आदि शंकराचार्य से जुड़े चार आम्नाय मठ (पीठ) हैं: उत्तर में ज्योतिर्मठ (बदरीनाथ क्षेत्र, उत्तराखंड), दक्षिण में शृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक), पश्चिम में द्वारका का शारदा पीठ (गुजरात) और पूर्व में पुरी का गोवर्धन मठ (ओडिशा)। परंपरा, विशेषकर “मठाम्नाय” नाम का ग्रंथ, हर मठ को एक वेद और एक महावाक्य देती है: ज्योतिर्मठ को अथर्ववेद और “अयमात्मा ब्रह्म”, शृंगेरी को यजुर्वेद और “अहं ब्रह्मास्मि”, द्वारका को सामवेद और “तत्त्वमसि”, और पुरी को ऋग्वेद और “प्रज्ञानं ब्रह्म”। इन मठों के प्रमुख शंकराचार्य कहलाते हैं।
| नाम | दिशा | स्थान | वेद | महावाक्य | पहले आचार्य (परंपरा) |
|---|---|---|---|---|---|
| ज्योतिर्मठश्रीमठ, उत्तराम्नाय | उत्तर | बदरीनाथ क्षेत्र (जोशीमठ), उत्तराखंड | अथर्ववेद | अयमात्मा ब्रह्म | तोटकाचार्य |
| शृंगेरी शारदा पीठदक्षिणाम्नाय | दक्षिण | शृंगेरी, कर्नाटक | यजुर्वेद | अहं ब्रह्मास्मि | सुरेश्वराचार्य |
| द्वारका शारदा पीठशारदा मठ, पश्चिमाम्नाय | पश्चिम | द्वारका, गुजरात | सामवेद | तत्त्वमसि | हस्तामलकाचार्य (मठाम्नाय); शृंगेरी की सूची में पद्मपादाचार्य |
| गोवर्धन मठगोवर्धन पीठ, पूर्वाम्नाय | पूर्व | पुरी, ओडिशा | ऋग्वेद | प्रज्ञानं ब्रह्म | पद्मपादाचार्य (मठाम्नाय, गोवर्धन मठ); शृंगेरी की सूची में हस्तामलकाचार्य |
मठाम्नाय के अनुसार हर मठ
मठाम्नाय (मठाम्नाय-महानुशासनम्) एक छोटा संस्कृत ग्रंथ है जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। इसमें हर मठ के लिए उसका सम्प्रदाय, संन्यासियों के पद, क्षेत्र, देवता, देवी, तीर्थ, वेद और महावाक्य दिए गए हैं, और अंत में कहा गया है कि चार मठ, चार आचार्य और चार सम्प्रदाय, यही धर्म की व्यवस्था है (श्लोक 65)।
ज्योतिर्मठ (उत्तर): सम्प्रदाय आनन्दवार; संन्यासियों के पद गिरि, पर्वत और सागर; क्षेत्र बदरिकाश्रम, देवता नारायण, देवी पूर्णागिरि, तीर्थ अलकनंदा; अथर्ववेद और “अयमात्मा ब्रह्म”; आचार्य तोटक (श्लोक 18–22)।
शृंगेरी (दक्षिण): सम्प्रदाय भूरिवार; पद सरस्वती, भारती और पुरी; क्षेत्र रामेश्वर, देवता आदिवराह, देवी कामाक्षी, तीर्थ तुंगभद्रा; यजुर्वेद और “अहं ब्रह्मास्मि”; आचार्य सुरेश्वर (श्लोक 28–31)।
शारदा मठ, द्वारका (पश्चिम): सम्प्रदाय कीटवार; पद तीर्थ और आश्रम; क्षेत्र द्वारका, देवता सिद्धेश्वर, देवी भद्रकाली, तीर्थ गोमती; सामवेद और “तत्त्वमसि”; आचार्य हस्तामलक (श्लोक 1–4)।
गोवर्धन मठ, पुरी (पूर्व): सम्प्रदाय भोगवार; पद वन और अरण्य; क्षेत्र पुरुषोत्तम (पुरी), देवता जगन्नाथ, देवी विमला, तीर्थ महोदधि (समुद्र); ऋग्वेद और “प्रज्ञानं ब्रह्म”; आचार्य पद्मपाद (श्लोक 10–13)।
चार महावाक्य और उनके उपनिषद्
हर मठ का महावाक्य उसी वेद के एक उपनिषद् से है: “प्रज्ञानं ब्रह्म” ऋग्वेद के ऐतरेय उपनिषद् (3.3) से, “अहं ब्रह्मास्मि” शुक्ल यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.10) से, “तत्त्वमसि” सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद् (6.8.7) से, और “अयमात्मा ब्रह्म” अथर्ववेद के माण्डूक्य उपनिषद् (मंत्र 2) से। कौन सा उपनिषद् किस वेद का है, यह मुक्तिका उपनिषद् (अध्याय 1) की सूची से है।
चारों का भाव एक है, आत्मा और ब्रह्म की एकता। “प्रज्ञानं ब्रह्म”: चेतना ही ब्रह्म है। “अहं ब्रह्मास्मि”: मैं ब्रह्म हूँ। “तत्त्वमसि”: वह (ब्रह्म) तुम हो; मठाम्नाय इसे जीवात्मा और परमात्मा की एकता का बोध कहता है। “अयमात्मा ब्रह्म”: यह आत्मा ब्रह्म है।
दशनामी संन्यासी
शंकराचार्य की परंपरा के संन्यासी दस नामों (पदों) में बँटे हैं, इसलिए दशनामी कहलाते हैं: अरण्य, आश्रम, भारती, गिरि, पर्वत, पुरी, सरस्वती, सागर, तीर्थ और वन। मठाम्नाय के अनुसार हर नाम एक मठ से जुड़ा है: गिरि, पर्वत और सागर ज्योतिर्मठ से; सरस्वती, भारती और पुरी शृंगेरी से; तीर्थ और आश्रम द्वारका से; वन और अरण्य पुरी से।
इतिहास के बारे में
ब्रिटानिका के अनुसार शंकर के जीवन पर कम से कम 11 जीवनी-ग्रंथ हैं, जो सब सदियों बाद लिखे गए; आधुनिक शोध उन्हें लगभग 700–750 ई. का मानता है (पहले 788–820 ई. कहा जाता था)। परंपरा कहती है कि उन्होंने चार दिशाओं में चार मठ बनाए और अपने चार प्रमुख शिष्यों, सुरेश्वर, पद्मपाद, तोटक और हस्तामलक, को उनका पहला आचार्य बनाया।
मठों की अपनी परंपराएँ कहीं पुरानी तिथि देती हैं: पुरी का गोवर्धन मठ अपनी स्थापना 486 ई.पू. बताता है। तमिलनाडु का कांची कामकोटि पीठ भी स्वयं को आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित (482 ई.पू.) बताता है; मठाम्नाय की चार मठों की सूची में उसका नाम नहीं है।
स्रोतों में अंतर
- द्वारका और पुरी के पहले आचार्य: मठाम्नाय और गोवर्धन मठ के अनुसार पुरी के पहले आचार्य पद्मपाद और द्वारका के हस्तामलक थे; शृंगेरी पीठ की वेबसाइट इसका उलटा देती है, द्वारका में पद्मपाद और पुरी में हस्तामलक।
- मठाम्नाय के अपने पाठभेद: sanskritdocuments.org के पाठ में शारदा मठ के आचार्य के लिए “विश्वरूप” और शृंगेरी के आचार्य के लिए “हस्तामलक” पाठभेद दिए गए हैं।
- स्थापना की तिथि: ब्रिटानिका शंकर को लगभग 700–750 ई. का मानता है; गोवर्धन मठ अपनी स्थापना 486 ई.पू. और कांची कामकोटि पीठ 482 ई.पू. बताता है।
- क्रम और आगे के आम्नाय: मठाम्नाय पश्चिम (द्वारका) से गिनती शुरू करता है: पश्चिम, पूर्व, उत्तर, दक्षिण; यहाँ सूची उत्तर से शुरू की गई है। मठाम्नाय आगे तीन और “ऊर्ध्व आम्नाय” (सुमेरु आदि) भी बताता है, जिनका वर्णन आध्यात्मिक अर्थ में है (जैसे “अनुभूति ही क्षेत्र”), किसी भौगोलिक मठ के रूप में नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शंकराचार्य के 4 मठ (पीठ) कौन से हैं?
उत्तर में ज्योतिर्मठ (बदरीनाथ क्षेत्र, उत्तराखंड), दक्षिण में शृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक), पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ (गुजरात) और पूर्व में गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा)।
किस मठ का कौन सा वेद और महावाक्य है?
मठाम्नाय के अनुसार: ज्योतिर्मठ का अथर्ववेद और “अयमात्मा ब्रह्म”, शृंगेरी का यजुर्वेद और “अहं ब्रह्मास्मि”, द्वारका का सामवेद और “तत्त्वमसि”, और पुरी के गोवर्धन मठ का ऋग्वेद और “प्रज्ञानं ब्रह्म”।
आदि शंकराचार्य के चार प्रमुख शिष्य कौन थे?
सुरेश्वर, पद्मपाद, तोटक (त्रोटक) और हस्तामलक। ब्रिटानिका के अनुसार शंकर के शिष्य शायद बहुत थे, पर अपनी रचनाओं से यही चार जाने जाते हैं। परंपरा इन्हीं चारों को चार मठों के पहले आचार्य मानती है।
शंकराचार्य कितने होते हैं?
चार आम्नाय मठों के चार प्रमुख शंकराचार्य कहलाते हैं, और हर मठ में यह पद गुरु-शिष्य क्रम से आगे चलता है। मठाम्नाय (श्लोक 52) के अनुसार हर पीठ पर क्रम से एक समय में एक ही आचार्य होना चाहिए।
दशनामी संन्यासी किसे कहते हैं?
शंकराचार्य की परंपरा के संन्यासी, जो दस नामों में बँटे हैं: अरण्य, आश्रम, भारती, गिरि, पर्वत, पुरी, सरस्वती, सागर, तीर्थ और वन। हर नाम चार मठों में से एक से जुड़ा है।
स्रोत
- मठाम्नाय-महानुशासनम् (परंपरा से आदि शंकराचार्य रचित), श्लोक 1–37, 52, 65–75
- ऐतरेय उपनिषद् 3.3; बृहदारण्यक उपनिषद् 1.4.10; छान्दोग्य उपनिषद् 6.8.7; माण्डूक्य उपनिषद् 2
- मुक्तिका उपनिषद्, अध्याय 1 (वेद के अनुसार उपनिषदों की सूची)
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Shankara”, “Dashnami sannyasin”
- श्री शृंगेरी शारदा पीठ: “The Amnaya Peethams” (sringeri.net)
- श्री गोवर्धन मठ, पुरी: “About Govardhan Matha” (govardhanpeeth.org)
- श्री कांची कामकोटि पीठ (kamakoti.org)
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