प्रचलित परंपरा के अनुसार नवरात्रि 2026 के पहले दिन, 11 अक्टूबर को माँ शैलपुत्री को घी का भोग लगाया जाता है; उसके बाद हर दिन क्रम से शक्कर या मिश्री, दूध या खीर, मालपुआ, केला, शहद, गुड़ और नारियल, और नौवें दिन हलवा-पूरी और चना या तिल। इस बार आठवें और नौवें दिन की पूजा, माँ महागौरी और माँ सिद्धिदात्री की, दोनों 19 अक्टूबर को है।
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नौ दिन, नौ देवियाँ और उनके भोग
- पहला दिन (11 अक्टूबर), माँ शैलपुत्री: घी
- दूसरा दिन (12 अक्टूबर), माँ ब्रह्मचारिणी: शक्कर या मिश्री
- तीसरा दिन (13 अक्टूबर), माँ चंद्रघंटा: दूध या खीर
- चौथा दिन (14 अक्टूबर), माँ कूष्मांडा: मालपुआ
- पाँचवाँ दिन (15 अक्टूबर), माँ स्कंदमाता: केला
- छठा दिन (16 अक्टूबर), माँ कात्यायनी: शहद
- सातवाँ दिन (17 अक्टूबर), माँ कालरात्रि: गुड़
- आठवाँ दिन (19 अक्टूबर), माँ महागौरी: नारियल
- नौवाँ दिन (19 अक्टूबर), माँ सिद्धिदात्री: हलवा-पूरी और चना, या तिल
18 और 19 अक्टूबर
इस बार सप्तमी तिथि 17 और 18 अक्टूबर, दोनों दिन सूर्योदय पर है, इसलिए 18 अक्टूबर के लिए Drik Panchang किसी अलग देवी का नाम नहीं देता। 19 अक्टूबर को अष्टमी सुबह समाप्त होकर नवमी लग जाती है, और उसी दिन माँ महागौरी और माँ सिद्धिदात्री, दोनों की पूजा है; इसलिए दोनों के भोग उसी दिन आते हैं। जो परिवार नवमी 20 अक्टूबर को मनाते हैं, वे अपनी रीति से करें।
यह सूची कहाँ से आती है
देवी भागवत पुराण के आठवें स्कंध के 24वें अध्याय में नारायण नारद को देवी की पूजा की विधि बताते हैं, और उसमें हर तिथि का एक नैवेद्य है: प्रतिपदा को घी, द्वितीया को शक्कर, तृतीया को दूध, चतुर्थी को अपूप (पुआ), पंचमी को केला, षष्ठी को शहद, सप्तमी को गुड़, अष्टमी को नारियल, नवमी को लाजा (खील) और दशमी को काले तिल; चढ़ाने के बाद वही वस्तु ब्राह्मण को दी जाती है। पुराण ये नैवेद्य तिथि के अनुसार बताता है, देवी के नौ रूपों के नाम से नहीं। नवरात्रि के दिन प्रतिपदा से नवमी तक की तिथियाँ हैं, इसलिए पहले आठ दिन की प्रचलित सूची इससे मेल खाती है; नौवें दिन की सूचियाँ अलग-अलग हैं।
नौवें दिन ज़्यादातर अख़बारों की सूचियाँ हलवा, पूरी, चना और खीर बताती हैं, जो कन्या पूजन में भी बनता है; कुछ सूचियाँ तिल बताती हैं, जो पुराण में दशमी का नैवेद्य है। भोग हर घर में अपनी रीति से लगता है; परिवार की परंपरा अलग हो तो वही मानें।
अखंड ज्योति
अखंड का अर्थ है बिना टूटे। कई घरों में घटस्थापना के समय देवी के सामने एक बड़ा दीपक जलाया जाता है, जो नवरात्रि पूरी होने तक दिन-रात जलता रहता है; यही अखंड ज्योति है। यह हर घर में नहीं होती: जिन परिवारों में इसकी परंपरा है या जिन्होंने इसका संकल्प लिया है, वे इसे रखते हैं।
परंपरा में घी का दीपक देवी के दाईं ओर और तेल का बाईं ओर रखा जाता है, चौकी या थाली पर, हवा से बचाने के लिए काँच की चिमनी के साथ, और नौ दिन घर में कोई न कोई रहता है। ज्योति बुझ जाए तो देवी से क्षमा माँगकर उसे फिर जला दिया जाता है। पूरी जानकारी नवरात्रि के पन्ने पर है।
स्रोत
- भोग: प्रचलित परंपरा; वेबदुनिया, अमर उजाला, पंजाब केसरी, ईटीवी भारत, नवभारत लाइव और फ़्री प्रेस जर्नल की सूचियाँ (मिलान: docs/checks/navratri-bhog.md)
- देवी भागवत पुराण, स्कंध 8, अध्याय 24 (तिथि के अनुसार नैवेद्य; संस्कृत पाठ sanskritdocuments.org से)
- तारीखें: Drik Panchang, शारदीय नवरात्रि 2026, नई दिल्ली (मिलान: docs/checks/drik-navratri-2026.md)
- अखंड ज्योति: प्रचलित परंपरा; पत्रिका, ज़ी न्यूज़ हिंदी, टाइम्स नाउ नवभारत, इंडिया टीवी और आर्ट ऑफ़ लिविंग
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