नरसिंह दशावतार में विष्णु का चौथा अवतार है: आधा मनुष्य, आधा सिंह। ब्रह्मा के वरदान से दैत्यराज हिरण्यकशिपु न मनुष्य से मर सकता था न पशु से, न दिन में न रात में, न भीतर न बाहर, न धरती पर न आकाश में, न किसी शस्त्र से (भागवत 7.3.35-37)। अपने भक्त पुत्र प्रह्लाद को मारने चले हिरण्यकशिपु के सामने भगवान खंभे से नरसिंह रूप में प्रकट हुए और सभा-भवन की देहली पर उसे अपनी जंघाओं पर रखकर नखों से चीर दिया (भागवत 7.8.15-29)।
- दशावतार में
- चौथा अवतार
- रूप
- न पूरा मनुष्य न पूरा पशु: सिंह का मुख और अयाल, मनुष्य का शरीर, नख ही अस्त्र (भागवत 7.8.18-22)
- युग (परंपरा से)
- सत्य युग
- मुख्य पात्र
- भक्त प्रह्लाद, उनके पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपु, ब्रह्मा
- कथा के ग्रंथ
- भागवत पुराण 7.3-10; विष्णु पुराण 1.16-20
- जयंती
- नृसिंह जयंती: वैशाख शुक्ल चतुर्दशी; 2027 में 18 मई (द्रिक पंचांग), पूजा सायंकाल में
- प्रमुख मंदिर
- अहोबिलम (नौ नरसिंह मंदिर) और सिंहाचलम, आंध्र प्रदेश; यादगिरिगुट्टा, तेलंगाना
ब्रह्मा का वरदान
वराह भगवान के हाथों भाई हिरण्याक्ष के मरने के बाद हिरण्यकशिपु ने कठोर तप किया। प्रसन्न ब्रह्मा से उसने माँगा कि ब्रह्मा के रचे किसी प्राणी से उसकी मृत्यु न हो; न भीतर न बाहर, न रात में न दिन में, न किसी शस्त्र से, न धरती पर न आकाश में, न मनुष्य से न पशु से, न देव, दानव या बड़े नाग से; और युद्ध में कोई उसकी बराबरी न कर सके (भागवत 7.3.35-38)। ब्रह्मा ने ये दुर्लभ वर दे दिए (7.4.1)।
खंभे से प्रकट होना
हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद हरि का भक्त था। क्रोधित पिता ने उससे पूछा कि तेरा भगवान कहाँ है, क्या इस खंभे में है; और तलवार लेकर सिंहासन से उछलकर उसने खंभे पर मुक्का मारा (भागवत 7.8.12-15)। खंभे से ऐसा भयंकर शब्द हुआ कि ब्रह्मा आदि ने प्रलय समझा (7.8.16)।
अपने भक्त की बात सच करने और यह दिखाने के लिए कि वे सब प्राणियों और वस्तुओं में हैं, भगवान सभा-भवन के उसी खंभे से ऐसे अद्भुत रूप में प्रकट हुए जो न मनुष्य था न पशु (7.8.18-19)। लंबे युद्ध के बाद नरसिंह ने उसे पकड़ा, सभा-भवन के द्वार की देहली पर अपनी जंघाओं पर रखा, और जिस त्वचा को इंद्र का वज्र भी नहीं काट सका था, उसे खेल-खेल में नखों से चीर दिया (7.8.24-29)। इस तरह ब्रह्मा के वरदान की हर शर्त बनी रही।
वरदान की ‘न दिन न रात’ वाली शर्त का उत्तर परंपरा में संध्या का समय माना जाता है; भागवत के इस अध्याय के अनुवाद में समय नहीं लिखा है। विष्णु पुराण (1.16-20) प्रह्लाद पर हुए अत्याचारों की कथा विस्तार से कहता है, और उसके अध्याय 20 में विष्णु नृसिंह रूप में हिरण्यकशिपु को मारते हैं।
नृसिंह जयंती और मंदिर
नृसिंह जयंती वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाती है; 2027 में यह 18 मई को है, और द्रिक पंचांग इसकी पूजा सायंकाल में बताता है। आंध्र प्रदेश के अहोबिलम में नरसिंह के नौ रूपों के नौ मंदिर हैं; सिंहाचलम का वराह लक्ष्मी नरसिंह मंदिर और तेलंगाना का यादगिरिगुट्टा (यादाद्रि) भी प्रसिद्ध हैं।
स्रोतों में अंतर
- संध्या का समय: परंपरा और विकिपीडिया के अनुसार वध संध्या के समय हुआ; भागवत 7.8.29 के अनुवाद में द्वार की देहली, जंघा और नख का उल्लेख है, समय का नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नरसिंह अवतार क्यों हुआ?
भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए और उस हिरण्यकशिपु को मारने के लिए, जिसे ब्रह्मा के वरदान से न मनुष्य मार सकता था न पशु। भागवत (7.8.18) कहता है कि भगवान अपने भक्त की बात सच करने के लिए खंभे से प्रकट हुए।
नृसिंह जयंती 2027 में कब है?
18 मई 2027 (मंगलवार), वैशाख शुक्ल चतुर्दशी। द्रिक पंचांग के अनुसार पूजा सायंकाल में होती है।
हिरण्यकशिपु को वरदान किसने दिया था?
ब्रह्मा ने, उसके कठोर तप से प्रसन्न होकर (भागवत 7.3.35-38, 7.4.1)।
नरसिंह भगवान के प्रमुख मंदिर कहाँ हैं?
आंध्र प्रदेश में अहोबिलम (नौ नरसिंह मंदिर) और सिंहाचलम, और तेलंगाना में यादगिरिगुट्टा।
स्रोत
- भागवत पुराण 7.3.35-38, 7.4.1, 7.8.12-30 (जी. वी. तगारे का अंग्रेज़ी अनुवाद, मोतीलाल बनारसीदास, archive.org)
- विष्णु पुराण 1.16-20 (एच. एच. विल्सन का अनुवाद, archive.org)
- द्रिक पंचांग: नृसिंह जयंती 2027 की तिथि और सायंकाल (हमारी जाँच: docs/checks/drik-festivals-2027.md)
- विकिपीडिया: “Narasimha” (संध्या, अहोबिलम, सिंहाचलम, यादगिरिगुट्टा)
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