है, बृहदारण्यक गौतम और भरद्वाज से।
- हर मन्वंतर के सप्तर्षि अलग हैं, इसलिए किसी दूसरी सूची को गलत कहना ठीक नहीं; वह किसी और मन्वंतर या किसी और परंपरा की हो सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सप्तर्षि के नाम क्या हैं?
वर्तमान मन्वंतर के सप्तर्षि: वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज (विष्णु पुराण 3.1.32)।
आकाश में सप्तर्षि कौन से तारे हैं?
उत्तर आकाश के वे सात चमकीले तारे जो पश्चिम में अर्सा मेजर (Big Dipper) के भाग हैं। परंपरा इन्हें मरीचि, वसिष्ठ, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु के नाम देती है।
क्या सप्तर्षि हमेशा वही रहते हैं?
नहीं। विष्णु पुराण (3.1-3.2) के अनुसार हर मन्वंतर के सप्तर्षि अलग होते हैं; ऊपर की सूची वर्तमान, वैवस्वत मन्वंतर की है।
गायत्री मंत्र किस ऋषि का है?
परंपरा ऋग्वेद 3.62.10 के गायत्री मंत्र का ऋषि विश्वामित्र को मानती है, जो इन सप्तर्षियों में से हैं।
स्रोत
- विष्णु पुराण 1.15.77 और 124, 3.1.30-32, 4.24.105-106 (संस्कृत पाठ, GRETIL)
- बृहदारण्यक उपनिषद् 2.2.3-4, काण्व पाठ (sanskritdocuments.org)
- शतपथ ब्राह्मण 2.1.2.4 (जूलियस एगेलिंग का अनुवाद, wisdomlib.org)
- महाभारत 1.57.89 और 12.322.26-28, समीक्षित संस्करण (संस्कृत पाठ, GRETIL)
- वाल्मीकि रामायण 1.11, 1.18-21, 1.47-48, 2.5, 2.48, समीक्षित संस्करण (संस्कृत पाठ, GRETIL)
- भागवत पुराण 4.1.15 और 9.15.11-13 (संस्कृत पाठ, GRETIL)
- सप्तर्षि और गायत्री मंत्र पर विकिपीडिया के लेख (तारों के नाम, मंत्र के ऋषि)
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