मंत्रआत्मा

असतो मा सद्गमय

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 2 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. मंत्र

    असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय॥

    शब्दार्थ: असतः = असत् से; मा = मुझे; सत् गमय = सत् की ओर ले चलो; तमसः = अंधकार से; ज्योतिः गमय = प्रकाश की ओर ले चलो; मृत्योः = मृत्यु से; मा अमृतम् गमय = मुझे अमृत की ओर ले चलो। यहाँ ‘मा’ का अर्थ ‘मुझे’ है, ‘मत’ नहीं। भावार्थ: मुझे असत् से सत् की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/asato-ma-sadgamaya/

संक्षेप में

“असतो मा सद्गमय” बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28) के तीन छोटे प्रार्थना-वाक्य हैं, जिन्हें उपनिषद् ‘पवमान अभ्यारोह’ कहता है। उपनिषद् के अनुसार यज्ञ में सामगान आरंभ होने पर इनका जप किया जाता था। आज ये वाक्य प्रार्थना-सभाओं, पाठ के आरंभ और दीप जलाने के समय बोले जाते हैं, और प्रायः अंत में ‘ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः’ जोड़ा जाता है।

उपनिषद् की अपनी व्याख्या: इन वाक्यों के ठीक बाद बृहदारण्यक उपनिषद् स्वयं इनका अर्थ बताता है: असत् मृत्यु है और सत् अमृत; तम मृत्यु है और ज्योति अमृत। यानी तीनों वाक्यों का आशय एक ही है: “मुझे अमर करो”। पाठ के बारे में: उपनिषद् में ये वाक्य ‘ॐ’ और ‘शान्तिः’ के बिना हैं; ये परंपरा से जोड़े जाते हैं। तीसरी पंक्ति को ‘मृत्योर्माऽमृतं गमय’ भी लिखा जाता है; शब्द वही हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह मंत्र किस ग्रंथ से है?

बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28) से, जो शुक्ल यजुर्वेद का उपनिषद् है। वहाँ इन तीन वाक्यों को ‘पवमान अभ्यारोह’ कहा गया है।

यहाँ ‘मा’ का अर्थ क्या है?

‘मा’ यहाँ ‘माम्’, यानी ‘मुझे’ के अर्थ में है। ‘असतो मा सद्गमय’ का अर्थ है ‘मुझे असत् से सत् की ओर ले चलो’, न कि ‘सत् की ओर मत ले चलो’।

उपनिषद् स्वयं इसका क्या अर्थ बताता है?

उपनिषद् कहता है कि असत् और अंधकार मृत्यु हैं, और सत् और प्रकाश अमृत। इसलिए तीनों प्रार्थनाओं का आशय है: “मुझे अमर करो”।

क्या ‘ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः’ इसका हिस्सा है?

उपनिषद् के इस स्थान पर नहीं। यह अंश परंपरा में प्रार्थना के अंत में जोड़ा जाता है।

स्रोत

  1. बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28 (काण्व पाठ, GRETIL)
  2. बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28 का देवनागरी पाठ (vivekavani.com)

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पाठ का मिलान: gretil.sub.uni-goettingen.de, vivekavani.com