व्रत और पर्व

देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) 2026 कब है: 20 नवंबर

शुक्रवार, 20 नवंबर 2026

कार्तिक शुक्ल एकादशी

44 दिन बाद
देवउठनी एकादशी: गन्ने के मंडप के नीचे लाल चुनरी ओढ़े तुलसी चौरा, चारों ओर जलते दीये और रंगोली
चित्र: AI से बनाया गया

व्रत और पारण का समय

पारण (व्रत खोलना)द्वादशी को, हरि वासर के बाद
1:11–3:18 PM (21 नव॰)
हरि वासर समाप्त
12:09 PM (21 नव॰)
एकादशी तिथि
7:17 AM से 6:33 AM (21 नव॰) तक
द्वादशी समाप्त
4:58 AM (22 नव॰)

पारण का समय व्रत की अगली तिथि (द्वादशी) का है; तारीख़ कोष्ठक में दी गई है। वैष्णव (गौण) एकादशी कभी-कभी अगले दिन पड़ती है।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 के लिए, भारतीय मानक समय में, चुने हुए शहर के सूर्योदय, सूर्यास्त और ग्रह-स्थिति से। अलग-अलग पंचांगों में 1–2 मिनट का अंतर सामान्य है। गणना कैसे होती है

संक्षेप में

देवउठनी एकादशी 2026 में 20 नवंबर, शुक्रवार को है। यह कार्तिक शुक्ल एकादशी है, जिसे प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं। परंपरा के अनुसार देवशयनी एकादशी से योगनिद्रा में गए भगवान विष्णु इस दिन जागते हैं, और चार महीने का चातुर्मास पूरा होता है। व्रत का पारण अगली सुबह द्वादशी में होता है; अपने शहर का समय नीचे देखें।

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

एक नज़र में

तिथि
कार्तिक शुक्ल एकादशी
अन्य नाम
प्रबोधिनी, देवोत्थान, हरि प्रबोधिनी, कार्तिकी एकादशी
आराध्य
भगवान विष्णु (शालग्राम रूप में भी)
महत्व
विष्णु का योगनिद्रा से जागना; चातुर्मास का समापन
व्रत
एकादशी को अन्न नहीं; पारण अगले दिन द्वादशी में
तुलसी विवाह
कई परंपराओं में द्वादशी को, कुछ में एकादशी को
इसके बाद
विवाह आदि मांगलिक कार्यों के मुहूर्त फिर शुरू
महाराष्ट्र
पंढरपुर में विट्ठल की कार्तिकी एकादशी यात्रा

चातुर्मास: योगनिद्रा से जागरण

आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी (हरिशयनी) एकादशी कहते हैं। परंपरा के अनुसार उस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में जाते हैं, और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। बीच के लगभग चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं। इस अवधि में उत्तर भारत की परंपरा में विवाह, गृहप्रवेश और मुंडन जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते, और संन्यासी एक स्थान पर रहकर साधना करते हैं। देवउठनी एकादशी के साथ यह अवधि पूरी होती है।

शेषशायी विष्णु

दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय में वर्णन है कि कल्प के अंत में, जब संसार एक समुद्र बन गया था, भगवान विष्णु शेषनाग को बिछाकर योगनिद्रा में थे (नीचे श्लोक देखें)।

दुर्गा सप्तशती, अध्याय 1

कार्तिक मास की महिमा

पद्म पुराण के उत्तर खंड के कार्तिक माहात्म्य में कार्तिक मास को स्नान, दीपदान और विष्णु-पूजा के लिए श्रेष्ठ बताया गया है। प्रबोधिनी एकादशी इसी मास के शुक्ल पक्ष में पड़ती है।

पद्म पुराण, उत्तर खंड (कार्तिक माहात्म्य)

तुलसी विवाह

देवउठनी एकादशी के साथ ही तुलसी विवाह का समय आता है। इसमें तुलसी के पौधे का विवाह शालग्राम (विष्णु का शिला-रूप) या श्रीकृष्ण की प्रतिमा से, विवाह की पूरी रीति से कराया जाता है: मंडप, कन्यादान, फेरे और भोज। कई परंपराओं में यह कार्तिक शुक्ल द्वादशी को होता है, कुछ में एकादशी को ही, और कई स्थानों पर एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के बीच किसी भी दिन। कई क्षेत्रों में गन्नों से मंडप बनाया जाता है, और तुलसी विवाह के बाद ही घर में विवाह के मुहूर्त शुरू माने जाते हैं।

एकादशी व्रत और पारण

एकादशी के व्रत में अन्न, विशेषकर चावल, नहीं खाया जाता; कई लोग निर्जल या फलाहार व्रत रखते हैं। व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद किया जाता है। प्रचलित पंचांगों के अनुसार द्वादशी का पहला चौथाई भाग (हरि वासर) पारण के लिए टाला जाता है, और द्वादशी बीतने से पहले पारण कर लेना चाहिए। कभी-कभी स्मार्त और वैष्णव परंपरा की एकादशी अलग-अलग दिन पड़ती है; अपनी परंपरा के अनुसार व्रत रखें।

राजा अंबरीष का द्वादशी व्रत

भागवत पुराण के अनुसार पारण के दिन ऋषि दुर्वासा अतिथि बनकर आए और स्नान करने चले गए। द्वादशी बीतने को थी, इसलिए ब्राह्मणों की सलाह से राजा अंबरीष ने केवल जल पीकर पारण किया, ताकि अतिथि का अनादर भी न हो और व्रत भी न टूटे। यह कथा द्वादशी में पारण के महत्व से जुड़ी है।

भागवत पुराण 9.4–9.5

पूजा विधि

  1. चरण 1

    संकल्प

    एकादशी की सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें; अपनी सामर्थ्य और स्वास्थ्य के अनुसार निर्जल या फलाहार व्रत।

  2. चरण 2

    विष्णु पूजा

    भगवान विष्णु या शालग्राम की पूजा करें: पंचामृत से स्नान, पीले वस्त्र, तुलसी दल, फूल, धूप-दीप और नैवेद्य।

  3. चरण 3

    देव उठाना

    शाम को आँगन या पूजा-स्थान पर चौक बनाकर गन्ना, सिंघाड़ा और शकरकंद जैसी मौसमी चीज़ें रखें; शंख, घंटा या थाली बजाकर प्रबोधन मंत्रों और "उठो देव" जैसे लोकगीतों से भगवान को जगाएँ (लोक परंपरा, विशेषकर उत्तर भारत)।

  4. चरण 4

    दीपदान और जागरण

    घर में और तुलसी के पास दीपक जलाएँ; कई परिवार रात में भजन-कीर्तन के साथ जागरण करते हैं।

  5. चरण 5

    तुलसी विवाह

    अपनी परंपरा के अनुसार उसी दिन या द्वादशी को तुलसी और शालग्राम का विवाह कराएँ।

  6. चरण 6

    पारण

    अगली सुबह द्वादशी में, हरि वासर बीतने के बाद, ऊपर दिए पारण के समय में व्रत खोलें।

कथा

तुलसी और शालग्राम

ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड की कथा के अनुसार राजा धर्मध्वज की पुत्री तुलसी ने भगवान नारायण को पति रूप में पाने के लिए तप किया, पर उनका विवाह पहले असुर शंखचूड़ से हुआ। तुलसी के पातिव्रत्य के कारण शंखचूड़ को कोई हरा नहीं पा रहा था। तब भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी का व्रत भंग किया, और शिव ने शंखचूड़ का वध किया। सच जानकर तुलसी ने विष्णु को पत्थर हो जाने का शाप दिया। विष्णु ने शाप स्वीकार किया और कहा कि तुलसी का शरीर गंडकी नदी बनेगा, उनके केश पवित्र तुलसी का पौधा बनेंगे, और वे स्वयं गंडकी के तट पर शालग्राम शिला के रूप में रहेंगे; तुलसी उन्हें सदा प्रिय रहेंगी। लोक में यही कथा जलंधर की पत्नी वृंदा के नाम से भी कही जाती है। इसी संबंध से तुलसी और शालग्राम के विवाह की परंपरा चली।

ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड; लोक परंपरापूरी कथा पढ़ें

श्लोक

योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते।आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः॥
कल्प के अंत में, जब संसार एक समुद्र में डूब गया था, तब भगवान विष्णु शेषनाग को बिछाकर योगनिद्रा में लीन हो गए।दुर्गा सप्तशती, अध्याय 1
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशंविश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यंवन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी, विश्व के आधार, आकाश जैसे व्यापक, मेघ जैसे श्याम और सुंदर अंगों वाले हैं, जो लक्ष्मी के पति, कमल-नयन और योगियों के ध्यान से प्राप्त होने वाले हैं, संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी उन विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।प्रचलित विष्णु ध्यान-श्लोक

देवउठनी एकादशी के रिश्ते

ज्ञान-ग्राफ़ में देखें

देवता, पात्र और ऋषि 3

पर्व 1

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देवउठनी एकादशी 2026 कब है?

20 नवंबर, शुक्रवार को। व्रत का पारण अगली सुबह द्वादशी में होगा।

देवउठनी एकादशी 20 नवंबर को है या 21 नवंबर को?

व्रत शुक्रवार, 20 नवंबर को है (Drik Panchang की स्मार्त तारीख), और पारण 21 नवंबर को, नई दिल्ली में 1:11–3:18 PM। वैष्णव परंपरा वाले परिवार गौण एकादशी 21 नवंबर को रखते हैं। एकादशी तिथि 20 नवंबर 7:17 AM से 21 नवंबर 6:33 AM तक है। तुलसी विवाह शनिवार, 21 नवंबर को है (Drik Panchang)।

पारण कब करें?

अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) बीतने पर। ऊपर अपने शहर का पारण समय देखें।

तुलसी विवाह कब है?

2026 में Drik Panchang के अनुसार शनिवार, 21 नवंबर को; कुछ परंपराओं में एकादशी (20 नवंबर) को ही। कई स्थानों पर एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी दिन तुलसी विवाह किया जाता है।

चातुर्मास क्या है?

देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल) से देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल) तक के लगभग चार महीने (अधिक मास पड़ने पर लगभग पाँच), जब परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं।

क्या देवउठनी एकादशी के बाद विवाह शुरू होते हैं?

हाँ, परंपरा में चातुर्मास के बाद विवाह के मुहूर्त फिर शुरू होते हैं। पर विवाह की तारीख पंचांग में शुद्ध मुहूर्त देखकर ही तय की जाती है।

एकादशी व्रत में क्या नहीं खाते?

अन्न, विशेषकर चावल। फल, दूध और व्रत में खाई जाने वाली चीज़ें ली जा सकती हैं; निर्जल व्रत अपनी सामर्थ्य और स्वास्थ्य के अनुसार रखें।

स्रोत

  1. दुर्गा सप्तशती, अध्याय 1 (विष्णु की योगनिद्रा)
  2. पद्म पुराण, उत्तर खंड (कार्तिक माहात्म्य)
  3. ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड (तुलसी और शंखचूड़ की कथा)
  4. भागवत पुराण 9.4–9.5 (अंबरीष का द्वादशी व्रत)
  5. लोक परंपरा
  6. मुहूर्त और चंद्रोदय: SanatanBodh पंचांग गणना, Drik Panchang (नई दिल्ली, 2026–27) से मिलान

कुछ गलत लगा? गलती बताएँ