शरद पूर्णिमा पर साहूकार की दो बेटियों की लोक कथा सुनी जाती है: बड़ी बेटी पूर्णिमा का व्रत पूरा करती थी और छोटी अधूरा, इसलिए छोटी की संतान जीवित नहीं रहती थी; पूरा व्रत करने पर और बड़ी बहन के पुण्य से उसका बच्चा फिर जी उठता है। कोजागर व्रत की कथा में मगध का निर्धन ब्राह्मण वलित इसी रात जागता मिलता है और लक्ष्मी जी की कृपा से धनी हो जाता है; यह कथा व्रतराज में "सनत्कुमार संहिता" के नाम से छपी है।
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शरद पूर्णिमा आश्विन मास की पूर्णिमा है, जिसे कोजागरी या कोजागर पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन व्रत रखा जाता है, रात में लक्ष्मी जी की पूजा और जागरण होता है, और खीर का भोग लगता है। इस अवसर पर दो कथाएँ सुनाई जाती हैं।
पहली, साहूकार की दो बेटियों की कथा, एक लोक कथा है; कोई स्रोत इसके साथ किसी ग्रंथ का नाम नहीं देता, और वेबदुनिया इसे लोक कथा ही कहता है। ज़्यादातर स्रोतों में यह हर पूर्णिमा के व्रत की कथा है, जबकि Drik Panchang और टाइम्स नाउ नवभारत इसे शरद पूर्णिमा के व्रत से जोड़ते हैं।
दूसरी, ब्राह्मण वलित की कथा, कोजागर व्रत की कथा है। यह व्रतराज नाम के व्रत-संग्रह में "सनत्कुमार संहिता" के नाम से छपी है; उस संहिता को हमने स्वयं नहीं देखा। कोजागर व्रत के श्लोक, जिनमें आधी रात को लक्ष्मी "को जागर्ति?" (कौन जाग रहा है?) पूछती हैं, निर्णयसिन्धु में भी हैं, जो उन्हें तिथितत्त्व के हवाले से लिंग पुराण का बताता है।
व्रत और कथा की विधि
- कथा सुनते समय हाथ में गेहूँ के तेरह दाने लेकर बैठने की रीति है, और लोटे के जल से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है (टाइम्स नाउ नवभारत; "व्रत कथा" पुस्तिका)।
- नवविवाहित स्त्रियाँ वर्ष भर के पूर्णिमा व्रत का आरंभ इसी पूर्णिमा से करती हैं (Drik Panchang; "व्रत कथा" पुस्तिका)।
- हिंदी विकिपीडिया और "पूर्णिमा व्रत कथा" पुस्तिका के अनुसार चंद्रोदय पर घी के सौ दीपक जलाए जाते हैं, खीर कई पात्रों में चाँदनी में रखी जाती है, और एक प्रहर (लगभग तीन घंटे) बाद लक्ष्मी जी को अर्पित करके ज़रूरतमंदों में बाँटी जाती है; फिर रात भर जागरण होता है।
- कोजागर व्रत की विधि व्रतराज और गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" में: दिन में उपवास; रात में महालक्ष्मी और ऐरावत पर बैठे इंद्र की पूजा; सामर्थ्य के अनुसार सौ से लेकर लाख तक घी के दीपक (व्रतराज तिल के तेल की भी अनुमति देता है) मंदिरों, बगीचों, गलियों, चौराहों और घरों में; और गीत-संगीत के साथ जागरण, जिसमें ग्रंथ पासों के खेल (अक्ष-क्रीड़ा) की रीति भी बताते हैं। अगली सुबह स्नान करके इंद्र की पूजा, ब्राह्मणों को घी-शक्कर वाली खीर का भोजन और वस्त्र-दक्षिणा, फिर व्रत का पारण।
साहूकार की दो बेटियाँ
प्रचलित लोक कथा। यह रूप हिंदी विकिपीडिया, वेबदुनिया, अमर उजाला (2025) और "पूर्णिमा व्रत कथा" पुस्तिका में लगभग एक जैसे शब्दों में है; Drik Panchang, टाइम्स नाउ नवभारत और प्रभात खबर इसे अपने ढंग से सुनाते हैं।
एक साहूकार की दो बेटियाँ थीं। दोनों पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। बड़ी बेटी पूरे मन और पूरे नियम से व्रत करती थी, पर छोटी बेटी व्रत को अधूरा ही छोड़ देती थी।
समय बीता और दोनों का विवाह हुआ। बड़ी बहन की संतानें स्वस्थ रहीं, पर छोटी बहन के घर जो भी संतान होती, जन्म लेते ही चल बसती। दुखी होकर उसने पंडितों से इसका कारण पूछा। पंडितों ने कहा, "तुम पूर्णिमा का व्रत अधूरा करती रही हो, इसी से तुम्हारी संतान जीवित नहीं रहती। यदि तुम पूरे विधि-विधान से पूर्णिमा का व्रत करो, तो तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है।"
छोटी बेटी ने पंडितों की बात मानी और इस बार पूर्णिमा का व्रत पूरी विधि से किया। उसके घर एक बेटा हुआ, पर वह भी थोड़े ही दिनों में चल बसा।
तब उसने बच्चे को एक पीढ़े (लकड़ी के छोटे आसन) पर लिटाया और ऊपर से कपड़ा ढक दिया। फिर वह अपनी बड़ी बहन को बुला लाई और बैठने के लिए वही पीढ़ा आगे कर दिया।
बड़ी बहन जैसे ही बैठने लगी, उसका घाघरा बच्चे को छू गया, और घाघरे के छूते ही बच्चा रोने लगा। बड़ी बहन चौंक उठी और बोली, "तू मुझ पर कलंक लगाना चाहती थी! मैं बैठ जाती तो यह बच्चा मर जाता।"
छोटी बहन ने कहा, "दीदी, यह तो पहले से ही मरा हुआ था। तुम्हारे भाग्य और तुम्हारे पुण्य से ही यह फिर जी उठा है।"
उसके बाद छोटी बहन ने पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब लोग पूर्णिमा का व्रत पूरे नियम से करें, अधूरा न छोड़ें।
कोजागर व्रत की कथा: ब्राह्मण वलित
व्रतराज (विश्वनाथ शर्मा; खेमराज श्रीकृष्णदास संस्करण, हिंदी टीका सहित, पृ. 627–630) में यह कथा "सनत्कुमार संहिता" के नाम से छपी है। Drik Panchang और वेबदुनिया (2024) इसी का हिंदी और अंग्रेज़ी रूप देते हैं।
ऋषियों ने वालखिल्य मुनियों से कार्तिक के उपांग व्रतों के बारे में पूछा। वालखिल्य बोले कि आश्विन शुक्ल पूर्णिमा की रात जागकर लक्ष्मी जी की पूजा करनी चाहिए, और नारियल का जल पीकर पासे खेलने चाहिए। उस आधी रात को वर देने वाली लक्ष्मी "को जागर्ति?", यानी "कौन जाग रहा है?", पूछती हुई संसार में घूमती हैं और जो जागता मिलता है उसे धन देती हैं। दरिद्रता से डरने वाले सब यह व्रत करें; इसी व्रत से वलित भी धनी हुआ था। ऋषियों ने पूछा कि वलित कौन था, तब वालखिल्यों ने यह कथा सुनाई।
मगध देश में वलित नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह अनेक विद्याओं का जानकार था और रोज़ संध्या और स्नान करता था। घर बैठे कोई कुछ दे जाता तो ले लेता, पर किसी से माँगना उसे मृत्यु के समान लगता था; इसलिए वह बहुत निर्धन था।
उसकी पत्नी बहुत क्रोधी और झगड़ालू थी। वह रोज़ ताने देती कि उसकी बहनें धनी घरों में सोने-चाँदी के गहनों से सजी घूमती हैं और वह एक दरिद्र के घर आ पड़ी। लोगों के सामने भी वह पति के कुल और विद्या को धिक्कारती। उसने ठान लिया था कि जब तक लक्ष्मी प्रसन्न न हों, पति जो कहेगा वह उसका उलटा ही करेगी। वह कहती, "राजमहल से चोरी करके धन लाओ, नहीं तो मैं तुम्हें मारूँगी।" कभी वह रोने लगती, कभी खाना छोड़ देती, कभी बहुत खा लेती, कभी अपना सिर पीटती। वलित यह सब सह लेता, पर माँगने नहीं जाता; जो मिलता उसी में संतोष करता।
एक बार पितृ पक्ष आया। पिता के श्राद्ध की सारी सामग्री घर में थी, पर वलित चिंता में था कि पत्नी तो हर बात का उलटा करेगी, श्राद्ध कैसे होगा। उसी समय उसका मित्र गणपति आया और उसकी चिंता का कारण पूछा। सारी बात सुनकर मित्र मुस्कुराकर बोला, "यह तो सहज है। जो तुम चाहते हो, उसका उलटा उससे कहो। वह उलटा करेगी, और तुम्हारा काम ठीक हो जाएगा।"
शाम को वलित घर आकर पत्नी से बोला, "हे चंडी, परसों मेरे पिता का श्राद्ध है, पर उन्होंने मेरे लिए कोई धन नहीं छोड़ा। इसलिए तुम कुछ मत पकाना, और यदि पकाओ भी तो जुआरी और आचारहीन ब्राह्मणों को बुलाना, अच्छे ब्राह्मणों को कभी नहीं।" पति की बात का उलटा करने के लिए पत्नी ने बड़ी तैयारी की, अनेक पकवान बनाए और नगर के उत्तम ब्राह्मणों को न्योता दिया। इस तरह श्राद्ध पूरी विधि से हो गया।
पिंडदान के बाद वलित ने पत्नी से पिंडों को पवित्र गंगा जल में प्रवाहित करने की बात कही। पत्नी ने फिर उलटा किया और पिंड गंगा में प्रवाहित करने की जगह एक अपवित्र गड्ढे में डाल दिए।
यह जानकर वलित का मन बहुत दुखी हुआ। दुख और क्रोध में वह घर छोड़कर निकल पड़ा और संकल्प लिया कि जब तक लक्ष्मी जी प्रसन्न न हों, वह वन में केवल कंद-मूल और फल खाकर रहेगा। वल्कल वस्त्र पहनकर वह धर्मनदी के किनारे अकेला रहने लगा। तीस दिन बीते और आश्विन की पूर्णिमा आ गई।
उसी वन में कालिय नाग के कुल की नाग-कन्याएँ रहती थीं, जो लक्ष्मी जी का व्रत कर रही थीं। उनका घर सफ़ेदी से पुता था और चंद्रमा की तरह चमक रहा था। उन्होंने पंचामृत, रत्न, दर्पण और वस्त्र चढ़ाकर लक्ष्मी जी की पूजा की, और रात का पहला प्रहर पूजा में बिताया।
फिर वे पासे खेलने बैठीं, पर खेल के लिए चार लोग चाहिए थे और वे तीन ही थीं। चौथे को ढूँढ़ते हुए उनकी दृष्टि नदी किनारे बैठे वलित पर पड़ी। उसका चेहरा देखकर वे समझ गईं कि यह भला ब्राह्मण है। उन्होंने कहा, "आओ, हमारे साथ पासे खेलो; इससे लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।"
वलित बोला, "जुए से धन भी जाता है और धर्म भी।" एक नाग-कन्या ने कहा, "बातें तो तुम पंडितों जैसी करते हो, पर समझ मूर्खों जैसी है। इस पूर्णिमा को पासों के खेल से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।" वे उसे अपने पूजा-स्थान पर ले गईं और उसे प्रसाद और नारियल का जल दिया।
खेल शुरू हुआ। नाग-कन्याओं ने रत्न दाँव पर लगाए। वलित के पास कुछ नहीं था; पहले उसने अपनी लंगोटी (कौपीन) दाँव पर लगाई और हार गया, फिर जनेऊ लगाया और वह भी हार गया। अब उसके पास कुछ न बचा, तो उसने स्वयं को ही दाँव पर लगा दिया।
तभी आधी रात हुई। लक्ष्मी जी भगवान नारायण के साथ संसार को देखती हुई उधर से निकलीं। भगवान विष्णु ने वलित की दशा देखकर कहा, "यह ब्राह्मण तुम्हारा व्रत कर रहा है, फिर भी इतने कष्ट में क्यों बैठा है? इसे धन और सुख दो।"
लक्ष्मी जी ने कृपा-दृष्टि से उसकी ओर देखा, और उसी क्षण वलित कामदेव के समान सुंदर हो गया। नाग-कन्याएँ बोलीं, "हमने तुम्हें जीत लिया है, अब तुम हमारे पति बनो।" वलित ने स्वीकार किया, उनसे गांधर्व विवाह किया और उनके रत्नों के साथ घर लौट आया।
घर पहुँचकर वलित ने सोचा कि उसका भाग्य पत्नी के तिरस्कार के कारण ही बदला है, इसलिए उसने पत्नी का आदर किया। पत्नी प्रसन्न हुई और उस दिन से पति की बात मानने लगी। व्रतराज के अनुसार इस कथा को श्रद्धा से सुनने से भी व्रत का फल मिलता है।
कथा के अलग-अलग रूप
- कौन-सा व्रत: ज़्यादातर स्रोत हर पूर्णिमा के व्रत की बात करते हैं; Drik Panchang और टाइम्स नाउ नवभारत शरद पूर्णिमा के व्रत की। Drik Panchang के रूप में बड़ी बहन शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोलती थी, और छोटी नाम भर का व्रत रखती थी। टाइम्स नाउ नवभारत में दोनों बहनें पहले से विवाहित हैं और दोनों शरद पूर्णिमा का व्रत रखती हैं।
- कारण बताने वाले: अधिकतर स्रोतों में पंडित, Drik Panchang में एक संत, और प्रभात खबर में कुंडली देखकर ब्राह्मण। प्रभात खबर में बेटी का जन्म होता है; बाकी सब स्रोतों में बेटे का। बच्चे की मृत्यु कहीं "शीघ्र ही", कहीं "कुछ दिनों बाद" और Drik Panchang में जन्म के तुरंत बाद होती है।
- पीढ़ा और घाघरा: Drik Panchang में बच्चा पीढ़े की जगह एक छोटी शैया पर है। घाघरे की जगह वेबदुनिया के दो पन्नों में लहंगा है, और Drik Panchang और एक पुस्तिका में केवल वस्त्र। प्रभात खबर में बच्चा बड़ी बहन के बैठने से पहले ही रो पड़ता है।
- अंत: Drik Panchang में छोटी बहन कहती है कि यह चंद्र देव की कृपा और पूर्णिमा व्रत का प्रभाव है, और ढिंढोरे की जगह यह है कि उस दिन से शरद पूर्णिमा का व्रत परंपरा बन गया। प्रभात खबर में व्रत की महिमा नगर में फैलती है; टाइम्स नाउ नवभारत में ढिंढोरे का प्रसंग नहीं है। एक पुस्तिका जोड़ती है कि पूरा व्रत संतान का सुख देता है।
- वलित की कथा के छोटे रूप (हिंदूपैड, मराठी वेबदुनिया) में वलित नाग-कन्याओं से विवाह नहीं करता, बस पासों में धन जीत लेता है; मराठी रूप में नाग-कन्याएँ उसे कोजागर व्रत करने को कहती हैं और वह धनी हो जाता है। हिंदूपैड में पत्नी का नाम चाँदनी है, और मराठी वेबदुनिया में पिंड कुएँ में फेंके जाते हैं।
- व्रतराज में मित्र का नाम गणपति है; Drik Panchang उसका नाम नहीं देता। व्रतराज की एक पाद-टिप्पणी में वन में रहने के तीस दिन की जगह बीस दिन का पाठ है।
- बंगाल, असम और ओडिशा में इस रात कोजागरी लक्ष्मी पूजा होती है (बांग्ला और अंग्रेज़ी विकिपीडिया)। वहाँ की एक लोक कथा, लोहे की अलक्ष्मी-मूर्ति खरीदने वाले राजा की, हमें केवल एक ब्लॉग में मिली; किसी छपी लक्ष्मी पाँचाली से मिलान होने तक हम उसे यहाँ नहीं दे रहे।
कथा के बाद
कथा के साथ इस रात चंद्रमा को अर्घ्य, लक्ष्मी पूजा, खीर का भोग और जागरण होता है। अपने शहर का चंद्रोदय और कोजागर पूजा का समय शरद पूर्णिमा के पन्ने पर है।
लक्ष्मी जी की आरती: ॐ जय लक्ष्मी माताअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शरद पूर्णिमा पर खीर चाँदनी में क्यों रखते हैं?
मान्यता है कि वर्ष में इसी रात चंद्रमा सोलहों कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृत झरता है, इसलिए उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखी जाती है और सुबह प्रसाद के रूप में खाई जाती है। गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" आधी रात को, जब पूरा चंद्रमा आकाश के बीच हो, उसकी पूजा करके गाय के दूध की खीर का भोग लगाने और उसे अगले दिन खाने को कहती है; खीर को खुले में रखने की बात उसमें स्पष्ट नहीं है। महाराष्ट्र में खीर की जगह चाँदनी में मसाला दूध पिया जाता है, और मिथिला में मखाने की खीर का भोग लगता है।
कोजागरी का अर्थ क्या है?
कोजागर संस्कृत के "को जागर्ति", यानी "कौन जाग रहा है?", से बना है। व्रतराज, निर्णयसिन्धु और गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" के अनुसार इस रात आधी रात को लक्ष्मी यही पूछती हुई घूमती हैं और जो जागकर पूजा करता मिले उसे धन देती हैं; "व्रत-परिचय" में यह प्रश्न इंद्र और लक्ष्मी दोनों करते हैं।
शरद पूर्णिमा की कथाएँ किस ग्रंथ में हैं?
साहूकार की दो बेटियों वाली कथा लोक कथा है; कोई स्रोत उसे किसी ग्रंथ का नहीं बताता। ब्राह्मण वलित की कोजागर कथा व्रतराज में "सनत्कुमार संहिता" के नाम से छपी है। व्रतराज इसी व्रत का एक श्लोक स्कंद पुराण से भी उद्धृत करता है, और निर्णयसिन्धु कोजागर के श्लोक लिंग पुराण के बताता है; इन पुराणों में हमने उन्हें स्वयं नहीं जाँचा।
कोजागर पूजा में किसकी पूजा होती है?
व्रतराज, निर्णयसिन्धु और गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" के अनुसार महालक्ष्मी की, और ऐरावत हाथी पर बैठे इंद्र की; अगली सुबह फिर इंद्र की पूजा होती है। बंगाल, असम और ओडिशा में इस रात कोजागरी लक्ष्मी पूजा होती है, और मिथिला में लक्ष्मी की अन्नपूर्णा रूप में पूजा होती है (प्रभात खबर, दरभंगा)।
स्रोत
- व्रतराज (विश्वनाथ शर्मा), खेमराज श्रीकृष्णदास संस्करण, हिंदी टीका सहित, पृ. 627–630: कोजागर व्रत, "सनत्कुमार संहिता" के नाम से (archive.org पर स्कैन)
- निर्णयसिन्धु (कमलाकर भट्ट), निर्णय सागर प्रेस संस्करण: कोजागर के श्लोक, तिथितत्त्व के हवाले से लिंग पुराण के बताए गए
- गीता प्रेस, व्रत-परिचय (पं. हनुमान शर्मा, पुस्तक सं. 610), पृ. 149–150: कोजागरव्रत और शरत्पूर्णिमा
- हिंदी विकिपीडिया: शरद पूर्णिमा
- Drik Panchang: शरद पूर्णिमा व्रत कथा; कोजागर पूजा व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी)
- वेबदुनिया (hindi.webdunia.com): शरद पूर्णिमा की कथा; शरद पूर्णिमा लोक कथा; कोजागिरी शरद पूर्णिमा की व्रत कथा (15 अक्टूबर 2024)
- अमर उजाला: शरद पूर्णिमा व्रत कथा (विनोद शुक्ला, 6 अक्टूबर 2025)
- टाइम्स नाउ नवभारत: शरद पूर्णिमा व्रत कथा (12 अक्टूबर 2019)
- प्रभात खबर: शरद पूर्णिमा व्रत कथा (2025); कोजागरा, दरभंगा (16 अक्टूबर 2024)
- आचार्य अखिलेश द्विवेदी, "पूर्णिमा व्रत कथा, पूजन विधि और उद्यापन विधि" (मानव विकास फाउंडेशन, मुंबई); "व्रत कथा" पुस्तिका, पृ. 192–193 (दोनों archive.org पर)
- हिंदूपैड (hindupad.com): Kojagari Lakshmi Puja Katha; मराठी वेबदुनिया: कोजागिरी पूर्णिमा व्रत कथा
- अंग्रेज़ी विकिपीडिया: Sharada Purnima, Kojagra; बांग्ला विकिपीडिया: কোজাগরী লক্ষ্মীপূজা
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