वर और कन्या की जानकारी
आपकी जानकारी इसी ब्राउज़र में रहती है; कहीं भेजी, सहेजी या पते में नहीं डाली जाती। समय भारतीय मानक समय में।
यह केवल अष्टकूट गुण-मिलान की परंपरागत गणना है। विवाह का निर्णय अपने परिवार और पुरोहित से करें।
कुंडली मिलान (गुण मिलान) में परंपरा से वर और कन्या के जन्म के चंद्र नक्षत्र और चंद्र राशि को आठ बातों में मिलाया जाता है, जिन्हें अष्टकूट कहते हैं: वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाडी। इनके क्रम से 1 से 8 तक गुण हैं, कुल 36 (मुहूर्त चिंतामणि, विवाह प्रकरण, श्लोक 21)। नीचे दोनों की जन्म-जानकारी या नक्षत्र डालें; हर कूट के गुण और कुल गुण मिलेंगे। गणना इसी ब्राउज़र में होती है।
आठ कूट: क्या मिलाया जाता है
हर कूट परंपरा में किस बात से जोड़ा जाता है, यह Drik Panchang की कुंडली मिलान मार्गदर्शिका के अनुसार लिखा है; ये परंपरा के कथन हैं, हमारी भविष्यवाणी नहीं।
- वर्ण (1 गुण): मीन, वृश्चिक और कर्क ब्राह्मण, मेष, सिंह और धनु क्षत्रिय, वृषभ, कन्या और मकर वैश्य, और मिथुन, तुला और कुंभ शूद्र वर्ण की राशियाँ हैं। वर का वर्ण कन्या के बराबर या ऊँचा हो तो 1 गुण, नहीं तो 0 (मुहूर्त चिंतामणि 22; Drik Panchang)। परंपरा में इसे आपसी प्रेम और सामंजस्य से जोड़ा जाता है।
- वश्य (2 गुण): राशियाँ पाँच वर्गों में हैं: चतुष्पद, मानव, जलचर, वनचर (सिंह) और कीट (वृश्चिक); धनु और मकर आधे-आधे दो वर्गों में। एक वर्ग पर 2 गुण; बाकी जोड़ियों पर 1, ½ या 0, इस आधार पर कि कौन राशि किसके वश्य या भक्ष्य मानी गई है (मुहूर्त चिंतामणि 23; अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम्, श्लोक 20; Drik Panchang)। परंपरा में यह आपसी प्रभाव और अनुकूलता का कूट है।
- तारा (3 गुण): कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक, और वर के नक्षत्र से कन्या के नक्षत्र तक गिनकर 9 से भाग दिया जाता है। जिस ओर शेष 3, 5 या 7 न हो, उस ओर के 1½ गुण (मुहूर्त चिंतामणि 24; अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम्)। परंपरा में इसे भाग्य और एक-दूसरे के हित से जोड़ा जाता है।
- योनि (4 गुण): हर नक्षत्र की एक पशु-योनि है, जैसे अश्विनी और शतभिषा की अश्व। एक योनि पर 4, मित्र योनि पर 3, सम पर 2, शत्रु पर 1 और सात परस्पर-विरोधी जोड़ियों (गौ-व्याघ्र, गज-सिंह, अश्व-महिष, श्वान-मृग, सर्प-नकुल, वानर-मेष, मार्जार-मूषक) पर 0 (मुहूर्त चिंतामणि 25–26 और उसकी टीका; जोड़ियों की तालिका अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम् की)। परंपरा में इसे शारीरिक अनुकूलता से जोड़ा जाता है।
- ग्रह मैत्री (5 गुण): दोनों चंद्र राशियों के स्वामी ग्रहों की नैसर्गिक मित्रता देखी जाती है: एक ही स्वामी या दोनों मित्र 5, मित्र और सम 4, दोनों सम 3, मित्र और शत्रु 1, सम और शत्रु ½, दोनों शत्रु 0 (मुहूर्त चिंतामणि 27–28; अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम्)। परंपरा में यह मन और स्वभाव के मेल का कूट है।
- गण (6 गुण): हर नक्षत्र देव, मनुष्य या राक्षस गण का है। एक गण पर 6; दूसरी जोड़ियों के अंक नीचे की तालिका में हैं (मुहूर्त चिंतामणि 29–30)। परंपरा में इसे स्वभाव से जोड़ा जाता है।
- भकूट (7 गुण): कन्या की राशि से वर की राशि गिनी जाती है: दोनों राशियाँ एक-दूसरे से 2 और 12, 5 और 9, या 6 और 8 पर हों तो 0, बाकी सब स्थितियों में 7 गुण (मुहूर्त चिंतामणि 31)। परंपरा में इसे परिवार, संतान और सुख-समृद्धि से जोड़ा जाता है।
- नाडी (8 गुण): हर नक्षत्र आदि, मध्य या अंत्य नाडी का है। दोनों की नाडी अलग हो तो 8 गुण, एक हो तो 0 (मुहूर्त चिंतामणि 34)। परंपरा में इसे स्वभाव और शरीर की प्रकृति से जोड़ा जाता है।
नक्षत्र के अनुसार योनि, गण और नाडी
| नक्षत्र | राशि | योनि | गण | नाडी |
|---|---|---|---|---|
| अश्विनी | मेष | अश्व (घोड़ा) | देव | आदि |
| भरणी | मेष | गज (हाथी) | मनुष्य | मध्य |
| कृत्तिका | मेष / वृषभ | मेष (मेढ़ा) | राक्षस | अंत्य |
| रोहिणी | वृषभ | सर्प | मनुष्य | अंत्य |
| मृगशिरा | वृषभ / मिथुन | सर्प | देव | मध्य |
| आर्द्रा | मिथुन | श्वान (कुत्ता) | मनुष्य | आदि |
| पुनर्वसु | मिथुन / कर्क | मार्जार (बिल्ली) | देव | आदि |
| पुष्य | कर्क | मेष (मेढ़ा) | देव | मध्य |
| आश्लेषा | कर्क | मार्जार (बिल्ली) | राक्षस | अंत्य |
| मघा | सिंह | मूषक (चूहा) | राक्षस | अंत्य |
| पूर्वा फाल्गुनी | सिंह | मूषक (चूहा) | मनुष्य | मध्य |
| उत्तरा फाल्गुनी | सिंह / कन्या | गौ | मनुष्य | आदि |
| हस्त | कन्या | महिष (भैंस) | देव | आदि |
| चित्रा | कन्या / तुला | व्याघ्र (बाघ) | राक्षस | मध्य |
| स्वाति | तुला | महिष (भैंस) | देव | अंत्य |
| विशाखा | तुला / वृश्चिक | व्याघ्र (बाघ) | राक्षस | अंत्य |
| अनुराधा | वृश्चिक | मृग (हिरण) | देव | मध्य |
| ज्येष्ठा | वृश्चिक | मृग (हिरण) | राक्षस | आदि |
| मूल | धनु | श्वान (कुत्ता) | राक्षस | आदि |
| पूर्वाषाढ़ा | धनु | वानर | मनुष्य | मध्य |
| उत्तराषाढ़ा | धनु / मकर | नकुल (नेवला) | मनुष्य | अंत्य |
| श्रवण | मकर | वानर | देव | अंत्य |
| धनिष्ठा | मकर / कुंभ | सिंह | राक्षस | मध्य |
| शतभिषा | कुंभ | अश्व (घोड़ा) | राक्षस | आदि |
| पूर्वा भाद्रपद | कुंभ / मीन | सिंह | मनुष्य | आदि |
| उत्तरा भाद्रपद | मीन | गौ | मनुष्य | मध्य |
| रेवती | मीन | गज (हाथी) | देव | अंत्य |
हर नक्षत्र के चरण, नाम अक्षर, स्वामी और देवता: 27 नक्षत्र
राशि के अनुसार वर्ण, वश्य और स्वामी
| राशि | वर्ण | वश्य | स्वामी |
|---|---|---|---|
| मेष | क्षत्रिय | चतुष्पद | मंगल |
| वृषभ | वैश्य | चतुष्पद | शुक्र |
| मिथुन | शूद्र | मानव (द्विपद) | बुध |
| कर्क | ब्राह्मण | जलचर | चंद्र |
| सिंह | क्षत्रिय | वनचर | सूर्य |
| कन्या | वैश्य | मानव (द्विपद) | बुध |
| तुला | शूद्र | मानव (द्विपद) | शुक्र |
| वृश्चिक | ब्राह्मण | कीट | मंगल |
| धनु | क्षत्रिय | मानव (0°–15°), चतुष्पद (15°–30°) | गुरु |
| मकर | वैश्य | चतुष्पद (0°–15°), जलचर (15°–30°) | शनि |
| कुंभ | शूद्र | मानव (द्विपद) | शनि |
| मीन | ब्राह्मण | जलचर | गुरु |
गणना कैसे होती है
जन्म की तारीख, समय और शहर से जन्म के क्षण पर चंद्रमा की निरयण स्थिति (लाहिड़ी अयनांश) निकाली जाती है, ठीक जन्म पंचांग की तरह; उससे नक्षत्र, चरण और राशि। यह Drik Panchang से 1 कला के भीतर मिलती है। जन्म का समय नक्षत्र या राशि बदलने के 15 मिनट के भीतर हो, तो परिणाम में चेतावनी दी जाती है। नक्षत्र खुद चुनें तो चरण बताने पर राशि उसी से तय होती है; जो नक्षत्र दो राशियों में बँटा है (जैसे कृत्तिका: मेष और वृषभ), उसमें चरण न पता हो तो राशि चुननी होती है।
फिर ऊपर के आठ नियमों से हर कूट के गुण गिने जाते हैं। वश्य में धनु और मकर के 15° पर वर्ग बदलता है: चरण से यह तय न हो (पूर्वाषाढ़ा का पहला चरण और श्रवण का दूसरा चरण 15° के दोनों ओर हैं), तो दोनों संभव अंक दिखाए जाते हैं। तारा, योनि, गण और नाडी नक्षत्र से, और वर्ण, वश्य, ग्रह मैत्री और भकूट राशि से देखे जाते हैं।
वश्य और गण के अंक
पंक्ति में वर का वर्ग, स्तंभ में कन्या का, जैसे Drik Panchang गिनता है।
| वर \ कन्या | चतुष्पद | मानव | जलचर | वनचर | कीट |
|---|---|---|---|---|---|
| चतुष्पद | 2 | 1 | 1 | ½ | 1 |
| मानव | 1 | 2 | ½ | 0 | 1 |
| जलचर | 1 | ½ | 2 | 1 | 1 |
| वनचर | 0 | 0 | 0 | 2 | 0 |
| कीट | 1 | 1 | 1 | 0 | 2 |
| वर \ कन्या | देव | मनुष्य | राक्षस |
|---|---|---|---|
| देव | 6 | 6 | 0 |
| मनुष्य | 5 | 6 | 0 |
| राक्षस | 1 | 0 | 6 |
जहाँ परंपराएँ अलग हैं
- वर्ण: कुछ आचार्य दोनों का वर्ण एक होने पर आधा गुण देते हैं (अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम्, श्लोक 16 में “केऽप्याहुः सदृशे दलम्”)। Drik Panchang वर का वर्ण कम होने पर दोनों राशि-स्वामियों के वर्ण देखने को अंतिम उपाय बताता है। हम पूरा 1 या 0 देते हैं।
- वश्य: Drik Panchang की तरह धनु का पहला आधा (0°–15°) मानव और दूसरा चतुष्पद, मकर का पहला आधा चतुष्पद और दूसरा जलचर, और कुंभ मानव है। कुछ पुस्तकें सिंह को चतुष्पद और कुंभ को जलचर गिनती हैं (अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम्, 1932)। अंक हम Drik Panchang के कुंडली मिलान की तरह गिनते हैं (7 अक्टूबर 2026 को पाँच जोड़ियों पर जाँचा): मानव-जलचर पर ½, “वश्यभक्ष्ये गुणार्धकम्” (वश्य और भक्ष्य में आधा गुण) के नियम से, और वर वनचर और कन्या चतुष्पद पर 0। कुछ वेबसाइटें यही तालिका कन्या को पंक्ति में रखकर और ½ की जगह 1½ लिखकर छापती हैं, और Drik की अपनी मार्गदर्शिका भी “एक, डेढ़ तथा शून्य” लिखती है।
- योनि: मित्र, सम और शत्रु योनियों की तालिका स्रोतों में कुछ जोड़ियों पर एक अंक ऊपर-नीचे है। हम अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम् (1932) की तालिका लेते हैं, जो Drik Panchang से जाँची गई चार जोड़ियों में से तीन पर मिलती है। Drik मूषक-अश्व को 3 देता है, जबकि अवकहड़ा और Saravali 2 देते हैं; ऐसी जोड़ी में हमारा कुल Drik से 1 गुण कम आ सकता है। Saravali की तालिका (PyJHora में) 105 में से 27 जोड़ियों पर अलग है।
- ग्रह मैत्री: पं. महीधर शर्मा की मुहूर्त चिंतामणि टीका मित्र-शत्रु पर 2 और सम-शत्रु पर 1 गुण देती है; हम अवकहड़ा के श्लोक के अनुसार 1 और ½ देते हैं, जो आम तालिकाओं में भी है; Drik Panchang भी मित्र-शत्रु पर 1 देता है।
- गण: हम Drik Panchang की तरह गिनते हैं (जाँचा हुआ): वर देव और कन्या मनुष्य पर 6, वर मनुष्य और कन्या देव पर 5, वर राक्षस और कन्या देव पर 1 (तालिका नीचे)। कुछ वेबसाइटें यही अंक कन्या को पंक्ति में रखकर छापती हैं, जिससे दिशा उलट जाती है। अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम् देव-मनुष्य को दोनों ओर 5 और देव-राक्षस को दोनों ओर 1 देता है; उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की पाठ्य-पुस्तक (मेलापक एवं विवाह मुहूर्त विचार) कन्या देव और वर मनुष्य पर 4, वर राक्षस और कन्या देव पर 2, और वर राक्षस और कन्या मनुष्य पर 1 देती है।
- भकूट और नाडी: ग्रंथ कुछ स्थितियों में अपवाद बताते हैं, जैसे दोनों राशियों का एक ही स्वामी हो या स्वामी मित्र हों, या नक्षत्र एक हो पर राशि या चरण अलग हो (मुहूर्त चिंतामणि 32–34)। कुछ सॉफ़्टवेयर तब पूरे अंक जोड़ देते हैं। हम अंक नहीं बदलते: तालिका में मूल गणना है।
कुंडली मिलान: सवाल-जवाब
कुंडली मिलान या गुण मिलान क्या है?
विवाह से पहले वर और कन्या की जन्म कुंडली के चंद्र नक्षत्र और चंद्र राशि को आठ कूटों में मिलाने की परंपरा है, जिसे अष्टकूट मिलान या गुण मिलान कहते हैं। हर कूट के कुछ गुण (अंक) हैं, कुल 36। इसका वर्णन मुहूर्त चिंतामणि के विवाह प्रकरण (श्लोक 21–34) में है। यह पन्ना वही गणना करता है।
आठ कूट कौन से हैं और किसके कितने गुण हैं?
वर्ण 1, वश्य 2, तारा 3, योनि 4, ग्रह मैत्री 5, गण 6, भकूट 7 और नाडी 8 गुण: कुल 36। वर्ण, वश्य, ग्रह मैत्री और भकूट चंद्र राशि से देखे जाते हैं (15 गुण), और तारा, योनि, गण और नाडी जन्म नक्षत्र से (21 गुण)।
परंपरा में कितने गुण मिलने चाहिए?
परंपरा में 18 से कम गुणों को अशुभ, 18 से अधिक को शुभ और 27 से अधिक को बहुत शुभ कहा गया है (अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम्, मेलापक, श्लोक 42: “अशुभोऽष्टादशाल्पश्चेत्”)। मुहूर्त चिंतामणि की टीका भी कहती है कि गुण जितने अधिक, मेल उतना अच्छा माना जाता है। ये परंपरा के कथन हैं; यह पन्ना केवल गुण गिनता है, कोई निर्णय नहीं देता।
जन्म का ठीक समय पता न हो तो?
“समय पता नहीं” चुनें। अगर उस पूरे दिन चंद्रमा एक ही नक्षत्र और राशि में रहा, तो गणना पर कोई असर नहीं पड़ता। दिन में नक्षत्र या राशि बदली हो तो दोपहर 12 बजे का चंद्रमा लिया जाता है और परिणाम में यह लिखा मिलता है; तब “मुझे नक्षत्र/राशि पता है” चुनकर दोनों नक्षत्र आज़मा सकते हैं। जिन्हें अपना नक्षत्र या नाम राशि पता है, वे सीधे वह चुन सकते हैं।
अलग-अलग पंचांगों या वेबसाइटों पर गुण अलग क्यों आते हैं?
तीन कारण आम हैं। पहला, कुछ कूटों की तालिकाएँ परंपराओं में अलग हैं, खासकर वश्य, योनि और गण, और कई वेबसाइटें वर और कन्या की दिशा उलटकर पढ़ती हैं। हम वश्य और गण Drik Panchang की तरह गिनते हैं और योनि अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम् की तालिका से; कुछ योनि-जोड़ियों (जैसे मूषक-अश्व) पर Drik एक अंक अधिक देता है, इसलिए वहाँ कुल में 1 गुण का अंतर हो सकता है। दूसरा, कुछ सॉफ़्टवेयर भकूट या नाडी के अपवाद लागू करके अंक बदल देते हैं; हम नहीं बदलते। तीसरा, नक्षत्र या राशि बदलने के आसपास जन्म हो तो अयनांश या समय के छोटे अंतर से चंद्रमा का नक्षत्र ही बदल जाता है; ऐसे में परिणाम में चेतावनी दी जाती है।
क्या हमारी जानकारी कहीं भेजी या सहेजी जाती है?
नहीं। तारीख, समय, शहर या नक्षत्र इसी ब्राउज़र में रहते हैं; गणना यहीं होती है और कुछ भी भेजा, सहेजा या पते (URL) में नहीं डाला जाता। पन्ना बंद करते ही जानकारी चली जाती है; रखनी हो तो PDF सेव करें।
क्या यह विवाह के बारे में भविष्यफल या मांगलिक दोष भी बताता है?
नहीं। यह केवल अष्टकूट के गुणों की परंपरागत गणना है। इसमें भविष्यफल, मांगलिक या कोई दोष, उपाय, या “मेल है/नहीं है” का निर्णय नहीं है। विवाह का निर्णय अपने परिवार और पुरोहित से करें।
स्रोत
- मुहूर्त चिंतामणि (रामदैवज्ञ), विवाह प्रकरण, श्लोक 21–34: वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाडी; हिंदी टीका पं. महीधर शर्मा (खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई) और पं. प्यारेलाल मिश्र (1939), archive.org
- पं. सीताराम शर्मा, अति बृहत् अवकहड़ा चक्रम् (ज्योतिःशास्त्र सोपानम्), दूसरा संस्करण 1932, मेलापक, पृ. 45–55: हर कूट के गुण-विभाग के श्लोक और तालिकाएँ (योनि की तालिका पृ. 50), और श्लोक 42 (18 और 27 गुण), archive.org
- बृहदवकहडाचक्रम्, विवाह प्रकरण: वर्ण, गण, नाडी और ग्रहों की मैत्री के वही वर्ग, archive.org
- Drik Panchang, Kundali Match, Varna Kuta और Vashya Kuta मार्गदर्शिकाएँ: कूटों के गुण, वर्ण का नियम और वश्य के वर्ग; और Drik Panchang का Horoscope Match: नई दिल्ली के जन्म वाली पाँच जोड़ियों के हर कूट के अंक, 7 अक्टूबर 2026 को मिलाए
- वश्य की तालिका: AstroYogi, Vasya Koota in Kundli Matching, वर को पंक्ति में रखकर और ½ के साथ, जैसे Drik गिनता है; गण और ग्रह मैत्री की तालिकाएँ: onlinejyotish.com, Gana Kootam और Graha Maitri Kootam (गण में वर पंक्ति में, जैसे Drik); योनि की दूसरी तालिका: Saravali (PyJHora में)
- उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, मेलापक एवं विवाह मुहूर्त विचार (BAJY-302): गण के अंकों का दूसरा मत
- SanatanBodh पंचांग गणना (astronomy-engine, लाहिड़ी अयनांश): जन्म के समय चंद्रमा, Drik Panchang से 1 कला के भीतर; विधि: sanatanbodh.in/panchang/ganana-vidhi/
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