वैष्णव सम्प्रदाय विष्णु और उनके अवतारों, विशेषकर राम और कृष्ण, की भक्ति करने वाली परंपरा है; विष्णु के भक्त को वैष्णव कहते हैं। इसका कोई एक संस्थापक नहीं: तमिल आळवार संतों और रामानुज, मध्व, निम्बार्क, वल्लभ और चैतन्य जैसे आचार्यों से इसकी अलग-अलग शाखाएँ बनीं, जिनमें से चार को परंपरा “चार सम्प्रदाय” कहती है। ये शाखाएँ ईश्वर और जीव के संबंध को अलग-अलग ढंग से समझाती हैं, पर सब ईश्वर को गुणों वाला व्यक्ति मानती हैं और उनकी प्रतिमा के रूप में उपासना करती हैं।
- प्रमुख देवता
- विष्णु (नारायण), लक्ष्मी के साथ
- प्रमुख अवतार
- राम और कृष्ण
- आचार्य और संत
- आळवार संत (7वीं–10वीं सदी), रामानुज, मध्व, निम्बार्क, वल्लभ, चैतन्य, रामानंद
- दर्शन
- विशिष्टाद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत, अचिन्त्य भेदाभेद
- मुख्य ग्रंथ
- भगवद्गीता, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, रामायण, पांचरात्र संहिताएँ, आळवारों का नालायिर प्रबंधम्
- मुख्य केंद्र
- श्रीरंगम, तिरुमला-तिरुपति, उडुपी, मथुरा-वृंदावन, पुरी, नाथद्वारा, पंढरपुर
- तिलक
- ऊर्ध्वपुंड्र: U जैसी दो या अधिक खड़ी रेखाएँ, बीच में रेखा या बिंदु के साथ या बिना; हर सम्प्रदाय का अपना रूप
- मुख्य पर्व
- जन्माष्टमी, राम नवमी, एकादशी व्रत
वैष्णव सम्प्रदाय क्या है
वैष्णवों के लिए परम सत्य (ब्रह्म) विष्णु में प्रकट है, जो राम, कृष्ण और दूसरे अवतारों के रूप में आते हैं और धर्म की रक्षा करते हैं। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि होती है, वे साधुओं की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होते हैं (4.7–4.8)।
वैष्णव धर्म के कई पंथ हैं, जो जीव और ईश्वर के संबंध को अलग-अलग समझाते हैं। ब्रिटानिका के अनुसार इन सबमें यह समान है कि ईश्वर को विशिष्ट गुणों वाला व्यक्ति माना जाता है और उनकी प्रतिमाओं और रूपों के माध्यम से उपासना होती है; अधिकांश वैष्णव परंपरा के साथ स्थानीय रीतियों को भी मिलाते हैं।
संक्षिप्त इतिहास
ब्रिटानिका के अनुसार वासुदेव-कृष्ण की देवता के रूप में पूजा ई.पू. 5वीं सदी तक शुरू हो चुकी थी। दक्षिण में 7वीं से 10वीं सदी के तमिल आळवार संत मंदिर-मंदिर घूमकर विष्णु के भजन गाते थे; 10वीं सदी में नाथमुनि ने उनके लगभग चार हज़ार पदों को नालायिर प्रबंधम् के रूप में संकलित किया।
इसके बाद बड़े आचार्य आए: श्रीरंगम में रामानुज (11वीं–12वीं सदी), उडुपी में मध्व (13वीं सदी), निम्बार्क, और 15वीं–16वीं सदी में ब्रज में वल्लभ और बंगाल में चैतन्य। उत्तर भारत में रामानंद से रामानंदी परंपरा, महाराष्ट्र में ज्ञानदेव और नामदेव से वारकरी पंथ, और 19वीं सदी में गुजरात में स्वामीनारायण सम्प्रदाय बना। संस्कृत और भारतीय भाषाओं में 10वीं से 16वीं सदी का भक्ति-साहित्य आज भी वैष्णव पूजा का हिस्सा है।
विश्वास और साधना
अवतार वैष्णव धर्म का आधार है। ब्रिटानिका के अनुसार दस अवतारों (दशावतार) की प्रचलित सूची है: मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और भविष्य के कल्कि; कुछ सूचियों में बुद्ध की जगह बलराम हैं, और कुछ ग्रंथ 24 अवतार गिनते हैं।
भक्ति इसका मार्ग है। कई परंपराएँ सिखाती हैं कि जीव ईश्वर की कृपा से ही संसार से मुक्त होता है; आळवारों ने पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति) पर ज़ोर दिया, और चैतन्य की परंपरा में नाम-कीर्तन प्रमुख है। अधिकांश भक्त मंदिर की प्रतिमा को केवल प्रतीक नहीं, ईश्वर का वास्तविक रूप (अर्चावतार) मानते हैं।
शाखाएँ
परंपरा चार सम्प्रदाय गिनती है: श्री (रामानुज, विशिष्टाद्वैत), ब्रह्म (मध्व, द्वैत), रुद्र (विष्णुस्वामी और वल्लभ, शुद्धाद्वैत) और सनकादि (निम्बार्क, द्वैताद्वैत)। इनके बाद गौड़ीय (चैतन्य, अचिन्त्य भेदाभेद), रामानंदी, वारकरी और स्वामीनारायण जैसी परंपराएँ बनीं। चारों का विवरण और गिनती का स्रोत “वैष्णव के चार सम्प्रदाय” पन्ने पर है।
प्रमुख केंद्र
श्रीरंगम का रंगनाथस्वामी मंदिर रामानुज का केंद्र था; तिरुमला-तिरुपति में विष्णु वेंकटेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं; उडुपी माध्व परंपरा का मुख्य केंद्र है; मथुरा कृष्ण की जन्मभूमि और वृंदावन उनकी लीलाओं का स्थान माना जाता है; पुरी में जगन्नाथ हैं; नाथद्वारा पुष्टिमार्ग का और पंढरपुर वारकरी पंथ का केंद्र है।
स्रोतों में अंतर
- दशावतार की सूची: प्रचलित सूची में नौवें अवतार बुद्ध हैं, कुछ सूचियों में उनकी जगह बलराम; जयदेव के गीतगोविंद में कृष्ण स्वयं परम देवता हैं जो दस बार अवतार लेते हैं, और कुछ ग्रंथ 24 अवतार गिनते हैं (ब्रिटानिका)।
- बाद की परंपराओं का संबंध: गौड़ीय परंपरा स्वयं को माध्व सम्प्रदाय से और रामानंदी परंपरा स्वयं को रामानुज से जोड़ती है; दोनों संबंधों पर कुछ विद्वानों ने प्रश्न उठाए हैं (विवरण “वैष्णव के चार सम्प्रदाय” पन्ने पर)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वैष्णव सम्प्रदाय क्या है?
विष्णु और उनके अवतारों, विशेषकर राम और कृष्ण, की भक्ति करने वाली परंपरा। इसके अनुयायी वैष्णव कहलाते हैं, और इसकी कई शाखाएँ हैं जिनमें से चार को परंपरा “चार सम्प्रदाय” कहती है।
वैष्णव सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
कोई एक संस्थापक नहीं। अलग-अलग शाखाएँ अलग आचार्यों से चलीं: श्री सम्प्रदाय रामानुज से, माध्व मध्व से, निम्बार्क सम्प्रदाय निम्बार्क से, पुष्टिमार्ग वल्लभ से और गौड़ीय परंपरा चैतन्य से। उनसे पहले तमिल आळवार संतों की भक्ति-परंपरा थी।
विष्णु के दस अवतार कौन से हैं?
प्रचलित सूची: मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि। कुछ सूचियों में बुद्ध की जगह बलराम हैं (ब्रिटानिका)।
कैलेंडर में स्मार्त और वैष्णव एकादशी अलग दिन क्यों होती है?
कभी-कभी एकादशी व्रत दो लगातार दिनों पर बताया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार ऐसे में स्मार्त गृहस्थ पहले दिन व्रत रखते हैं, और वैष्णव एकादशी कई बार स्मार्त एकादशी से एक दिन बाद पड़ती है, इसलिए वैष्णव अपना व्रत-दिन वैष्णव पंचांग से देखते हैं।
वैष्णव तिलक कैसा होता है?
ब्रिटानिका के अनुसार इसके कई रूप हैं, पर सामान्यतः यह अंग्रेज़ी U जैसी दो या अधिक खड़ी रेखाएँ (ऊर्ध्वपुंड्र) होता है, जो विष्णु के चरण का प्रतीक मानी जाती हैं, बीच में रेखा या बिंदु के साथ या बिना।
स्रोत
- भगवद्गीता 4.7–4.8
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Vaishnavism”, “Hinduism: Vaishnavism and Shaivism”, “Krishna”, “Alvar”
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Ramanuja”, “Madhva”, “Vallabha”, “Chaitanya movement”, “Ramananda”, “Varakari Panth”, “Swami-Narayani”, “tilak”
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “What is Janmashtami and why is it celebrated?”, “Rama Navami”
- द्रिक पंचांग: एकादशी तिथियाँ (स्मार्त और वैष्णव)
- हिमालयन अकादमी (कौआई हिंदू मठ): “The Four Denominations of Hinduism”
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