णमोकार (नवकार) मंत्र जैन धर्म का मूल मंत्र है, प्राकृत भाषा में, जिसमें पाँच परमेष्ठियों को नमस्कार है: णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं, यानी अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और लोक के सभी साधुओं को नमस्कार। दिगंबर परंपरा के षट्खंडागम (1.1.1) में यही पाँच पद हैं; श्वेतांबर पुस्तकों में इनके बाद चार पदों की चूलिका भी छपती है (एसो पंच नमुक्कारो…), इसलिए इसे नौ पदों का नवकार कहते हैं। मंत्र किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं लेता, गुणों को नमन करता है।
पाँच पद: पाठ और अर्थ
- णमो अरिहंताणंṇamo arihantāṇaṃअरिहंतों को नमस्कार: जो पूजा के योग्य हैं और जिन्होंने भीतर के शत्रुओं, यानी कर्म और राग-द्वेष, को जीत लिया है; तीर्थंकर इन्हीं में गिने जाते हैं।
- णमो सिद्धाणंṇamo siddhāṇaṃसिद्धों को नमस्कार: वे मुक्त आत्माएँ जिनकी साधना पूरी हो चुकी और जो मोक्ष पा चुकी हैं।
- णमो आयरियाणंṇamo āyariyāṇaṃआचार्यों को नमस्कार: साधु-संघ के नायक और उपदेशक।
- णमो उवज्झायाणंṇamo uvajjhāyāṇaṃउपाध्यायों को नमस्कार: वे मुनि जो शास्त्र पढ़ाते हैं।
- णमो लोए सव्वसाहूणंṇamo loe savvasāhūṇaṃलोक के सभी साधुओं को नमस्कार। धवला टीका के अनुसार “लोक” और “सब” पाँचों पदों पर लागू होते हैं: हर क्षेत्र और हर काल के सभी परमेष्ठियों को नमन।
चूलिका: श्वेतांबर पुस्तकों के चार पद
- एसो पंच नमुक्कारोeso paṃca namukkāroयह पाँच नमस्कार
- सव्वपावप्पणासणोsavva-pāvappaṇāsaṇoसब पापों का नाश करने वाला है,
- मंगलाणं च सव्वेसिंmaṃgalāṇaṃ ca savvesiṃऔर सब मंगलों में
- पढमं हवइ मंगलंpaḍhamaṃ havai maṃgalaṃपहला मंगल है।
पाँच संस्करणों में पाठ, शब्दशः
हमने यह मंत्र दोनों परंपराओं के छपे संस्करणों में पढ़ा और शब्द-शब्द मिलाया। पाँचों पद सब संस्करणों में एक ही हैं; अंतर केवल वर्तनी के हैं: दिगंबर षट्खंडागम “णमो” (ण) छापता है, श्वेतांबर संस्करण “नमो” (न); षट्खंडागम में “आइरियाणं” है, बाकी में “आयरियाणं”; और तेरापंथ के जैन विश्व भारती संस्करण में “अरहंताणं”।
| षट्खंडागम 1.1.1 (दिगंबर, 1939) | आवश्यक सूत्र (स्थानकवासी, 1985) | पंच प्रतिक्रमण (मूर्तिपूजक, 1921) | नवसुत्ताणि (तेरापंथ, 2000) | भगवती सूत्र 1.1 (2005) |
|---|---|---|---|---|
| णमो अरिहंताणं | नमो अरिहंताणं | नमो अरिहंताणं | नमो अरहंताणं | नमो अरिहंताणं |
| णमो सिद्धाणं | नमो सिद्धाणं | नमो सिद्धाणं | नमो सिद्धाणं | नमो सिद्धाणं |
| णमो आइरियाणं | नमो आयरियाणं | नमो आयरियाणं | नमो आयरियाणं | नमो आयरियाणं |
| णमो उवज्झायाणं | नमो उवज्झायाणं | नमो उवज्झायाणं | नमो उवज्झायाणं | नमो उवज्झायाणं |
| णमो लोए सव्व-साहूणं | नमो लोए सव्वसाहूणं | नमो लोए सव्वसाहूणं | नमो लोए सव्वसाहूणं | नमो लोए सव्व साहूणं |
ण और न: दिवाकर प्रकाशन की पुस्तक (सुराणा और बोथरा) कहती है कि “णमो” और “नमो” दोनों उच्चारण ठीक हैं। अरिहंत, अरहंत, अर्हंत और अरुहंत: आवश्यक सूत्र (ब्यावर) के संपादक लिखते हैं कि आचार्यों ने इस पद के कई पाठ बताए हैं; भगवती सूत्र पर अभयदेव सूरि की टीका “अरहंत” को पूजा के योग्य और “अरिहंत” को कर्म-शत्रुओं का नाश करने वाला समझाती है। जैनी के अनुसार दोनों संस्कृत “अर्हत्” के प्राकृत रूप हैं।
चूलिका: कौन पढ़ता है
श्वेतांबर पुस्तकों में मंत्र नौ पदों में छपता है: पाँच नमस्कार और चार पदों की चूलिका। मूर्तिपूजक परंपरा के पंच प्रतिक्रमण (1921) और स्थानकवासी परंपरा के आवश्यक सूत्र (1985) दोनों नौ पद देते हैं; आवश्यक सूत्र के संपादक लिखते हैं कि नवकार मंत्र में नौ पद हैं, पाँच मूल पद और चार चूलिका के। तेरापंथ का समालोचित संस्करण (नवसुत्ताणि) सूत्र में पाँच पद रखता है और चूलिका को टिप्पणी में आवश्यक-निर्युक्ति की गाथा 1018 के रूप में देता है।
दिगंबर आगम षट्खंडागम (1.1.1) में केवल पाँच पद हैं। जैना शिक्षा समिति के पाठ्यक्रम के अनुसार कुछ जैन परंपराएँ अंतिम चार पद नहीं जोड़तीं। कौन-सी परंपरा रोज़ के पाठ में चूलिका पढ़ती है और कौन नहीं, इस पर हमें कोई ऐसा स्रोत नहीं मिला जो हर संप्रदाय के लिए साफ़ कहे; इसलिए अपने गुरु या मंदिर की परंपरा मानें।
कब पढ़ा जाता है
जैनी के अनुसार आशाधर का सागारधर्मामृत (6.1–3) गृहस्थ को सलाह देता है कि वह ब्राह्म मुहूर्त में उठकर पंच नमस्कार पढ़े; मंदिर में मुख्य वेदी के पास पहुँचकर और पूजा के आरंभ और जयमाला के अंत में भी यही मंत्र पढ़ा जाता है। आवश्यक सूत्र के प्रत्याख्यान अध्याय में पहला प्रत्याख्यान “नमुक्कार-सहियं” है: सूर्योदय के बाद भोजन-पान तब तक नहीं, जब तक नमस्कार के साथ वह पूरा न किया जाए (प्रचलित नाम नवकारसी)। कायोत्सर्ग भी “नमो अरहंताणं” कहकर पूरा होता है, और शास्त्र पढ़ने से पहले भी नमस्कार का नियम है।
उपवास (पौषध) के दिन व्यक्ति यह मंत्र जपता या शास्त्र पढ़ता है, और जैनी के अनुसार जीवन के अंतिम समय (सल्लेखना) में व्यक्ति मन में यही मंत्र दोहराता है या दूसरों से सुनता है। परंपरा के अनुसार माला के 108 मनके पाँच परमेष्ठियों के 108 गुणों के हैं: अरिहंत के 12, सिद्ध के 8, आचार्य के 36, उपाध्याय के 25 और साधु के 27 (जैना शिक्षा समिति; आवश्यक सूत्र, ब्यावर)।
सबसे पुराने प्रमाण
ओडिशा में उदयगिरि की हाथीगुंफा गुफा पर राजा खारवेल का अभिलेख पहली पंक्ति में ही “नमो अरहंतानं, नमो सव-सिधानं” कहता है: अरिहंतों को और सब सिद्धों को नमस्कार। इसमें केवल ये दो नमस्कार हैं। अभिलेख का समय विवादित है; जैनी लगभग 150 ई.पू. और एल. एम. जोशी पहली सदी ई.पू. बताते हैं। जोशी के अनुसार विद्वान रॉथ इसे मंत्र का पुराना, छोटा रूप मानते हैं।
दिगंबर आगम षट्खंडागम पाँचों पदों से शुरू होता है, और उस पर वीरसेन की धवला टीका इसे आचार्य पुष्पदंत का मंगल-सूत्र कहती है; जैनी के अनुसार एक दिगंबर परंपरा मंत्र को पुष्पदंत (लगभग दूसरी सदी ई.) की रचना मानती है। श्वेतांबर आगम भगवती सूत्र भी पाँच नमस्कारों से शुरू होता है; छपे संस्करणों में उनके बाद ब्राह्मी लिपि और श्रुत को नमस्कार हैं। एक श्वेतांबर मत के अनुसार इसका अर्थ तीर्थंकरों ने और सूत्र गणधरों ने दिया (प्रज्ञापना सूत्र की भूमिका)।
भाषा प्राकृत है। जैनी के अनुसार श्वेतांबर आगम परंपरा से अर्धमागधी में माने जाते हैं और दिगंबर षट्खंडागम शौरसेनी प्राकृत में है; षट्खंडागम का “ण” और “आइरिय” इसी से मेल खाते हैं। जैनी यह भी लिखते हैं कि मंत्र में किसी एक व्यक्ति, महावीर तक का, नाम नहीं; भक्ति एक आदर्श के प्रति है।
परंपराओं और स्रोतों में अंतर
- ण/न: दिगंबर षट्खंडागम “णमो”, श्वेतांबर संस्करण “नमो”; दोनों उच्चारण ठीक माने जाते हैं (दिवाकर प्रकाशन)।
- अरिहंताणं/अरहंताणं: अधिकतर संस्करण “अरिहंताणं”; जैन विश्व भारती का नवसुत्ताणि और खारवेल का अभिलेख “अरहंत-”। अभयदेव सूरि और आवश्यक सूत्र के संपादक अरुहंत आदि और पाठ भी गिनाते हैं।
- आयरियाणं/आइरियाणं: षट्खंडागम (1939) “आइरियाणं”, श्वेतांबर संस्करण “आयरियाणं”।
- चूलिका का पहला पद: “पंच नमुक्कारो” (पंच प्रतिक्रमण, नवसुत्ताणि), “पंच नमोक्कारो” (आवश्यक सूत्र, ब्यावर), “पंच णमोक्कारो” (दिवाकर प्रकाशन)।
- “लोए”: नवसुत्ताणि की टिप्पणी के अनुसार आवश्यक-चूर्णि में “लोए” नहीं है और हरिभद्र तथा मलयगिरि की टीकाएँ भी इसे नहीं समझातीं; आज के सभी छपे पाठों में यह है।
- भगवती सूत्र: जैनी लिखते हैं कि वहाँ पाँचवाँ नमस्कार साधुओं की जगह ब्राह्मी लिपि को है; जो छपे संस्करण हमने पढ़े (2005, और जोशी के अनुसार ललवानी का) उनमें साधुओं वाला पद भी है और ब्राह्मी लिपि का भी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
णमोकार मंत्र का अर्थ क्या है?
अरिहंतों को, सिद्धों को, आचार्यों को, उपाध्यायों को और लोक के सभी साधुओं को नमस्कार। धवला के अनुसार “लोक” और “सब” हर पद पर लागू होते हैं।
नवकार मंत्र में कितने पद हैं?
श्वेतांबर पुस्तकों में नौ: पाँच नमस्कार और चार पदों की चूलिका (एसो पंच नमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं)। दिगंबर षट्खंडागम में पाँच।
णमो सही है या नमो?
दोनों। दिगंबर षट्खंडागम “णमो” छापता है और श्वेतांबर संस्करण “नमो”; दिवाकर प्रकाशन के अनुसार दोनों उच्चारण ठीक हैं।
णमोकार मंत्र किसने रचा?
परंपराएँ अलग बताती हैं। एक दिगंबर परंपरा इसे षट्खंडागम के रचयिता आचार्य पुष्पदंत की रचना मानती है (जैनी); एक श्वेतांबर मत के अनुसार अर्थ तीर्थंकरों ने और सूत्र गणधरों ने दिया। सबसे पुराना लिखित प्रमाण खारवेल का अभिलेख है, जिसमें पहले दो नमस्कार हैं।
यह मंत्र कब पढ़ते हैं?
परंपरा के अनुसार सुबह उठते ही, मंदिर में और पूजा के आरंभ में, भोजन के प्रत्याख्यान (नवकारसी) को पूरा करते समय, कायोत्सर्ग के अंत में, शास्त्र पढ़ने से पहले, उपवास के दिन और जीवन के अंतिम समय में। इसे किसी भी समय पढ़ा जा सकता है (जैना शिक्षा समिति)।
स्रोत
- षट्खंडागम, वीरसेन की धवला टीका सहित, पुस्तक 1, सं. हीरालाल जैन, जैन साहित्योद्धारक फंड, अमरावती 1939, पृ. 8 और 52 (jainqq.org/explore/001395)
- आवश्यक सूत्र (आगम 28), आगम प्रकाशन समिति, ब्यावर 1985, पृ. 4–7 (jainqq.org/explore/003464)
- सुखलाल संघवी, पंच प्रतिक्रमण (अर्थ सहित), आत्मानंद जैन पुस्तक प्रचारक मंडल, आगरा 1921, पृ. 1–2 (jainqq.org/explore/003649)
- नवसुत्ताणि, वाचना-प्रमुख आचार्य तुलसी, सं. आचार्य महाप्रज्ञ, जैन विश्व भारती, लाडनूं 2000, आवस्सयं अध्याय 1, 5, 6 (jainqq.org/explore/003556)
- भगवती (व्याख्याप्रज्ञप्ति) सूत्र, भाग 1, सं. अमर मुनि और श्रीचंद सुराना, पद्म प्रकाशन, दिल्ली 2005, पृ. 3 (jainqq.org/explore/002902)
- शशि कांत, द हाथीगुंफा इंस्क्रिप्शन ऑफ़ खारवेल एंड द भाब्रू एडिक्ट ऑफ़ अशोक, डी. के. प्रिंटवर्ल्ड 2000 (पंक्ति 1 और पाठभेद); के. पी. जायसवाल और आर. डी. बनर्जी, एपिग्राफ़िया इंडिका खंड 20
- एल. एम. जोशी, फ़ैसेट्स ऑफ़ जैन रिलिजियसनेस इन कम्पैरेटिव लाइट, एल. डी. इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडोलॉजी, अहमदाबाद 1981, पृ. 54–55
- पद्मनाभ एस. जैनी, द जैन पाथ ऑफ़ प्योरिफ़िकेशन (मोतीलाल बनारसीदास), पृ. 42, 47, 162–163, 199, 201, 217, 232
- हरगोविंददास टी. सेठ, पाइअ-सद्द-महण्णवो (प्राकृत-हिंदी कोश): अरहंत, अरिहंत, आयरिय, उवज्झाय, णमो, णमोकार, साहु
- जैना एजुकेशन कमेटी, JES 401 जैन फ़िलॉसफ़ी एंड प्रैक्टिस 2, पृ. 20–21; प्रज्ञापना सूत्र भाग 1 की भूमिका (गुरु रामचंद्र प्रकाशन); श्रीचंद सुराना और सुरेंद्र बोथरा, इलस्ट्रेटेड नमोकार महामंत्र (दिवाकर प्रकाशन)
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