परंपरा वैष्णवों के चार सम्प्रदाय मानती है: श्री सम्प्रदाय (आचार्य रामानुज, दर्शन विशिष्टाद्वैत), ब्रह्म सम्प्रदाय (मध्वाचार्य, द्वैत), रुद्र सम्प्रदाय (विष्णुस्वामी, और उनकी परंपरा में वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत) और सनकादि या कुमार सम्प्रदाय (निम्बार्काचार्य, द्वैताद्वैत)। हर सम्प्रदाय अपना मूल एक दिव्य आचार्य से मानता है: लक्ष्मी (श्री), ब्रह्मा, रुद्र (शिव) और सनक आदि चार कुमार। चार की यह गिनती नाभादास के भक्तमाल (16वीं सदी का अंत) में मिलती है, और पद्म पुराण के नाम से उद्धृत एक श्लोक में भी।
| नाम | मूल (परंपरा के अनुसार) | प्रमुख आचार्य | दर्शन | प्रमुख केंद्र |
|---|---|---|---|---|
| श्री सम्प्रदायश्रीवैष्णव | लक्ष्मी (श्री) | रामानुजाचार्य (लगभग 1017–1137); उनसे पहले यामुनाचार्य | विशिष्टाद्वैत | श्रीरंगम और कांचीपुरम (तमिलनाडु) |
| ब्रह्म सम्प्रदायमाध्व सम्प्रदाय | ब्रह्मा | मध्वाचार्य (आनंदतीर्थ), 13वीं–14वीं सदी | द्वैत (तत्त्ववाद) | उडुपी (कर्नाटक) |
| रुद्र सम्प्रदायविष्णुस्वामी सम्प्रदाय; आज मुख्यतः वल्लभ सम्प्रदाय (पुष्टिमार्ग) | रुद्र (शिव) | विष्णुस्वामी; उनकी परंपरा में वल्लभाचार्य (1479–1531) | शुद्धाद्वैत (वल्लभ) | नाथद्वारा (राजस्थान), ब्रज |
| सनकादि (कुमार) सम्प्रदायनिम्बार्क सम्प्रदाय | सनक आदि चार कुमार | निम्बार्काचार्य | द्वैताद्वैत (स्वाभाविक भेदाभेद) | निम्बार्क तीर्थ, सलेमाबाद (राजस्थान); वृंदावन |
चार की गिनती कहाँ से आती है
नाभादास के भक्तमाल (हिंदी, 16वीं सदी का अंत) के एक छप्पय में चार आचार्यों को कलियुग का “चतुर्व्यूह” कहा गया है: रामानुज, विष्णुस्वामी, मध्वाचार्य और निम्बादित्य (निम्बार्क)। उसके बाद के दोहे में हर आचार्य को उसके मूल से जोड़ा गया है: रामानुज को रमा (लक्ष्मी) से, विष्णुस्वामी को त्रिपुरारि (शिव) से, निम्बादित्य को सनकादि से और मध्व को चतुर्मुख ब्रह्मा से।
संस्कृत में यही बात एक श्लोक में कही जाती है जो पद्म पुराण का बताया जाता है: “सम्प्रदायविहीना ये मन्त्रास्ते निष्फला मताः”, यानी जो मंत्र किसी सम्प्रदाय से नहीं मिले वे निष्फल माने गए हैं, और कलियुग में श्री, ब्रह्म, रुद्र और सनक के चार वैष्णव सम्प्रदाय होंगे। 18वीं सदी के गौड़ीय आचार्य बलदेव विद्याभूषण अपनी प्रमेय-रत्नावली में इसे पद्म पुराण के नाम से उद्धृत करते हैं, और अगले श्लोक में चारों आचार्यों के नाम देते हैं।
हमें किसी स्रोत में इस श्लोक का पद्म पुराण में खंड और अध्याय नहीं मिला, इसलिए यहाँ अध्याय-संख्या नहीं दी गई। चारों आचार्य अलग-अलग सदियों में हुए; उन्हें चार सम्प्रदायों के रूप में एक साथ गिनना बाद की परंपरा का वर्गीकरण है।
चारों दर्शन संक्षेप में
विशिष्टाद्वैत (रामानुज): ब्रह्म एक है और अनगिनत शुभ गुणों वाला है। जीव और जगत सच्चे हैं और ब्रह्म से वैसे जुड़े हैं जैसे शरीर आत्मा से। यह ब्रह्म लक्ष्मी सहित विष्णु-नारायण हैं, और उन तक पहुँचने का साधन भक्ति और शरणागति (प्रपत्ति) है।
द्वैत (मध्व): ईश्वर और जीव दो अलग सत्ताएँ हैं और जीव का अस्तित्व ईश्वर पर निर्भर है। जगत बदलता रहता है, पर इससे वह असत्य नहीं हो जाता। मध्व के अनुयायी अपने मत को तत्त्ववाद कहते हैं।
शुद्धाद्वैत (वल्लभ): ईश्वर और जगत एक हैं, और जगत को माया या भ्रम नहीं माना जाता। मुक्ति केवल ईश्वर की कृपा (पुष्टि) से मिलती है, और भक्त को स्वयं को पूरी तरह ईश्वर को समर्पित करना होता है।
द्वैताद्वैत (निम्बार्क): ब्रह्म, यानी श्रीकृष्ण, जीव और जगत से भिन्न भी है और अभिन्न भी। यह भेद और अभेद दोनों उसके स्वभाव में हैं, किसी बाहरी उपाधि से नहीं, इसलिए इसे स्वाभाविक भेदाभेद भी कहते हैं।
बाद की वैष्णव परंपराएँ
गौड़ीय वैष्णव: चैतन्य महाप्रभु (ब्रिटानिका के अनुसार 1485–1533) से बंगाल और ओडिशा में 16वीं सदी से चली कृष्ण-भक्ति, जिसमें सामूहिक कीर्तन प्रमुख है। उनके छह गोस्वामियों ने वृंदावन में इसका दर्शन लिखा, जिसे अचिन्त्य भेदाभेद कहते हैं। यह परंपरा अपनी गुरु-परंपरा मध्वाचार्य से जोड़कर स्वयं को ब्रह्म (माध्व) सम्प्रदाय की शाखा मानती है; इस्कॉन (ISKCON) इसी परंपरा में है।
रामानंदी: रामानंद (लगभग 1400–1470) से जुड़ी परंपरा। अनुयायी रामानंद को रामानुज की परंपरा में पाँचवाँ आचार्य मानते हैं। ब्रिटानिका के अनुसार आज यह उत्तर भारत का सबसे बड़ा वैष्णव साधु-समाज है।
पुष्टिमार्ग: वल्लभाचार्य और उनके पुत्र विट्ठलनाथ की परंपरा। ब्रिटानिका के अनुसार वल्लभ विष्णुस्वामी के रुद्र सम्प्रदाय के थे, और इसी से पुष्टिमार्ग को रुद्र सम्प्रदाय भी कहा जाता है।
वारकरी पंथ: महाराष्ट्र की लगभग 700 वर्ष पुरानी भक्ति परंपरा, जो विष्णु के रूप पंढरपुर के विट्ठल (विठोबा) की उपासना करती है और हर वर्ष पैदल यात्रा करते हुए जुलाई की शुरुआत में पंढरपुर पहुँचती है। ज्ञानदेव, नामदेव और तुकाराम इसके प्रमुख संत हैं।
स्वामीनारायण सम्प्रदाय: सहजानंद स्वामी (1781–1830), जिन्हें अनुयायी स्वामीनारायण कहते हैं, ने 1800 में रामानंद स्वामी से दीक्षा ली और 1801 से गुजरात में यह परंपरा आगे बढ़ाई। इसके मुख्य ग्रंथ शिक्षापत्री (1826) और वचनामृत हैं, और एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन इसके दर्शन की नींव रामानुज के विशिष्टाद्वैत को बताता है।
स्रोतों में अंतर
- क्रम और नाम: भक्तमाल का छप्पय रामानुज, विष्णुस्वामी, मध्वाचार्य, निम्बादित्य के क्रम में नाम देता है; पद्म पुराण के नाम से उद्धृत श्लोक का क्रम श्री, ब्रह्म, रुद्र, सनक है।
- पद्म पुराण वाला श्लोक: बलदेव विद्याभूषण इसे पद्म पुराण का बताते हैं, पर हमें इसका खंड-अध्याय किसी स्रोत में नहीं मिला। गौड़ीय परंपरा के विद्वान जगदानंद दास (जान ब्रज़ेज़िंस्की) भी लिखते हैं कि इसका ठीक संदर्भ कहीं नहीं दिया गया।
- गौड़ीय और माध्व: गौड़ीय परंपरा अपनी गुरु-परंपरा मध्व से जोड़ती है (प्रमेय-रत्नावली); कुछ विद्वानों ने इस संबंध पर प्रश्न उठाए हैं।
- रामानंदी और रामानुज: अनुयायी रामानंद को रामानुज की परंपरा में मानते हैं; ब्रिटानिका के अनुसार कुछ विद्वानों ने, और 20वीं सदी की शुरुआत में कुछ रामानंदियों ने भी, इस संबंध पर प्रश्न उठाए।
- आचार्यों का समय: रामानुज के लिए परंपरागत लगभग 1017–1137 के बजाय कुछ नए शोध 1077–1157 देते हैं (इंटरनेट एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी); मध्व के लिए 1238–1317 और 1199–1278, दोनों मत मिलते हैं (ब्रिटानिका)। निम्बार्क के समय पर मतभेद “निम्बार्क सम्प्रदाय” पन्ने पर है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वैष्णव सम्प्रदाय कितने हैं?
परंपरा चार मानती है: श्री (रामानुज), ब्रह्म (मध्व), रुद्र (विष्णुस्वामी, वल्लभ) और सनकादि या कुमार (निम्बार्क)। इनके अलावा गौड़ीय, रामानंदी, वारकरी और स्वामीनारायण जैसी बाद की वैष्णव परंपराएँ भी हैं, जिनमें से कई स्वयं को इन चार में से किसी एक से जोड़ती हैं।
चार वैष्णव सम्प्रदायों के आचार्य कौन हैं?
श्री सम्प्रदाय के रामानुजाचार्य, ब्रह्म सम्प्रदाय के मध्वाचार्य, रुद्र सम्प्रदाय के विष्णुस्वामी (और उनकी परंपरा में वल्लभाचार्य), और सनकादि सम्प्रदाय के निम्बार्काचार्य।
इस्कॉन किस वैष्णव सम्प्रदाय में आता है?
इस्कॉन चैतन्य महाप्रभु की गौड़ीय परंपरा में है। गौड़ीय परंपरा अपनी गुरु-परंपरा मध्वाचार्य से जोड़कर स्वयं को ब्रह्म (माध्व) सम्प्रदाय की शाखा मानती है, हालाँकि कुछ विद्वान इस संबंध पर प्रश्न उठाते हैं।
चार सम्प्रदायों वाला श्लोक किस ग्रंथ में है?
यह श्लोक पद्म पुराण के नाम से उद्धृत किया जाता है, जैसे बलदेव विद्याभूषण की प्रमेय-रत्नावली (18वीं सदी) में। पद्म पुराण में इसका खंड-अध्याय हमें किसी स्रोत में नहीं मिला। चारों आचार्यों का एक साथ उल्लेख नाभादास के हिंदी भक्तमाल में भी है।
वैष्णव तिलक कैसा होता है?
ब्रिटानिका के अनुसार वैष्णव तिलक के कई रूप हैं, पर सामान्यतः यह अंग्रेज़ी अक्षर U जैसी दो या अधिक खड़ी रेखाएँ होता है, जो विष्णु के चरण का प्रतीक मानी जाती हैं, बीच में रेखा या बिंदु के साथ या बिना। हर सम्प्रदाय का अपना रूप है।
स्रोत
- नाभादास, भक्तमाल, छप्पय 28 और दोहा 29 (archive.org पर “मूल भक्तमाल” संस्करण की गिनती)
- बलदेव विद्याभूषण, प्रमेय-रत्नावली, प्रथम प्रमेय, श्लोक 5–7
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Vaishnavism”, “Ramanuja”, “Madhva”, “Vallabha”, “Vallabhacharya”, “Chaitanya movement”, “Ramananda”, “Swami-Narayani”, “Varakari Panth”, “Jnanadeva”, “tilak”
- इंटरनेट एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी: “Ramanuja”, “Madhva”, “Bhedabheda Vedanta”
- एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन: “Nimbārka” (बिमल कृष्ण मतिलाल), “Swaminarayan Movement” (हन्ना एच. किम)
- जगदानंद दास (जान ब्रज़ेज़िंस्की): “Is the Gaudiya Vaishnava sampradaya connected to the Madhva line?”
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