जैन परंपरा में दीपावली भगवान महावीर के निर्वाण (मोक्ष) का पर्व है। कल्पसूत्र के अनुसार महावीर ने कार्तिक के कृष्ण पक्ष के पंद्रहवें दिन, अमावस्या की रात के अंतिम भाग में, स्वाति नक्षत्र में, पावा नगरी में 72 वर्ष की आयु में निर्वाण पाया; उसी रात उनके सबसे बड़े शिष्य गौतम (इंद्रभूति) को केवलज्ञान हुआ, और काशी-कोसल के अठारह राजाओं ने यह कहकर दीप जलाए कि ज्ञान का प्रकाश चला गया, अब हम भौतिक प्रकाश करेंगे। 2026 में कार्तिक अमावस्या 8 नवंबर सुबह 11:28 से 9 नवंबर दोपहर 12:32 तक है (नई दिल्ली); जैन तिथि दर्पण (सोनगढ़) के अनुसार निर्वाण लाडू सोमवार, 9 नवंबर की सुबह चढ़ेगा, जब सूर्योदय के समय अमावस्या है। वीर निर्वाण संवत 2553 कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, मंगलवार 10 नवंबर से शुरू होगा।
2026 में (नई दिल्ली)
- कार्तिक अमावस्या
- 8 नवंबर सुबह 11:28 से 9 नवंबर दोपहर 12:32 तक
- स्वाति नक्षत्र
- 8 नवंबर की पूरी रात, 9 नवंबर सुबह 7:24 तक
- सूर्योदय के समय अमावस्या
- सोमवार, 9 नवंबर (सूर्योदय 6:39)
- निर्वाण लाडू, निर्वाण पूजा
- सोमवार, 9 नवंबर की सुबह (जैन तिथि दर्पण, सोनगढ़)
- दीपावली, लक्ष्मी पूजा (हिंदू पंचांग)
- रविवार, 8 नवंबर
- वीर निर्वाण संवत 2553 का आरंभ
- मंगलवार, 10 नवंबर (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा)
तिथि और नक्षत्र के समय हमारे पंचांग से, Drik Panchang से मिलाकर (अंतर 1-2 मिनट)। निर्वाण लाडू की तारीख जैन तिथि दर्पण (सोनगढ़) पर आधारित 2026 के जैन कैलेंडर से है; REOnline का जैन कैलेंडर भी 9 नवंबर देता है। Drik Panchang इसकी अलग तारीख नहीं देता। हर मंदिर और संघ अपने पंचांग से दिन तय करता है, इसलिए अपने मंदिर से भी पूछ लें।
कल्पसूत्र में महावीर का निर्वाण
श्वेतांबर परंपरा का कल्पसूत्र महावीर के जीवन के अंत का वर्णन इस क्रम में करता है। अपना अंतिम, बयालीसवाँ वर्षावास महावीर ने पावा नगरी में राजा हस्तिपाल के लेखकों के कार्यालय (लेख-शाला) में बिताया (§ 122)। उस वर्षावास के चौथे महीने, कार्तिक के कृष्ण पक्ष के पंद्रहवें दिन, रात के अंतिम भाग में वे “सिद्ध, बुद्ध, मुक्त” हुए (§ 123); चंद्रमा स्वाति नक्षत्र में था (§ 124)। उस रात देवताओं के आने-जाने से प्रकाश हुआ (§ 125)।
उसी रात उनके सबसे बड़े शिष्य, गौतम गोत्र के इंद्रभूति, ने गुरु के प्रति स्नेह का बंधन काटकर केवलज्ञान पाया (§ 127)। और काशी-कोसल के अठारह गणराजाओं, नौ मल्लकियों और नौ लिच्छवियों ने अमावस्या के दिन, उपवास (पौषध) करते हुए, यह कहकर प्रकाश किया कि “ज्ञान का प्रकाश चला गया, अब हम भौतिक वस्तुओं का प्रकाश करेंगे” (§ 128)। याकोबी अपनी टिप्पणी में लिखते हैं कि जैन कार्तिक की अमावस्या की रात दीप जलाकर महावीर का निर्वाण मनाते हैं।
कल्पसूत्र (§ 147) यह भी गिनता है कि महावीर 30 वर्ष गृहस्थ रहे, 12 वर्ष से कुछ अधिक साधना की, लगभग 30 वर्ष केवली रहे और कुल 72 वर्ष जिए। वे भोर में, अकेले, पर्यंक आसन में बैठे, कर्म-फल पर 55 अध्ययन और बिना पूछे 36 प्रश्नों के उत्तर कहते हुए मुक्त हुए; याकोबी की टिप्पणी के अनुसार 36 प्रश्न उत्तराध्ययन सूत्र हैं।
दिगंबर ग्रंथों में
दिगंबर विद्वान दरबारीलाल कोठिया अपने लेख में दिगंबर ग्रंथों के ये स्थल उद्धृत करते हैं: यतिवृषभ की तिलोयपण्णत्ती (4.1208) के अनुसार महावीर कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात के अंत में, प्रत्यूष काल (भोर) में सिद्ध हुए; वीरसेन की धवला टीका में उद्धृत एक प्राकृत गाथा भी यही कहती है, स्वाति नक्षत्र और पावा नगरी के साथ; और धवला के अनुसार निर्वाण की पूजा देवेंद्रों ने अमावस्या को की। यानी चतुर्दशी की रात का अंत और अमावस्या की भोर एक ही क्षण है, और पूजा अमावस्या की मानी जाती है।
जिनसेन (पुन्नाट संघ) का हरिवंशपुराण, जो शक संवत 705 (783 ई.) में पूरा हुआ, सर्ग 66 में कहता है कि निर्वाण के समय देवताओं और लोगों ने दीपों से पावा नगरी को जगमगा दिया, और तब से भारत के लोग हर वर्ष प्रसिद्ध “दीपालिका” से जिनेंद्र के निर्वाण की पूजा करते हैं (66.19–21)। जैनी कल्पसूत्र के दीपों वाले वर्णन के साथ इसी श्लोक (66.21) को उद्धृत करते हैं।
जैन दीपावली कैसे मनाते हैं
जॉन कॉर्ट ने पाटन (उत्तर गुजरात) के श्वेतांबर जैनों में दीपावली को कई दिनों के क्रम के रूप में देखा: धनतेरस, काली चौदस, अमावस्या की दीपावली, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का नववर्ष, भाई बीज, और अंत में कार्तिक शुक्ल पंचमी की ज्ञान पंचमी। उनके अनुसार दीपावली के दो अर्थ एक साथ चलते हैं: मोक्ष-मार्ग की दृष्टि से यह महावीर का निर्वाण और गौतम स्वामी का केवलज्ञान है, और दुनियादारी की दृष्टि से लक्ष्मी और समृद्धि का पर्व।
कॉर्ट के अनुसार सुबह उपाश्रय में साधु महावीर के जीवन और निर्वाण तथा गौतम स्वामी के केवलज्ञान पर प्रवचन देते हैं, अक्सर जिनसुंदरसूरि के दीपालिका-कल्प (1427 ई.) के आधार पर; कुछ विद्वान साधु उत्तराध्ययन सूत्र पढ़ते हैं, जिसे परंपरा महावीर का अंतिम उपदेश मानती है। साधु आधी रात (निर्वाण का समय) और भोर से पहले (गौतम के केवलज्ञान का समय) देववंदन करते हैं। गृहस्थों का मुख्य अनुष्ठान शाम की शारदा पूजा या बही-पूजा है, जिसमें नई बही में गौतम स्वामी की “लब्धि” की कामना लिखी जाती है।
निर्वाण लाडू: बहुत से जैन मंदिरों में, विशेषकर दिगंबर मंदिरों में, अमावस्या की सुबह अभिषेक और पूजा के बाद महावीर को “निर्वाण लाडू” चढ़ाया जाता है; बिहार की पावापुरी में जल मंदिर पर दीपावली की सुबह श्वेतांबर और दिगंबर दोनों के श्रद्धालु लाडू चढ़ाते हैं (अमर उजाला, 2021; ईटीवी भारत, 2022)। यह प्रचलित रीति है; इसका किसी ग्रंथ में आधार हमें नहीं मिला।
डंडस के अनुसार दीपावली के ठीक अगले दिन गौतम स्वामी का केवलज्ञान याद किया जाता है और नया धार्मिक और व्यापारिक वर्ष शुरू होता है, जब व्यापारी नई बही खोलते हैं। कॉर्ट के अनुसार नववर्ष की सुबह मंदिर में दर्शन होते हैं और उपाश्रय में साधु नवस्मरण का मंगल-पाठ सुनाते हैं; एक वर्ष उन्होंने विनयप्रभ का “गौतम स्वामी रास” भी सुना।
वीर निर्वाण संवत 2553
वीर निर्वाण संवत महावीर के निर्वाण से गिना जाने वाला जैन संवत है। जैनी के अनुसार परंपरा निर्वाण को 527 ई.पू. में, वर्षा ऋतु के अंत के पास रखती है, और इसी से जैन वीर-निर्वाण संवत गिनते हैं, जिसे वे भारत का सबसे लंबा निरंतर संवत कहते हैं। इतिहासकार इस तिथि पर एकमत नहीं; जैनी अपनी टिप्पणी में दूसरे मत भी गिनाते हैं, जैसे याकोबी (1932) का लगभग 477 ई.पू.।
नया वर्ष कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है। जैन तिथि दर्पण (सोनगढ़) पर आधारित कैलेंडर के अनुसार वीर संवत 2552 22 अक्टूबर 2025 को शुरू हुआ और 2553 10 नवंबर 2026 को शुरू होगा; Drik Panchang भी 2026 की जैन सूची को “वीर निर्वाण संवत 2552-2553” कहता है और 10 नवंबर को कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (गुजराती नववर्ष, विक्रम संवत 2083) देता है।
परंपराओं और स्रोतों में अंतर
- निर्वाण का क्षण: कल्पसूत्र (श्वेतांबर) कार्तिक कृष्ण पक्ष के पंद्रहवें दिन (अमावस्या) की रात का अंतिम भाग कहता है; तिलोयपण्णत्ती (दिगंबर) चतुर्दशी की रात के अंत में भोर कहती है (कोठिया के उद्धरण)। दोनों एक ही भोर की बात करते हैं, गिनती अलग है।
- गौतम स्वामी का केवलज्ञान: कल्पसूत्र (§ 127) उसी रात कहता है; गुजरात की श्वेतांबर परंपरा इसे अगली सुबह, नववर्ष के दिन मनाती है (कॉर्ट, डंडस)।
- उपवास: कॉर्ट एक मुद्रित प्रवचन का हवाला देते हैं जो दीपावली के उपवास को बहुत पुण्य का कहता है; डंडस के अनुसार इस समय आमतौर पर उपवास नहीं होता, यद्यपि साधु इसका महत्व बताते हैं।
- वर्ष: श्वेतांबर परंपरा का वर्ष 527 ई.पू. है, और वीर संवत इसी से गिना जाता है; डंडस के अनुसार दिगंबर परंपरा 510 ई.पू. मानती है, और बुद्ध के निर्वाण की नई गणना मानने वाले इतिहासकार लगभग 425 ई.पू. तक आते हैं (डंडस, अध्याय 1; जैनी, टिप्पणी 88)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
महावीर निर्वाण 2026 में कब है?
महावीर का निर्वाण कल्याणक कार्तिक अमावस्या को मनाया जाता है। 2026 में अमावस्या 8 नवंबर सुबह 11:28 से 9 नवंबर दोपहर 12:32 तक है (नई दिल्ली)। हिंदू पंचांग की दीपावली 8 नवंबर को है; सूर्योदय के समय अमावस्या 9 नवंबर को है, और जैन तिथि दर्पण (सोनगढ़) के अनुसार निर्वाण लाडू सोमवार, 9 नवंबर की सुबह चढ़ेगा। कुछ मंदिर अपना पंचांग मानते हैं, इसलिए अपने मंदिर से भी पूछ लें।
वीर निर्वाण संवत 2553 कब से शुरू होगा?
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, मंगलवार 10 नवंबर 2026 से (जैन तिथि दर्पण, सोनगढ़; Drik Panchang पर इसी दिन प्रतिपदा और गुजराती नववर्ष)।
जैन दीपावली क्यों मनाते हैं?
कल्पसूत्र (§§ 123–128) के अनुसार कार्तिक अमावस्या की रात महावीर का निर्वाण हुआ और राजाओं ने यह कहकर दीप जलाए कि ज्ञान का प्रकाश चला गया, अब भौतिक प्रकाश करेंगे। जिनसेन का हरिवंशपुराण (66.19–21) भी कहता है कि तब से लोग हर वर्ष दीपालिका से निर्वाण की पूजा करते हैं।
गौतम स्वामी को केवलज्ञान कब हुआ?
कल्पसूत्र (§ 127) के अनुसार महावीर के निर्वाण की उसी रात। गुजरात की श्वेतांबर परंपरा इसे अगली सुबह, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (नववर्ष) को मनाती है।
महावीर का निर्वाण कहाँ हुआ?
कल्पसूत्र (§ 122) के अनुसार पावा नगरी में, राजा हस्तिपाल के लेखकों के कार्यालय में। जैनी के अनुसार इसे आज की पावापुरी (पटना के पास, बिहार) माना जाता है।
स्रोत
- कल्पसूत्र, महावीर-चरित्र §§ 122–128 और 147 (हरमन याकोबी का अंग्रेज़ी अनुवाद, Sacred Books of the East खंड 22, 1884, पृ. 264–270)
- दरबारीलाल कोठिया, “वीर निर्वाण पर्व दीपावली” (हिंदी लेख, 1982, पृ. 471–474; jainqq.org/explore/211948): तिलोयपण्णत्ती 4.1208, धवला की गाथा, उत्तरपुराण और हरिवंशपुराण 66.15–21 के उद्धरण
- पद्मनाभ एस. जैनी, द जैन पाथ ऑफ़ प्योरिफ़िकेशन (मोतीलाल बनारसीदास), पृ. 37–38 और टिप्पणी 88, 91
- जॉन ई. कॉर्ट, जैन्स इन द वर्ल्ड (ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2001), अध्याय 6, पृ. 164–172 (पाटन, उत्तर गुजरात में श्वेतांबर जैनों की दीपावली)
- पॉल डंडस, द जैन्स, दूसरा संस्करण (रूटलेज, 2002), अध्याय 1 (“महावीर का समय”) और अध्याय 7 (“वार्षिक पर्व”)
- अमर उजाला, इटावा, 4 नवंबर 2021: भगवान महावीर को चढ़ाया लाडू
- ईटीवी भारत, नालंदा, अक्टूबर 2022: पावापुरी जल मंदिर की विशेषता
- Drik Panchang, नई दिल्ली: दैनिक पंचांग 8, 9 और 10 नवंबर 2026; गुजराती नववर्ष 2026; जैन त्योहार 2026 (20 अक्टूबर 2026 को पढ़ा)
- जैन तिथि दर्पण, सोनगढ़ पर आधारित “2026 Jain Calendar Special Dates” (AtmaDharma.com, PDF)
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