दीपावली 2026: 8 नवंबर, रविवार। नीचे 12 श्लोक हैं जो दिवाली पर शुभकामना के साथ भेजे जा सकते हैं, पहला ‘हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्’ (श्रीसूक्त (ऋग्वेद का खिल सूक्त), मंत्र 1)। हर श्लोक के नीचे उसका स्रोत और हमारा लिखा सरल अर्थ है; ‘कार्ड बनाएँ’ से वही श्लोक आपके नाम के साथ फ़ोटो कार्ड बन जाता है।
दिवाली का शुभकामना कार्ड बनाएँ
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1हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
स्रोत: श्रीसूक्त (ऋग्वेद का खिल सूक्त), मंत्र 1
अर्थ: हे अग्निदेव (जातवेद), सोने जैसी आभा वाली, हिरणी जैसी चपल, सोने-चाँदी की मालाएँ पहने, चंद्रमा जैसी प्रसन्न और स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास बुला लाइए।
गीता प्रेस की दीपावली महालक्ष्मी पूजा में लक्ष्मी के ध्यान के साथ यही मंत्र आता है, और आगे हर उपचार के साथ श्रीसूक्त का एक-एक मंत्र।
पाठभेद: पूजा में इसके आरंभ में ‘ॐ’ लगाया जाता है; गीता प्रेस ‘म आ वह’ अलग-अलग छापता है। शब्द वही हैं।
2मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥
स्रोत: श्रीसूक्त (ऋग्वेद का खिल सूक्त), मंत्र 10
अर्थ: हम मन की इच्छा और संकल्प को पूरा होता पाएँ, और वाणी में सत्य पाएँ। पशुधन और अन्न की समृद्धि, श्री और यश मुझमें आकर बसें।
गीता प्रेस की दीपावली पूजा में फूल और माला चढ़ाते समय यह मंत्र आता है।
3कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम।श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥
स्रोत: श्रीसूक्त (ऋग्वेद का खिल सूक्त), मंत्र 11
अर्थ: श्रीसूक्त की परंपरा में कर्दम ऋषि लक्ष्मी के पुत्र माने गए हैं; उन्हीं से लक्ष्मी संतान वाली कही गई हैं। हे कर्दम, मेरे यहाँ प्रकट होइए और कमल की माला पहनने वाली माता लक्ष्मी को मेरे कुल में बसाइए।
कर्दम को लक्ष्मी का पुत्र बताने वाला श्लोक (‘आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः’) श्रीसूक्त के साथ पढ़े जाने वाले श्लोकों में है। गीता प्रेस की दीपावली पूजा में धूप दिखाते समय यह मंत्र आता है।
पाठभेद: गीता प्रेस ‘प्रजा भूता’ अलग-अलग और ‘संभव’ छापता है; शब्द वही हैं।
4सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे।भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥
स्रोत: श्रीसूक्त के साथ पढ़े जाने वाले श्लोकों में; आदि शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध कनकधारा स्तोत्र में भी (श्लोक 15)
अर्थ: हे कमल में निवास करने वाली, हाथ में कमल लिए, उजले वस्त्रों, चंदन और मालाओं से सुशोभित भगवती! हे हरि की प्रिया, मन को भाने वाली, तीनों लोकों को समृद्धि देने वाली, मुझ पर प्रसन्न होइए।
गीता प्रेस की दीपावली महालक्ष्मी पूजा में क्षमा-प्रार्थना के बाद, पूजा के अंत में, यही श्लोक पढ़कर फिर प्रणाम किया जाता है।
पाठभेद: कनकधारा स्तोत्र के पाठ (sanskritdocuments.org और गीता प्रेस) में ‘धवलतरांशुक’ की जगह ‘धवलतमांशुक’ (सबसे उजले वस्त्र) है।
5नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
स्रोत: महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र (इन्द्र द्वारा कही गई स्तुति), श्लोक 1
अर्थ: हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजमान, देवताओं से पूजित, तुम्हें नमस्कार। हाथों में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मी, तुम्हें नमस्कार।
स्तोत्र के अंत (फलश्रुति, श्लोक 9–11) में लिखा है कि इसे दिन में एक बार पढ़ने से बड़े पापों का नाश होता है, दो बार पढ़ने वाला धन-धान्य से युक्त होता है।
6नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम्
नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम्।श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम्॥
स्रोत: विष्णु पुराण, पहला अंश, अध्याय 9, श्लोक 117 (इन्द्र द्वारा लक्ष्मी की स्तुति)
अर्थ: मैं सब लोकों की माता, कमल से प्रकट हुई, खिले कमल जैसे नेत्रों वाली और भगवान विष्णु के वक्षःस्थल पर रहने वाली श्री (लक्ष्मी) को नमस्कार करता हूँ।
पुराण के अनुसार समुद्र-मंथन से लक्ष्मी के प्रकट होने के बाद इन्द्र ने फिर से स्वर्ग का राज्य पाकर यह स्तुति की। स्तुति के अंत में लक्ष्मी कहती हैं कि जो सुबह-शाम इस स्तोत्र से उनकी स्तुति करेगा, उससे वे मुँह नहीं मोड़ेंगी (श्लोक 139)।
पाठभेद: विकिस्रोत के विष्णु पुराण पाठ में यह श्लोक 116 गिना गया है; वहाँ ‘सर्वलोकानां’ की जगह ‘सर्वभूतानां’ (सब प्राणियों की) और ‘विष्णोर्वक्षःस्थलस्थिताम्’ है।
7त्वं माता सर्वलोकानां देवदेवो हरिः पिता
त्वं माता सर्वलोकानां देवदेवो हरिः पिता।त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम्॥
स्रोत: विष्णु पुराण, पहला अंश, अध्याय 9, श्लोक 126 (इन्द्र द्वारा लक्ष्मी की स्तुति)
अर्थ: इन्द्र कहते हैं: तुम सब लोकों की माता हो और देवों के देव हरि पिता हैं। हे माँ, यह सारा चर-अचर जगत तुमसे और विष्णु से भरा हुआ है।
पाठभेद: विकिस्रोत के पाठ में यह श्लोक 124 है; वहाँ ‘सर्वभूतानां’ और ‘चाम्ब’ (हे माँ) की जगह ‘चाद्य’ (आज) है।
8मा नः कोशं तथा गोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम्
मा नः कोशं तथा गोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम्।मा शरीरं कलत्रं च त्यजेथाः सर्वपावनि॥
स्रोत: विष्णु पुराण, पहला अंश, अध्याय 9, श्लोक 127 (इन्द्र द्वारा लक्ष्मी की स्तुति)
अर्थ: हे सबको पवित्र करने वाली! हमारे कोष (खजाने), गोशाला, घर, घर की वस्तुओं, शरीर और पत्नी को कभी मत छोड़ना।
अगले श्लोक (128) में इन्द्र पुत्र, मित्र, पशु और आभूषणों के लिए भी यही प्रार्थना करते हैं।
पाठभेद: विकिस्रोत के पाठ में यह श्लोक 125 गिना गया है; शब्द वही हैं।
9दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः
दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।दीपो हरतु मे पापं सांध्यदीप नमोऽस्तु ते॥
स्रोत: संध्या-दीप का श्लोक, परंपरा के अनुसार (गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, दिनचर्या का प्रकरण); किसी ग्रंथ के अध्याय-श्लोक के साथ इसका स्रोत हमें नहीं मिला
अर्थ: दीपक का प्रकाश परम ब्रह्म है, दीपक का प्रकाश जनार्दन (विष्णु) है। दीपक मेरा पाप हर ले; हे संध्या के दीप, तुम्हें नमस्कार।
गीता प्रेस के अनुसार सूर्यास्त के समय दीपक जलाकर, उसे प्रकाश-रूप ब्रह्म मानकर, इन श्लोकों से प्रणाम किया जाता है; पुस्तक कहती है कि इससे लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह रोज़ की संध्या का श्लोक है, केवल दीपावली का नहीं।
पाठभेद: sanskritdocuments.org के श्लोक-संग्रहों में पहली पंक्ति ‘दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः’ है, और अंत ‘सन्ध्यादीप नमोऽस्तु ते’ या ‘दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते’। अर्थ वही रहता है।
10शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदम्
शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदम्।शत्रुबुद्धिविनाशं च दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
स्रोत: संध्या-दीप का श्लोक, परंपरा के अनुसार (गीता प्रेस, नित्यकर्म-पूजाप्रकाश); किसी ग्रंथ के अध्याय-श्लोक के साथ इसका स्रोत हमें नहीं मिला
अर्थ: हे दीपक की ज्योति! तुम शुभ करो, कल्याण, आरोग्य और सुख-संपदा दो, और मन से शत्रुता के भाव को मिटाओ; तुम्हें नमस्कार।
गीता प्रेस इसे ‘दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म’ के साथ संध्या के दीप के श्लोकों में देता है।
पाठभेद: यह श्लोक अधिकतर इस रूप में भेजा जाता है, और sanskritdocuments.org के श्लोक-संग्रह में भी यही है: ‘शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसम्पदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥’ (‘करोति’ = करती है, ‘धनसम्पदा’ = धन-संपदा, ‘विनाशाय’ = नाश के लिए)। हमने गीता प्रेस का पाठ लिया है।
11असतो मा सद्गमय
असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्मामृतं गमय॥
स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28
अर्थ: मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो। (उपनिषद् स्वयं समझाता है कि असत् और अंधकार मृत्यु हैं, सत् और ज्योति अमृत; अर्थात् ‘मुझे अमर कर दो’।)
दीपावली दीपों का पर्व है, इसलिए ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’ वाली यह पंक्ति इस दिन बहुत भेजी जाती है। उपनिषद् में इसका दीपावली से संबंध नहीं बताया गया; वहाँ यह यज्ञ में साम-गान के आरंभ पर जपा जाने वाला मंत्र है।
पाठभेद: तीसरी पंक्ति ‘मृत्योर्माऽमृतं गमय’ (अवग्रह के साथ) भी छपती है; शब्द वही हैं।
12वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
स्रोत: गणेश वंदना, परंपरा के अनुसार; किसी ग्रंथ के अध्याय-श्लोक के साथ इसका स्रोत हमें नहीं मिला
अर्थ: हे मुड़ी हुई सूँड और विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले देव, मेरे सब कामों को सदा विघ्न से मुक्त रखिए।
दीपावली पूजा में लक्ष्मी से पहले गणेश की पूजा होती है (गीता प्रेस), इसलिए शुभकामना में भी गणेश वंदना साथ भेजी जाती है।
पाठभेद: गीता प्रेस (नित्यकर्म-पूजाप्रकाश, मंगल-पाठ) में पहली पंक्ति ‘वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ’ है: शब्द वही, क्रम उलटा, अर्थ वही।
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इन श्लोकों के बारे में
हर पाठ कम से कम दो अलग प्रकाशनों से शब्द-शब्द मिलाया गया है। जहाँ प्रकाशनों में अंतर है, वह ‘पाठभेद’ में लिखा है। श्लोक संख्या उसी प्रकाशन की है जिसका नाम स्रोत में है; दूसरे प्रकाशनों में संख्या कुछ आगे-पीछे हो सकती है। अर्थ हमने सरल भाषा में ख़ुद लिखे हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दिवाली पर कौन सा संस्कृत श्लोक भेजें?
दीपक का श्लोक ‘शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदम्’ (अधिकतर ‘शुभं करोति कल्याणम्’ के रूप में भेजा जाता है), श्रीसूक्त का पहला मंत्र ‘हिरण्यवर्णां हरिणीं’, या ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ वाली उपनिषद् की पंक्ति। हर श्लोक का स्रोत और अर्थ ऊपर है।
‘असतो मा सद्गमय’ किस ग्रंथ में है?
बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28) में। वहाँ यह यज्ञ में साम-गान के आरंभ पर जपा जाने वाला मंत्र है; उपनिषद् इसका दीपावली से संबंध नहीं बताता, पर ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’ के कारण यह इस दिन बहुत भेजा जाता है।
दिवाली 2026 कब है?
दीपावली 8 नवंबर 2026, रविवार को है। नई दिल्ली में लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त 5:55 PM से 7:51 PM तक है; अपने शहर का मुहूर्त दिवाली के पन्ने पर या कार्ड बनाते समय देखें।
स्रोत
- गीता प्रेस, गोरखपुर: नित्यकर्म-पूजाप्रकाश (श्रीमहालक्ष्मी-पूजन, संध्या-दीप, मंगल-पाठ) (archive.org)
- sanskritdocuments.org: श्रीसूक्त (s-sukta), महालक्ष्म्यष्टक, कनकधारा स्तोत्र, दीपलक्ष्मी स्तोत्र, श्लोक-संग्रह, बृहदारण्यक उपनिषद्
- श्रीसूक्त, विद्यारण्य आदि के भाष्य सहित, सं. ढुण्ढिराज शास्त्री, चौखम्बा, काशी 1923 (archive.org)
- गीता प्रेस: स्तोत्ररत्नावली (महालक्ष्म्यष्टक) (archive.org)
- गीता प्रेस: श्रीविष्णुपुराण, हिंदी अनुवाद सहित (मुनिलाल गुप्त) (archive.org); विकिस्रोत: विष्णुपुराणम्, प्रथमांश, अध्याय 9
- गीता प्रेस: बृहदारण्यकोपनिषद्, शांकरभाष्य सहित (archive.org)
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