जैन धर्म

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परिचय · स्रोत सहित: जैन धर्म. तीर्थंकर, णमोकार मंत्र, पर्व और सिद्धांत
संक्षेप में

जैन धर्म एक स्वतंत्र धर्म है, सनातन (हिंदू) धर्म का अंग नहीं: इसके अपने ग्रंथ (आगम, षट्खंडागम, तत्त्वार्थ सूत्र), अपने चौबीस तीर्थंकर, अपने साधु-संघ और अपना पंचांग (वीर निर्वाण संवत) हैं। भारत सरकार ने 27 जनवरी 2014 की अधिसूचना (S.O. 267(E)) से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के तहत जैन समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय अधिसूचित किया। तत्त्वार्थ सूत्र (1.1) के अनुसार सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं। सनातन बोध पर यह खंड जैन धर्म को उसके अपने ग्रंथों और परंपराओं के शब्दों में, सम्मान के साथ, अलग रखता है; जहाँ दोनों परंपराओं में साझा नाम और कथाएँ हैं, वे एक अलग पन्ने पर दोनों के स्रोतों के साथ हैं।

इस खंड के पन्ने

आने वाले जैन पर्व और तिथियाँ

एक स्वतंत्र धर्म

जैन परंपरा के अनुसार इस काल-चक्र में चौबीस तीर्थंकरों ने धर्म का उपदेश दिया, पहले ऋषभदेव और अंतिम (चौबीसवें) महावीर। जैनी के अनुसार तीर्थंकर वे हैं जिन्होंने केवलज्ञान पाकर मोक्ष का उपदेश दिया और दुःख-सागर के पार जाने का “तीर्थ” (घाट) बनाया; वे किसी नए धर्म के संस्थापक नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा को फिर जगाने वाले हैं जो हर काल-चक्र में चौबीस तीर्थंकरों से चलती है। परंपरा कहती है कि तीर्थंकर ने साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका का चतुर्विध तीर्थ (संघ) “स्थापित” किया। जैनी यह भी लिखते हैं कि जैन जैसी श्रमण परंपराएँ वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, महाभारत, रामायण और धर्मशास्त्रों को शास्त्र-प्रमाण नहीं मानतीं।

भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की 27 जनवरी 2014 की अधिसूचना (S.O. 267(E)) ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की धारा 2(ग) के तहत जैन समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय अधिसूचित किया; भारतीय रिज़र्व बैंक के 18 फ़रवरी 2015 के परिपत्र में इसी अधिसूचना का हवाला है। 2011 की जनगणना में भारत में 44,51,753 जैन गिने गए, कुल जनसंख्या का 0.37 प्रतिशत; इनमें से लगभग 80 प्रतिशत शहरों में रहते हैं।

रत्नत्रय: मोक्ष का मार्ग

उमास्वाति का तत्त्वार्थ सूत्र, जिसे श्वेतांबर और दिगंबर दोनों मानते हैं, पहले ही सूत्र में कहता है: “सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः” (1.1), यानी सही श्रद्धा, सही ज्ञान और सही आचरण, तीनों मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं। इन्हीं तीन को रत्नत्रय कहते हैं; जैन प्रतीक के तीन बिंदु इन्हीं के हैं (जैनी)।

पाँच व्रत और अहिंसा

तत्त्वार्थ सूत्र (7.1) के अनुसार हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म (असंयम) और परिग्रह से विरति ही व्रत है; इस तरह पाँच व्रत हैं: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। अगला सूत्र (7.2) कहता है कि इनसे आंशिक विरति अणुव्रत है और पूर्ण विरति महाव्रत: साधु-साध्वी महाव्रत लेते हैं, गृहस्थ अणुव्रत। अहिंसा इनमें पहला है।

अनेकांतवाद और स्याद्वाद

अनेकांतवाद यह सिद्धांत है कि वस्तु के अनेक पक्ष होते हैं और कोई एक कथन उसे पूरा नहीं कह सकता। इसे कहने का ढंग स्याद्वाद है: जैनी के अनुसार “स्यात्” का अर्थ है “किसी अपेक्षा से” और “एव” का “वस्तुतः”, जैसे “किसी अपेक्षा से, यानी द्रव्य की दृष्टि से, न कि पर्यायों की, आत्मा वस्तुतः नित्य है।” इसी से सात प्रकार के कथनों की सप्तभंगी बनती है।

श्वेतांबर और दिगंबर

जैन धर्म की दो मुख्य परंपराएँ हैं, श्वेतांबर (श्वेत वस्त्र वाले) और दिगंबर (दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं)। जैनी के अनुसार इनके मुख्य अंतर ये हैं:

श्वेतांबरों में मूर्तिपूजक के अलावा दो परंपराएँ मूर्ति-पूजा नहीं करतीं: स्थानकवासी, जो लोंकाशाह के आंदोलन से निकले और मुँह पर मुखवस्त्रिका रखते हैं, और तेरापंथ, जिसकी स्थापना अठारहवीं सदी में स्थानकवासी मुनि भिक्षु (भीखणजी) ने की (जैनी; डंडस)।

जैन प्रतीक

जैनी के अनुसार जैन प्रतीक भगवान महावीर के 2500वें निर्वाण वर्ष (1974–75) में आधिकारिक रूप से अपनाया गया। इसकी बाहरी रेखा लोक (ब्रह्मांड) का आकार है; हथेली पर “अहिंसा” लिखा चक्र है; स्वस्तिक चार गतियों का, तीन बिंदु रत्नत्रय का, और अर्धचंद्र तथा बिंदु मुक्त आत्माओं के स्थान (सिद्धशिला) का प्रतीक है। नीचे तत्त्वार्थ सूत्र (5.21) का वाक्य “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” लिखा होता है: जीव एक-दूसरे का उपकार करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या जैन धर्म हिंदू धर्म का हिस्सा है?

नहीं। जैन धर्म अपने ग्रंथों, अपने तीर्थंकरों, अपने साधु-संघ और अपने पंचांग वाला अलग धर्म है, जो वेद को प्रमाण नहीं मानता। भारत सरकार ने 27 जनवरी 2014 को जैन समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय अधिसूचित किया। दोनों परंपराओं में कुछ नाम और कथाएँ साझा हैं, जैसे ऋषभदेव और राम; उन्हें हमने एक अलग पन्ने पर दोनों के स्रोतों के साथ रखा है।

जैन धर्म के तीन रत्न क्या हैं?

सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र, जो मिलकर मोक्ष का मार्ग हैं (तत्त्वार्थ सूत्र 1.1)।

जैन धर्म के पाँच व्रत कौन से हैं?

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (तत्त्वार्थ सूत्र 7.1)। साधु इन्हें पूर्ण रूप में महाव्रत के रूप में और गृहस्थ आंशिक रूप में अणुव्रत के रूप में लेते हैं (7.2)।

श्वेतांबर और दिगंबर में क्या अंतर है?

मुख्य अंतर मुनियों के वस्त्र, स्त्री के मोक्ष, केवली के भोजन और आगमों को लेकर हैं: दिगंबर मुनि वस्त्र नहीं पहनते और मानते हैं कि मूल अंग-आगम बचे नहीं; श्वेतांबर मुनि श्वेत वस्त्र पहनते हैं और मानते हैं कि स्त्री भी मोक्ष पा सकती है (जैनी)।

भारत में कितने जैन हैं?

2011 की जनगणना में 44,51,753, यानी कुल जनसंख्या का 0.37 प्रतिशत।

स्रोत

  1. भारत सरकार, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, अधिसूचना S.O. 267(E), 27 जनवरी 2014, जैसा भारतीय रिज़र्व बैंक के परिपत्र RBI/2014-15/473 (18 फ़रवरी 2015) में उद्धृत है
  2. उमास्वाति, तत्त्वार्थ सूत्र 1.1, 5.21, 7.1, 7.2 (नथमल टाटिया का अनुवाद, दैट विच इज़, 1994)
  3. पद्मनाभ एस. जैनी, द जैन पाथ ऑफ़ प्योरिफ़िकेशन (मोतीलाल बनारसीदास), पृ. 1–2 और टिप्पणी 2, 35–36, 38–41, 49, 90–97, 309–316
  4. पॉल डंडस, द जैन्स, दूसरा संस्करण (रूटलेज, 2002), अध्याय 3
  5. भारत की जनगणना 2011, तालिका C-1 (धर्म के अनुसार जनसंख्या), भारत

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