नरक चतुर्दशी से तीन कथाएँ जुड़ी हैं। भागवत पुराण (10.59) के अनुसार श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के साथ गरुड़ पर जाकर नरकासुर (भौमासुर) का वध किया और उसकी कैद से सोलह हज़ार राजकुमारियों को छुड़ाया। लोक कथा में राजा रंतिदेव इस दिन व्रत रखकर एक भूल के दोष से मुक्त होते हैं। और स्कंद पुराण में राजा बलि को मिले वरदान से इस दिन दीपक जलाने का विधान है।
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नरक चतुर्दशी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (पूर्णिमांत) को, दीपावली से पहले आती है; इसे छोटी दिवाली, रूप चौदस और काली चौदस भी कहते हैं। इस दिन सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान (अभ्यंग स्नान), यम के लिए तर्पण और शाम को दीपदान किया जाता है। अपने शहर में स्नान का समय नरक चतुर्दशी के पन्ने पर है।
व्रत और कथा की विधि
- सूर्योदय से पहले, रात के अंतिम प्रहर में तेल लगाकर स्नान। स्कंद पुराण (कार्तिक मास माहात्म्य 9.27–32) इसे इस दिन का मुख्य कर्म बताता है और कहता है कि इस दिन तेल में लक्ष्मी और जल में गंगा का वास होता है। नारद पुराण (1.123.46–47) यही स्नान चंद्रोदय के समय बताता है।
- स्नान के जल में अपामार्ग (चिरचिटा) की टहनी घुमाकर सिर के चारों ओर फिराई जाती है (स्कंद पुराण 9.33–35)।
- यम के चौदह नामों से तर्पण; स्कंद पुराण के अनुसार जिसके पिता जीवित हों वह भी यह तर्पण कर सकता है (9.37–42)।
- शाम को घर के बाहर और चौराहों पर दीपक जलाए जाते हैं (नारद पुराण 1.123); स्कंद पुराण के अनुसार चतुर्दशी को नरक के लिए दीपदान करने वालों के पितर नरक में नहीं रहते।
श्रीकृष्ण और नरकासुर
भागवत पुराण, दशम स्कंध, अध्याय 59, और विष्णु पुराण 5.29 के अनुसार।
प्राग्ज्योतिषपुर में भूमि देवी का पुत्र भौमासुर राज करता था, जिसे नरकासुर कहा जाता है। उसने वरुण देव का छत्र और देवमाता अदिति के कुंडल छीन लिए और मंदराचल पर देवताओं के क्रीड़ास्थल मणिपर्वत पर अधिकार कर लिया। दुखी इंद्र द्वारका में श्रीकृष्ण के पास पहुँचे।
श्रीकृष्ण सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर बैठे और प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। नगर चारों ओर से कड़े घेरों से सुरक्षित था, पर श्रीकृष्ण ने एक-एक घेरा तोड़ दिया। पाँच सिरों वाला दैत्य मुर उन पर टूट पड़ा, तो उन्होंने चक्र से उसके पाँचों सिर काट दिए। फिर मुर के सात पुत्र (ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान और अरुण) अपने सेनापति पीठ के साथ लड़ने आए, और वे भी मारे गए।
तब स्वयं नरकासुर हाथी पर चढ़कर सेना के साथ निकला। उसने गरुड़ पर शक्ति-अस्त्र चलाया, पर गरुड़ अडिग रहे। जैसे ही नरकासुर ने त्रिशूल उठाया, श्रीकृष्ण ने चक्र से उसका सिर काट दिया। विष्णु पुराण के अनुसार चक्र ने उसके दो टुकड़े कर दिए।
तब भूमि देवी स्वयं आईं। उन्होंने छीनी हुई वस्तुएँ श्रीकृष्ण को लौटाईं, उनकी स्तुति की, और नरकासुर के डरे हुए पुत्र को उनकी शरण में सौंप दिया। श्रीकृष्ण ने उसे अभय दिया।
नरकासुर के महल में श्रीकृष्ण ने उन राजकुमारियों को देखा जिन्हें उसने बलपूर्वक बंदी बना रखा था। भागवत पुराण के श्लोक में उनकी संख्या सोलह हज़ार है, विष्णु पुराण में सोलह हज़ार एक सौ। सबने मन ही मन श्रीकृष्ण को पति रूप में चाहा। श्रीकृष्ण ने उन्हें आदर के साथ, धन-संपत्ति सहित, पालकियों में द्वारका भेज दिया।
फिर श्रीकृष्ण ने स्वर्ग जाकर अदिति को उनके कुंडल लौटाए और सत्यभामा के लिए पारिजात वृक्ष लेकर द्वारका लौटे। वहाँ उन्होंने उन सभी राजकुमारियों से, प्रत्येक के लिए अलग रूप धरकर, एक साथ विवाह किया।
लोक-परंपरा में कहा जाता है कि यह वध कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हुआ और लोगों ने दीपक जलाकर खुशी मनाई, इसी से यह दिन नरक चतुर्दशी कहलाया; भागवत और विष्णु पुराण में इसकी तिथि नहीं दी गई है। कई लोक-कथाओं में सत्यभामा की भूमिका बड़ी बताई जाती है: कहीं वे श्रीकृष्ण की सारथी बनती हैं, कहीं स्वयं नरकासुर का वध करती हैं, क्योंकि उसे अपनी माता भूमि देवी के हाथों ही मरने का वरदान था और सत्यभामा को भूमि देवी का अवतार माना जाता है। पुराणों में वध श्रीकृष्ण के चक्र से होता है।
राजा रंतिदेव की कथा
लोक कथा: वेबदुनिया, भारतकोश, हिंदी विकिपीडिया और टाइम्स नाउ हिंदी में।
रंतिदेव नाम के एक धर्मात्मा और दानी राजा थे। जब उनका अंत समय आया, तो यमदूत उन्हें लेने आ पहुँचे और कहा कि उन्हें नरक ले जाना है। राजा चकित होकर बोले, "मैंने तो जीवन भर धर्म किया, फिर मुझे नरक क्यों?"
यमदूतों ने बताया, "एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया था; यह उसी का फल है।" राजा ने विनती की कि उन्हें एक वर्ष का समय दिया जाए, और यमदूतों ने उन्हें एक वर्ष दे दिया।
राजा ऋषियों के पास गए और सारी बात बताई। ऋषियों ने कहा कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को व्रत रखो और ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपनी भूल की क्षमा माँगो। राजा ने वैसा ही किया।
इस व्रत के पुण्य से राजा उस दोष से मुक्त हो गए और उन्हें विष्णु लोक मिला (एक रूप में स्वर्ग)। तभी से माना जाता है कि इस चतुर्दशी का व्रत नरक के भय से मुक्त करता है।
भागवत पुराण (9.21) में रंतिदेव की कथा दूसरी है: वहाँ वे अड़तालीस दिन के उपवास के बाद मिला अपना भोजन और जल भी भूखे अतिथियों को दे देते हैं। नरक चतुर्दशी वाली यह कथा उसी नाम से लोक में प्रचलित है; किसी ग्रंथ का नाम इसके साथ नहीं मिलता।
राजा बलि का वरदान और दीपदान
स्कंद पुराण, वैष्णव खंड, कार्तिक मास माहात्म्य, अध्याय 9, श्लोक 49–60 के अनुसार।
वामन अवतार में भगवान ने राजा बलि से तीन पग धरती माँगकर तीनों लोक ले लिए थे। स्कंद पुराण के अनुसार बलि के दान से प्रसन्न होकर भगवान ने उससे वर माँगने को कहा।
बलि ने माँगा कि इन तीन दिनों, चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा, में पृथ्वी पर उसका राज्य माना जाए, और जो लोग इन दिनों दीपक जलाएँ उनके घर लक्ष्मी स्थायी रूप से वास करें। उसी प्रसंग में कहा गया है कि जो चतुर्दशी को नरक के लिए दीपदान करते हैं, उनके पितर नरक में नहीं रहते। भगवान ने यह वर दिया।
इसी से नरक चतुर्दशी से दीपावली और गोवर्धन प्रतिपदा तक दीपक जलाने की परंपरा जोड़ी जाती है।
कथा के अलग-अलग रूप
- राजकुमारियों की संख्या भागवत पुराण के श्लोक (10.59.33) में सोलह हज़ार और विष्णु पुराण (5.29) में सोलह हज़ार एक सौ है; हिंदी स्रोत दोनों संख्याएँ लिखते हैं।
- नरकासुर को केवल माता के हाथों मरने का वरदान, और सत्यभामा द्वारा वध, भागवत और विष्णु पुराण में नहीं है; ये बातें लोक-कथाओं और समाचार-पत्रों की कथाओं में मिलती हैं।
- श्रीकृष्ण के नरकासुर-वध के बाद तेल से स्नान करने की बात Drik Panchang लिखता है, पर किसी ग्रंथ का नाम नहीं देता।
कथा के बाद
कथा के बाद शाम को घर में और द्वार के बाहर दीपक जलाए जाते हैं। स्नान का समय और दीपावली की पूजा का मुहूर्त अपने शहर के लिए नरक चतुर्दशी और दीपावली के पन्नों पर है।
श्री कृष्ण की आरती: आरती कुंजबिहारी कीअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नरकासुर को किसने मारा, श्रीकृष्ण ने या सत्यभामा ने?
भागवत पुराण (10.59) और विष्णु पुराण (5.29) के अनुसार श्रीकृष्ण ने चक्र से नरकासुर का वध किया, और सत्यभामा गरुड़ पर उनके साथ थीं। कई लोक-कथाओं में सत्यभामा को वध करने वाली बताया जाता है।
नरक चतुर्दशी पर तेल लगाकर स्नान क्यों करते हैं?
स्कंद पुराण के कार्तिक मास माहात्म्य (अध्याय 9) में इस दिन भोर से पहले तेल लगाकर स्नान का विधान है; उसमें कहा गया है कि इस दिन तेल में लक्ष्मी और जल में गंगा का वास होता है।
नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली और रूप चौदस क्यों कहते हैं?
यह दीपावली से पहले की रात है और इस दिन भी दीपक जलाए जाते हैं, इसलिए छोटी दिवाली। सुबह के उबटन और तेल-स्नान से रूप निखरने की मान्यता के कारण इसे रूप चौदस कहा जाता है।
स्रोत
- भागवत पुराण 10.59 और 9.21 (vedabase.io पर श्लोक-दर-श्लोक जाँचा)
- विष्णु पुराण 5.29 (एच. एच. विल्सन का अनुवाद, wisdomlib.org)
- स्कंद पुराण, वैष्णव खंड, कार्तिक मास माहात्म्य, अध्याय 9, श्लोक 27–60 (wisdomlib.org)
- नारद पुराण, पूर्व भाग 1.123.46–47 (wisdomlib.org)
- वेबदुनिया: नरक चतुर्दशी की तीन पौराणिक कथाएँ; रूप चौदस; सत्यभामा और नरकासुर
- भारतकोश (bharatdiscovery.org) और हिंदी विकिपीडिया: नरक चतुर्दशी
- Drik Panchang: नरक चतुर्दशी
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