अहोई अष्टमी पर दो कथाएँ सबसे अधिक सुनी जाती हैं। पहली में एक साहूकारनी से मिट्टी खोदते समय अनजाने में सेही का बच्चा मर जाता है और उसके सातों बेटे चल बसते हैं; अपनी भूल मानकर अहोई माता की पूजा करने से उसे फिर संतान का सुख मिलता है। दूसरी में छोटी बहू ननद की भूल का दंड अपने ऊपर लेती है और सुरही गाय की सेवा करके स्याहु माता से अपनी कोख खुलवाती है।
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अहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण अष्टमी (पूर्णिमांत पंचांग) को, करवा चौथ के चार दिन बाद आती है। माताएँ संतान की लंबी आयु और सुख के लिए दिन भर व्रत रखती हैं, शाम को दीवार पर अहोई माता और स्याहु (सेही) के बच्चों का चित्र बनाकर पूजा करती हैं, कथा सुनती हैं और तारे देखकर अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं।
ये कथाएँ लोक व्रत-कथाएँ हैं, जो घर-घर में सुनाई जाती हैं; किसी पुराण में हमें ये नहीं मिलीं। नारद पुराण (पूर्व भाग, अध्याय 117) में कार्तिक कृष्ण अष्टमी को पुत्र की कामना से "करक व्रत" और चंद्रोदय पर अर्घ्य का विधान है, पर उसमें अहोई या स्याहु की कथा नहीं है। नीचे कथाएँ उसी रूप में हैं जिसमें वे सबसे अधिक छपती और सुनाई जाती हैं; स्रोतों के अंतर अंत में दिए हैं।
व्रत और कथा की विधि
- पूजा शाम को होती है। दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाया जाता है, अक्सर आठ कोठों वाला, जिसमें स्याहु और उसके बच्चे भी होते हैं; कई घरों में छपा हुआ चित्र लगाया जाता है।
- कई परिवारों में चाँदी की स्याहु की रोली और चावल से पूजा होती है।
- पूजा के बाद कथा सुनी जाती है। हलवा, पूरी और मिठाई का भोग लगता है, और कई घरों में उसका एक भाग सास को देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
- तारे निकलने पर उन्हें अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है; कुछ परिवार चंद्रोदय तक रुकते हैं।
साहूकारनी और सेही के बच्चे की कथा
यह रूप Drik Panchang, भक्ति भारत, श्री मंदिर और भारतकोश में मिलता है।
बहुत पहले एक गाँव में एक साहूकार की पत्नी रहती थी। उसके सात बेटे थे और घर धन-धान्य से भरा था। कार्तिक का महीना आया, दीपावली पास थी, और घर लीपने-पोतने के लिए मिट्टी चाहिए थी। साहूकारनी कुदाल लेकर गाँव के बाहर उस जगह गई जहाँ से मिट्टी लाई जाती थी।
मिट्टी खोदते-खोदते उसकी कुदाल एक माँद में जा लगी, जहाँ सेही (साही) के बच्चे थे। कुदाल की चोट से एक बच्चा मर गया। साहूकारनी ने यह जान-बूझकर नहीं किया था, पर उस नन्हे जीव को मरा देखकर उसका मन काँप उठा। दुखी मन से वह मिट्टी लेकर घर लौट आई।
उसी साल के भीतर उसके सातों बेटे एक-एक करके चल बसे। घर सूना हो गया। साहूकारनी दिन-रात रोती और सोचती कि उससे ऐसी कौन-सी भूल हुई जिसका यह फल मिला।
एक दिन उसने गाँव की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों के सामने सब सच-सच कह दिया: कैसे मिट्टी खोदते हुए उसके हाथ से सेही का बच्चा मरा था। बूढ़ी स्त्रियों ने उसे ढाढ़स बँधाया और कहा, "तूने अपनी भूल सबके सामने मान ली, इससे तेरा आधा दोष तो उतर गया। अब कार्तिक कृष्ण अष्टमी को भगवती अहोई की शरण ले। उस दिन व्रत रख, दीवार पर सेही और उसके बच्चों का चित्र बनाकर पूजा कर, और मन से क्षमा माँग।"
साहूकारनी ने वैसा ही किया। अष्टमी को उसने दिन भर व्रत रखा, शाम को चित्र बनाकर अहोई माता की पूजा की और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी। फिर वह हर साल यह व्रत करने लगी।
माता की कृपा से उसके दुख के दिन बीते और उसका घर फिर संतान से भर गया। तभी से संतान की कुशल के लिए माताएँ अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। Drik Panchang के अनुसार अहोई भगवती देवी पार्वती का ही एक रूप मानी जाती हैं।
छोटी बहू, सुरही गाय और स्याहु माता
यह लंबा रूप हिंदी विकिपीडिया, वेबदुनिया, अमर उजाला और आर्ट ऑफ लिविंग में मिलता है।
एक साहूकार के सात बेटे थे, सात बहुएँ और एक बेटी। दीपावली से पहले घर लीपने के लिए सातों बहुएँ जंगल में मिट्टी लेने चलीं, तो साहूकार की बेटी, यानी उनकी ननद, भी उनके साथ चली गई।
जहाँ वे मिट्टी खोद रही थीं, वहाँ स्याहु (सेही) अपने बच्चों के साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए ननद की खुरपी से अनजाने में स्याहु का एक बच्चा मर गया। स्याहु क्रोध से भर उठी और बोली, "मैं तेरी कोख बाँध दूँगी।"
ननद डर गई। उसने एक-एक करके भाभियों से विनती की कि कोई उसके बदले यह शाप अपने ऊपर ले ले। बड़ी छहों भाभियों ने मना कर दिया। सबसे छोटी बहू ने सोचा कि अगर वह भी मना करेगी तो सास दुखी होंगी, इसलिए उसने ननद के बदले अपनी कोख बँधवा ली।
इसके बाद छोटी बहू के जो भी बच्चा होता, वह सातवें दिन चल बसता। ऐसा सात बार हुआ। दुखी होकर उसने एक पंडित से उपाय पूछा। पंडित ने कहा, "तू सुरही गाय की सेवा कर। सुरही स्याहु की सहेली (भायली) है; वह चाहे तो स्याहु तेरी कोख खोल सकती है।"
उस दिन से छोटी बहू रोज़ सबसे पहले उठकर चुपचाप सुरही गाय का स्थान झाड़-बुहारकर साफ़ कर जाती। सुरही सोचती कि रोज़ सवेरे कौन यह सेवा कर जाता है। एक दिन वह जल्दी जागी और उसने छोटी बहू को देख लिया। प्रसन्न होकर सुरही ने कहा, "माँग, क्या चाहती है?" बहू ने कहा, "स्याहु माता ने मेरी कोख बाँध रखी है, मेरे बच्चे जीते नहीं। आप उनसे मेरी कोख खुलवा दीजिए।"
सुरही उसे साथ लेकर स्याहु के पास चली, जो सात समुद्र पार रहती थी। रास्ते में धूप तेज़ थी, तो दोनों एक बड़े पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठीं। उस पेड़ पर गरुड़ पंखनी (एक बड़ी चील) का घोंसला था, जिसमें उसके बच्चे थे। तभी एक साँप बच्चों को डसने के लिए ऊपर चढ़ने लगा। छोटी बहू ने साँप को मार दिया और उसे एक ओर छिपा दिया।
गरुड़ पंखनी लौटी तो उसने ज़मीन पर खून देखा। उसे लगा कि इसी स्त्री ने उसके बच्चों को मारा है, और वह उस पर झपट पड़ी। तब बहू ने मरा हुआ साँप दिखाकर सारी बात बताई। सच जानकर गरुड़ पंखनी बहुत प्रसन्न हुई और बोली, "तूने मेरे बच्चों की जान बचाई है; बता, मैं तेरे लिए क्या करूँ?" सुरही ने कहा कि उन्हें सात समुद्र पार स्याहु के पास जाना है। गरुड़ पंखनी दोनों को अपनी पीठ पर बिठाकर स्याहु के घर पहुँचा आई।
स्याहु ने सुरही को देखकर उसका स्वागत किया, जैसे बहुत दिनों बाद बहन आई हो। बातों-बातों में उसने कहा कि उसके सिर में बहुत जुएँ हो गई हैं। छोटी बहू ने सलाई से उसकी सारी जुएँ निकाल दीं। स्याहु प्रसन्न हो गई और उसे आशीर्वाद दिया, "तेरे सात बेटे हों और सात बहुएँ।"
बहू ने हाथ जोड़कर कहा, "माता, मेरा तो एक भी बेटा नहीं है। आपने ही मेरी कोख बाँध रखी है।" स्याहु समझ गई कि अब वह अपने दिए आशीर्वाद से बँध चुकी है। वचन दिया था, तो निभाना ही था; उसने छोटी बहू की कोख खोल दी।
घर लौटी तो छोटी बहू ने देखा कि उसका घर सात बेटों और सात बहुओं से भरा है। उसने प्रसन्न होकर सात अहोई बनाकर पूजा की और सात उजमन (उद्यापन) किए। उधर जेठानियाँ सोच रही थीं कि इस बार वह रो क्यों नहीं रही। बच्चों ने जाकर बताया कि चाची तो पकवान बना रही है। वे दौड़ी आईं और पूछा कि उसकी कोख कैसे खुली, तो छोटी बहू ने उन्हें सारी बात बताई।
कथा के अंत में यह कामना की जाती है: हे स्याहु माता, जैसे तुमने छोटी बहू की कोख खोली, वैसे ही सबकी खोलना, और सबकी संतान को सुखी रखना।
चंद्रभान और चंद्रिका की कथा
यह छोटी कथा भक्ति भारत और भारतकोश में मिलती है; दोनों इसे लोक कथा बताते हैं और जगह का नाम अलग देते हैं।
चंद्रभान नाम का एक धनी साहूकार अपनी गुणवती पत्नी चंद्रिका के साथ रहता था; एक कथा उन्हें झाँसी के पास बताती है, दूसरी दतिया में। उनकी संतानें छोटी उम्र में ही चल बसती थीं। दुख से टूटकर दोनों अपना धन छोड़कर वन की ओर निकल पड़े।
चलते-चलते वे बद्रिकाश्रम के पास एक जलकुंड पर पहुँचे और वहीं अन्न-जल त्यागकर बैठ गए। सातवें दिन आकाशवाणी हुई कि उनका दुख पिछले कर्मों का फल है; यदि चंद्रिका कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत रखे, तो माता की कृपा से उन्हें संतान का सुख मिलेगा।
चंद्रिका ने श्रद्धा से अहोई व्रत रखा। अहोई माता ने प्रसन्न होकर उन्हें लंबी आयु वाली संतान का वर दिया। भक्ति भारत के रूप में आकाशवाणी राधा कुंड में स्नान करने को भी कहती है।
कथा के अलग-अलग रूप
- पहली कथा में जीव का नाम सेह, सेही या साही मिलता है; कहीं एक बच्चा मरता है, कहीं कई। Drik Panchang के हिंदी रूप में सेही माँ साहूकारनी को शाप देती है, दूसरे स्रोतों में शाप का ज़िक्र नहीं है।
- पहली कथा के अंत में कुछ स्रोत कहते हैं कि वही सातों बेटे जीवित लौट आए (Drik Panchang), कुछ कि आगे चलकर उसे फिर सात बेटे हुए (भक्ति भारत, श्री मंदिर, भारतकोश)।
- मथुरा के राधा कुंड में अहोई अष्टमी की आधी रात को संतान की कामना से पति-पत्नी के साथ स्नान करने की मान्यता है (Drik Panchang)। इसके पीछे कृष्ण के अरिष्टासुर-वध और राधा कुंड की कथा कही जाती है; इस वरदान का उल्लेख किसी जाँचे हुए ग्रंथ में हमें नहीं मिला।
कथा के बाद
कथा के बाद अहोई माता की आरती गाई जाती है, और तारे निकलने पर अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। अपने शहर में तारे दिखने और चंद्रोदय का समय अहोई अष्टमी के पन्ने पर है।
अहोई माता की आरती: जय अहोई माताअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अहोई अष्टमी की कथा कब सुनी जाती है?
शाम को, अहोई माता की पूजा के बाद और तारों को अर्घ्य देने से पहले।
स्याहु माता कौन हैं?
स्याहु (सेही या साही) वह जीव है जिसके बच्चे की कथा में भूल से मृत्यु होती है। दूसरी कथा में स्याहु को माता कहा गया है, जो प्रसन्न होकर छोटी बहू की कोख खोलती हैं। पूजा में दीवार पर अहोई माता के साथ स्याहु और उसके बच्चे बनाए जाते हैं, और कई घरों में चाँदी की स्याहु की पूजा होती है।
अहोई अष्टमी की कथा किस पुराण में है?
ये लोक व्रत-कथाएँ हैं; किसी पुराण में ये हमें नहीं मिलीं। नारद पुराण (पूर्व भाग, अध्याय 117) में कार्तिक कृष्ण अष्टमी को पुत्र की कामना से करक व्रत और चंद्रोदय पर अर्घ्य का विधान है, पर उसमें यह कथा नहीं है।
कथा सुनते समय क्या पास रखें?
अहोई माता का चित्र, रोली, चावल, दीपक और भोग (हलवा-पूरी या मिठाई); कई घरों में चाँदी की स्याहु भी। सामग्री परिवार की परंपरा के अनुसार बदलती है।
स्रोत
- Drik Panchang: अहोई अष्टमी व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी) और राधा कुंड स्नान, drikpanchang.com
- हिंदी विकिपीडिया: अहोई अष्टमी
- वेबदुनिया (hindi.webdunia.com): अहोई अष्टमी व्रत की कहानी
- अमर उजाला: अहोई अष्टमी व्रत कथा (22 अक्टूबर 2024)
- भक्ति भारत (bhaktibharat.com): अहोई अष्टमी व्रत कथा; अहोई अष्टमी और राधा कुंड की कथा
- भारतकोश (bharatdiscovery.org): अहोई अष्टमी, दोनों कथाएँ "लोक कथा" के रूप में
- आर्ट ऑफ लिविंग (artofliving.org): अहोई अष्टमी व्रत विधि
- श्री मंदिर (srimandir.com): अहोई अष्टमी व्रत कथा
- नारद पुराण, पूर्व भाग 1.117.78–80 (करक व्रत), wisdomlib.org पर अंग्रेज़ी अनुवाद में जाँचा
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