नवरात्रि की व्रत कथा ब्राह्मण की बेटी सुमति की कहानी है: एक दिन देवी की पूजा में न आने पर क्रोधित पिता उसका विवाह एक कोढ़ी से कर देते हैं, और वन में देवी भगवती प्रकट होकर बताती हैं कि पिछले जन्म में अनजाने में हुए नौ दिन के नवरात्र व्रत के पुण्य से वे उस पर प्रसन्न हैं। उसी पुण्य से सुमति के पति का रोग दूर होता है, उसे पुत्र का वर मिलता है, और देवी उसे नवरात्र व्रत की विधि बताती हैं। यह परंपरा में प्रचलित व्रत कथा है; देवी भागवत पुराण और दुर्गा सप्तशती में यह नहीं है।
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नवरात्रि में, खासकर शारदीय नवरात्रि (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी) में, व्रत रखने वाले घरों में सुमति की यह कथा पढ़ी और सुनी जाती है। कथा अपने आरंभ में चैत्र और आश्विन दोनों नवरात्रों की बात करती है, और कहती है कि इसे दस दिन तक परिवार के साथ सुना जाए।
यह परंपरा में प्रचलित व्रत कथा है, जो व्रत-कथा की पुस्तिकाओं और समाचार-पत्रों में छपती आई है। कोई स्रोत इसके साथ किसी ग्रंथ का नाम नहीं देता। देवी भागवत पुराण (3.26–28) में नवरात्र व्रत के नियम हैं और एक अलग कथा है, कोसल के निर्धन वैश्य सुशील की, जिसने एक ब्राह्मण के कहने पर यह व्रत किया था; सुमति की कथा उसमें नहीं है। गीता प्रेस की "व्रत-परिचय", जो नवरात्र के नियम शास्त्रों के हवाले से देती है, उसमें भी यह कथा नहीं है।
नवरात्रि में जिस ग्रंथ का पाठ होता है, वह दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) है: मार्कण्डेय पुराण के अध्याय 81 से 93, जिनमें राजा सुरथ, वैश्य समाधि और मेधा ऋषि का संवाद और देवी के तीन चरित्र हैं। वह एक अलग ग्रंथ है, और उसमें सुमति की कथा नहीं है। नीचे सुमति की कथा उसी रूप में है जिसमें वह सबसे अधिक छपती है; दूसरे स्रोतों के अंतर अंत में दिए हैं।
व्रत और कथा की विधि
- कथा के अनुसार व्रत आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नौ दिन रखा जाता है; जो पूरे दिन का उपवास न कर सके, वह एक समय भोजन करे।
- कथा के आरंभ में कहा गया है कि दस दिन तक परिवार-जनों के साथ यह कथा सुनी जाए। संस्कृत सुभाषित पर इस पाठ के साथ छपी विधि इसे स्नान के बाद, मंदिर में या घर पर, पढ़ने को कहती है।
- गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" के अनुसार देवी के नवरात्र में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन और दुर्गा सप्तशती का पाठ मुख्य है, और कुमारी-पूजन आवश्यक माना गया है: हो सके तो नौ दिन, नहीं तो अंतिम दिन, दो से दस वर्ष की कन्याओं का पूजन और भोजन।
सुमति की कथा
परंपरा में प्रचलित व्रत कथा। यह रूप उस पाठ के अनुसार है जो अमर उजाला (2019, 2020) और संस्कृत सुभाषित ब्लॉग में एक जैसे शब्दों में छपा है; टाइम्स नाउ नवभारत, वेबदुनिया, श्री मंदिर और हिंदूपैड इसे अपने शब्दों में सुनाते हैं।
एक बार देवगुरु बृहस्पति ने ब्रह्मा जी से पूछा, "चैत्र और आश्विन के शुक्ल पक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? इसका फल क्या है, इसे कैसे करना चाहिए, और सबसे पहले यह व्रत किसने किया था?"
ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए कि बृहस्पति ने सबके हित की बात पूछी है। कथा के अनुसार उन्होंने कहा कि जो मनोरथ पूरे करने वाली दुर्गा, महादेव, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे धन्य हैं, और यह व्रत मन की कामनाएँ पूरी करने वाला है: पुत्र चाहने वाले को पुत्र, धन चाहने वाले को धन, विद्या चाहने वाले को विद्या और सुख चाहने वाले को सुख। उन्होंने यह भी कहा कि जो पूरे दिन उपवास न कर सके वह एक समय भोजन करे, और दस दिन तक अपने बंधु-बांधवों के साथ यह कथा सुने। फिर वे बोले, "जिसने सबसे पहले यह महाव्रत किया था, उसकी कथा ध्यान से सुनो।"
बहुत पहले मनोहर नगर में पीठत नाम का एक अनाथ ब्राह्मण रहता था, जो भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके घर सुमति नाम की एक बेटी हुई, जो बहुत सुंदर थी और सब गुणों से भरी थी। सहेलियों के साथ खेलती-कूदती वह शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की तरह दिन-दिन बढ़ने लगी। पिता रोज़ दुर्गा जी की पूजा और होम करते, और सुमति हर दिन नियम से वहाँ उपस्थित रहती।
एक दिन सुमति सहेलियों के साथ खेल में ऐसी रमी कि पूजा के समय आ न सकी। बेटी की यह लापरवाही पिता को बहुत बुरी लगी। क्रोध में वे बोले, "आज तूने भगवती की पूजा नहीं की। इसके बदले मैं तेरा विवाह किसी कोढ़ी या दरिद्र से करूँगा।"
पिता की बात सुनकर सुमति का मन दुखी हुआ, पर उसने शांत होकर कहा, "पिताजी, मैं आपकी बेटी हूँ और हर तरह से आपके अधीन हूँ। आप मेरा विवाह राजा से करें, कोढ़ी से या किसी निर्धन से, होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है। कर्म करना मनुष्य के हाथ में है, पर उसका फल देना ईश्वर के हाथ में।"
बेटी की यह निडर बात सुनकर पिता का क्रोध और भड़क उठा, जैसे आग में सूखी घास पड़ जाए। उन्होंने सुमति का विवाह एक कोढ़ी से कर दिया और कहा, "जा, अपने कर्मों का फल भोग। देखें, भाग्य के भरोसे तू क्या कर लेती है।"
पिता के कड़वे वचनों से सुमति का मन भर आया। वह सोचती रही कि उसके भाग्य में ऐसा दुख क्यों लिखा था। फिर वह अपने पति के साथ वन की ओर चली गई। वह वन सुनसान और डरावना था, चारों ओर कुश उगी थी। वहाँ दोनों ने वह रात बड़े कष्ट में काटी।
उस दुखी बेटी की दशा देखकर, उसके पिछले जन्म के पुण्य के प्रभाव से, देवी भगवती वहाँ प्रकट हुईं और बोलीं, "हे ब्राह्मणी, मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। जो चाहे, वर माँग।" सुमति ने हाथ जोड़कर पूछा, "आप कौन हैं?" देवी ने कहा, "मैं आदि शक्ति भगवती हूँ। मैं ही ब्रह्मविद्या हूँ और मैं ही सरस्वती। प्रसन्न होने पर मैं प्राणियों का दुख दूर करके उन्हें सुख देती हूँ।"
फिर देवी ने बताया, "मैं तुझ पर तेरे पिछले जन्म के पुण्य से प्रसन्न हूँ। पिछले जन्म में तू एक निषाद (भील) की पतिव्रता पत्नी थी। एक दिन तेरे पति ने चोरी की। सिपाहियों ने तुम दोनों को पकड़कर कैद में डाल दिया और खाने को कुछ नहीं दिया। वे नवरात्र के दिन थे। नौ दिन तक तूने न कुछ खाया, न पानी पिया। इस तरह अनजाने में ही तेरा नवरात्र का व्रत हो गया। उसी व्रत के प्रभाव से मैं तुझे मनचाहा वर देती हूँ।"
सुमति ने प्रणाम करके कहा, "माँ, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे पति का कोढ़ दूर कर दीजिए।" देवी बोलीं, "उन दिनों तूने जो व्रत किया था, उसमें से एक दिन का पुण्य अपने पति के लिए अर्पण कर दे। उस पुण्य से वह रोग से मुक्त हो जाएगा।" सुमति ने प्रसन्न होकर "तथास्तु" कहा, और उसी क्षण देवी की कृपा से उसके पति का शरीर रोग से मुक्त होकर तेज से चमक उठा।
पति का सुंदर रूप देखकर सुमति देवी की स्तुति करने लगी: "हे दुर्गे, आप दुर्गति को दूर करने वाली हैं, तीनों लोकों का ताप हरने वाली, रोगी को निरोग करने वाली और दुष्टों का नाश करने वाली जगत की माता हैं। मेरे पिता ने मेरा विवाह एक रोगी से करके मुझे घर से निकाल दिया था, और मैं वन में भटक रही थी। आपने ही मुझे इस विपदा से उबारा है। मैं आपको प्रणाम करती हूँ; मेरी रक्षा कीजिए।"
यह स्तुति सुनकर देवी बहुत प्रसन्न हुईं और बोलीं, "तेरे घर जल्दी ही उदालय नाम का पुत्र जन्म लेगा, जो बहुत बुद्धिमान, धनवान, यशस्वी और जितेंद्रिय होगा।" फिर देवी ने कहा कि और जो चाहे माँग ले। सुमति ने विनती की, "माँ, यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे नवरात्र व्रत की विधि और उसका फल विस्तार से बताइए।" तब देवी ने उसे व्रत की विधि बताई, जो आगे दी गई है।
देवी ने सुमति को जो व्रत-विधि बताई
कथा का अंतिम भाग, उसी पाठ के अनुसार (अमर उजाला 2020, संस्कृत सुभाषित)। यह कथा में कही गई विधि है; व्रत अपनी कुल-परंपरा और अपने पुरोहित की सलाह से करें।
देवी ने कहा: आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नौ दिन तक विधि से व्रत करो; पूरे दिन का उपवास न हो सके तो एक समय भोजन करो। विद्वान ब्राह्मणों से पूछकर घट (कलश) की स्थापना करो, और अन्न बोकर एक छोटी वाटिका बनाओ, जिसे रोज़ जल से सींचो।
महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की मूर्तियाँ स्थापित करके रोज़ विधि से उनकी पूजा करो, और फूलों से अर्घ्य दो। कथा फलों से अर्घ्य देने का फल भी बताती है: बिजौरे से रूप, जायफल से कीर्ति, दाख (अंगूर) से काम में सफलता, आँवले से सुख और केले से आभूषण।
व्रत पूरा होने पर नौवें दिन विधि से हवन करो। हवन में खांड, घी, गेहूँ, शहद, जौ, तिल, बेल, नारियल, दाख और कदंब लिए जाते हैं। कथा के अनुसार गेहूँ की आहुति से लक्ष्मी, खीर और चंपा के फूलों से धन, बेलपत्र से तेज और सुख, आँवले से कीर्ति, केले से पुत्र, कमल से राज-सम्मान और दाख से संपदा मिलती है; और खांड, घी, नारियल, शहद, जौ, तिल और फलों की आहुति से मनचाही वस्तु।
हवन के बाद आचार्य को विनम्रता से प्रणाम करो और यज्ञ की पूर्णता के लिए उन्हें दक्षिणा दो। देवी ने कहा कि इस विधि से व्रत करने वाले के मनोरथ पूरे होते हैं, इन नौ दिनों में दिए दान का फल करोड़ों गुना होता है, और यह व्रत अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है। यह व्रत तीर्थ में, मंदिर में या घर पर, कहीं भी किया जा सकता है।
इतना कहकर देवी अंतर्धान हो गईं। ब्रह्मा जी ने बृहस्पति से कहा कि जो स्त्री या पुरुष भक्ति से यह व्रत करता है, वह इस लोक में सुख पाता है और अंत में दुर्लभ मोक्ष पाता है। बृहस्पति जी ने आनंदित होकर उनका आभार माना। ब्रह्मा जी बोले, "ये भगवती शक्ति सब लोकों का पालन करती हैं; इन महादेवी की महिमा को कौन जान सकता है?" कथा "बोलो देवी भगवती की जय" के साथ पूरी होती है।
कथा के अलग-अलग रूप
- नाम: अमर उजाला वाले पाठ और टाइम्स नाउ नवभारत में ब्राह्मण का नाम पीठत है, और नगर का नाम मनोहर नगर केवल अमर उजाला वाले पाठ में है। श्री मंदिर और हिंदूपैड में पीठत नगर का नाम है और ब्राह्मण का नाम सुनाथ। वेबदुनिया ब्राह्मण या नगर का नाम नहीं देता, केवल सुमति का।
- पिता का क्रोध: श्री मंदिर और हिंदूपैड में पिता को लगता है कि सुमति पूजा से अधिक अपने रूप-श्रृंगार में मन लगाती है। वेबदुनिया में सुमति पिता की बात सहर्ष मान लेती है; श्री मंदिर में वह भगवती पर भरोसा रखती है; हिंदूपैड में वह कहती है कि दुर्गा माँ उसकी रक्षा करेंगी, और पिता इसे ढिठाई मानते हैं।
- वन की रात: वेबदुनिया के अनुसार पति का कोई घर नहीं था, इसलिए सुमति ने वन में घास के आसन पर रात काटी। श्री मंदिर और हिंदूपैड में रात भर देवी का ध्यान और पूजन होता है, और देवी उसी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट होती हैं।
- पिछला जन्म: अमर उजाला वाले पाठ में सुमति "निषाद (भील)" की पत्नी थी, वेबदुनिया में भील की और टाइम्स नाउ नवभारत में निषाद की। श्री मंदिर में पति-पत्नी दोनों निषाद थे, वह नवरात्र आश्विन का था, और पति का इस जन्म का रोग उसी चोरी का फल बताया गया है।
- रोग का दूर होना: एक दिन का पुण्य अर्पण करने की बात अमर उजाला वाले पाठ, टाइम्स नाउ नवभारत और हिंदूपैड में है; वेबदुनिया और श्री मंदिर में देवी सीधे पति को रोगमुक्त कर देती हैं। वेबदुनिया की कथा यहीं पूरी हो जाती है।
- पुत्र: अमर उजाला वाले पाठ और टाइम्स नाउ नवभारत में पुत्र का नाम उदालय है, श्री मंदिर और हिंदूपैड में उद्दालक। हिंदूपैड के अनुसार बाकी आठ दिनों के पुण्य से समृद्धि और पुत्र मिलते हैं; श्री मंदिर में पुत्र का जन्म होता है और परिवार हर वर्ष नवरात्र का व्रत रखता है।
- आरंभ और विधि: बृहस्पति और ब्रह्मा के संवाद वाला आरंभ वेबदुनिया और टाइम्स नाउ नवभारत में नहीं है। कथा के आरंभ में चैत्र और आश्विन दोनों नवरात्रों की बात है, पर देवी की बताई विधि में केवल आश्विन का नाम है।
- दूसरी कथाएँ: कुछ व्रत-कथा पुस्तिकाएँ "नवरात्र व्रत कथा" शीर्षक के नीचे दुर्गा सप्तशती की सुरथ-समाधि-मेधा वाली कथा छापती हैं, और वेबदुनिया महिषासुर-वध और श्रीराम की नौ दिन की देवी-पूजा को अलग कथाओं के रूप में देता है। ये सुमति की कथा से अलग हैं।
कथा के बाद
कथा "बोलो देवी भगवती की जय" के साथ पूरी होती है। अपने शहर का घटस्थापना मुहूर्त, नवदुर्गा के नौ रूप और नवरात्रि की तारीखें नवरात्रि के पन्ने पर हैं।
दुर्गा जी की आरती: जय अम्बे गौरीअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नवरात्रि व्रत कथा कब पढ़ें?
कथा के आरंभ में ही कहा गया है कि नवरात्र में दस दिन तक परिवार-जनों के साथ यह कथा सुनी जाए। संस्कृत सुभाषित पर छपी विधि इसे स्नान के बाद, मंदिर में या घर पर, पढ़ने को कहती है। समय अपनी कुल-परंपरा के अनुसार रखा जाता है।
क्या सुमति की कथा किसी पुराण में है?
जिन ग्रंथों को हमने जाँचा, उनमें नहीं। देवी भागवत पुराण (3.26–28) में नवरात्र व्रत की कथा कोसल के वैश्य सुशील की है, और दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 81–93) में राजा सुरथ और वैश्य समाधि की। गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" में भी सुमति की कथा नहीं है। इसे परंपरा में प्रचलित व्रत कथा के रूप में पढ़ा जाता है।
दुर्गा सप्तशती और नवरात्रि व्रत कथा में क्या अंतर है?
दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) मार्कण्डेय पुराण के अध्याय 81–93 हैं: राजा सुरथ, वैश्य समाधि और मेधा ऋषि का संवाद, और देवी के तीन चरित्र। गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" नवरात्र में इसके पाठ को मुख्य बताती है। सुमति की कथा उससे अलग, लोक में प्रचलित व्रत कथा है। कुछ पुस्तिकाएँ सुरथ और समाधि की कथा को ही "नवरात्र व्रत कथा" के नाम से छापती हैं।
पूरे नौ दिन व्रत न हो सके तो क्या करें?
कथा कहती है कि पूरे दिन का उपवास न हो सके तो एक समय भोजन करें। गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" के अनुसार पूरे नवरात्र का व्रत न हो सके तो सप्तरात्र (प्रतिपदा से सप्तमी), पंचरात्र, त्रिरात्र (सप्तमी, अष्टमी, नवमी), युग्मरात्र (पहला और अंतिम दिन) या एकरात्र (पहला या अंतिम दिन) के रूप में भी व्रत किया जाता है। अपनी सेहत और कुल-परंपरा देखकर, और ज़रूरत हो तो अपने पुरोहित से पूछकर, निर्णय लें।
स्रोत
- अमर उजाला: नवरात्रि 2020, संपूर्ण देवी कथा (योगेश जोशी, 25 मार्च 2020); नवरात्रि 2019, संपूर्ण देवी कथा (विनोद शुक्ला, 21 सितंबर 2019)
- संस्कृत सुभाषित (sanskritsubhashita.com): श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा (2019)
- टाइम्स नाउ नवभारत: नवरात्रि 2024 व्रत कथा (लविना शर्मा, 11 अक्टूबर 2024)
- वेबदुनिया (hindi.webdunia.com): नवरात्रि व्रत की प्रामाणिक कथाएं
- श्री मंदिर (srimandir.com): नवरात्रि व्रत एवं परंपरा (25 सितंबर 2025)
- हिंदूपैड (hindupad.com): Navratri Vrat Katha and Pujan Vidhi
- देवी भागवत पुराण 3.26–28 (स्वामी विज्ञानानंद का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org पर जाँचा)
- गीता प्रेस, व्रत-परिचय (पं. हनुमान शर्मा, पुस्तक सं. 610), पृ. 62–65 और 134–137: नवरात्र
- मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 81–93 (देवी माहात्म्य / दुर्गा सप्तशती)
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