18 महापुराण ये हैं: ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ और ब्रह्माण्ड पुराण। विष्णु पुराण (3.6.20-23) और भागवत पुराण (12.13.4-8) दोनों में यही क्रम है। कुछ सूचियाँ, जैसे मत्स्य पुराण (अध्याय 53), चौथे स्थान पर शिव पुराण की जगह वायु पुराण रखती हैं।
| # | नाम | श्लोक (भागवत) | विषय (मत्स्य पुराण) |
|---|---|---|---|
| 1 | ब्रह्म पुराण | 10,000 | सब पुराणों में पहला (विष्णु पुराण 3.6.20); ब्रह्मा ने मरीचि को सुनाया |
| 2 | पद्म पुराण | 55,000 | उस काल की कथा जब जगत स्वर्ण कमल (पद्म) के रूप में था; इसी से नाम |
| 3 | विष्णु पुराण | 23,000 | पराशर ने वराह कल्प के प्रसंग से धर्म कहे; पुराण स्वयं कहता है कि इसके हर भाग में विष्णु का वर्णन है (3.6.25-26) |
| 4 | शिव पुराणकुछ सूचियों में इसकी जगह वायु पुराण | 24,000 | शिव की महिमा। मत्स्य पुराण यहाँ वायु पुराण गिनता है: वायु देव का कहा, रुद्र-माहात्म्य सहित, 24,000 श्लोक (53.18) |
| 5 | भागवत पुराणश्रीमद्भागवत | 18,000 | गायत्री से आरंभ, वृत्रासुर-वध की कथा सहित, सारस्वत कल्प का वृत्तांत (53.20-22) |
| 6 | नारद पुराणनारदीय पुराण | 25,000 | नारद ने बृहत् कल्प के प्रसंग से धर्म कहे (53.23) |
| 7 | मार्कण्डेय पुराण | 9,000 | पक्षियों के माध्यम से धर्म-अधर्म का विचार, मार्कण्डेय का कहा (53.25-26); दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) इसी का अंश है |
| 8 | अग्नि पुराण | 15,400 | अग्नि ने वसिष्ठ को ईशान कल्प के प्रसंग से कहा (53.28) |
| 9 | भविष्य पुराण | 14,500 | ब्रह्मा ने मनु को सूर्य की महिमा कही; अधिकतर आगे होने वाली घटनाओं का वर्णन (53.31-32) |
| 10 | ब्रह्मवैवर्त पुराण | 18,000 | सावर्णि ने नारद को रथन्तर कल्प के प्रसंग से कृष्ण की महिमा कही (53.34-35) |
| 11 | लिंग पुराण | 11,000 | अग्नि-लिंग के बीच स्थित महेश्वर ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहे (53.37-38) |
| 12 | वराह पुराण | 24,000 | विष्णु ने वराह रूप की महिमा पृथ्वी को सुनाई, मानव कल्प के प्रसंग से (53.39-40) |
| 13 | स्कन्द पुराण | 81,100 | षण्मुख (स्कन्द) ने तत्पुरुष कल्प के प्रसंग से शैव धर्म कहे (53.42-43); श्लोक संख्या में सबसे बड़ा |
| 14 | वामन पुराण | 10,000 | ब्रह्मा ने त्रिविक्रम (वामन) की महिमा कही (53.45-46) |
| 15 | कूर्म पुराण | 17,000 | कूर्म रूप में विष्णु ने रसातल में, इन्द्रद्युम्न के प्रसंग से, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहे (53.47-48) |
| 16 | मत्स्य पुराण | 14,000 | कल्प के आरंभ में मत्स्य रूप में विष्णु ने मनु को कहा, नरसिंह-कथा सहित (53.50-51) |
| 17 | गरुड़ पुराण | 19,000 | गरुड़ कल्प में ब्रह्माण्ड से गरुड़ के जन्म के प्रसंग से कृष्ण (विष्णु) का कहा (53.53-54) |
| 18 | ब्रह्माण्ड पुराण | 12,000 | ब्रह्मा ने ब्रह्माण्ड की महिमा और आने वाले कल्पों का विस्तार कहा (53.55-56) |
18 पुराणों के नाम याद करने का श्लोक
मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् ।अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक् ॥पुराण किसे कहते हैं
विष्णु पुराण (3.6.24) और मत्स्य पुराण (53.65) के अनुसार पुराण के पाँच लक्षण हैं: सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय और फिर सृष्टि), वंश (देवताओं और ऋषियों की वंशावली), मन्वंतर (मनुओं के काल) और वंशानुचरित (राजवंशों का इतिहास)। इसी अध्याय (3.6.15-16) के अनुसार वेदव्यास ने आख्यानों, उपाख्यानों और गाथाओं से पुराण-संहिता बनाई और अपने शिष्य सूत रोमहर्षण को दी।
महापुराण और उपपुराण
विष्णु पुराण इन अठारह को महापुराण कहकर बताता है कि मुनियों ने उपपुराण भी कहे हैं (3.6.23-24)। उपपुराण भी प्रायः 18 गिने जाते हैं, पर उनकी सूचियाँ ग्रंथों में अलग-अलग हैं। देवी भागवत (1.3) और मधुसूदन सरस्वती के प्रस्थानभेद, दोनों की सूची में सनत्कुमार, नरसिंह, नारदीय, दुर्वासा, कपिल, मानव, औशनस, वरुण, कालिका, माहेश्वर, साम्ब, सौर और पराशर उपपुराण आते हैं। प्रस्थानभेद स्वयं कहता है कि उपपुराण कई प्रकार के गिने जाते हैं।
श्लोक संख्या के बारे में
तालिका की श्लोक संख्या भागवत पुराण (12.13.4-8) की है, जो सब पुराणों का योग चार लाख श्लोक बताता है (12.13.9); विषय वाला स्तंभ मत्स्य पुराण के अध्याय 53 से है, जो हर पुराण का वक्ता और कल्प बताता है। मत्स्य पुराण भी कुल चार लाख कहता है, पर कुछ पुराणों की संख्या अलग देता है। आज छपे संस्करणों के श्लोक इन संख्याओं से मेल खाएँ, यह ज़रूरी नहीं।
स्रोतों में अंतर
- शिव या वायु: विष्णु पुराण (3.6.21), भागवत (12.7.23 और 12.13.4) और प्रस्थानभेद चौथा पुराण शिव पुराण गिनते हैं; मत्स्य पुराण (53.18) और देवी भागवत (1.3) उसकी जगह वायु पुराण गिनते हैं।
- कौन-सा भागवत: देवी भागवत (1.3) शिव पुराण और एक ‘भागवत’ को उपपुराणों में रखता है। शाक्त परंपरा अठारह महापुराणों के ‘भागवत’ को देवी भागवत मानती है, जबकि वैष्णव परंपरा श्रीमद्भागवत को।
- भागवत 12.7.23-24 में वही अठारह नाम छंद के कारण दूसरे क्रम में हैं: ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, लिंग, गरुड़, नारद, भागवत, अग्नि, स्कन्द, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय, वामन, वराह, मत्स्य, कूर्म, ब्रह्माण्ड।
- मत्स्य पुराण (53) की श्लोक संख्या कुछ पुराणों के लिए भागवत से अलग है: ब्रह्म 13,000, अग्नि 16,000, कूर्म 18,000, ब्रह्माण्ड 12,200।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
18 पुराणों के नाम क्रम से क्या हैं?
ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव (या वायु), भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ और ब्रह्माण्ड। यह क्रम विष्णु पुराण 3.6.21-23 और भागवत 12.13.4-8 का है।
अठारह पुराणों के नाम याद करने का श्लोक कौन सा है?
देवी भागवत पुराण (1.3.2) का श्लोक “मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्। अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्॥”। यह पुराणों को उनके पहले अक्षर से गिनाता है: म से दो, भ से दो, ब्र से तीन, व से चार, और अ, ना, प, लिं, ग, कू, स्क से एक-एक। इस गिनती में वायु पुराण है, शिव पुराण नहीं।
18 पुराणों में सबसे बड़ा पुराण कौन सा है?
स्कन्द पुराण। भागवत पुराण (12.13.7) इसके 81,100 श्लोक बताता है और देवी भागवत (1.3.12) 81,000; दोनों गिनतियों में यह सबसे बड़ा है, और दूसरे स्थान पर पद्म पुराण (55,000 श्लोक) है।
सबसे छोटा पुराण कौन सा है?
मार्कण्डेय पुराण। भागवत (12.13.5) और देवी भागवत (1.3.3, ‘ग्रहसहस्रं’, यानी नौ हज़ार) दोनों इसके 9,000 श्लोक बताते हैं, जो 18 महापुराणों में सबसे कम हैं। दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) इसी पुराण का अंश है।
18 पुराण किसने लिखे?
परंपरा के अनुसार वेदव्यास ने। विष्णु पुराण (3.6.15-16) कहता है कि व्यास ने पुराण-संहिता बनाकर सूत रोमहर्षण को दी, और प्रस्थानभेद अठारह पुराणों को बादरायण (व्यास) की रचना कहता है।
वायु पुराण 18 पुराणों में है या शिव पुराण?
यह सूची पर निर्भर है। विष्णु पुराण और भागवत शिव पुराण गिनते हैं, मत्स्य पुराण और देवी भागवत वायु पुराण। दोनों ही परंपरा में मान्य ग्रंथ हैं।
उपपुराण कितने हैं?
प्रायः 18 गिने जाते हैं, पर नामों की सूची ग्रंथ-ग्रंथ में बदलती है। सनत्कुमार, नरसिंह, कालिका, साम्ब और सौर जैसे नाम अधिकतर सूचियों में मिलते हैं।
4 वेद, 6 शास्त्र और 18 पुराणों के नाम क्या हैं?
चार वेद: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ‘छह शास्त्र’ दो अर्थों में कहा जाता है: हिंदी शब्दसागर ‘षट्शास्त्र’ का अर्थ हिंदुओं के छह दर्शन देता है (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त), जबकि एक नेपाली कोश इसे छह वेदांग बताता है (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष)। 18 पुराण: ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव (या वायु), भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ और ब्रह्माण्ड।
स्रोत
- विष्णु पुराण 3.6.15-28 (संस्कृत पाठ, GRETIL; एच. एच. विल्सन का अनुवाद, wisdomlib.org)
- भागवत पुराण 12.7.22-24 और 12.13.3-15 (संस्कृत पाठ, GRETIL; vedabase.io)
- मत्स्य पुराण, अध्याय 53 (संस्कृत पाठ, GRETIL)
- देवी भागवत पुराण, स्कंध 1, अध्याय 3, श्लोक 1-16 (संस्कृत पाठ, sa.wikisource; स्वामी विज्ञानानंद का अनुवाद, wisdomlib.org)
- श्रीमद्देवीभागवत, प्रथम स्कन्ध, अध्याय 3 (गीता प्रेस, गोरखपुर, हिंदी अनुवाद सहित, पृ. 75-76; खेमराज श्रीकृष्णदास, बंबई, भाषा-टीका सहित; दोनों archive.org पर)
- मधुसूदन सरस्वती, प्रस्थानभेद (संस्कृत पाठ, archive.org)
- हिंदी शब्दसागर, ‘षट्शास्त्र’, पृ. 4831 (dsal.uchicago.edu); नेपाली-अंग्रेज़ी कोश, ‘षट्शास्त्र’ (wisdomlib.org)
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