जैन और वैदिक परंपरा: साझी विरासत

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जैन धर्म · साझी विरासत: जैन और वैदिक परंपरा: साझी विरासत. ऋषभदेव, राम, अयोध्या और दीपावली, दोनों परंपराओं के ग्रंथों में
संक्षेप में

जैन और वैदिक-पौराणिक परंपराएँ अलग-अलग हैं, पर कुछ नाम और स्थान दोनों में आते हैं। ऋषभदेव भागवत पुराण (स्कंध 5, अध्याय 3–6) में स्वायंभुव मनु के वंश में राजा नाभि और मेरुदेवी के पुत्र और विष्णु के अवतार हैं; जैन ग्रंथों में वही ऋषभदेव पहले राजा और पहले तीर्थंकर हैं, और इक्ष्वाकु नाम उन्हीं से चलता है। राम वाल्मीकि रामायण में वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु के वंश में हैं; विमलसूरि के प्राकृत पउमचरियं में राम (पद्म) आठवें बलदेव हैं, उसी इक्ष्वाकु वंश के जो जैन परंपरा में ऋषभदेव से शुरू होता है। यानी जैन परंपरा राम को ऋषभदेव से शुरू होने वाले वंश में रखती है, जबकि पुराण ऋषभदेव और राम को दो अलग वंशों में रखते हैं। अयोध्या जैन परंपरा में पाँच तीर्थंकरों की जन्मभूमि है, और दीपावली दोनों परंपराओं में मनती है, अलग कारणों से। यह पन्ना हर परंपरा की बात उसी के ग्रंथ से कहता है, किसी को दूसरी से ऊपर नहीं रखता।

ऋषभदेव भागवत पुराण में

भागवत पुराण के पाँचवें स्कंध में वंश इस क्रम में है: स्वायंभुव मनु के पुत्र प्रियव्रत (5.1.22), प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र, जो जंबूद्वीप के राजा बने (5.1.24–25, 5.2.1), और आग्नीध्र के नौ पुत्रों में पहले नाभि (5.2.19)। संतान की इच्छा से नाभि अपनी पत्नी मेरुदेवी के साथ यज्ञ करते हैं और भगवान प्रकट होते हैं (5.3.1–2)। भगवान कहते हैं कि उनके जैसा पुत्र दुर्लभ है, इसलिए वे स्वयं अंश रूप में आग्नीध्र के पुत्र के घर अवतरित होंगे (5.3.17–18)। गीता प्रेस और भक्तिवेदांत संस्करणों में 5.3.20 कहता है कि वे “वातरशना श्रमण” ऋषियों के धर्म दिखाने के लिए मेरुदेवी के गर्भ से अवतरित हुए; GRETIL के संस्कृत पाठ में यह श्लोक नहीं है।

बालक के गुणों के कारण पिता ने उसका नाम ऋषभ (“श्रेष्ठ”) रखा (5.4.2)। ऋषभ के सौ पुत्रों में सबसे बड़े भरत थे, जिनके नाम से यह देश भारतवर्ष कहलाता है (5.4.9)। ऋषभ अपने पुत्रों को उपदेश देते हैं (5.5), भरत को राज्य देकर दिगंबर, अवधूत के रूप में निकल जाते हैं (5.5.28), और अंत में दक्षिण कर्णाटक के कोंक, वेंक और कुटक प्रदेश में कुटकाचल के पास वन की आग में उनका शरीर जल जाता है (5.6.7–8)। भागवत उन्हें अवतारों में गिनता है: आठवाँ अवतार, नाभि और मेरुदेवी के पुत्र (1.3.13); 2.7.10 में उनकी माता का नाम सुदेवी है।

इसके बाद भागवत (5.6.9–11) भविष्यवाणी के रूप में कहता है कि कोंक, वेंक और कुटक का “अर्हत्” नाम का एक राजा ऋषभ के आचरण की नकल करके कलियुग में एक ऐसा मार्ग चलाएगा जिसे पुराण अनुचित कहता है। संस्कृत पाठ में “जैन” शब्द नहीं है; भक्तिवेदांत अनुवाद का “यही जैन धर्म का आरंभ था” वाक्य अनुवादक का है, मूल का नहीं। जैन ग्रंथ ऋषभदेव का जीवन बिल्कुल अलग ढंग से, अपने धर्म के पहले तीर्थंकर के रूप में, कहते हैं।

ऋषभदेव जैन ग्रंथों में

कल्पसूत्र (याकोबी का अनुवाद) ऋषभ को “कोसलीय” अर्हत् कहता है (§ 204); याकोबी की टिप्पणी के अनुसार इसलिए कि उनका जन्म कोसल, यानी अयोध्या में हुआ। वे “इक्ष्वाकु-भूमि” में कुलकर नाभि की पत्नी मरुदेवी के गर्भ में आए (§ 206); कुलकर पहले राजा और कुलों के संस्थापक थे, और नाभि सातवें, अंतिम कुलकर। उनके पाँच नाम थे: ऋषभ, प्रथम राजा, प्रथम भिक्षु, प्रथम जिन और प्रथम तीर्थंकर (§ 210)। उन्होंने लेखन से लेकर शकुन तक 72 कलाएँ और सौ शिल्प सिखाए, सौ पुत्रों का राज्याभिषेक किया और विनीता नगरी से दीक्षा ली (§ 211); केवलज्ञान पाया (§ 212) और अष्टापद पर्वत पर निर्वाण पाया (§ 227)।

इक्ष्वाकु नाम की कथा: हेमचंद्र के त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र (पर्व 1, सर्ग 2) के अनुसार जब बालक ऋषभ एक वर्ष के होने वाले थे, इंद्र गन्ने का डंठल लेकर आए, बालक ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया, और इसलिए इंद्र ने उनके कुल का नाम “इक्ष्वाकु” रखा। जिनसेन का (दिगंबर) आदिपुराण (16.264) दूसरा कारण देता है: भगवान ने लोगों को गन्ने का रस निकालना सिखाया, इसलिए वे इक्ष्वाकु कहलाए। विमलसूरि का पउमचरियं (5.1–3) कहता है कि पृथ्वी के चार बड़े वंशों में पहला इक्ष्वाकु वंश है, जो भरत के पुत्र आदित्ययश से आगे चला।

राम: वाल्मीकि रामायण और पउमचरियं

वाल्मीकि रामायण में वसिष्ठ राम का वंश बताते हैं: अव्यक्त से ब्रह्मा, ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि से कश्यप, कश्यप से विवस्वान, और विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु; मनु पहले प्रजापति थे और उनके पुत्र इक्ष्वाकु अयोध्या के पहले राजा (बालकांड 70.19–21 गीता प्रेस क्रम में; समालोचित संस्करण में 1.69.17–19)। यही वंशावली अयोध्याकांड में फिर आती है (2.110.5–7; समालोचित संस्करण में 2.102)। वहाँ से वंश कुक्षि, विकुक्षि आदि से होते हुए दशरथ और उनके पुत्रों राम और लक्ष्मण तक आता है (1.70.43)।

विमलसूरि का पउमचरियं प्राकृत में जैन रामकथा है, जिसमें राम का नाम पउम (पद्म) भी है। उसमें राजा श्रेणिक गौतम गणधर से “आठवें बलदेव” का वंश और कथा पूछते हैं (20.2)। जैन परंपरा के हर काल-चक्र में नौ बलदेव, नौ वासुदेव और नौ प्रतिवासुदेव होते हैं; पउमचरियं में आठवें बलदेव राम, आठवें वासुदेव लक्ष्मण और आठवें प्रतिवासुदेव रावण हैं (20.199–204)। रावण का वध लक्ष्मण चक्र से करते हैं (सर्ग 73)। लक्ष्मण की मृत्यु के बाद राम दीक्षा लेते हैं (सर्ग 114), केवलज्ञान पाते हैं (सर्ग 117) और निर्वाण पाते हैं (सर्ग 118)। राजा दशरथ इक्ष्वाकु कुल के हैं और साकेतपुरी (अयोध्या) में राज करते हैं।

पउमचरियं स्वयं कहता है कि वह महावीर के निर्वाण के 530 वर्ष बाद रचा गया (118.103)। विद्वान इसके समय पर एकमत नहीं: संपादक वी. एम. कुलकर्णी के अनुसार याकोबी इसे लगभग तीसरी सदी ई. का मानते थे, और कुलकर्णी भी इसी को स्वीकार करते हैं; दूसरे विद्वानों ने पहली सदी ई. और बाद की तिथियाँ भी दी हैं।

एक नाम, दो वंश-क्रम

भागवत पुराण में ऋषभदेव पहले मन्वंतर में हैं: इस कल्प के पहले मनु स्वायंभुव (8.1.4), और ऋषभ उनके पुत्र प्रियव्रत के वंश में (5.6.14)। राम सातवें मनु के वंश में हैं: विवस्वान के पुत्र श्राद्धदेव, यानी वैवस्वत मनु, सातवें मनु हैं (8.13.1), इक्ष्वाकु उनके पुत्र (9.1.11–12; 9.6.4 में मनु की छींक से जन्म), और इसी वंश में रघु, अज, दशरथ और राम (9.10.1–2)। इस तरह पुराण ऋषभदेव और राम को दो अलग मन्वंतरों और दो अलग वंशों में रखते हैं।

जैन ग्रंथों में इक्ष्वाकु नाम ऋषभदेव से ही शुरू होता है (हेमचंद्र; आदिपुराण 16.264), और यही वंश उनके पुत्र भरत से आगे चलकर दशरथ और राम तक आता है (पउमचरियं 5.3)। यानी दोनों परंपराएँ “इक्ष्वाकु” नाम उन वंशों के लिए प्रयोग करती हैं जिनका आरंभ अलग है। यह तुलना हमारी है; दोनों पक्ष अपने-अपने ग्रंथ से हैं।

अयोध्या जैन परंपरा में

हेमचंद्र के त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र के अनुसार अयोध्या (जिसे विनीता भी कहते हैं) पाँच तीर्थंकरों की जन्मभूमि है: पहले ऋषभदेव (आदिनाथ), दूसरे अजितनाथ, चौथे अभिनंदननाथ, पाँचवें सुमतिनाथ और चौदहवें अनंतनाथ। कल्पसूत्र ऋषभ के लिए “विनीता” और याकोबी की टिप्पणी “कोसल या अयोध्या” कहती है; पउमचरियं अयोध्या को साकेतपुरी कहता है (28.94)।

अयोध्या ज़िले की सरकारी वेबसाइट भी इन पाँच तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में बताती है, और श्वेतांबर जैन मंदिर तथा रायगंज के “बड़ी मूर्ति” मंदिर का उल्लेख करती है, जिसमें ऋषभदेव की 31 फ़ुट की प्रतिमा है।

दीपावली दोनों परंपराओं में

जैन परंपरा में दीपावली महावीर के निर्वाण का पर्व है: कल्पसूत्र (§§ 123–128) के अनुसार कार्तिक अमावस्या की रात पावा में महावीर का निर्वाण हुआ और राजाओं ने यह कहकर दीप जलाए कि ज्ञान का प्रकाश चला गया, अब भौतिक प्रकाश करेंगे; जिनसेन का हरिवंशपुराण (66.19–21, 783 ई.) कहता है कि तब से भारत के लोग हर वर्ष “दीपालिका” से जिनेंद्र के निर्वाण की पूजा करते हैं।

हिंदू परंपरा में दीपावली लक्ष्मी पूजा का पर्व है, और उत्तर भारत की परंपरा इसे रावण-वध के बाद श्रीराम के अयोध्या लौटने से जोड़ती है (देखें हमारा दीपावली पन्ना)। वाल्मीकि रामायण में राम के स्वागत का वर्णन है, भरत के आदेश से देव-पूजा, संगीत, फूल, धान की खील और हर घर पर ध्वजाएँ, जो सूर्योदय तक सज जाएँ (युद्धकांड, समालोचित संस्करण 6.115.2–8, गीता प्रेस क्रम में 6.127); उसमें इस अवसर पर दीप जलाने का उल्लेख हमें नहीं मिला। दोनों परंपराएँ एक ही रात दीप जलाती हैं, अपने-अपने कारण से।

परंपराओं और स्रोतों में अंतर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या ऋषभदेव हिंदू धर्म में भी हैं?

हाँ। भागवत पुराण (5.3–6) में ऋषभ राजा नाभि और मेरुदेवी के पुत्र और विष्णु के अवतार हैं, आठवें अवतार के रूप में गिने गए (1.3.13)। जैन धर्म में वे पहले तीर्थंकर हैं। दोनों परंपराएँ उनका जीवन अपने ढंग से कहती हैं।

जैन रामायण में राम कौन हैं?

विमलसूरि के पउमचरियं में राम (पद्म) आठवें बलदेव हैं, लक्ष्मण आठवें वासुदेव और रावण आठवें प्रतिवासुदेव; रावण का वध लक्ष्मण करते हैं, और राम अंत में दीक्षा लेकर निर्वाण पाते हैं (सर्ग 73, 114–118)।

क्या राम ऋषभदेव के वंश में थे?

जैन परंपरा में हाँ: इक्ष्वाकु वंश ऋषभदेव से शुरू होता है और भरत से आगे दशरथ और राम तक आता है (पउमचरियं 5.3)। भागवत पुराण में नहीं: वहाँ ऋषभ स्वायंभुव मनु के वंश में हैं और राम वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु के वंश में (8.13.1, 9.1, 9.10)।

अयोध्या में कितने तीर्थंकरों का जन्म हुआ?

जैन परंपरा के अनुसार पाँच: ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और अनंतनाथ (हेमचंद्र; अयोध्या ज़िले की वेबसाइट)।

स्रोत

  1. भागवत पुराण 1.3.13; 2.7.10; 5.1–5.6; 8.1.4; 8.13.1; 9.1; 9.6.4; 9.10.1–2 (भक्तिवेदांत संस्करण, vedabase.io; संस्कृत पाठ GRETIL से मिलाया)
  2. वाल्मीकि रामायण, बालकांड 70 और अयोध्याकांड 110, युद्धकांड 124–128 (गीता प्रेस क्रम, valmikiramayan.net); बड़ौदा समालोचित संस्करण 1.69, 2.102, 6.112–116 (GRETIL)
  3. कल्पसूत्र, ऋषभ-चरित्र §§ 204–227 और महावीर-चरित्र §§ 122–128 (हरमन याकोबी का अनुवाद, Sacred Books of the East खंड 22, 1884)
  4. हेमचंद्र, त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र, पर्व 1–4 (हेलेन एम. जॉनसन का अनुवाद, wisdomlib.org)
  5. जिनसेन, आदिपुराण, पर्व 16 (सं. पन्नालाल जैन, भारतीय ज्ञानपीठ)
  6. विमलसूरि, पउमचरियं, सं. हरमन याकोबी और मुनि पुण्यविजय, हिंदी अनुवाद एस. एम. वोरा, अंग्रेज़ी भूमिका वी. एम. कुलकर्णी (प्राकृत टेक्स्ट सोसाइटी, 1962)
  7. जिनसेन (पुन्नाट), हरिवंशपुराण, सर्ग 66.15–21 और 66.52 (सं. पन्नालाल जैन, भारतीय ज्ञानपीठ)
  8. ज़िला अयोध्या (उत्तर प्रदेश सरकार): जैन श्वेतांबर मंदिर

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