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वक्रतुण्ड महाकाय PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/vakratunda-mahakaya/
“वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ” भगवान गणेश की वंदना का संस्कृत श्लोक है, जिसमें सब कामों को विघ्न-रहित करने की प्रार्थना है। परंपरा में किसी भी पूजा, पाठ, पढ़ाई या नए काम के आरंभ में इसे बोला जाता है, क्योंकि गणेश जी को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य माना जाता है। यह अनुष्टुप छंद में है; इसका मूल ग्रंथ प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं है।
पाठ के बारे में: कुछ स्थानों पर ‘सूर्यकोटि समप्रभ’ को एक शब्द ‘सूर्यकोटिसमप्रभ’ लिखा जाता है, और कुछ लोग आरंभ में ‘श्री’ जोड़कर बोलते हैं; अर्थ वही रहता है। इस श्लोक का मूल ग्रंथ और रचयिता प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं है; यह परंपरा में प्रचलित श्लोक है। ‘कोटि’ का अर्थ करोड़ है; ‘करोड़ों सूर्य’ अपार तेज बताने का काव्य का ढंग है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यह श्लोक किस ग्रंथ से है?
इसका मूल ग्रंथ प्रामाणिक रूप से ज्ञात नहीं है। यह गणेश वंदना का परंपरा में प्रचलित श्लोक है और अनुष्टुप छंद में है।
यह श्लोक कब बोला जाता है?
परंपरा में किसी भी पूजा, पाठ, पढ़ाई, यात्रा या नए काम के आरंभ में, क्योंकि गणेश जी को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य माना जाता है। गणेश चतुर्थी पर और बुधवार को भी।
‘सूर्यकोटि समप्रभ’ का क्या अर्थ है?
‘करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा (तेज) वाले’। ‘कोटि’ का अर्थ करोड़ है; यह अपार तेज बताने का काव्य का ढंग है।
स्रोत
- परंपरागत पाठ
- पाठ का मिलान: greenmesg.org, shlokam.org और drikpanchang.com
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पाठ का मिलान: greenmesg.org, shlokam.org, drikpanchang.com
