स्मार्त सम्प्रदाय वह परंपरा है जो स्मृति ग्रंथों, विशेषकर प्राचीन सूत्र ग्रंथों, में बताए आचार और कर्मकांड पर चलती है और सभी प्रमुख देवताओं को मानती है। स्मार्त पंचायतन पूजा में पाँच देवताओं, शिव, विष्णु, देवी, सूर्य और गणेश, की एक साथ पूजा करते हैं। आदि शंकराचार्य इस परंपरा के सबसे बड़े आचार्य माने जाते हैं, और कुछ लोग उन्हें इसका संस्थापक भी कहते हैं; उनका अद्वैत वेदांत इसका दर्शन है और उनके चार मठ इसके केंद्र।
- प्रमुख देवता
- पंचायतन: शिव, विष्णु, देवी (शक्ति), सूर्य, गणेश; षण्मत में स्कंद भी
- आचार्य
- आदि शंकराचार्य (ब्रिटानिका के अनुसार लगभग 700–750 ई.); उनके शिष्य सुरेश्वर, पद्मपाद, तोटक, हस्तामलक
- दर्शन
- अद्वैत वेदांत
- मुख्य ग्रंथ
- वेद, स्मृतियाँ और सूत्र ग्रंथ, पुराण; ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों और गीता पर शंकराचार्य के भाष्य
- मुख्य केंद्र
- शंकराचार्य के चार आम्नाय मठ, विशेषकर शृंगेरी
- तिलक
- कोई एक तय चिह्न नहीं; दशनामी संन्यासी भस्म का त्रिपुंड्र लगाते हैं
- मुख्य पर्व
- शंकर जयंती (वैशाख शुक्ल पंचमी); पाँचों देवताओं के पर्व
स्मार्त सम्प्रदाय क्या है
“स्मार्त” शब्द स्मृति से बना है। ब्रिटानिका के अनुसार स्मृति वे ग्रंथ हैं जिन्हें मनुष्य-रचित माना जाता है, जबकि वेदों को दिव्य रूप से प्रकट (श्रुति) माना जाता है; स्मार्त जिन सूत्र ग्रंथों के आचार पर चलते हैं, वे स्मृति साहित्य का हिस्सा हैं।
स्मार्त किसी एक देवता के अनन्य उपासक नहीं होते: वे सभी देवताओं को मानते हैं, हालाँकि किसी परिवार को एक देवता अधिक प्रिय हो सकता है; ब्रिटानिका के अनुसार आज उनमें शिव विशेष रूप से प्रिय हैं। हिमालयन अकादमी के अनुसार स्मार्त परम ईश्वर को छह रूपों में से किसी एक में पूजते हैं, और इसी कारण उन्हें उदार या असाम्प्रदायिक कहा जाता है।
संक्षिप्त इतिहास
ब्रिटानिका आदि शंकराचार्य को स्मार्तों का सबसे बड़ा आचार्य कहता है, और “कुछ लोगों के अनुसार” इसका संस्थापक। उनके जीवन पर कम से कम 11 जीवनी-ग्रंथ हैं, सब सदियों बाद लिखे गए; आधुनिक शोध उन्हें लगभग 700–750 ई. का मानता है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र, प्रमुख उपनिषदों और भगवद्गीता पर भाष्य लिखे।
परंपरा के अनुसार उन्होंने चार दिशाओं में चार मठ स्थापित किए। ब्रिटानिका के अनुसार उनका शृंगेरी मठ आज भी इस सम्प्रदाय का केंद्र है, और उसके प्रमुख, जगद्गुरु, दक्षिण भारत और गुजरात के स्मार्तों के आध्यात्मिक प्रमुख हैं। उत्तर भारत में “स्मार्त” शब्द का अर्थ आवश्यक रूप से शंकराचार्य का अनुयायी नहीं होता।
विश्वास और साधना
पंचायतन पूजा स्मार्त उपासना की पहचान है: शिव, विष्णु, देवी, सूर्य और गणेश की एक साथ पूजा। षण्मत की परंपरा इनमें स्कंद को जोड़कर छह मार्ग गिनती है।
दर्शन में स्मार्त शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत को मानते हैं: एक ही सनातन, अपरिवर्तनशील सत्य (ब्रह्म) है, और अनेकता और भेद का अनुभव अज्ञान से होता है। इस ज्ञान तक पहुँचने के तीन चरण बताए जाते हैं: श्रवण, मनन और निदिध्यासन, जो बृहदारण्यक उपनिषद् के वचन “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (2.4.5) पर आधारित हैं।
स्मार्त ब्राह्मण परंपरागत मूल्यों को दृढ़ता से मानते रहे हैं और विद्या की सभी शाखाओं में सक्रिय रहे हैं; ब्रिटानिका के अनुसार उन्हें “शास्त्री” की उपाधि मिली, और तमिल में “अय्यर”।
षण्मत और दशनामी परंपरा
कांची कामकोटि पीठ की परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य ने छह उपासना-मार्ग (षण्मत) स्थापित किए: शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, कौमार और सौर। शंकराचार्य की संन्यास-परंपरा दस नामों (दशनामी) में बँटी है: अरण्य, आश्रम, भारती, गिरि, पर्वत, पुरी, सरस्वती, सागर, तीर्थ और वन, और हर नाम चार मठों में से एक से जुड़ा है।
प्रमुख केंद्र
शंकराचार्य के चार आम्नाय मठ: उत्तर में ज्योतिर्मठ, दक्षिण में शृंगेरी, पश्चिम में द्वारका और पूर्व में पुरी का गोवर्धन मठ। शृंगेरी में वैशाख शुक्ल पंचमी को शंकर जयंती बड़े उत्सव के साथ मनाई जाती है। तमिलनाडु का कांची कामकोटि पीठ भी स्वयं को आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित बताता है।
स्रोतों में अंतर
- शंकराचार्य का समय: ब्रिटानिका आधुनिक शोध के आधार पर लगभग 700–750 ई. देता है और बताता है कि पहले 788–820 ई. कहा जाता था; हिमालयन अकादमी 788–820 ई. लिखती है; कुछ मठों की परंपराएँ उन्हें ई.पू. 5वीं सदी में रखती हैं।
- संस्थापक: ब्रिटानिका शंकराचार्य को स्मार्तों का सबसे बड़ा आचार्य कहता है और “कुछ लोगों के अनुसार” संस्थापक; हिमालयन अकादमी उन्हें षण्मत व्यवस्था का संस्थापक कहती है।
- पाँच या छह देवता: ब्रिटानिका पंचायतन के पाँच देवता बताता है; हिमालयन अकादमी और कांची कामकोटि पीठ स्कंद को जोड़कर छह गिनते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
स्मार्त सम्प्रदाय क्या है?
स्मृति ग्रंथों के आचार पर चलने वाली परंपरा, जो सभी प्रमुख देवताओं को मानती है और पंचायतन पूजा में शिव, विष्णु, देवी, सूर्य और गणेश की एक साथ पूजा करती है। इसका दर्शन आदि शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत है।
पंचायतन पूजा क्या है?
“पाँच मंदिरों की पूजा”: स्मार्तों की वह पूजा जिसमें शिव, विष्णु, देवी (शक्ति), सूर्य और गणेश, पाँचों देवताओं की एक साथ उपासना होती है।
स्मार्त एकादशी और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?
कभी-कभी एकादशी व्रत दो लगातार दिनों पर पड़ता है। द्रिक पंचांग के अनुसार ऐसे में स्मार्त गृहस्थ पहले दिन व्रत रखते हैं, और दूसरा दिन संन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष की कामना वालों के लिए बताया जाता है; यही दूसरा दिन वैष्णव एकादशी का दिन होता है। इसलिए वैष्णव एकादशी कई बार स्मार्त एकादशी से एक दिन बाद होती है।
स्मार्त सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
आदि शंकराचार्य इस परंपरा के सबसे बड़े आचार्य माने जाते हैं, और कुछ लोग उन्हें संस्थापक भी कहते हैं। स्वयं परंपरा वेदों और स्मृतियों पर आधारित है, जो शंकराचार्य से पहले की हैं।
स्रोत
- बृहदारण्यक उपनिषद् 2.4.5
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Smarta sect”, “Shankara”, “Saura sect”, “Dashnami sannyasin”
- हिमालयन अकादमी (कौआई हिंदू मठ): “The Four Denominations of Hinduism”
- श्री कांची कामकोटि पीठ (kamakoti.org): “Our Heritage: Ganapatyam”, षण्मत की सूची
- श्री शृंगेरी शारदा पीठ: “Shankara Jayanti”, “The Amnaya Peethams” (sringeri.net)
- द्रिक पंचांग: एकादशी तिथियाँ (स्मार्त और वैष्णव)
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