ग्रंथ

उपनिषद् कितने हैं और उनके नाम

संक्षेप में

परंपरा में 108 उपनिषद् गिने जाते हैं, जिनकी सूची मुक्तिकोपनिषद् (1.30-39) देता है; उपनिषद् नाम के ग्रंथ इससे कहीं अधिक, 200 से ऊपर मिलते हैं। इनमें 10 मुख्य माने जाते हैं: ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक, जिन पर आदि शंकराचार्य के नाम से भाष्य मिलते हैं। कुछ गिनतियाँ श्वेताश्वतर, कौषीतकि और मैत्री जोड़कर 11, 12 या 13 मुख्य उपनिषद् मानती हैं।

#नामवेदकिस गिनती मेंपहचान
1ईश उपनिषद्ईशावास्यशुक्ल यजुर्वेद10 मुख्य‘ईशा वास्यमिदं सर्वम्’ से आरंभ: जो कुछ है, ईश्वर से व्याप्त है
2केन उपनिषद्सामवेद10 मुख्य‘केनेषितम्’ (किसकी प्रेरणा से?) प्रश्न से आरंभ; यक्ष और उमा हैमवती का प्रसंग
3कठ उपनिषद्कृष्ण यजुर्वेद10 मुख्यबालक नचिकेता और यम का संवाद
4प्रश्न उपनिषद्अथर्ववेद10 मुख्यछह जिज्ञासु पिप्पलाद ऋषि के पास जाकर छह प्रश्न पूछते हैं
5मुण्डक उपनिषद्अथर्ववेद10 मुख्यपरा और अपरा विद्या (1.1.4); ‘सत्यमेव जयते’ इसी का वाक्य है (3.1.6)
6माण्डूक्य उपनिषद्अथर्ववेद10 मुख्यॐ और आत्मा के चार पाद; ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (मंत्र 2)
7तैत्तिरीय उपनिषद्कृष्ण यजुर्वेद10 मुख्यशिक्षा, ब्रह्मानन्द और भृगु वल्ली; अन्नमय से आनन्दमय तक पाँच स्तर; ‘सत्यं वद, धर्मं चर’
8ऐतरेय उपनिषद्ऋग्वेद10 मुख्यसृष्टि और आत्मा का विचार; ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ (3.1.3)
9छान्दोग्य उपनिषद्सामवेद10 मुख्यउद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु को उपदेश ‘तत्त्वमसि’ (6.8.7)
10बृहदारण्यक उपनिषद्शुक्ल यजुर्वेद10 मुख्ययाज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का संवाद (2.4); ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (1.4.10) और ‘असतो मा सद्गमय’ (1.3.28)
11श्वेताश्वतर उपनिषद्कृष्ण यजुर्वेद11, 12 और 13 की गिनती मेंएक रुद्र को जगत का स्वामी कहता है (3.2); अंत में देव और गुरु के प्रति परा भक्ति (6.23)
12कौषीतकि उपनिषद्ऋग्वेद12 और 13 की गिनती मेंचित्र गार्ग्यायणि, और प्रतर्दन व इन्द्र के प्रसंग
13मैत्री उपनिषद्मैत्रायणीकृष्ण यजुर्वेद (मुक्तिका: सामवेद)13 की गिनती मेंराजा बृहद्रथ और ऋषि शाकायन्य का संवाद

108 उपनिषद् और मुक्तिकोपनिषद्

मुक्तिकोपनिषद् में राम हनुमान से कहते हैं कि मुक्ति के लिए माण्डूक्य अकेला पर्याप्त है; उससे ज्ञान न हो तो दस उपनिषद् पढ़ो, फिर बत्तीस, और विदेह-मुक्ति चाहो तो एक सौ आठ (1.26-29)। इसके बाद 108 नाम क्रम से आते हैं, जिनमें पहले दस यही मुख्य उपनिषद् हैं (1.30-39)।

वेद के अनुसार मुक्तिका की गिनती: ऋग्वेद के 10, शुक्ल यजुर्वेद के 19, कृष्ण यजुर्वेद के 32, सामवेद के 16 और अथर्ववेद के 31, कुल 108। विद्वान मुक्तिका की यह सूची 1656 ई. से पहले की मानते हैं।

उपनिषद् शब्द का अर्थ

उप (पास) और नि-षद् (बैठना) से: गुरु के पास बैठकर पाया गया ज्ञान। उपनिषद् वेदों के अंतिम भाग हैं और वेदान्त दर्शन इन्हीं पर टिका है।

स्रोतों में अंतर

  • 10, 11, 12 या 13: दस की गिनती मुक्तिका (1.30) और शंकराचार्य के भाष्यों से है। श्वेताश्वतर पर भी शंकराचार्य के नाम से भाष्य है, पर विद्वान उसके शंकर-कृत होने पर संदेह करते हैं; इसे जोड़कर 11। रॉबर्ट ह्यूम (1921) कौषीतकि और श्वेताश्वतर सहित बारह को ‘सामान्य समूह’ कहकर उसमें मैत्री जोड़ते हैं, जिससे 13 होते हैं।
  • माण्डूक्य पर भाष्य शंकराचार्य के नाम से है, पर कुछ विद्वान (जैसे नाकामुरा) उसे किसी और की रचना मानते हैं।
  • मैत्री उपनिषद् का वेद: मुक्तिका उसे सामवेद में रखता है, जबकि सामान्यतः उसे कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा का माना जाता है।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 4 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उपनिषद् कितने हैं?

परंपरा की प्रामाणिक सूची 108 की है (मुक्तिकोपनिषद्)। उपनिषद् नाम के ग्रंथ 200 से अधिक हैं। मुख्य उपनिषद् 10 माने जाते हैं, कुछ गिनतियों में 11 से 13।

10 मुख्य उपनिषदों के नाम क्या हैं?

ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक। यह क्रम मुक्तिकोपनिषद् (1.30) के श्लोक का है।

चार महावाक्य किन उपनिषदों में हैं?

‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ ऐतरेय (3.1.3) में, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ बृहदारण्यक (1.4.10) में, ‘तत्त्वमसि’ छान्दोग्य (6.8.7) में और ‘अयमात्मा ब्रह्म’ माण्डूक्य (2) में है; ये क्रमशः ऋग्, यजु, साम और अथर्व वेद के उपनिषद् हैं।

‘सत्यमेव जयते’ किस उपनिषद् से है?

मुण्डक उपनिषद् (3.1.6) से।

शंकराचार्य ने किन उपनिषदों पर भाष्य लिखे?

दस मुख्य उपनिषदों पर उनके नाम से भाष्य मिलते हैं। माण्डूक्य और श्वेताश्वतर के भाष्यों के लेखक पर विद्वानों में मतभेद है।

स्रोत

  1. मुक्तिकोपनिषद्, अध्याय 1 (sanskritdocuments.org)
  2. ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, श्वेताश्वतर, कौषीतकि और मैत्री उपनिषद् के मूल पाठ (sanskritdocuments.org)
  3. रॉबर्ट अर्नेस्ट ह्यूम, द थर्टीन प्रिंसिपल उपनिषद्स, ऑक्सफ़र्ड 1921 (archive.org)
  4. आदि शंकराचार्य की रचनाएँ और उपनिषद् पर विकिपीडिया के लेख (भाष्यों की प्रामाणिकता, 200 से अधिक उपनिषद्, मुक्तिका की तिथि)

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