धनतेरस पर सबसे अधिक राजा हेम (हिम) के पुत्र की कथा सुनाई जाती है, जिसकी मृत्यु विवाह के चौथे दिन होनी तय थी। इसी कथा से धनतेरस की शाम यमराज के लिए घर के बाहर दक्षिण की ओर दीपक जलाने (यम दीपदान) की परंपरा जुड़ी है, जिसका विधान स्कंद पुराण में है। इसी दिन समुद्र मंथन से धन्वंतरि के प्रकट होने की मान्यता है, और लक्ष्मी जी व किसान की लोक कथा भी सुनी जाती है।
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धनतेरस (धन त्रयोदशी) कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (पूर्णिमांत) को, दीपावली से दो दिन पहले आता है। इस दिन शाम को घर के बाहर यमराज के लिए दीपक जलाया जाता है, और धन्वंतरि और लक्ष्मी-कुबेर की पूजा होती है।
स्कंद पुराण (वैष्णव खंड, कार्तिक मास माहात्म्य, अध्याय 9) में इस त्रयोदशी की शाम घर के द्वार पर दक्षिण की ओर यम के लिए दीपक रखने का विधान है; नारद पुराण (पूर्व भाग 1.122) भी इस दिन एक समय भोजन करके द्वार के बाहर तेल का दीपक रखने को कहता है। स्कंद पुराण के उसी अध्याय में एक पंक्ति में हेमनक राजा के पुत्र के अकाल मृत्यु से बचने का उल्लेख है; उस राजकुमार की पूरी कथा परंपरा में नीचे दिए दो रूपों में सुनाई जाती है। (स्कंद पुराण अमांत गणना से इस पक्ष को आश्विन कृष्ण कहता है; उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यही कार्तिक कृष्ण है।)
व्रत और कथा की विधि
- शाम (प्रदोष काल) को एक नया मिट्टी का दीपक सरसों के तेल से जलाकर घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है। कई जगह तेरह दीपक जलाने का चलन है।
- नारद पुराण के अनुसार इस दिन एक समय भोजन किया जाता है और दीपक रखते समय यम के प्रसन्न होने की प्रार्थना की जाती है।
- इसी शाम धन्वंतरि की पूजा (धन्वंतरि जयंती) और लक्ष्मी-कुबेर की पूजा होती है, और कथा सुनी जाती है।
यमदूतों की करुणा: राजा हेम के पुत्र की कथा
यह रूप वेबदुनिया, भारत-दर्शन और India.com में मिलता है; नाम हर जगह थोड़े अलग हैं।
एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा, "प्राणियों के प्राण हरते समय क्या कभी तुम्हें किसी पर दया आई है?" दूत पहले तो बोले कि वे तो केवल आज्ञा का पालन करते हैं। पर यमराज के फिर पूछने पर उन्होंने एक घटना सुनाई, जिसे याद करके उनका मन आज भी भर आता था।
हंस नाम का एक राजा शिकार खेलते हुए भटककर राजा हेम के राज्य में जा पहुँचा। उसी दिन राजा हेम के घर पुत्र का जन्म हुआ था। ज्योतिषियों ने बालक के ग्रह देखकर बताया कि विवाह के चौथे दिन इसकी मृत्यु हो जाएगी।
यह सुनकर राजा हेम ने बालक को यमुना के किनारे एक गुफा में ब्रह्मचारी के रूप में पालने की व्यवस्था की, जहाँ किसी स्त्री की छाया भी न पड़े। पर संयोग से राजा हंस की पुत्री यमुना के किनारे आई। राजकुमार और राजकुमारी ने एक-दूसरे को देखा और दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया।
विवाह के चौथे दिन राजकुमार के प्राण चले गए। नववधू का विलाप इतना करुण था कि प्राण ले जाते हुए यमदूतों की आँखें भी भर आईं।
एक दूत ने हाथ जोड़कर यमराज से पूछा, "महाराज, क्या कोई ऐसा उपाय नहीं जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से बच सके?" यमराज ने कहा, "जो धनतेरस के दिन पूजा करे और शाम को मेरे नाम से दक्षिण दिशा में दीपक जलाए, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।" तभी से धनतेरस की शाम यम दीपदान की परंपरा चली।
स्कंद पुराण की पंक्ति में अंत अलग है: वहाँ हेमनक राजा का पुत्र इसी दिन भगवान की कृपा से अकाल मृत्यु से बच जाता है, और यमदूतों के पूछने पर यमराज आज्ञा देते हैं कि इस शाम घर के द्वार पर दीपक जलाने वालों को न लाया जाए।
पत्नी के दीपक: जब यमराज साँप बनकर आए
यह रूप वेबदुनिया, अमर उजाला और अंग्रेज़ी विकिपीडिया में मिलता है।
राजा हिम के पुत्र के बारे में भविष्यवाणी थी कि विवाह के चौथे दिन साँप के डसने से उसकी मृत्यु होगी। फिर भी उसका विवाह हुआ। उसकी पत्नी महालक्ष्मी की भक्त थी, और उसने ठान लिया कि वह अपने पति को इस संकट से बचाएगी।
चौथी रात वह सोई नहीं। उसने कमरे के भीतर-बाहर चारों ओर दीपक जला दिए और महालक्ष्मी की आरती गाती रही। कुछ रूपों में वह अपने सारे गहने और सोने-चाँदी के सिक्के शयन-कक्ष के द्वार पर ढेर कर देती है और पति को जगाए रखने के लिए रात भर कथाएँ और गीत सुनाती है।
नियत समय पर यमराज साँप का रूप धरकर आए। पर दीपकों की जगमगाहट से उनकी आँखें चौंधिया गईं और वे भीतर न जा सके। वे वहीं बैठकर उसके गीत और आरती सुनते रहे।
भोर हो गई और मृत्यु का समय बीत गया। यमराज खाली हाथ लौट गए और राजकुमार दीर्घायु हुआ। तभी से धनतेरस की रात यमराज के लिए दीपक जलाने की परंपरा मानी जाती है।
समुद्र मंथन से धन्वंतरि
भागवत पुराण 8.8.31–35 और 1.3.17, विष्णु पुराण 1.9 के अनुसार।
जब देवता और असुर क्षीरसागर को मथ रहे थे, तब समुद्र से एक अद्भुत पुरुष प्रकट हुए। भागवत पुराण उनका रूप बताता है: बलिष्ठ शरीर, लंबी भुजाएँ, साँवला रंग, गले में माला, पीले वस्त्र और कानों में मोतियों के कुंडल। उनके हाथ में अमृत से भरा कलश था।
ये धन्वंतरि थे, भगवान विष्णु के अंश और आयुर्वेद के ज्ञाता; भागवत पुराण (1.3.17) उन्हें भगवान के अवतारों में गिनता है। अमृत का कलश देखते ही असुरों ने उसे छीन लिया, और तब भगवान ने मोहिनी का रूप धरा।
परंपरा में माना जाता है कि धन्वंतरि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन धन्वंतरि जयंती मनाई जाती है। भागवत और विष्णु पुराण में इस घटना की तिथि नहीं दी गई है।
लक्ष्मी जी और किसान
लोक कथा: Drik Panchang, वेबदुनिया और अमर उजाला में।
एक बार लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी पर चलने की इच्छा जताई। विष्णु जी ने शर्त रखी कि वह दक्षिण दिशा की ओर न देखेंगी। पर चंचल स्वभाव की लक्ष्मी जी का ध्यान उधर चला गया, जहाँ सरसों के फूलों से लदा खेत और गन्ने का खेत था। उन्होंने सरसों के फूलों से श्रृंगार किया और गन्ना तोड़कर उसका रस पिया।
किसान की फसल बिना पूछे लेने पर विष्णु जी नाराज़ हुए और बोले कि अब बारह वर्ष तक उस गरीब किसान के घर उसकी सेवा करो। लक्ष्मी जी किसान के घर रहने लगीं। उन्होंने किसान की पत्नी से कहा कि भोजन बनाने से पहले स्नान करके लक्ष्मी जी की पूजा किया करो। ऐसा करते ही किसान का घर अन्न, धन और गहनों से भर गया।
बारह वर्ष बाद विष्णु जी लक्ष्मी जी को लेने आए, तो किसान ने उन्हें जाने देने से मना कर दिया। तब लक्ष्मी जी ने अपना रूप प्रकट किया और वचन दिया कि वह हर वर्ष दीपावली से पहले कृष्ण त्रयोदशी को उसके घर आएँगी। वेबदुनिया के रूप में वह कहती हैं कि उस दिन घर साफ़ करके रात को घी का दीपक जलाना और ताँबे के कलश में सिक्के भरकर पूजा करना, तो मैं साल भर उस घर में रहूँगी। इसी से धनतेरस पर लक्ष्मी पूजा की परंपरा जोड़ी जाती है।
कथा के अलग-अलग रूप
- राजकुमार के पिता का नाम स्रोतों में हेम, हिम या हेमनक (स्कंद पुराण) मिलता है; India.com में राजकुमार का नाम ही हेम है। वधू के पिता का नाम हंस बताया गया है।
- पहले रूप में राजकुमार के प्राण चले जाते हैं और यम दीपदान का नियम दूसरों के लिए बनता है; स्कंद पुराण की पंक्ति और दूसरे रूप में वह बच जाता है।
- गहनों और सिक्कों के ढेर और रात भर कथा-गीत का प्रसंग अंग्रेज़ी स्रोतों में है (विलियम क्रम्प, Encyclopedia of New Year’s Holidays Worldwide); हिंदी स्रोत दीपकों और महालक्ष्मी की आरती की बात करते हैं।
- दीपकों की संख्या अलग-अलग बताई जाती है: एक नया दीपक या तेरह दीपक।
- धन्वंतरि के वस्त्र भागवत पुराण में पीले और विष्णु पुराण में सफ़ेद बताए गए हैं।
- वेबदुनिया यम और एक राजा की एक और कथा (भूखे ब्राह्मण को द्वार से लौटाने वाले राजा की) त्रयोदशी से जोड़ती है; दूसरे स्रोत यही कथा राजा रंतिदेव के नाम से नरक चतुर्दशी पर सुनाते हैं।
कथा के बाद
कथा के बाद शाम को यम दीपदान किया जाता है, और धन्वंतरि व लक्ष्मी-कुबेर की पूजा होती है। अपने शहर में धनतेरस की पूजा का मुहूर्त धनतेरस के पन्ने पर है।
भगवान धन्वंतरि की आरती: जय धन्वंतरि देवाअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
धनतेरस पर यम का दीपक क्यों जलाते हैं?
स्कंद पुराण के कार्तिक मास माहात्म्य (अध्याय 9) में इस त्रयोदशी की शाम घर के द्वार पर यम के लिए दीपक रखने का विधान है, जिससे अकाल मृत्यु का भय न रहे। लोक में यह राजा हेम के पुत्र की कथा से जोड़ा जाता है।
यम दीपदान कैसे किया जाता है?
शाम को एक नया मिट्टी का दीपक सरसों के तेल से जलाकर घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है। कई परिवार तेरह दीपक जलाते हैं। विधि परिवार की परंपरा के अनुसार थोड़ी बदलती है।
धनतेरस पर धन्वंतरि की पूजा क्यों होती है?
परंपरा में माना जाता है कि समुद्र मंथन से धन्वंतरि इसी दिन अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए यह धन्वंतरि जयंती है। मंथन की कथा भागवत पुराण (8.8) में है, पर उसमें तिथि नहीं दी गई है।
क्या राजा हेम की कथा पुराण में है?
स्कंद पुराण में केवल एक पंक्ति है कि हेमनक राजा का पुत्र इस दिन अकाल मृत्यु से बचा। पूरी कथा, उसके नाम और घटनाएँ, लोक परंपरा में सुनाई जाती हैं।
स्रोत
- स्कंद पुराण, वैष्णव खंड, कार्तिक मास माहात्म्य, अध्याय 9, श्लोक 20–26 (जी. वी. तगारे का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org पर जाँचा)
- नारद पुराण, पूर्व भाग 1.122.46–47 (wisdomlib.org)
- भागवत पुराण 8.8.31–35 और 1.3.17 (vedabase.io); विष्णु पुराण 1.9 (एच. एच. विल्सन का अनुवाद)
- वेबदुनिया: धनतेरस की पौराणिक कथा; यमराज को दीपदान की कथा; किसान के घर लक्ष्मी
- अमर उजाला: धनतेरस पर यम दीपक; धनतेरस की कथा
- भारत-दर्शन (bharatdarshan.co.nz): राजा हेम की कथा
- Drik Panchang: धनतेरस की कथाएँ और धन्वंतरि त्रयोदशी
- हिंदी और अंग्रेज़ी विकिपीडिया: धनतेरस (अंग्रेज़ी पृष्ठ का स्रोत: विलियम डी. क्रम्प, Encyclopedia of New Year’s Holidays Worldwide, 2016, पृ. 112)
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