व्रत कथा

इंदिरा एकादशी व्रत कथा

इन्दिरा एकादशी: रविवार, 26 सितंबर 2027

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 8 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
लोक लघुचित्र शैली में: राजसभा में कोमल प्रकाश के बीच उतरते सफ़ेद दाढ़ी वाले देवर्षि नारद, केसरिया वस्त्र में, हाथ में वीणा; राजसी वस्त्रों में राजा सोने के सिंहासन से उठकर हाथ जोड़े उनका स्वागत करते हैं, दोनों ओर दरबारी
चित्र: AI से बनाया गया
संक्षेप में

इंदिरा एकादशी की कथा पद्म पुराण (उत्तर खंड) में है। माहिष्मती के राजा इंद्रसेन को देवर्षि नारद बताते हैं कि उनके पिता किसी व्रत में रह गई कमी के कारण यमराज की सभा में रुके हैं और बेटे से इंदिरा व्रत का पुण्य माँग रहे हैं। राजा परिवार सहित विधि से यह व्रत करते हैं, और उसके पुण्य से पिता गरुड़ पर बैठकर भगवान विष्णु के धाम जाते हैं।

इंदिरा एकादशी आश्विन कृष्ण एकादशी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में भाद्रपद कृष्ण) को, पितृ पक्ष में आती है। इसलिए इसका व्रत भगवान विष्णु की पूजा के साथ पितरों की सद्गति की कामना से भी किया जाता है, और पूजा के बाद यह कथा पढ़ी या सुनी जाती है।

यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खंड में है, जहाँ युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण एक-एक एकादशी की महिमा बताते हैं; पूरा उत्तर खंड भगवान शिव और देवर्षि नारद के संवाद के रूप में है। हमने कथा संस्कृत मूल, उसके अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर अपने शब्दों में लिखी है। व्रत की विधि कथा के भीतर ही नारद जी बताते हैं; उसमें श्राद्ध भी है, जिसके बारे में संस्करणों में अंतर है (नीचे देखें)।

व्रत और कथा की विधि

  • कथा में नारद जी यह विधि तीन दिनों में बताते हैं। दशमी (आश्विन कृष्ण दशमी): सुबह श्रद्धा से स्नान, फिर दोपहर में दोबारा स्नान करके पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध; दिन में एक ही बार भोजन और रात को भूमि पर शयन।
  • एकादशी: सुबह मुँह धोकर भक्ति से उपवास का संकल्प। कथा में संकल्प का श्लोक यह है: "अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः। श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥" भाव: आज मैं सब भोग छोड़कर बिना आहार के रहूँगा और कल भोजन करूँगा; हे कमलनयन अच्युत, आप मेरी शरण बनिए। दोपहर में शालग्राम शिला के पास विधि से स्नान, धूप और गंध से भगवान हृषीकेश की पूजा, और रात को भगवान के पास जागरण।
  • द्वादशी: सुबह श्रीहरि की पूजा के बाद पितरों का श्राद्ध, फिर ब्राह्मणों को दक्षिणा सहित भोजन, और उसके बाद भाई-बंधुओं, नातियों और पुत्रों के साथ मौन रहकर भोजन। पद्म पुराण के अनुसार गेहूँ के आटे से किया श्राद्ध शुद्ध होता है, और जौ, चावल, तिल, उड़द, गेहूँ या चने से किया श्राद्ध भी।
  • कथा में इस व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित किया जाता है: राजा इंद्रसेन यह पुण्य अपने पिता को देते हैं।
  • गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद में क्रम कुछ अलग है: वहाँ दशमी को श्राद्ध नहीं है; श्राद्ध एकादशी की दोपहर शालग्राम के सामने होता है, ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है, और पितरों को अर्पित पिंड को सूँघकर गाय को खिलाया जाता है; द्वादशी पर श्राद्ध की पंक्ति नहीं है। पिंड गाय को देने की बात ISKCON की पुस्तक (और वेबदुनिया) में भी है, पर पद्म पुराण के संस्कृत पाठ में एकादशी पर न श्राद्ध है, न गाय को पिंड। संस्कृत पाठ एकादशी की सुबह बिना दातुन के मुँह धोने को कहता है; गीता प्रेस का अनुवाद दातुन करके।
  • श्राद्ध की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार बदलती है; इसे अपने पुरोहित से पूछकर करें।

राजा इंद्रसेन और उनके पिता की कथा

पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 58 (गीता प्रेस के संस्करण में 60) के अनुसार; संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर।

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनती की, "मधुसूदन, कृपा करके बताइए, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है?" श्रीकृष्ण बोले, "राजन्, उस एकादशी का नाम इंदिरा है। इसके व्रत के प्रभाव से बड़े-बड़े पाप भी मिट जाते हैं, और जो पितर नीची योनियों में जा पड़े हों, उन्हें भी यह सद्गति देती है। मन लगाकर इसकी पाप हरने वाली कथा सुनो; इसे सुनने भर से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।"

बहुत पहले, सत्ययुग में, माहिष्मती नगरी में इंद्रसेन नाम के एक यशस्वी राजा थे। वे धर्म से प्रजा का पालन करते थे। उनका परिवार पुत्रों और पौत्रों से भरा-पूरा था, और राज्य में धन-धान्य की कोई कमी न थी। राजा भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। मुक्ति देने वाले गोविंद के नामों का जप करते हुए और आत्मा का ध्यान करते हुए वे अपना समय बिताते थे।

एक दिन राजा अपनी सभा में सुख से बैठे थे। तभी आकाश से उतरकर देवर्षि नारद वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखते ही राजा हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए, विधि से उनकी पूजा की और आदर से आसन पर बिठाया। फिर बोले, "देवर्षि, आपकी दया से मेरे यहाँ सब कुशल-मंगल है। आपके दर्शन हुए, तो मानो मेरे किए सारे यज्ञ आज सफल हो गए। कृपा करके कहिए, आपका आना किस कारण हुआ?"

नारद जी बोले, "राजश्रेष्ठ, सुनो; मेरी बात तुम्हें अचरज में डाल देगी। मैं ब्रह्मलोक से यमलोक गया था। वहाँ यमराज ने भक्ति से मेरा सत्कार किया और मुझे उत्तम आसन पर बिठाया। उनकी सभा में मैंने तुम्हारे पिता को देखा। उन्होंने जीवन में बहुत पुण्य किए थे, फिर भी किसी व्रत में रह गई एक कमी के कारण वे वहाँ रुके हुए हैं।"

"उन्होंने तुम्हारे लिए एक संदेश दिया है, उसे सुनो। उन्होंने कहा, ‘ब्रह्मन्, माहिष्मती के राजा इंद्रसेन से कहना कि पिछले जन्म की किसी बाधा के कारण मैं यमराज के पास ही अटका हूँ। बेटा, इंदिरा व्रत का पुण्य मुझे देकर मुझे स्वर्ग भेज दो।’ यही संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ। राजन्, अपने पिता को स्वर्ग पहुँचाने के लिए तुम इंदिरा का व्रत करो। उस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे पिता स्वर्ग जाएँगे।"

राजा ने हाथ जोड़कर पूछा, "भगवन्, कृपा करके मुझे इंदिरा व्रत के बारे में बताइए। यह किस पक्ष में, किस तिथि को और किस विधि से किया जाता है?"

नारद जी ने कहा, "राजेंद्र, इस शुभ व्रत की विधि सुनो। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी को श्रद्धा भरे मन से सुबह स्नान करो। फिर दोपहर में दोबारा स्नान करके, मन को शांत और एकाग्र रखकर, पितरों की प्रसन्नता के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करो। उस दिन एक ही बार भोजन करो और रात को भूमि पर सोओ।"

"एकादशी की निर्मल सुबह होने पर मुँह धोओ और भक्ति से उपवास का नियम लो, भगवान से यह कहते हुए: हे कमलनयन, आज मैं सब भोग छोड़कर निराहार रहूँगा और कल भोजन करूँगा; हे अच्युत, आप ही मेरी शरण हों। फिर दोपहर में शालग्राम शिला के पास विधि से स्नान करो, धूप और गंध आदि से भगवान हृषीकेश की पूजा करो, और रात को भगवान केशव के पास जागरण करो।"

"द्वादशी की सुबह भक्ति से श्रीहरि की पूजा करके विधि से पितरों का श्राद्ध करो। फिर ब्राह्मणों का दक्षिणा से सम्मान करके उन्हें भोजन कराओ, और उसके बाद अपने भाई-बंधुओं, नातियों और पुत्रों के साथ मौन रहकर स्वयं भोजन करो। राजन्, आलस छोड़कर इस विधि से व्रत करोगे, तो तुम्हारे पितर भगवान विष्णु के लोक को जाएँगे।" इतना कहकर नारद जी अंतर्धान हो गए।

राजा इंद्रसेन ने नारद जी की बताई विधि से, अपनी रानियों, पुत्रों और सेवकों के साथ, यह उत्तम व्रत किया।

श्रीकृष्ण बोले, "कुंतीनंदन, व्रत पूरा होते ही आकाश से फूल बरसने लगे, और राजा के पिता गरुड़ पर सवार होकर भगवान विष्णु के धाम को चले गए।"

राजर्षि इंद्रसेन ने भी बिना किसी बाधा के राज किया, और फिर अपने पुत्र को राजगद्दी सौंपकर स्वयं स्वर्ग को गए।

कथा के अंत में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह इंदिरा व्रत का माहात्म्य है। कथा के अनुसार जो इसे पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से छूट जाता है, इस लोक में सुख पाता है और फिर बहुत समय तक विष्णु लोक में वास करता है।

कथा के अलग-अलग रूप

  • पद्म पुराण, गीता प्रेस, ISKCON की पुस्तक, वेबदुनिया और अमर उजाला में यह कथा श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को सुनाते हैं। Drik Panchang के हिंदी और अंग्रेज़ी रूप में वे इसे अर्जुन को सुनाते हैं; यह लोक में प्रचलित रूप है, पद्म पुराण का नहीं।
  • पद्म पुराण और गीता प्रेस में पिता गरुड़ पर बैठकर भगवान विष्णु के धाम जाते हैं। Drik Panchang में वे रथ पर बैठकर स्वर्ग जाते हैं, और अमर उजाला उन्हें वैकुंठ जाते बताता है। अंत में इंद्रसेन स्वयं संस्कृत पाठ में स्वर्ग जाते हैं, ISKCON की पुस्तक में वैकुंठ।
  • पिता के यमलोक में रुकने का कारण संस्कृत पाठ में "व्रत में कोई कमी या दोष" है और गीता प्रेस में "व्रत-भंग का दोष"; Drik Panchang और वेबदुनिया कहते हैं कि उनसे एकादशी का व्रत टूट गया था, और ISKCON की पुस्तक कि उन्होंने एकादशी का उपवास समय से पहले तोड़ दिया था।
  • अमर उजाला के छोटे रूप में पिता पहले स्वप्न में इंद्रसेन के पास आते हैं और नारद जी बाद में आते हैं; यह प्रसंग दूसरे स्रोतों में नहीं है।
  • कथा सुनने का फल संस्कृत पाठ, वेबदुनिया और आज तक में वाजपेय यज्ञ के बराबर है; ISKCON की पुस्तक में अश्वमेध यज्ञ के बराबर, और Drik Panchang में अनंत फल। गीता प्रेस में यह पंक्ति नहीं है।

कथा के बाद

कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती और एकादशी माता की आरती गाई जाती है। कथा के अनुसार व्रत द्वादशी को श्रीहरि की पूजा, श्राद्ध और ब्राह्मण भोजन के बाद खोला जाता है; अपने शहर का पारण समय इंदिरा एकादशी के पन्ने पर है।

एकादशी माता की आरती: ॐ जय एकादशी माता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इंदिरा एकादशी की कथा किस पुराण में है?

पद्म पुराण के उत्तर खंड में, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हैं। संस्कृत विकिस्रोत और एन. ए. देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह अध्याय 58 है, और गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय 60।

इंदिरा एकादशी पर श्राद्ध कब करें?

पद्म पुराण के संस्कृत पाठ में श्राद्ध दो बार है: दशमी की दोपहर, और द्वादशी की सुबह श्रीहरि की पूजा के बाद। गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद में श्राद्ध एकादशी की दोपहर शालग्राम के सामने है। श्राद्ध की विधि परिवार की परंपरा से बदलती है, इसलिए अपने पुरोहित से पूछ लें।

इंदिरा एकादशी का व्रत पितरों के लिए क्यों किया जाता है?

पद्म पुराण में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह एकादशी नीची योनियों में पड़े पितरों को भी सद्गति देती है, और कथा में राजा इंद्रसेन इस व्रत का पुण्य देकर अपने पिता को यमराज की सभा से भगवान विष्णु के धाम भेजते हैं। यह एकादशी पितृ पक्ष में ही आती है।

इंदिरा एकादशी व्रत कथा कब पढ़ें?

परंपरा में एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के बाद, आरती से पहले। पद्म पुराण के अनुसार इस कथा को सुनने भर से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

स्रोत

  1. पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 58, संस्कृत विकिस्रोत (अध्याय संख्या संस्करण के अनुसार बदलती है; गीता प्रेस के संस्करण में यह 60 है)
  2. पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 58, एन. ए. देशपांडे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास; wisdomlib.org)
  3. गीता प्रेस, गोरखपुर: एकादशी-व्रत का माहात्म्य (26 एकादशियों की कथाएँ), संकलन राधेश्याम खेमका, पृ. 59–62 (पद्म पुराण पर आधारित)
  4. ISKCON की Ekadasi पुस्तक का पाठ: इंदिरा एकादशी (iskcondesiretree.com और iskconbangalore.org)
  5. Drik Panchang: इंदिरा एकादशी व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी), drikpanchang.com
  6. वेबदुनिया (hindi.webdunia.com): इंदिरा एकादशी व्रत कथा; हिंदी विकिपीडिया में यही पाठ है
  7. अमर उजाला: आश्विन कृष्ण इंदिरा एकादशी व्रत कथा
  8. आज तक: इंदिरा एकादशी 2024 की कथा (28 सितंबर 2024)

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