आरतीदुर्गा

दुर्गा जी की आरती: जय अम्बे गौरी

परंपरा में: शुक्रवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 2 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
नवरात्रि में सिंहवाहिनी दुर्गा प्रतिमा के सामने पाँच बत्ती वाली आरती की थाली, लाल गुड़हल और कलश
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥

    हे अम्बे गौरी, हे श्यामा गौरी माँ, आपकी जय हो। विष्णु (हरि), ब्रह्मा और शिव दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।

  2. पद 2

    माँग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥

    आपकी माँग में सिंदूर शोभित है और माथे पर कस्तूरी का टीका है। आपके दोनों नेत्र उज्ज्वल हैं और चंद्रमा जैसा मुख सुंदर है।

  3. पद 3

    कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै। रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥

    आपका शरीर सोने जैसा दमकता है और आप लाल वस्त्र पहने हैं। आपके गले में लाल फूलों की माला सजी है।

  4. पद 4

    केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी॥

    आप सिंह पर विराजमान हैं और खड्ग (तलवार) और खप्पर धारण करती हैं। देवता, मनुष्य और मुनि आपकी सेवा करते हैं, और आप उनके दुख हरती हैं।

  5. पद 5

    कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥

    आपके कानों में कुंडल और नाक में मोती शोभित है। आपकी ज्योति करोड़ों चंद्रमाओं और सूर्यों के समान चमकती है।

  6. पद 6

    शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥

    आपने शुंभ और निशुंभ का नाश किया और महिषासुर का वध किया। ‘धूम्र विलोचन’ से धूम्रलोचन असुर का संकेत माना जाता है; आपके नेत्र दिन-रात दिव्य मद से भरे रहते हैं।

  7. पद 7

    चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥

    आपने चंड और मुंड का संहार किया और रक्तबीज (शोणितबीज) का नाश किया। मधु और कैटभ दोनों को मारकर देवताओं को निर्भय किया। ये सभी प्रसंग दुर्गा सप्तशती में आते हैं।

  8. पद 8

    ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम-निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥

    आप ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला (लक्ष्मी) रानी हैं। आगम और निगम (शास्त्र और वेद) आपका गुणगान करते हैं, और आप शिव की पटरानी हैं।

  9. पद 9

    चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥

    चौंसठ योगिनियाँ मंगल गीत गाती हैं और भैरव नृत्य करते हैं। ताल, मृदंग और डमरू बजते हैं।

  10. पद 10

    तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता। भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पति करता॥

    आप ही जगत की माता हैं और आप ही उसका भरण-पोषण करती हैं। आप भक्तों का दुख हरती हैं और उन्हें सुख और संपत्ति देती हैं।

  11. पद 11

    भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी॥

    आपकी चार भुजाएँ अत्यंत सुंदर हैं और आप वरदान की मुद्रा धारण करती हैं। आपकी सेवा करने वाले स्त्री-पुरुष मनचाहा फल पाते हैं।

  12. पद 12

    कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥

    सोने की थाली में अगर, कपूर और बाती सजी है। ‘श्रीमालकेतु’ में करोड़ों रत्नों जैसी ज्योति शोभित है।

  13. पद 13

    श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै। कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पति पावै॥

    शिवानंद स्वामी कहते हैं कि जो कोई श्री अम्बे जी की यह आरती गाता है, वह सुख और संपत्ति पाता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/durga-aarti/

संक्षेप में

“जय अम्बे गौरी” देवी दुर्गा (अम्बे माँ) की सबसे प्रचलित आरतियों में से एक है। इसमें देवी के रूप, श्रृंगार और सिंह वाहन का वर्णन है, और दुर्गा सप्तशती में वर्णित असुरों पर उनकी विजय को याद किया गया है। यह नवरात्रि, दुर्गा पूजा, माता की चौकी और जागरण में, और प्रतिदिन की देवी पूजा के अंत में गाई जाती है।

इस आरती के शब्दों में क्षेत्र और परंपरा के अनुसार थोड़ा अंतर मिलता है, जैसे ‘निशिदिन/निशदिन’, ‘भैरों/भैरूँ’ और पद 11 में ‘वर मुद्रा धारी’ की जगह ‘खड्ग खप्पर धारी’। गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है। अंतिम पद में ‘शिवानन्द स्वामी’ का नाम (छाप) आता है, पर रचयिता के बारे में पक्की ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

“जय अम्बे गौरी” आरती किसने लिखी?

अंतिम पद में ‘कहत शिवानन्द स्वामी’ आता है, इसलिए इसे शिवानन्द स्वामी से जोड़ा जाता है। उनके जीवन और समय के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

इस आरती में कितने पद हैं?

प्रचलित पाठ में पहली टेक समेत 13 पद हैं।

यह आरती कब गाई जाती है?

नवरात्रि के नौ दिनों में, दुर्गा पूजा और दुर्गा अष्टमी पर, माता की चौकी और जागरण में, और प्रतिदिन की देवी पूजा के अंत में।

आरती में किन असुरों का उल्लेख है?

शुंभ-निशुंभ, महिषासुर, धूम्रलोचन, चंड-मुंड, रक्तबीज और मधु-कैटभ। इनकी कथाएँ दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य) में हैं।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ
  2. असुर-वध के प्रसंग: दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य)

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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, bhaktibharat.com