व्रत कथा

करवा चौथ की कथा

करवा चौथ: गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 9 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
लोक-चित्र शैली में: तारों भरी रात में छत पर लाल-सुनहरी साड़ी में छलनी और पूजा की थाली लिए वीरावती, पीछे हाथ जोड़े दो भाभियाँ; दूर बरगद पर मशाल लिए भाई, जिसकी रोशनी चाँद जैसी दिखती है
चित्र: AI से बनाया गया
संक्षेप में

करवा चौथ पर मुख्य रूप से वीरावती की कथा सुनी जाती है। सात भाइयों की लाड़ली बहन वीरावती भूख-प्यास से बेहाल हुई, तो एक भाई ने पेड़ पर छलनी की ओट में दीपक जलाकर झूठा चाँद दिखा दिया; उसने व्रत तोड़ा और उसके पति के प्राण चले गए। इंद्राणी के कहने पर उसने साल भर हर चौथ का व्रत नियम से रखा, और उसी पुण्य से उसका पति फिर जीवित हुआ। कई घरों में करवा और मगरमच्छ की कथा भी सुनाई जाती है।

करवा चौथ (करक चतुर्थी) कार्तिक कृष्ण चतुर्थी (पूर्णिमांत; अमांत पंचांग में आश्विन) को आती है। सुहागिनें सूर्योदय से चंद्रोदय तक व्रत रखती हैं, शाम की पूजा में करवा चौथ की कथा सुनती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। कई परिवारों में मान्यता है कि कथा सुने बिना यह व्रत पूरा नहीं होता।

व्रत का विधान नारद पुराण (पूर्व भाग, अध्याय 113) में है: कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को स्त्रियाँ गणेश जी की पूजा करें, पकवान से भरे दस करवे अर्पित करें, और चंद्रोदय पर अर्घ्य देकर भोजन करें; उसमें कोई कथा नहीं है। वीरावती की कथा संस्कृत के "व्रतराज" (1897 में छपा) में 41 श्लोकों में मिलती है, जो इसे वामन पुराण का बताता है; पर वामन पुराण के आलोचनात्मक संस्करण (काशिराज न्यास, 1967) के संपादक लिखते हैं कि यह अंश उस पुराण की किसी उपलब्ध पांडुलिपि में नहीं मिलता। इसलिए हम इसे परंपरा की कथा कहते हैं।

नीचे वीरावती की कथा उस रूप में है जिसमें वह सबसे अधिक सुनाई जाती है; संस्कृत पाठ और दूसरे रूपों के अंतर अंत में दिए हैं। उसके बाद करवा और मगरमच्छ की लोक कथा है।

व्रत और कथा की विधि

  • कथा प्रायः शाम को पूजा के समय, चंद्रोदय से पहले सुनी जाती है; पंजाब में कई जगह दोपहर में। घर की कोई बड़ी स्त्री कथा सुनाती हैं, या पंडित जी; पंजाब में स्त्रियाँ शाम को पंडित जी से कथा सुनने जाती हैं।
  • करवे पर तेरह बिंदियाँ लगाई जाती हैं और कथा सुनते समय हाथ में गेहूँ या चावल के तेरह दाने रखे जाते हैं (भारतकोश)।
  • उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों और पंजाब में स्त्रियाँ घेरे में बैठकर कथा सुनती हैं और बीच-बीच में अपनी थालियाँ एक-दूसरे को घुमाती हैं (फेरी); पंजाब में सात फेरियाँ होती हैं और साथ में करवा चौथ का गीत गाया जाता है।
  • कथा के बाद करवे पर हाथ फेरकर सास के पैर छूए जाते हैं और उन्हें करवा (बायना) दिया जाता है।

वीरावती (वीरवती) की कथा

द्रौपदी वाला आरंभ संस्कृत "व्रतराज", भारतकोश और वेबदुनिया में है; वीरावती की कथा उस रूप में है जिसमें Drik Panchang उसे देता है और जैसी वह घर-घर सुनाई जाती है।

कथा यूँ शुरू होती है। अर्जुन तपस्या के लिए पर्वत पर गए हुए थे, और पीछे पांडवों पर एक के बाद एक संकट आ रहे थे। चिंतित द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से पूछा कि ऐसा कौन-सा व्रत है जिससे सारी बाधाएँ दूर हों। श्रीकृष्ण बोले, "यही प्रश्न एक बार पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा था। शिव जी ने उन्हें करक चतुर्थी का व्रत बताया था, जो सब विघ्नों को हरता है।" फिर श्रीकृष्ण ने उसकी कथा सुनाई।

इंद्रप्रस्थपुर में वेदशर्मा नाम के एक विद्वान ब्राह्मण अपनी पत्नी लीलावती के साथ रहते थे। उनके सात बेटे थे और एक बेटी, वीरावती। सात भाइयों की अकेली बहन होने से वह सबकी लाड़ली थी। समय आने पर उसका विवाह वेद-वेदांग जानने वाले एक योग्य ब्राह्मण युवक से हुआ।

विवाह के बाद पहली करवा चौथ आई, तब वीरावती मायके में थी। उसने अपनी भाभियों के साथ सूर्योदय से व्रत रखा। शाम होते-होते भूख-प्यास से उसका बुरा हाल हो गया, और चाँद निकलने से पहले ही वह बेहोश होकर गिर पड़ी। घर वाले रोने लगे, और पानी के छींटे देकर, पंखा झलकर उसे होश में लाए।

भाइयों से अपनी प्यारी बहन की यह हालत देखी नहीं गई। वे जानते थे कि वीरावती चाँद को अर्घ्य दिए बिना अन्न-जल नहीं लेगी। तब एक भाई दूर एक बड़े बरगद के पेड़ पर चढ़ गया और छलनी की ओट में दीपक जलाकर ऐसी रोशनी की कि वह उगते चाँद जैसी लगे। बाकी भाई वीरावती को छत पर ले आए और बोले, "देखो, चाँद निकल आया है।"

वीरावती ने उस रोशनी को ही चाँद समझकर अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई। पहला कौर लिया तो उसमें बाल निकला। दूसरे कौर पर उसे छींक आई। तीसरा कौर उठाया ही था कि ससुराल से बुलावा आ गया।

वीरावती घबराकर ससुराल पहुँची, तो उसने अपने पति को मृत पाया। वह फूट-फूटकर रोने लगी और सोचने लगी कि उससे ऐसी कौन-सी भूल हुई।

उसका विलाप सुनकर देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी वहाँ आईं। उन्होंने बताया, "तुमने चंद्रोदय से पहले ही अर्घ्य देकर व्रत तोड़ दिया था; इसी से यह संकट आया। अब तुम साल भर हर महीने की चौथ का व्रत पूरे नियम से रखो, और अगली करवा चौथ का व्रत पूरी विधि से करो।"

वीरावती ने पूरी श्रद्धा से बारह महीनों की चौथ के व्रत किए और फिर करवा चौथ का व्रत विधि-विधान से किया। इन व्रतों के पुण्य से उसका पति फिर जीवित हो उठा। दोनों सुख से रहने लगे, और उनके घर धन-धान्य और संतान का सुख रहा।

श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि वह भी यही व्रत करे। कथा के अनुसार द्रौपदी ने करवा चौथ का व्रत रखा, और उसके प्रभाव से पांडवों के संकट दूर हुए।

करवा और मगरमच्छ

लोक कथा: वेबदुनिया, भारतकोश और अंग्रेज़ी विकिपीडिया में; किसी ग्रंथ का नाम इसके साथ नहीं मिलता।

एक गाँव में नदी के किनारे करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री अपने बूढ़े और कमज़ोर पति के साथ रहती थी। एक दिन पति नदी में नहाने गया, तो एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और उसे पानी में खींचने लगा। पति ने पुकारा, "करवा! करवा!"

करवा दौड़ी आई और उसने कच्चे सूत के धागे से मगरमच्छ को बाँध दिया। फिर वह यमराज के पास पहुँची। एक रूप में कहा जाता है कि उस समय यमराज चित्रगुप्त के बही-खाते देख रहे थे; करवा ने सात सींकों से झाड़ू लगाई तो बही-खाते आकाश में उड़ने लगे, और यमराज ने उससे पूछा कि वह क्या चाहती है।

करवा ने कहा, "इस मगरमच्छ ने मेरे पति का पैर पकड़ा है। इसे नरक भेजिए और मेरे पति को लंबी आयु दीजिए।" यमराज बोले, "मगरमच्छ की आयु अभी बाकी है; मैं उसे समय से पहले नहीं ले जा सकता।" करवा ने कहा, "तो मैं आपको शाप दे दूँगी।"

पतिव्रता के शाप से यमराज डर गए। उन्होंने मगरमच्छ को यमलोक भेज दिया और करवा के पति को लंबी आयु का वरदान दिया। एक रूप में यमराज वचन देते हैं कि जो स्त्री इस दिन व्रत रखेगी, उसके सुहाग की वे रक्षा करेंगे। वह दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का था, और तभी से यह व्रत करवा के नाम से करवा चौथ कहलाया।

कथा के अंत में यह कामना की जाती है: हे करवा माता, जैसे तुमने अपने पति के प्राणों की रक्षा की, वैसे ही सबके सुहाग की रक्षा करना।

कथा के अलग-अलग रूप

  • संस्कृत "व्रतराज" (1897) में बरगद पर एक भाई जलती मशाल (उल्का) दिखाता है; वहाँ न छलनी है, न भोजन के समय अपशकुन। पति की मृत्यु के बाद वीरावती साल भर निराहार व्रत रखती है, और अगली करवा चौथ पर इंद्राणी (शची) स्वयं यह व्रत करने धरती पर आती हैं और व्रत पूरा होने पर पति पर जल छिड़ककर उसे जीवित करती हैं।
  • छलनी का प्रसंग किसी संस्कृत या पुराने छपे पाठ (व्रतराज, गीता प्रेस का व्रत-परिचय, 1923 की व्रतोत्सव चंद्रिका) में नहीं है; यह बाद की कथाओं में जुड़ा। कुछ कथाओं में भाई पीपल के पीछे, टीले के पीछे या घर के पीछे आग जलाते हैं, और अंग्रेज़ी स्रोतों में दर्पण की बात भी है।
  • शहर का नाम Drik Panchang में इंद्रप्रस्थपुर, व्रतराज में शक्रप्रस्थपुर और गीता प्रेस में शाकप्रस्थपुर है; पिता का नाम वेदशर्मा या वेदधर्मा मिलता है। द्रौपदी वाले आरंभ में संस्कृत पाठ अर्जुन को इंद्रकील पर्वत पर बताते हैं, नई कथाएँ नीलगिरि पर; एक संस्कृत पाठ में द्रौपदी को श्रीकृष्ण की जगह वेदव्यास यह कथा सुनाते हैं।
  • लोक-कथाओं में पति को जीवित करने वाली कहीं इंद्राणी हैं, कहीं सबसे छोटी भाभी, कहीं चौथ माता, कहीं पार्वती जी और कहीं गणेश जी। राजस्थानी कथाओं में परिवार साहूकार का है और भाभियाँ वीरावती को झूठे चाँद के बारे में चेताती भी हैं।
  • भोजन के समय अपशकुनों का क्रम भी अलग है: Drik Panchang में पहले बाल, फिर छींक, फिर ससुराल का बुलावा; कुछ कथाओं में पहले छींक, फिर बाल।
  • करवा की कथा के एक रूप में करवा धोबिन है, नदी तुंगभद्रा है और मगरमच्छ पति को कपड़े धोते समय पकड़ता है (वेबदुनिया)।
  • कुछ परिवार इस दिन सत्यवान-सावित्री की कथा भी याद करते हैं; सावित्री का अपना व्रत वट सावित्री है।
  • कई परिवारों में करवा चौथ की कथा के बाद गणेश जी (विनायक जी) की एक छोटी कहानी भी सुनी जाती है। इसके कई रूप प्रचलित हैं, जैसे अंधी बुढ़िया के चतुर वरदान की कहानी और चुटकी भर चावल-दूध से बनी खीर की कहानी।

कथा के बाद

कथा के बाद सास को करवा (बायना) देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। चंद्रोदय पर हाथ में रखे दाने जल में डालकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है और व्रत खोला जाता है। अपने शहर में चाँद निकलने का समय करवा चौथ के पन्ने पर है।

करवा चौथ की आरती: ॐ जय करवा मैया

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

करवा चौथ की कथा कब सुनी जाती है?

प्रायः शाम को पूजा के समय, चंद्रोदय से पहले; पंजाब में कई जगह दोपहर में, थाली फेरते हुए। 1923 की पुस्तक व्रतोत्सव चंद्रिका चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद कथा सुनने को कहती है। अपने घर की परंपरा मानें।

करवा चौथ की कथा सुनते समय हाथ में क्या रखते हैं?

गेहूँ या चावल के तेरह दाने; करवे पर तेरह बिंदियाँ लगाई जाती हैं (भारतकोश)। चंद्रोदय पर ये दाने जल में डालकर अर्घ्य दिया जाता है।

करवा चौथ की कथा किस पुराण में है?

संस्कृत व्रतराज और कई पुस्तकें इस कथा को वामन पुराण का बताती हैं, पर वामन पुराण के आलोचनात्मक संस्करण (1967) के संपादकों के अनुसार यह अंश उसकी किसी उपलब्ध पांडुलिपि में नहीं है। व्रत का विधान नारद पुराण (पूर्व भाग, अध्याय 113) में है; कथा वहाँ नहीं है।

वीरावती का पति कैसे जीवित हुआ?

Drik Panchang की कथा में इंद्राणी के कहने पर वीरावती साल भर हर महीने की चौथ और फिर करवा चौथ का व्रत पूरे नियम से रखती है, और उन व्रतों के पुण्य से पति जीवित होता है। संस्कृत व्रतराज में इंद्राणी व्रत के बाद उस पर जल छिड़ककर उसे जीवित करती हैं; लोक-कथाओं में यह काम कहीं छोटी भाभी, कहीं चौथ माता करती हैं।

स्रोत

  1. व्रतराज (विश्वनाथ), खेमराज श्रीकृष्णदास, बंबई, 1897, पत्र 81–82: करकचतुर्थी व्रत कथा (संस्कृत; archive.org पर छपे पन्नों से जाँची)
  2. वामन पुराण, आलोचनात्मक संस्करण, सं. ए. एस. गुप्त, अखिल भारतीय काशिराज न्यास, वाराणसी, 1967, परिशिष्ट पृ. 743–751
  3. नारद पुराण, पूर्व भाग, अध्याय 113, श्लोक 43–50 (संस्कृत विकिस्रोत)
  4. गीता प्रेस, व्रत-परिचय (पं. हनुमान शर्मा), पृ. 152–153
  5. व्रतोत्सव चंद्रिका (पं. श्रवणलाल शर्मा), 1923, पृ. 235–237
  6. Drik Panchang: करवा चौथ की कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी)
  7. वेबदुनिया: करवा चौथ की एक नहीं 4 लोककथाएँ (2020)
  8. भारतकोश (bharatdiscovery.org): करवा चौथ
  9. अंग्रेज़ी विकिपीडिया: Karva Chauth; पंजाबी विकिपीडिया: ਕਰਵਾ ਚੌਥ; भारत सरकार का Incredible India पृष्ठ (कथा और थाली फेरने की रीत)

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