व्रत कथा

रमा एकादशी व्रत कथा

रमा एकादशी: गुरुवार, 5 नवंबर 2026

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
लोक-चित्र शैली में: बादलों के बीच पहाड़ की चोटी पर चमकता सुनहरा दिव्य नगर; हल्के रंग की साड़ी में एक राजकुमारी एक वृद्ध ऋषि के साथ चलती हुई वहाँ पहुँचती है, और नगर के रत्नजड़ित मंडप में प्रकाश से दमकता एक युवा राजकुमार सिंहासन से उठकर उसका स्वागत करता है
चित्र: AI से बनाया गया
संक्षेप में

रमा एकादशी की कथा पद्म पुराण (उत्तर खंड) में है। राजा मुचुकुंद के दामाद शोभन दुर्बल होते हुए भी ससुराल में यह व्रत रखते हैं और अगली सुबह उनके प्राण चले जाते हैं; व्रत के पुण्य से उन्हें मंदराचल पर्वत पर एक दिव्य नगर मिलता है, पर वह स्थिर नहीं, क्योंकि व्रत श्रद्धा के बिना हुआ था। उनकी पत्नी चंद्रभागा, जो आठ वर्ष की आयु के बाद से हर एकादशी श्रद्धा से करती आई थीं, उसी पुण्य से नगर को स्थिर कर देती हैं और पति के साथ वहीं रहने लगती हैं।

रमा एकादशी कार्तिक कृष्ण एकादशी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण) को, दीपावली से कुछ दिन पहले आती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और उपवास होता है, और पूजा के बाद यह कथा पढ़ी या सुनी जाती है।

यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खंड में है, जहाँ युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण इसे सुनाते हैं; पूरा उत्तर खंड भगवान शिव और देवर्षि नारद के संवाद के रूप में है। हमने इसे संस्कृत मूल, उसके अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर अपने शब्दों में लिखा है। कथा की सीख श्रद्धा है: शोभन ने व्रत श्रद्धा के बिना किया तो उसका फल अस्थिर रहा, और चंद्रभागा के श्रद्धा से किए व्रतों ने उसे स्थिर कर दिया।

व्रत और कथा की विधि

  • कथा में राजा मुचुकुंद के राज्य में दशमी को ही ढोल बजाकर घोषणा होती है कि हरि के दिन, यानी एकादशी को, कोई भोजन न करे।
  • उस राज्य में एकादशी को कोई अन्न या जल नहीं लेता; कथा के अनुसार हाथी, घोड़े और दूसरे पशु भी उस दिन घास, अन्न या पानी नहीं पाते।
  • रात को भगवान हरि की पूजा और जागरण होता है, और उपवास अगले दिन (द्वादशी) की सुबह तक चलता है।
  • कथा की मुख्य सीख यह है कि व्रत श्रद्धा से किया जाए: चंद्रभागा आठ वर्ष की आयु के बाद से हर एकादशी नियम और श्रद्धा से करती आई थीं।

शोभन और चंद्रभागा की कथा

पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 60 (गीता प्रेस के संस्करण में गिनती दो आगे) के अनुसार; संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर।

युधिष्ठिर ने प्रेम से पूछा, "जनार्दन, मुझ पर स्नेह रखकर यह भी बताइए: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है?" श्रीकृष्ण बोले, "राजश्रेष्ठ, सुनो। कार्तिक के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा है। यह बहुत मंगलमय है और बड़े-बड़े पापों को हर लेती है। इसकी महिमा मैं तुम्हें एक कथा के सहारे बताता हूँ।"

बहुत पहले मुचुकुंद नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे। देवराज इंद्र से उनकी मित्रता थी, और यम, वरुण, कुबेर और विभीषण भी उनके मित्र थे। वे भगवान विष्णु के भक्त थे और अपने वचन के पक्के थे। उनके राज्य में कोई उपद्रवी नहीं बचा था।

राजा के घर एक पुत्री हुई, जो नदियों में श्रेष्ठ चंद्रभागा के नाम वाली थी। राजा ने उसका विवाह चंद्रसेन के पुत्र शोभन से किया।

एक बार शोभन अपने ससुर के घर आए हुए थे, और तभी पुण्य देने वाला एकादशी का दिन आ गया। चंद्रभागा चिंता में पड़ गईं, "हे भगवान, अब क्या होगा? मेरे पति बहुत दुर्बल हैं और भूख सह नहीं पाते, और मेरे पिता का शासन बड़ा कठोर है।"

राजा मुचुकुंद के राज्य में दशमी के दिन ही ढोल बजाकर घोषणा कर दी जाती थी, "हरि के दिन कोई भोजन न करे, कोई भोजन न करे, कोई भोजन न करे!" ढोल की यह गूँज सुनकर शोभन ने पत्नी से पूछा, "प्रिये, अब मैं क्या करूँ? तुम्हीं मुझे राह दिखाओ।"

चंद्रभागा ने कहा, "स्वामी, मेरे पिता के घर आज कोई भोजन नहीं करता। यहाँ हरि के दिन हाथी, घोड़े, उनके बच्चे और दूसरे पशु भी घास, अन्न या पानी तक नहीं पाते; तो मनुष्य कैसे खा सकते हैं? आप आज कुछ खा लेंगे, तो लोग आपको ही दोष देंगे। इसलिए सोच-समझकर मन को पक्का कर लीजिए।"

शोभन बोले, "तुम्हारी बात सही है, प्रिये। आज मैं भी उपवास रखूँगा; आगे जो विधाता ने रचा है, वही होगा।" यह ठानकर उन्होंने व्रत का नियम लिया।

दिन बीतता गया और भूख से उनका शरीर पीड़ा से भर उठा; वे बहुत दुखी हो गए। इसी सोच में सूरज डूब गया। वह रात, जो हरि की पूजा में लगे और जागरण करते भक्तों का आनंद बढ़ाती है, शोभन के लिए बहुत कष्ट भरी बीती।

सूर्योदय की बेला में शोभन के प्राण चले गए। राजा मुचुकुंद ने राजा के योग्य लकड़ियों से उनका दाह-संस्कार कराया। चंद्रभागा ने पति के पीछे अपने प्राण नहीं त्यागे; उन्होंने पति के सब अंतिम कर्म किए और पिता के घर ही रहने लगीं।

रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत के शिखर पर देवताओं का-सा एक सुंदर नगर मिला। वह नगर अनुपम था, कोई उसे जीत नहीं सकता था, और उसके गुण गिने नहीं जा सकते थे। उसके महलों में सोने के खंभे थे, जिन पर रत्न और वैदूर्य मणि जड़े थे, और तरह-तरह के आकार के स्फटिक उनकी शोभा बढ़ाते थे।

वहाँ शोभन सिंहासन पर विराजते। सिर पर सफ़ेद छत्र होता और चँवर डुलते। वे मुकुट, कुंडल, हार और बाजूबंद पहने रहते; गंधर्व उनकी स्तुति करते और अप्सराएँ उनकी सेवा करतीं। वहाँ वे दूसरे कुबेर की तरह शोभा पाते थे।

मुचुकुंद के नगर में सोमशर्मा नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। तीर्थयात्रा करते-करते वे वहाँ जा पहुँचे और उन्होंने शोभन को देखा। राजा के दामाद को पहचानकर वे उनके पास गए। शोभन ने भी उन्हें पहचान लिया; वे झट आसन से उठे, ब्राह्मण को प्रणाम किया, और अपने ससुर, पत्नी चंद्रभागा और पूरे नगर का कुशल-समाचार पूछा।

सोमशर्मा बोले, "राजन्, आपके ससुर के घर सब कुशल है, चंद्रभागा भी सकुशल हैं, और नगर में भी सब ठीक है। पर अब अपनी बात बताइए। मैंने आज तक इतना सुंदर, इतना अनोखा नगर कहीं नहीं देखा; यह तो अचरज ही है। आपको यह कैसे प्राप्त हुआ?"

शोभन ने कहा, "द्विजवर, कार्तिक के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी का उपवास करने से मुझे यह नगर मिला है। पर यह स्थिर नहीं है। कोई ऐसा उपाय कीजिए जिससे यह स्थिर हो जाए।" ब्राह्मण ने पूछा, "यह अस्थिर क्यों है, और स्थिर कैसे होगा? मुझे ठीक-ठीक बताइए; आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा।"

शोभन बोले, "विप्रवर, वह उत्तम व्रत मैंने श्रद्धा के बिना किया था, इसलिए मुझे लगता है कि इसका फल टिकने वाला नहीं। अब सुनिए यह स्थिर कैसे होगा: राजा मुचुकुंद की पुत्री चंद्रभागा को यह सारा हाल सुना दीजिए। तब यह नगर स्थिर हो जाएगा।"

श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह सुनकर सोमशर्मा मुचुकुंद के नगर लौटे और चंद्रभागा को सारी बात बताई, "शुभे, मैंने तुम्हारे पति को अपनी आँखों से देखा है, और उनका नगर भी, जो इंद्र के नगर जैसा है और जिसे कोई जीत नहीं सकता। पर वे उसे अस्थिर बताते हैं। तुम उसे स्थिर करो।"

चंद्रभागा बोलीं, "विप्रर्षि, मुझे वहाँ ले चलिए; मैं अपने पति को देखने के लिए व्याकुल हूँ। अपने व्रतों के पुण्य से मैं उस नगर को स्थिर कर दूँगी। ऐसा कीजिए कि हम दोनों फिर मिल सकें; बिछड़े हुओं को मिलाने से बड़ा पुण्य मिलता है।"

यह सुनकर सोमशर्मा चंद्रभागा को साथ लेकर मंदराचल के पास वामदेव ऋषि के आश्रम पहुँचे। ऋषि ने दोनों से सारा वृत्तांत सुना और वेद मंत्रों से चंद्रभागा का अभिषेक किया। ऋषि के मंत्रों के प्रभाव से, और एकादशी के व्रतों के पुण्य से, चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया और उन्हें दिव्य गति मिली।

आनंद से खिली आँखों के साथ वे अपने पति के पास पहुँचीं। पत्नी को आया देख शोभन बहुत प्रसन्न हुए, और उन्होंने उन्हें बुलाकर अपनी बाईं ओर बिठाया।

तब चंद्रभागा ने प्रेम से कहा, "स्वामी, मेरी एक हित की बात सुनिए। पिता के घर में, आठ बरस की उम्र पार करने के बाद से, मैंने हर एकादशी का व्रत नियम से और मन की पूरी श्रद्धा से किया है। उसी पुण्य के प्रभाव से यह नगर स्थिर हो जाएगा, और प्रलय तक हर मनचाही वस्तु से भरा रहेगा।"

इस तरह रमा व्रत के प्रभाव से चंद्रभागा दिव्य रूप, दिव्य भोग और दिव्य आभूषणों के साथ मंदराचल के शिखर पर अपने पति के साथ आनंद से रहने लगीं, और दिव्य देह पाए शोभन भी उनके साथ सुख से रहे।

कथा के अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं कि रमा एकादशी चिंतामणि और कामधेनु जैसी है। दोनों पक्षों की एकादशियों में भेद नहीं करना चाहिए: जैसे सफ़ेद और काली, दोनों गायों से एक-सा दूध मिलता है, वैसे ही कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी एक-सा फल देती है। कथा के अनुसार एकादशी का व्रत इस लोक का सुख भी देता है और मुक्ति भी, और जो एकादशी व्रतों का माहात्म्य सुनता है, वह सब पापों से छूटकर विष्णु लोक में सम्मान पाता है।

कथा के अलग-अलग रूप

  • पद्म पुराण, गीता प्रेस, ISKCON की पुस्तक और वेबदुनिया में यह कथा श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को सुनाते हैं; Drik Panchang के रूप में अर्जुन को। यह लोक में प्रचलित रूप है, पद्म पुराण का नहीं।
  • पद्म पुराण और गीता प्रेस में राजा मुचुकुंद शोभन का दाह-संस्कार कराते हैं। केवल Drik Panchang के रूप में राजा शरीर को जल में प्रवाहित करवाते हैं, और बाद में एकादशी के प्रभाव से शोभन जल से बाहर आते हैं; यह बात पद्म पुराण में नहीं है। Drik Panchang में शोभन के प्राण सूर्योदय से ठीक पहले जाते हैं, संस्कृत पाठ और गीता प्रेस में सूर्योदय के समय।
  • वेबदुनिया (और हिंदी विकिपीडिया), Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक कहते हैं कि चंद्रभागा ने पिता के कहने पर पति के साथ प्राण नहीं त्यागे; पद्म पुराण के संस्कृत पाठ, उसके अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस में पिता की आज्ञा का उल्लेख नहीं है।
  • Drik Panchang और वेबदुनिया में चंद्रभागा यह भी कहती हैं कि उपवास न कर सकें तो कहीं और चले जाएँ, और शोभन जाने से मना करते हैं; यह बात पद्म पुराण में नहीं है।
  • दिव्य नगर में बैठे शोभन की तुलना संस्कृत पाठ में "राजराज" यानी कुबेर से है (गीता प्रेस: "द्वितीय कुबेर"); Drik Panchang और वेबदुनिया उन्हें "दूसरा इंद्र" कहते हैं। नगर को गीता प्रेस, Drik Panchang और वेबदुनिया "देवपुर" नाम से लिखते हैं; संस्कृत शब्द का अर्थ "देवताओं का नगर" भी हो सकता है, और देशपांडे का अनुवाद इसे एक सुंदर दिव्य नगर कहता है।
  • संस्कृत शब्द "सरिद्वरा" (नदियों में श्रेष्ठ) को अलग-अलग समझा गया है: गीता प्रेस के अनुसार स्वयं चंद्रभागा नदी राजा की पुत्री बनकर आईं; देशपांडे के अनुवाद में वह नदी जैसी थीं; ISKCON की पुस्तक में उनका नाम नदी के नाम पर रखा गया था।
  • नगर कब तक स्थिर रहेगा, इसे संस्कृत पाठ में "प्राणियों के प्रलय तक" कहा गया है, गीता प्रेस में "कल्प के अंत तक"। ISKCON की पुस्तक और वेबदुनिया में चंद्रभागा अपना पुण्य पति को सौंपती हैं; संस्कृत पाठ में इतना ही है कि उनके पुण्य से नगर स्थिर होगा। Drik Panchang के अंग्रेज़ी रूप में वे "आठ वर्ष की आयु से" व्रत करती हैं, संस्कृत में "आठ वर्ष से बड़ी होने के बाद से"।
  • ISKCON की पुस्तक और वेबदुनिया के अनुसार यह व्रत ब्रह्महत्या जैसे पाप भी मिटाता है; यह पंक्ति पद्म पुराण के संस्कृत पाठ में नहीं है।
  • कथा यह नहीं कहती कि ये वही राजा मुचुकुंद हैं जिनकी गुफा और कालयवन वाली कथा भागवत पुराण में है, इसलिए हमने दोनों को नहीं जोड़ा।

कथा के बाद

कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती और एकादशी माता की आरती गाई जाती है। व्रत द्वादशी को पारण के समय खोला जाता है; अपने शहर का पारण समय रमा एकादशी के पन्ने पर है। जो दुर्बल, बीमार या बुज़ुर्ग हों, वे व्रत का रूप अपने पुरोहित और डॉक्टर से पूछकर तय करें।

एकादशी माता की आरती: ॐ जय एकादशी माता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रमा एकादशी की कथा किस पुराण में है?

पद्म पुराण के उत्तर खंड में, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हैं। संस्कृत विकिस्रोत और एन. ए. देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह अध्याय 60 है; गीता प्रेस के संस्करण में अध्यायों की गिनती दो आगे चलती है।

रमा एकादशी की कथा में शोभन का नगर अस्थिर क्यों था?

शोभन स्वयं कहते हैं कि उन्होंने यह उत्तम व्रत श्रद्धा के बिना किया था, इसलिए उसका फल अस्थिर है; कथा में वे पत्नी के समझाने और राज्य के नियम के कारण उपवास करते हैं। चंद्रभागा के श्रद्धा से किए एकादशी व्रतों के पुण्य से नगर स्थिर हुआ।

क्या शोभन के शरीर को जल में प्रवाहित किया गया था?

पद्म पुराण के संस्कृत पाठ, उसके अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के अनुसार नहीं: वहाँ राजा मुचुकुंद राजा के योग्य लकड़ियों से उनका दाह-संस्कार कराते हैं। जल में प्रवाहित करने की बात केवल Drik Panchang के रूप में है।

रमा एकादशी व्रत कथा कब पढ़ें?

परंपरा में एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के बाद, आरती से पहले। कथा के अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो एकादशी व्रतों का माहात्म्य सुनता है, वह सब पापों से छूटकर विष्णु लोक में सम्मान पाता है।

स्रोत

  1. पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 60, संस्कृत विकिस्रोत (अध्याय संख्या संस्करण के अनुसार बदलती है; गीता प्रेस के संस्करण में गिनती दो आगे चलती है)
  2. पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 60, एन. ए. देशपांडे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास; wisdomlib.org)
  3. गीता प्रेस, गोरखपुर: एकादशी-व्रत का माहात्म्य (26 एकादशियों की कथाएँ), संकलन राधेश्याम खेमका, पृ. 64–67
  4. ISKCON की Ekadasi पुस्तक का पाठ: रमा एकादशी (iskcondesiretree.com)
  5. Drik Panchang: रमा एकादशी व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी), drikpanchang.com
  6. वेबदुनिया (hindi.webdunia.com): रमा एकादशी व्रत कथा; हिंदी विकिपीडिया में यही पाठ है

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