आरतीविष्णु

ॐ जय जगदीश हरे

रचना: पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (श्रद्धाराम शर्मा)

परंपरा में: गुरुवार

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चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा के सामने घर में आरती करता परिवार, तुलसी और फल
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

    हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो। आप भक्तों और सेवकों के संकट पल भर में दूर कर देते हैं।

  2. पद 2

    जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का, स्वामी दुख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

    जो आपका ध्यान करता है, उसे फल मिलता है और मन का दुख मिट जाता है। घर में सुख और संपत्ति आती है और शरीर के कष्ट मिटते हैं।

  3. पद 3

    मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥

    आप ही मेरे माता-पिता हैं; आपको छोड़कर मैं किसकी शरण लूँ? आपके सिवा कोई दूसरा नहीं, जिससे मैं आशा रखूँ।

  4. पद 4

    तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥

    आप पूर्ण परमात्मा हैं और सबके मन की बात जानने वाले (अंतर्यामी) हैं। आप परब्रह्म परमेश्वर और सबके स्वामी हैं।

  5. पद 5

    तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥

    आप करुणा के सागर और सबका पालन करने वाले हैं। मैं मूर्ख, दोषों और कामनाओं से भरा हूँ; मैं सेवक हूँ और आप स्वामी हैं। हे पालनहार, मुझ पर कृपा कीजिए।

  6. पद 6

    तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति। किस विधि मिलूँ दयामय, किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥

    आप एक हैं, इंद्रियों की पहुँच से परे (अगोचर) हैं और सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मैं अल्पबुद्धि आपसे किस तरह मिलूँ?

  7. पद 7

    दीनबन्धु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी ठाकुर तुम मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

    आप दीनों के बंधु और दुख हरने वाले हैं, आप ही मेरे ठाकुर (स्वामी) हैं। अपना हाथ बढ़ाइए और मुझे अपनी शरण में ले लीजिए; मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।

  8. पद 8

    विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा। श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

    हे देव, इंद्रिय-विषयों से उपजे विकार मिटाइए और मेरे पाप हर लीजिए। मेरी श्रद्धा, भक्ति और संतों की सेवा का भाव बढ़ाइए।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/om-jai-jagdish-hare/

संक्षेप में

“ॐ जय जगदीश हरे” भगवान विष्णु (जगदीश, हरि) की आरती है, जिसे पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (श्रद्धाराम शर्मा) ने 19वीं शताब्दी में पंजाब में लिखा। यह उत्तर भारत की सबसे प्रचलित आरतियों में से एक है। विष्णु पूजा, सत्यनारायण कथा और एकादशी पर, और बहुत से घरों में प्रतिदिन की पूजा के अंत में इसे गाया जाता है।

यहाँ वह रूप दिया गया है जिसमें आरती आमतौर पर गाई जाती है, दोहराई जाने वाली पंक्तियों सहित। कुछ संस्करणों में शब्द थोड़े अलग मिलते हैं, जैसे पद 5 में ‘मैं मूरख खल कामी’ की जगह ‘मैं मूरख फलकामी’, पद 7 में ‘स्वामी रक्षक तुम मेरे’ और ‘अपने शरण लगाओ’। कुछ संस्करणों में अंत में एक पद और मिलता है: ‘श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥’ गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

“ॐ जय जगदीश हरे” किसने लिखी?

पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (श्रद्धाराम शर्मा, 1837 से 1881) ने, जो पंजाब के फिल्लौर के विद्वान, लेखक और कथावाचक थे। प्रचलित जानकारी के अनुसार उन्होंने इसे लगभग 1870 में लिखा।

यह आरती किस देवता की है?

भगवान विष्णु की। ‘जगदीश’ (जगत के ईश) और ‘हरि’ विष्णु के नाम हैं। फिर भी इसे बहुत-सी अन्य पूजाओं के अंत में भी गाया जाता है।

इस आरती में कितने पद हैं?

प्रचलित पाठ में आठ पद हैं। कुछ संस्करणों में अंत में एक पद और जुड़ा मिलता है।

श्रद्धाराम फिल्लौरी ने और क्या लिखा?

आरती के अलावा उन्होंने गद्य भी लिखा। उनका उपन्यास ‘भाग्यवती’ हिंदी के आरंभिक उपन्यासों में गिना जाता है।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. रचयिता: पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (19वीं शताब्दी)

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पाठ का मिलान: bhaktibharat.com, vignanam.org, drikpanchang.com, hi.wikipedia.org