करवा चौथ शुभकामना श्लोक

करवा चौथ पर भेजने के लिए गौरी और शिव के श्लोक: व्रतराज में दिया करक चतुर्थी का पूजा-मंत्र और करवा-दान का मंत्र, उमामहेश्वर और अर्धनारीश्वर स्तोत्र, रघुवंश का मंगलाचरण और रामचरितमानस में सीता जी की गौरी-स्तुति, हर एक के साथ स्रोत और सरल अर्थ। हर पाठ हमने दो अलग-अलग प्रकाशनों से शब्द-शब्द मिलाया है।

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 4 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
करवा चौथ: करवा चौथ 2026: 29 अक्टूबर, गुरुवार
चित्र: AI से बनाया गया
संक्षेप में

करवा चौथ 2026: 29 अक्टूबर, गुरुवार। नीचे 10 श्लोक हैं जो करवा चौथ पर शुभकामना के साथ भेजे जा सकते हैं, पहला ‘नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संततिं शुभाम्’ (व्रतराज (विश्वनाथ), करक चतुर्थी व्रत; यह अंश वहाँ ‘वामन पुराण’ के नाम से है: गौरी-पूजा का मंत्र)। हर श्लोक के नीचे उसका स्रोत और हमारा लिखा सरल अर्थ है; ‘कार्ड बनाएँ’ से वही श्लोक आपके नाम के साथ फ़ोटो कार्ड बन जाता है।

करवा चौथ का शुभकामना कार्ड बनाएँ

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  1. 1नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संततिं शुभाम्

    नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संततिं शुभाम्।प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥

    स्रोत: व्रतराज (विश्वनाथ), करक चतुर्थी व्रत; यह अंश वहाँ ‘वामन पुराण’ के नाम से है: गौरी-पूजा का मंत्र

    अर्थ: हे शिवा, हे शर्वाणी, हे शिव की प्रिया! भक्ति से तुम्हारी पूजा करने वाली स्त्रियों को सौभाग्य और शुभ संतान दो।

    व्रतराज के अनुसार करवा चौथ की शाम शिव, गणेश और कार्तिकेय के साथ गौरी का चित्र बनाकर इसी मंत्र से उनकी षोडशोपचार पूजा होती है; गीता प्रेस की ‘व्रत-परिचय’ भी यही मंत्र देती है। वामन पुराण की आलोचनात्मक प्रति (1967) के अनुसार यह अंश उस पुराण की उपलब्ध पांडुलिपियों में नहीं मिलता, इसलिए हम इसे व्रतराज का पाठ कहते हैं।

  2. 2करकं क्षीरसम्पूर्णं तोयपूर्णमथापि वा

    करकं क्षीरसम्पूर्णं तोयपूर्णमथापि वा।ददामि रत्नसंयुक्तं चिरं जीवतु मे पतिः॥

    स्रोत: व्रतराज (विश्वनाथ), करक चतुर्थी व्रत; यह अंश वहाँ ‘वामन पुराण’ के नाम से है, कथा के श्लोक 39–40 (करवा-दान का मंत्र)

    अर्थ: दूध से, या फिर जल से भरा, रत्न सहित यह करवा मैं दान करती हूँ; मेरे पति चिरंजीवी हों।

    कथा के अंत में कहा गया है कि इस मंत्र से करवे ब्राह्मण को दिए जाएँ, और सुहागिनों को करवे दिए जाएँ और उनसे लिए भी जाएँ।

  3. 3नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां

    नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यांपरस्पराश्लिष्टवपुर्धराभ्याम्।नगेन्द्रकन्यावृषकेतनाभ्यांनमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्॥

    स्रोत: उमामहेश्वर स्तोत्र, श्लोक 1 (परंपरा से श्री शंकराचार्य रचित)

    अर्थ: जो सदा नए यौवन से भरे हैं, जिनके शरीर एक-दूसरे से जुड़े हैं, उन कल्याणकारी दोनों को, पर्वतराज की पुत्री पार्वती और वृषभ-ध्वज वाले शिव को नमस्कार; शंकर और पार्वती को बार-बार नमस्कार।

  4. 4स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं शिवपार्वतीयं

    स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं शिवपार्वतीयंभक्त्या पठेद् द्वादशकं नरो यः।स सर्वसौभाग्यफलानि भुङ्क्तेशतायुरन्ते शिवलोकमेति॥

    स्रोत: उमामहेश्वर स्तोत्र, श्लोक 13 (परंपरा से श्री शंकराचार्य रचित), अंतिम (फल-) श्लोक

    अर्थ: स्तोत्र कहता है: जो शिव-पार्वती के इस बारह श्लोकों वाले स्तोत्र को सुबह, दोपहर और शाम भक्ति से पढ़ता है, वह सब तरह के सौभाग्य का फल पाता है, सौ वर्ष जीता है और अंत में शिवलोक जाता है।

    पाठभेद: sanskritdocuments.org में पहली पंक्ति ‘शिवपार्वतीभ्याम्’ है; गीता प्रेस में ‘शिवपार्वतीयं’।

  5. 5चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौरार्धशरीरकाय

    चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौरार्धशरीरकाय।धम्मिल्लकायै च जटाधराय नमः शिवायै च नमः शिवाय॥

    स्रोत: अर्धनारीश्वर (अर्धनारीनटेश्वर) स्तोत्र, श्लोक 1

    अर्थ: जिनके आधे शरीर में चंपा के फूल जैसी गोरी पार्वती हैं और आधे में कपूर जैसे गोरे शिव; एक ओर सँवारा हुआ केश-पाश, दूसरी ओर जटा। शिवा को नमस्कार, शिव को नमस्कार।

    sanskritdocuments.org इस स्तोत्र को श्री शंकराचार्य की रचना बताता है; गीता प्रेस के शिवस्तोत्ररत्नाकर में रचयिता का नाम नहीं है।

  6. 6एतत्पठेदष्टकमिष्टदं यो भक्त्या स मान्यो भुवि दीर्घजीवी

    एतत्पठेदष्टकमिष्टदं यो भक्त्या स मान्यो भुवि दीर्घजीवी।प्राप्नोति सौभाग्यमनन्तकालं भूयात्सदा तस्य समस्तसिद्धिः॥

    स्रोत: अर्धनारीश्वर (अर्धनारीनटेश्वर) स्तोत्र, श्लोक 9, अंतिम (फल-) श्लोक

    अर्थ: स्तोत्र कहता है: मनचाहा फल देने वाले इस अष्टक को जो भक्ति से पढ़ता है, वह संसार में सम्मान पाता है, लंबी आयु पाता है, अनंत काल तक सौभाग्य पाता है और उसके सब काम सदा सिद्ध होते हैं।

  7. 7वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये

    वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥

    स्रोत: रघुवंश (महाकवि कालिदास), सर्ग 1, श्लोक 1 (मंगलाचरण)

    अर्थ: जैसे शब्द और उसका अर्थ सदा साथ रहते हैं, वैसे ही सदा साथ रहने वाले, जगत के माता-पिता पार्वती और परमेश्वर शिव को मैं शब्द और अर्थ की सही समझ पाने के लिए प्रणाम करता हूँ।

    मल्लिनाथ की टीका ‘पितरौ’ का अर्थ ‘माता और पिता’ बताती है; शिव-पार्वती का अटूट साथ यहाँ शब्द और अर्थ की उपमा से कहा गया है।

  8. 8जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी

    जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥

    स्रोत: श्रीरामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास), बालकाण्ड, दोहा 234 के बाद की तीसरी चौपाई

    अर्थ: हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री! आपकी जय हो, जय हो। शिव के मुख-चंद्र को निहारने वाली चकोरी, आपकी जय हो। हे गणेश और कार्तिकेय की माता, हे जगत की जननी, हे बिजली जैसी कांति वाली, आपकी जय हो।

    जनकपुर की पुष्पवाटिका का प्रसंग: सीता जी गौरी (भवानी) के मंदिर में जाकर यह स्तुति करती हैं।

    पाठभेद: विजया टीका (विजयानंद त्रिपाठी) की स्कैन-प्रति में ‘गिरिवरराज’ और ‘गजवदन’ (ब की जगह व) पढ़ा जाता है; अर्थ वही है।

  9. 9पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख

    पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥

    स्रोत: श्रीरामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास), बालकाण्ड, दोहा 235

    अर्थ: हे माता! पति को देवता मानने वाली श्रेष्ठ स्त्रियों में आपका नाम सबसे पहले आता है। आपकी अपार महिमा हज़ार सरस्वती और शेषनाग भी मिलकर नहीं कह सकते।

    सीता जी की गौरी-स्तुति का ही दोहा।

  10. 10सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी

    सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥

    स्रोत: श्रीरामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास), बालकाण्ड, दोहा 235 के बाद की पहली चौपाई

    अर्थ: हे वर देने वाली, हे त्रिपुरारि शिव की प्रिया! आपकी सेवा से चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सहज मिल जाते हैं। हे देवी, आपके चरण-कमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सब सुखी होते हैं।

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इन श्लोकों के बारे में

हर पाठ कम से कम दो अलग प्रकाशनों से शब्द-शब्द मिलाया गया है। जहाँ प्रकाशनों में अंतर है, वह ‘पाठभेद’ में लिखा है। श्लोक संख्या उसी प्रकाशन की है जिसका नाम स्रोत में है; दूसरे प्रकाशनों में संख्या कुछ आगे-पीछे हो सकती है। अर्थ हमने सरल भाषा में ख़ुद लिखे हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

करवा चौथ की पूजा का मंत्र क्या है?

व्रतराज में करक चतुर्थी (करवा चौथ) पर गौरी की पूजा का मंत्र ‘नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संततिं शुभाम्। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥’ है; गीता प्रेस की ‘व्रत-परिचय’ भी यही देती है। अर्थ और स्रोत ऊपर है।

करवा देते समय कौन सा मंत्र बोलते हैं?

व्रतराज की कथा के अंत में: ‘करकं क्षीरसम्पूर्णं तोयपूर्णमथापि वा। ददामि रत्नसंयुक्तं चिरं जीवतु मे पतिः॥’, अर्थात दूध या जल से भरा यह करवा मैं देती हूँ, मेरे पति चिरंजीवी हों।

करवा चौथ 2026 कब है और चाँद कब निकलेगा?

करवा चौथ 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को है। नई दिल्ली में पूजा मुहूर्त 5:39 PM से 6:56 PM और चंद्रोदय 8:17 PM पर है; अपने शहर का समय करवा चौथ के पन्ने पर या कार्ड बनाते समय देखें।

स्रोत

  1. व्रतराज (विश्वनाथ), खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई 1897; वामन पुराण, आलोचनात्मक संस्करण (सं. आनंद स्वरूप गुप्त, काशिराज ट्रस्ट 1967), परिशिष्ट; गीता प्रेस: व्रत-परिचय (archive.org)
  2. गीता प्रेस: शिवस्तोत्ररत्नाकर (उमामहेश्वर स्तोत्र, अर्धनारीनटेश्वर स्तोत्र) और sanskritdocuments.org: umamaheshvara, ardhanAri
  3. रघुवंश, मल्लिनाथ की संजीविनी टीका सहित (सं. काशीनाथ पांडुरंग परब, निर्णयसागर प्रेस) और sanskritdocuments.org: raghuvansha1
  4. गीता प्रेस: श्रीरामचरितमानस, और विजया टीका (विजयानंद त्रिपाठी) (archive.org)

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