आरतीविष्णु

एकादशी माता की आरती: ॐ जय एकादशी माता

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 2 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
एकादशी की सुबह शेषनाग की छाया में विष्णु प्रतिमा, तुलसी, फल, साबूदाना और मखाने का भोग
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता। विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥

    हे एकादशी माता, आपकी जय हो। जो विष्णु की पूजा के साथ आपका व्रत धारण करता है, वह शक्ति और मुक्ति पाता है।

  2. पद 2

    तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी। गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥

    हे भक्ति देने वाली देवी, मैं आपके नाम गिनाता हूँ। हे माता, आप सम्मान और गौरव देने वाली हैं, और शास्त्रों में आपका वर्णन है।

  3. पद 3

    मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी। शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥

    मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की एकादशी उत्पन्ना है; परंपरा के अनुसार संसार को तारने वाली एकादशी देवी इसी दिन जन्मीं। शुक्लपक्ष की एकादशी मोक्षदा है, जो मुक्ति देने वाली बनकर आई।

  4. पद 4

    पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है। शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥

    पौष के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम सफला है। शुक्लपक्ष में पुत्रदा एकादशी होती है, जिससे बहुत आनंद रहता है।

  5. पद 5

    नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै। शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥

    माघ मास के कृष्णपक्ष में षटतिला एकादशी आती है। शुक्लपक्ष की एकादशी जया कहलाती है; आरती कहती है कि इसका व्रत करने वाला सदा विजय पाता है।

  6. पद 6

    विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी। पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥

    फागुन के कृष्णपक्ष में विजया और शुक्लपक्ष में आमलकी एकादशी होती है। चैत्र के कृष्णपक्ष में महान शक्ति वाली पापमोचनी एकादशी आती है।

  7. पद 7

    चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली। नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥

    चैत्र के शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम कामदा है, जिसे आरती धन देने वाली कहती है। वैशाख मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम बरुथिनी (वरूथिनी) है।

  8. पद 8

    शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी। नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥

    (वैशाख के) शुक्लपक्ष में मोहिनी एकादशी होती है, और ज्येष्ठ के कृष्णपक्ष में अपरा। ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में सब सुख देने वाली निर्जला एकादशी रखी जाती है।

  9. पद 9

    योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी। देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥

    आषाढ़ के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम योगिनी जानो। शुक्लपक्ष में रखी जाने वाली एकादशी देवशयनी कहलाती है।

  10. पद 10

    कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए। श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥

    श्रावण मास के कृष्णपक्ष में कामिका एकादशी आती है। श्रावण के शुक्लपक्ष में पवित्रा एकादशी (जिसे श्रावण पुत्रदा भी कहते हैं) होती है; उसका व्रत करके आनंद से रहिए।

  11. पद 11

    अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला। इन्द्रा आश्विन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥

    भाद्रपद के कृष्णपक्ष की एकादशी अजा है और शुक्लपक्ष की परिवर्तिनी। आश्विन के कृष्णपक्ष में इन्द्रा (इंदिरा) एकादशी है; आरती कहती है कि इसके व्रत से व्यक्ति भवसागर से पार निकल जाता है।

  12. पद 12

    पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी। रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥

    (आश्विन के) शुक्लपक्ष में पापांकुशा एकादशी है; आप (पाप और दुख) हरने वाली हैं। कार्तिक मास (के कृष्णपक्ष) में रमा एकादशी आती है, जो बहुत सुख देने वाली है।

  13. पद 13

    देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया। पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥

    (कार्तिक के) शुक्लपक्ष की एकादशी देवोत्थानी (देवउठनी) है, जो दुख नष्ट करने वाली माता है। इस पावन (कार्तिक) मास में मैं विनती करता हूँ: मेरी नैया पार लगाओ।

  14. पद 14

    परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी। शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥

    (अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास के) कृष्णपक्ष में परमा एकादशी होती है, जो लोगों का मंगल करती है। शुक्लपक्ष में पद्मिनी एकादशी होती है, जो दुख और दरिद्रता हरती है। ये दोनों एकादशियाँ केवल अधिक मास वाले वर्ष में आती हैं।

  15. पद 15

    जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै। जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥

    सेवक गुरदिता कहते हैं कि जो कोई भक्ति के साथ एकादशी की यह आरती गाता है, वह निश्चय ही स्वर्ग में वास पाता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ekadashi-aarti/

संक्षेप में

“ॐ जय एकादशी माता” एकादशी तिथि को देवी रूप में मानकर गाई जाने वाली आरती है। इसमें मार्गशीर्ष की उत्पन्ना से लेकर अधिक मास की पद्मिनी तक, साल भर की सभी 26 एकादशियों के नाम महीने और पक्ष सहित गिनाए गए हैं। हर एकादशी पर विष्णु पूजा और व्रत-कथा के बाद इसे गाया जाता है, अक्सर “ॐ जय जगदीश हरे” के साथ।

यहाँ प्रचलित पाठ दिया गया है, जो कई स्रोतों में लगभग एक जैसा मिलता है। कुछ संस्करणों में ‘बरुथिनी’ की जगह ‘वरूथिनी’ और पद 12 में ‘आप हरनहारी’ की जगह ‘पाप हरनहारी’ मिलता है। पद 11 में कई छपे पाठों में ‘आश्विन’ को ‘आश्चिन’ लिखा गया है, जो छपाई की भूल है। महीनों के नाम उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार हैं। अंतिम पद में ‘जन गुरदिता’ नाम (छाप) आता है, पर रचयिता के बारे में पक्की जानकारी नहीं मिलती। गाते समय पहला पद (टेक) हर पद के बाद दोहराया जाता है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस आरती में कितनी एकादशियों के नाम हैं?

26 के: साल भर की 24 एकादशियाँ, और अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) की दो एकादशियाँ, परमा और पद्मिनी।

यह आरती कब गाई जाती है?

हर एकादशी पर, विष्णु पूजा और उस एकादशी की व्रत-कथा के बाद। कई घरों में इसके साथ “ॐ जय जगदीश हरे” भी गाई जाती है।

आरती में महीनों के नाम किस पंचांग के अनुसार हैं?

उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार, जिसमें महीना पूर्णिमा पर पूरा होता है। अमांत पंचांग (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत) में कृष्णपक्ष की एकादशी एक महीना पहले की गिनी जाती है; जैसे उत्पन्ना वहाँ कार्तिक कृष्ण एकादशी कहलाती है। शुक्लपक्ष की एकादशियों के महीने दोनों में एक ही हैं।

आरती उत्पन्ना एकादशी से क्यों शुरू होती है?

परंपरा के अनुसार एकादशी देवी की उत्पत्ति मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी को हुई, इसलिए उसे उत्पन्ना कहते हैं। आरती भी ‘उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी’ कहकर गिनती यहीं से शुरू करती है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं?

अंतिम पद में ‘जन गुरदिता’ नाम (छाप) आता है। उनके बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. एकादशियों के नाम और मास: उत्तर भारत का पूर्णिमांत पंचांग

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