विज्ञापन
ॐ जय जगदीश हरे PDF डाउनलोड करें
विज्ञापन
अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/om-jai-jagdish-hare/
“ॐ जय जगदीश हरे” भगवान विष्णु (जगदीश, हरि) की आरती है, जिसे पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (श्रद्धाराम शर्मा) ने 19वीं शताब्दी में पंजाब में लिखा। यह उत्तर भारत की सबसे प्रचलित आरतियों में से एक है। विष्णु पूजा, सत्यनारायण कथा और एकादशी पर, और बहुत से घरों में प्रतिदिन की पूजा के अंत में इसे गाया जाता है।
यहाँ वह रूप दिया गया है जिसमें आरती आमतौर पर गाई जाती है, दोहराई जाने वाली पंक्तियों सहित। कुछ संस्करणों में शब्द थोड़े अलग मिलते हैं, जैसे पद 5 में ‘मैं मूरख खल कामी’ की जगह ‘मैं मूरख फलकामी’, पद 7 में ‘स्वामी रक्षक तुम मेरे’ और ‘अपने शरण लगाओ’। कुछ संस्करणों में अंत में एक पद और मिलता है: ‘श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥’ गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है।
आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
हर सुबह तिथि, राहु काल और आने वाले व्रत-त्योहार, WhatsApp पर एक छोटे संदेश में।चैनल फ़ॉलो करें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
“ॐ जय जगदीश हरे” किसने लिखी?
पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (श्रद्धाराम शर्मा, 1837 से 1881) ने, जो पंजाब के फिल्लौर के विद्वान, लेखक और कथावाचक थे। प्रचलित जानकारी के अनुसार उन्होंने इसे लगभग 1870 में लिखा।
यह आरती किस देवता की है?
भगवान विष्णु की। ‘जगदीश’ (जगत के ईश) और ‘हरि’ विष्णु के नाम हैं। फिर भी इसे बहुत-सी अन्य पूजाओं के अंत में भी गाया जाता है।
इस आरती में कितने पद हैं?
प्रचलित पाठ में आठ पद हैं। कुछ संस्करणों में अंत में एक पद और जुड़ा मिलता है।
श्रद्धाराम फिल्लौरी ने और क्या लिखा?
आरती के अलावा उन्होंने गद्य भी लिखा। उनका उपन्यास ‘भाग्यवती’ हिंदी के आरंभिक उपन्यासों में गिना जाता है।
स्रोत
- परंपरागत आरती पाठ
- रचयिता: पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (19वीं शताब्दी)
कुछ गलत लगा? गलती बताएँ
पाठ का मिलान: bhaktibharat.com, vignanam.org, drikpanchang.com, hi.wikipedia.org
