वेद को प्रमाण मानने वाले छह आस्तिक दर्शन हैं: न्याय (गौतम), वैशेषिक (कणाद), सांख्य (कपिल), योग (पतंजलि), मीमांसा (जैमिनि) और वेदान्त (बादरायण)। इन्हें ‘षड्दर्शन’ नाम से छह की एक सूची में बाँधना बाद की, मध्यकालीन परंपरा है; पुराने ग्रंथ दर्शनों को अलग-अलग ढंग से गिनते हैं।
| नाम | आचार्य (परंपरा से) | मूल ग्रंथ | मुख्य विषय |
|---|---|---|---|
| न्याय | गौतम | न्याय सूत्र, 5 अध्याय | प्रमाण और तर्क; प्रमाण, प्रमेय, संशय आदि सोलह पदार्थों को जानकर तत्त्व-ज्ञान |
| वैशेषिक | कणाद | वैशेषिक सूत्र, 10 अध्याय | जगत के छह पदार्थ: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय, और सातवाँ अभाव |
| सांख्य | कपिल | सबसे पुराना उपलब्ध ग्रंथ ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका; कपिल के नाम से छह अध्याय का ‘सांख्य सूत्र’ बहुत बाद का माना जाता है | प्रकृति और पुरुष के भेद का ज्ञान |
| योग | पतंजलि | योग सूत्र, 4 पाद | चित्त-वृत्तियों का निरोध; यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये आठ अंग; कैवल्य |
| मीमांसापूर्व मीमांसा, कर्म-मीमांसा | जैमिनि | मीमांसा सूत्र, 12 अध्याय (‘अथातो धर्मजिज्ञासा’) | वेद के कर्मकांड और धर्म का विचार |
| वेदान्तउत्तर मीमांसा, शारीरक मीमांसा | बादरायण (परंपरा में वेदव्यास) | ब्रह्म सूत्र, 4 अध्याय (‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’) | उपनिषदों के आधार पर ब्रह्म और आत्मा का विचार |
तीन जोड़े
ये छह दर्शन प्रायः तीन जोड़ों में पढ़े जाते हैं: न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग और मीमांसा-वेदान्त। मधुसूदन सरस्वती का प्रस्थानभेद वैशेषिक को ‘न्याय’ शब्द में ही गिनता है, और जैमिनि की कर्म-मीमांसा व बादरायण की शारीरक-मीमांसा (वेदान्त) को मीमांसा के दो भाग कहता है।
छह की गिनती कब बनी
आठवीं सदी के जैन विद्वान हरिभद्र के ‘षड्दर्शनसमुच्चय’ में छह दर्शन दूसरे हैं: बौद्ध, न्याय, सांख्य, जैन, वैशेषिक और मीमांसा। चौदहवीं सदी में माधवाचार्य का ‘सर्वदर्शनसंग्रह’ सोलह दर्शन गिनाता है। वेद मानने वाले इन्हीं छह को ‘षड्दर्शन’ कहने की सूची 12वीं से 16वीं सदी के बीच वेदान्ती विद्वानों में बनी और बाद में पश्चिमी विद्वानों ने भी इसे अपना लिया।
स्रोतों में अंतर
- हरिभद्र (8वीं सदी) के षड्दर्शनसमुच्चय में छह दर्शन बौद्ध, न्याय, सांख्य, जैन, वैशेषिक और मीमांसा हैं, यानी योग और वेदान्त नहीं, बौद्ध और जैन हैं।
- सांख्य के मूल ग्रंथ पर: परंपरा कपिल को आदि आचार्य मानती है (भागवत 1.3.10 के अनुसार कपिल ने आसुरि को सांख्य सिखाया), पर कपिल के नाम का सांख्य सूत्र लगभग 14वीं सदी का माना जाता है; उपलब्ध सबसे पुराना ग्रंथ सांख्यकारिका है।
- प्रस्थानभेद 14 विद्याओं की गिनती में सांख्य और योग को धर्मशास्त्र के भीतर रखता है, अलग दर्शन के रूप में नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
छह दर्शनों के नाम क्या हैं?
न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त।
षड्दर्शन के रचयिता कौन हैं?
परंपरा के अनुसार न्याय के गौतम, वैशेषिक के कणाद, सांख्य के कपिल, योग के पतंजलि, मीमांसा के जैमिनि और वेदान्त (ब्रह्म सूत्र) के बादरायण।
आस्तिक और नास्तिक दर्शन में क्या अंतर है?
यहाँ आस्तिक का अर्थ है वेद को प्रमाण मानने वाला। ये छह दर्शन वेद को प्रमाण मानते हैं; बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन नहीं मानते, इसलिए नास्तिक कहलाते हैं।
क्या षड्दर्शन की सूची बहुत पुरानी है?
दर्शन स्वयं पुराने हैं, पर ठीक इन छह को एक साथ ‘षड्दर्शन’ कहना मध्यकाल में, लगभग 12वीं से 16वीं सदी के बीच, प्रचलित हुआ। हरिभद्र के पुराने ग्रंथ में छह दर्शन दूसरे हैं।
स्रोत
- मधुसूदन सरस्वती, प्रस्थानभेद: न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त, सांख्य और योग के आचार्य और ग्रंथ (संस्कृत पाठ, archive.org)
- भागवत पुराण 1.3.10 (संस्कृत पाठ, GRETIL)
- हिंदू दर्शन और सांख्य पर विकिपीडिया के लेख (छह की गिनती का काल, सर्वदर्शनसंग्रह, सांख्यकारिका और सांख्य सूत्र की तिथि)
- षड्दर्शनसमुच्चय, एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ बुद्धिज़्म
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