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एकादशी माता की आरती: ॐ जय एकादशी माता PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/ekadashi-aarti/
“ॐ जय एकादशी माता” एकादशी तिथि को देवी रूप में मानकर गाई जाने वाली आरती है। इसमें मार्गशीर्ष की उत्पन्ना से लेकर अधिक मास की पद्मिनी तक, साल भर की सभी 26 एकादशियों के नाम महीने और पक्ष सहित गिनाए गए हैं। हर एकादशी पर विष्णु पूजा और व्रत-कथा के बाद इसे गाया जाता है, अक्सर “ॐ जय जगदीश हरे” के साथ।
यहाँ प्रचलित पाठ दिया गया है, जो कई स्रोतों में लगभग एक जैसा मिलता है। कुछ संस्करणों में ‘बरुथिनी’ की जगह ‘वरूथिनी’ और पद 12 में ‘आप हरनहारी’ की जगह ‘पाप हरनहारी’ मिलता है। पद 11 में कई छपे पाठों में ‘आश्विन’ को ‘आश्चिन’ लिखा गया है, जो छपाई की भूल है। महीनों के नाम उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार हैं। अंतिम पद में ‘जन गुरदिता’ नाम (छाप) आता है, पर रचयिता के बारे में पक्की जानकारी नहीं मिलती। गाते समय पहला पद (टेक) हर पद के बाद दोहराया जाता है।
आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस आरती में कितनी एकादशियों के नाम हैं?
26 के: साल भर की 24 एकादशियाँ, और अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) की दो एकादशियाँ, परमा और पद्मिनी।
यह आरती कब गाई जाती है?
हर एकादशी पर, विष्णु पूजा और उस एकादशी की व्रत-कथा के बाद। कई घरों में इसके साथ “ॐ जय जगदीश हरे” भी गाई जाती है।
आरती में महीनों के नाम किस पंचांग के अनुसार हैं?
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार, जिसमें महीना पूर्णिमा पर पूरा होता है। अमांत पंचांग (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत) में कृष्णपक्ष की एकादशी एक महीना पहले की गिनी जाती है; जैसे उत्पन्ना वहाँ कार्तिक कृष्ण एकादशी कहलाती है। शुक्लपक्ष की एकादशियों के महीने दोनों में एक ही हैं।
आरती उत्पन्ना एकादशी से क्यों शुरू होती है?
परंपरा के अनुसार एकादशी देवी की उत्पत्ति मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी को हुई, इसलिए उसे उत्पन्ना कहते हैं। आरती भी ‘उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी’ कहकर गिनती यहीं से शुरू करती है।
इस आरती के रचयिता कौन हैं?
अंतिम पद में ‘जन गुरदिता’ नाम (छाप) आता है। उनके बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
स्रोत
- परंपरागत आरती पाठ
- एकादशियों के नाम और मास: उत्तर भारत का पूर्णिमांत पंचांग
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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, bhaktibharat.com, hindi.webdunia.com, hindi.webdunia.com
