एकादशी का व्रत दशमी की दोपहर के एक भोजन से शुरू होकर द्वादशी के पारण तक चलता है। नारद पुराण दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन न करने को कहता है, और धर्मसिन्धु पूरा उपवास न कर सकने वाले के लिए केवल जल, दूध, फल या एक समय भोजन का विकल्प देता है। प्रचलित फलाहार में फल, दूध, मेवे, साबूदाना, सिंघाड़ा और आलू सेंधा नमक के साथ लिए जाते हैं; अन्न, खासकर चावल, नहीं। पारण द्वादशी को हरि वासर बीतने के बाद, द्वादशी रहते होता है।
अगली एकादशी
पापांकुशा एकादशी, गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026। पारण 23 अक्टूबर, 6:27–8:42 AM (नई दिल्ली)।
शास्त्र किसी ग्रंथ में पढ़ा गया नियम, ग्रंथ और स्थान के साथ। परंपरा लोक प्रथा, जैसा स्रोत बताते हैं; अपने परिवार की रीति से मिलाएँ।
व्रत के नियम
दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं शास्त्र
नारद पुराण (उत्तरभाग 3.17) कहता है: “एकादश्यां न भोक्तव्यं पक्षयोरुभयोरपि”, यानी शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। उसी अध्याय में राजा रुक्मांगद ढोल बजवाकर यही घोषणा करवाते हैं: हरि के दिन भोजन न करें (3.29)।
स्रोत: नारद पुराण, उत्तरभाग 3.17 और 3.29 (एकादशी), संस्कृत विकिस्रोत; नारदीय महापुराण (संस्कृत), नाग पब्लिशर्स संस्करण
तीन दिन का व्रत: दशमी से द्वादशी शास्त्र
धर्मसिन्धु के अनुसार व्रत दशमी से शुरू होता है: दशमी को सुबह संकल्प लेकर दोपहर में एक ही बार भोजन (एकभक्त) करें और रात भूमि पर सोएँ। ‘व्रत-परिचय’ दशमी और द्वादशी दोनों दिन हविष्यान्न का एक बार भोजन बताती है: जौ, गेहूँ, मूँग, सेंधा नमक, काली मिर्च, शक्कर और गाय का घी।
स्रोत: धर्मसिन्धु (काशीनाथ उपाध्याय), खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई 1907: परिच्छेद 1 (एकादशी, पृ. 15–17), परिच्छेद 2 (नवरात्र, पृ. 78–81); धर्मसिन्धु, वसिष्ठदत्त मिश्र की हिंदी व्याख्या सहित, चौखम्बा संस्कृत सीरीज़, वाराणसी; गीता प्रेस, व्रत-परिचय, पृ. 49–52 (एकादशी व्रत) और 96–97 (निर्जला)
एकादशी का दिन: संकल्प, पूजा और जागरण शास्त्र
एकादशी की सुबह स्नान के बाद निराहार रहकर अगले दिन भोजन करने का संकल्प लें, भगवान विष्णु की पूजा करें और रात में कथा, स्तोत्र या भजन के साथ जागरण करें। धर्मसिन्धु इस दिन ब्रह्मचर्य, सच बोलने और दिन में न सोने का नियम देता है।
स्रोत: धर्मसिन्धु (काशीनाथ उपाध्याय), खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई 1907: परिच्छेद 1 (एकादशी, पृ. 15–17), परिच्छेद 2 (नवरात्र, पृ. 78–81); धर्मसिन्धु, वसिष्ठदत्त मिश्र की हिंदी व्याख्या सहित, चौखम्बा संस्कृत सीरीज़, वाराणसी; गीता प्रेस, व्रत-परिचय, पृ. 49–52 (एकादशी व्रत) और 96–97 (निर्जला)
निर्जल या फलाहार: अपनी सामर्थ्य से शास्त्र
धर्मसिन्धु पूरा उपवास न कर सकने वाले के लिए संकल्प के चार रूप देता है: केवल जल, केवल दूध, केवल फल, या दिन में एक बार (नक्त) भोजन। Drik Panchang भी यही चार प्रकार गिनाता है: जलाहार, क्षीरभोजी, फलाहारी और नक्तभोजी।
स्रोत: धर्मसिन्धु (काशीनाथ उपाध्याय), खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई 1907: परिच्छेद 1 (एकादशी, पृ. 15–17), परिच्छेद 2 (नवरात्र, पृ. 78–81); धर्मसिन्धु, वसिष्ठदत्त मिश्र की हिंदी व्याख्या सहित, चौखम्बा संस्कृत सीरीज़, वाराणसी; Drik Panchang: एकादशी व्रत आहार
निर्जला एकादशी शास्त्र
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी निर्जला कहलाती है। ‘व्रत-परिचय’ हेमाद्रि में उद्धृत महाभारत के व्यास-वचन के आधार पर बताती है कि इस दिन आचमन के सिवा जल भी नहीं लिया जाता, और अगले दिन स्नान व दान के बाद भोजन होता है।
स्रोत: गीता प्रेस, व्रत-परिचय, पृ. 49–52 (एकादशी व्रत) और 96–97 (निर्जला)
स्वास्थ्य पहले
गर्भावस्था, बीमारी, बढ़ती उम्र या नियमित दवा हो तो कठिन या निर्जल व्रत अपने डॉक्टर और परिवार के बड़ों से पूछकर ही रखें। व्रत भाव से होता है; सामर्थ्य के अनुसार हल्का नियम लेना भी व्रत ही है।
क्या खाएँ (फलाहार)
ग्रंथ एकादशी पर भोजन न करने को कहते हैं और असमर्थ के लिए जल, दूध या फल का विकल्प देते हैं। आज फलाहार में जो चीज़ें खाई जाती हैं, वे प्रचलित रीति हैं।
फल, दूध और मेवे परंपरा
फलाहार में मौसमी फल (आम, अंगूर, केला आदि), बादाम-पिस्ता जैसे मेवे, और क्षीर व्रत में दूध से बनी चीज़ें ली जाती हैं। Drik Panchang फलाहार में पत्तेदार साग न लेने की बात कहता है; धर्मसिन्धु भी व्रत के दिनों में शाक वर्जित करता है।
स्रोत: Drik Panchang: एकादशी व्रत आहार; धर्मसिन्धु (काशीनाथ उपाध्याय), खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई 1907: परिच्छेद 1 (एकादशी, पृ. 15–17), परिच्छेद 2 (नवरात्र, पृ. 78–81)
एक समय के फलाहारी भोजन में परंपरा
Drik Panchang के अनुसार एक समय (नक्त) के भोजन में प्रायः साबूदाना, सिंघाड़ा, शकरकंद, आलू और मूँगफली होते हैं। कुट्टू का आटा और सामक (समा) के चावल भी बहुत लोग खाते हैं, पर Drik इन्हें अर्ध-अन्न मानकर इन पर मतभेद बताता है; अपनी परंपरा के अनुसार चुनें।
सेंधा नमक शास्त्र
जहाँ नमक लिया जाता है, वहाँ सेंधा नमक चलता है। ‘व्रत-परिचय’ दशमी और द्वादशी के हविष्यान्न में सेंधा नमक गिनाती है।
स्रोत: गीता प्रेस, व्रत-परिचय, पृ. 49–52 (एकादशी व्रत) और 96–97 (निर्जला)
क्या न खाएँ
अन्न: चावल, गेहूँ, दालें परंपरा
एकादशी पर अन्न नहीं खाया जाता। प्रचलित रीति में चावल का निषेध सबसे अधिक माना जाता है, और Drik Panchang गेहूँ, चावल, दालें और सेम जैसी फलियाँ भी वर्जित गिनाता है। चावल से जोड़ी जाने वाली कथाएँ (जैसे महर्षि मेधा की) हमें किसी ग्रंथ में नहीं मिलीं, इसलिए यहाँ नहीं लिखीं।
स्रोत: Drik Panchang: एकादशी व्रत आहार; वेबदुनिया, एकादशी पर चावल क्यों नहीं, 10 जुलाई 2019; नारद पुराण, उत्तरभाग 3.17 और 3.29 (एकादशी), संस्कृत विकिस्रोत
दशमी से द्वादशी तक ये चीज़ें नहीं शास्त्र
धर्मसिन्धु और ‘व्रत-परिचय’ दोनों व्रत के दिनों में काँसे के बर्तन, मसूर, चना, शाक, शहद, तेल, बहुत पानी पीना, झूठ, जुआ और मैथुन वर्जित करते हैं। धर्मसिन्धु इनके साथ मांस, दूसरी बार भोजन, अधिक भोजन, दिन में सोना, कोदो, दूसरे का अन्न और पान भी गिनाता है।
स्रोत: धर्मसिन्धु (काशीनाथ उपाध्याय), खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई 1907: परिच्छेद 1 (एकादशी, पृ. 15–17), परिच्छेद 2 (नवरात्र, पृ. 78–81); धर्मसिन्धु, वसिष्ठदत्त मिश्र की हिंदी व्याख्या सहित, चौखम्बा संस्कृत सीरीज़, वाराणसी; गीता प्रेस, व्रत-परिचय, पृ. 49–52 (एकादशी व्रत) और 96–97 (निर्जला)
पारण: व्रत कैसे खोलें
द्वादशी को, हरि वासर के बाद शास्त्र
पारण अगले दिन द्वादशी को होता है। धर्मसिन्धु के अनुसार द्वादशी का पहला चौथाई भाग ‘हरि वासर’ कहलाता है; उसे बीत जाने दें और द्वादशी रहते ही पारण कर लें। इस पन्ने पर और हर एकादशी के पन्ने पर पारण का समय इसी नियम से निकाला गया है।
स्रोत: धर्मसिन्धु (काशीनाथ उपाध्याय), खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई 1907: परिच्छेद 1 (एकादशी, पृ. 15–17), परिच्छेद 2 (नवरात्र, पृ. 78–81); धर्मसिन्धु, वसिष्ठदत्त मिश्र की हिंदी व्याख्या सहित, चौखम्बा संस्कृत सीरीज़, वाराणसी
पूजा के बाद, भगवान का प्रसाद लेकर शास्त्र
द्वादशी को फिर पूजा करके पारण करें। धर्मसिन्धु भगवान को अर्पित नैवेद्य, तुलसी मिलाकर, उससे पारण करने को कहता है, और ‘व्रत-परिचय’ के अनुसार कोई संकट हो तो केवल जल पीकर भी पारण किया जा सकता है।
स्रोत: धर्मसिन्धु (काशीनाथ उपाध्याय), खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई 1907: परिच्छेद 1 (एकादशी, पृ. 15–17), परिच्छेद 2 (नवरात्र, पृ. 78–81); गीता प्रेस, व्रत-परिचय, पृ. 49–52 (एकादशी व्रत) और 96–97 (निर्जला)
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?
जो पूरा उपवास न कर सकें, उनके लिए ग्रंथ जल, दूध, फल या एक समय भोजन का विकल्प देते हैं। प्रचलित फलाहार में फल, दूध, मेवे, और एक समय के भोजन में साबूदाना, सिंघाड़ा, शकरकंद, आलू और मूँगफली, सेंधा नमक के साथ।
एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?
नारद पुराण (उत्तरभाग 3.17) एकादशी पर भोजन ही न करने को कहता है; चावल न खाना इसी नियम की सबसे प्रचलित पहचान बन गया है। चावल से जुड़ी जो कथाएँ सुनाई जाती हैं, वे हमें किसी ग्रंथ में नहीं मिलीं।
एकादशी का पारण कब करें?
अगले दिन द्वादशी को, हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई) बीतने के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले। हर एकादशी का पारण समय एकादशी की सूची में है।
दशमी के दिन क्या नियम है?
धर्मसिन्धु के अनुसार दशमी को दोपहर में एक ही बार भोजन करें, उसके बाद भोजन न करें, और रात भूमि पर सोएँ। काँसे के बर्तन, मसूर, चना, शहद, तेल और शाक से बचें।
बीमार या बुज़ुर्ग एकादशी कैसे रखें?
धर्मसिन्धु असमर्थ व्यक्ति के लिए केवल जल, केवल दूध, केवल फल या एक समय भोजन का संकल्प बताता है। डॉक्टर की सलाह से वही नियम लें जो स्वास्थ्य के लिए ठीक हो।
स्रोत
- नारद पुराण, उत्तरभाग 3.17 और 3.29 (एकादशी), संस्कृत विकिस्रोत
- नारदीय महापुराण (संस्कृत), नाग पब्लिशर्स संस्करण
- धर्मसिन्धु (काशीनाथ उपाध्याय), खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई 1907: परिच्छेद 1 (एकादशी, पृ. 15–17), परिच्छेद 2 (नवरात्र, पृ. 78–81)
- धर्मसिन्धु, वसिष्ठदत्त मिश्र की हिंदी व्याख्या सहित, चौखम्बा संस्कृत सीरीज़, वाराणसी
- गीता प्रेस, व्रत-परिचय, पृ. 49–52 (एकादशी व्रत) और 96–97 (निर्जला)
- Drik Panchang: एकादशी व्रत आहार
- वेबदुनिया, एकादशी पर चावल क्यों नहीं, 10 जुलाई 2019
- तारीखें और समय: SanatanBodh पंचांग गणना, Drik Panchang से मिलान (नई दिल्ली)
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