कूर्म दशावतार में विष्णु का दूसरा अवतार है, कछुए के रूप में। देवता और दानव मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर क्षीरसागर मथ रहे थे, तब पर्वत अपने भार से डूबने लगा; भगवान ने विशाल कछुए का रूप लेकर उसे अपनी पीठ पर उठा लिया (भागवत 8.7.6-9; विष्णु पुराण 1.9)।
- दशावतार में
- दूसरा अवतार
- रूप
- विशाल कछुआ (कूर्म, कच्छप)
- युग (परंपरा से)
- सत्य युग
- मुख्य पात्र
- देवता और दानव, वासुकि नाग, मंदराचल पर्वत; मंथन से निकला हलाहल शिव ने पिया
- कथा के ग्रंथ
- भागवत पुराण 8.7; विष्णु पुराण 1.9; महाभारत में मंथन की कथा; कूर्म पुराण कूर्म भगवान का उपदेश है
- प्रमुख मंदिर
- श्रीकूर्मम (श्रीकाकुलम ज़िला, आंध्र प्रदेश)
भागवत की कथा
अमृत के लिए देवता और दानव एक साथ क्षीरसागर मथने लगे। भागवत (8.7.1-4) के अनुसार भगवान पहले वासुकि के मुख की ओर गए और देवता उनके पीछे; दानवों ने कहा कि वे वेद पढ़े, ऊँचे कुल के हैं और नाग की पूँछ नहीं पकड़ेंगे। तब भगवान मुस्कुराकर देवताओं के साथ पूँछ की ओर हो गए।
मथते-मथते, नीचे कोई आधार न होने से, पर्वत अपने भार से पानी में डूब गया और सबके मुख उतर गए (8.7.6-7)। तब भगवान ने अद्भुत विशाल कछुए का रूप लिया, जल में उतरकर पर्वत को पीठ पर उठा लिया, और देव-दानव फिर मथने लगे (8.7.8-9)। घूमता पर्वत उन्हें पीठ की सुखद खुजली जैसा लगा (8.7.10)। साथ ही वे देवताओं और दानवों में बल बनकर समाए, और एक और रूप में हज़ार भुजाओं से पर्वत को ऊपर से थामे रहे (8.7.11-13)।
मंथन से पहले हलाहल नाम का भयंकर विष निकला, जिसे तीनों लोकों की रक्षा के लिए शिव ने पी लिया (8.7.18 से आगे); उसके बाद एक-एक करके रत्न निकले और अंत में अमृत (8.8)।
विष्णु पुराण में
विष्णु पुराण (1.9) में भगवान स्वयं देवताओं को दानवों से संधि करके मंथन का उपाय बताते हैं। देवताओं को नाग की पूँछ की ओर और दैत्यों को सिर की ओर रखा गया। क्षीरसागर के बीच हरि स्वयं कछुए के रूप में घूमते पर्वत का आधार बने, दूसरे रूपों में देव-दानवों के बीच रहकर नाग को खींचते रहे, और एक और विशाल रूप में पर्वत के शिखर पर बैठे रहे।
कूर्म के मंदिर
कूर्म के मंदिर बहुत कम हैं। सबसे प्रसिद्ध आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िले का श्रीकूर्मम (कूर्मनाथ स्वामी) मंदिर है। विकिपीडिया के अनुसार यह पहले शिव मंदिर था, जिसे संत रामानुज ने वैष्णव मंदिर बनाया।
स्रोतों में अंतर
- सबसे पुराने उल्लेख: विकिपीडिया के अनुसार शतपथ ब्राह्मण कूर्म का सबसे पुराना उल्लेख करता है, पर वहाँ कूर्म प्रजापति और कश्यप ऋषि से जोड़ा गया है; महाभारत के क्रिटिकल संस्करण में मंथन के कछुए को स्पष्ट रूप से विष्णु नहीं कहा गया। विष्णु से उसका पूरा संबंध पुराणों में है।
- कौन किस ओर: भागवत (8.7.1-4) में भगवान और देवता पहले नाग के मुख की ओर जाते हैं और दानवों के हठ पर पूँछ की ओर आते हैं; विष्णु पुराण (1.9) में देवताओं को सीधे पूँछ की ओर रखा गया है। दोनों में अंत में दानव सिर की ओर हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कूर्म अवतार क्यों हुआ?
समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत नीचे कोई आधार न होने से डूबने लगा। भगवान ने कछुए का रूप लेकर उसे अपनी पीठ पर उठाया ताकि मंथन चलता रहे और अमृत निकले (भागवत 8.7.6-9)।
समुद्र मंथन में रस्सी किसकी थी?
वासुकि नाग की। मथानी मंदराचल पर्वत था (विष्णु पुराण 1.9; भागवत 8.7)।
कूर्म अवतार का मंदिर कहाँ है?
सबसे प्रसिद्ध श्रीकूर्मम मंदिर आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िले में है।
स्रोत
- भागवत पुराण 8.7.1-13, 8.7.18 से आगे (जी. वी. तगारे का अंग्रेज़ी अनुवाद, मोतीलाल बनारसीदास, archive.org)
- विष्णु पुराण 1.9 (एच. एच. विल्सन का अनुवाद, archive.org)
- विकिपीडिया: “Kurma” (शतपथ ब्राह्मण और महाभारत वाले उल्लेख, कूर्म पुराण, श्रीकूर्मम)
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