व्रत कथा

छठ पूजा की कथा

छठ पूजा: रविवार, 15 नवंबर 2026

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 11 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
लोक लघुचित्र शैली में: प्राचीन महल के उद्यान में घुटनों के बल बैठे शोकाकुल राजा, हाथों में कपड़े में लिपटा निश्चल नन्हा शिशु; सामने बादलों पर सुनहरे प्रकाश से दीप्त, पीले-लाल वस्त्र और मुकुट पहने सौम्य युवा देवी दोनों हाथ बढ़ाकर शिशु को लेती और आशीर्वाद देती हुईं; राजा के पीछे हाथ जोड़े रानी
चित्र: AI से बनाया गया
संक्षेप में

छठ पूजा पर सबसे अधिक राजा प्रियव्रत की कथा सुनाई जाती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण और देवी भागवत के अनुसार उनकी रानी मालिनी का पुत्र मृत जन्मा, तब षष्ठी देवी (देवसेना) ने प्रकट होकर उसे जीवित किया और राजा ने उनकी पूजा का प्रचार किया। इन ग्रंथों में कार्तिक, सूर्य या छठ का नाम नहीं है; छठी मैया को इन्हीं षष्ठी देवी से जोड़ना परंपरा है।

छठ पूजा कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से सप्तमी तक चलने वाला चार दिन का व्रत है, जिसका मुख्य दिन षष्ठी है। व्रती डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और छठी मैया की पूजा करते हैं। Drik Panchang इसे सूर्य षष्ठी और डाला छठ भी कहता है; यही व्रत चैत्र में चैती छठ के रूप में भी रखा जाता है।

परंपरा में छठी मैया को षष्ठी देवी माना जाता है, और छठ पर सबसे अधिक उन्हीं की कथा सुनाई जाती है। यह कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खंड, अध्याय 43) और देवी भागवत पुराण (स्कंध 9, अध्याय 46) में है, और हमने इसे दोनों ग्रंथों में पढ़कर जाँचा है। पर ये ग्रंथ षष्ठी देवी की पूजा हर महीने की शुक्ल षष्ठी को और शिशु के जन्म के बाद बताते हैं; उनमें कार्तिक मास, सूर्य या छठ पर्व का नाम नहीं है। इस कथा को कार्तिक शुक्ल षष्ठी के छठ से जोड़ना बाद की परंपरा है।

इसके साथ तीन और कथाएँ लोक में सुनाई जाती हैं: सूर्यपुत्र कर्ण की, द्रौपदी की और सीता जी की। इनमें से किस बात का ग्रंथ में आधार मिलता है और कौन-सी केवल लोक मान्यता है, यह हर कथा के साथ लिखा है।

व्रत और कथा की विधि

  • छठ की विधि लोक परंपरा से चलती है और क्षेत्र व परिवार के अनुसार थोड़ी बदलती है। पहला दिन, नहाय-खाय (चतुर्थी): स्नान के बाद एक बार सात्विक भोजन, परंपरा से लौकी (कद्दू) और भात।
  • दूसरा दिन, खरना या लोहंडा (पंचमी): दिन भर उपवास, शाम को खीर और रोटी का प्रसाद; इसके बाद निर्जल व्रत शुरू होता है।
  • तीसरा दिन, संध्या अर्घ्य (षष्ठी): शाम को जल के किनारे, घाट पर, डूबते सूर्य को अर्घ्य।
  • चौथा दिन, उषा अर्घ्य (सप्तमी): भोर में उगते सूर्य को अर्घ्य, और फिर व्रत का पारण।
  • प्रसाद में साँचे में ढले गेहूँ के आटे के ठेकुआ और फल होते हैं, जो बाँस के सूप और दउरा में सजाए जाते हैं; साथ में मिट्टी के दीये जलते हैं।

राजा प्रियव्रत, रानी मालिनी और षष्ठी देवी

ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड, अध्याय 43 (संस्कृत पाठ) और देवी भागवत पुराण, स्कंध 9, अध्याय 46 के अनुसार। दोनों में कथा लगभग एक-सी है; ब्रह्मवैवर्त में इसे नारायण नारद जी को सुनाते हैं।

स्वायंभुव मनु के पुत्र प्रियव्रत योगी थे। उनका मन तप और ध्यान में लगा रहता था, और वे विवाह नहीं करना चाहते थे। ब्रह्मा जी ने उन्हें समझाया, तब उन्होंने विवाह किया। उनकी रानी का नाम मालिनी था।

बहुत समय बीत गया, पर उन्हें संतान नहीं हुई। तब महर्षि कश्यप ने उनके लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया, और यज्ञ का चरु, यानी आहुति का पवित्र अन्न, रानी मालिनी को दिया गया।

रानी ने बारह दिव्य वर्षों तक गर्भ धारण किया। फिर उन्होंने सोने जैसी कांति वाले पुत्र को जन्म दिया, पर बालक में प्राण नहीं थे।

राजा प्रियव्रत बालक को लेकर श्मशान गए। वे उसे अपने से अलग नहीं कर पा रहे थे, और दुख इतना गहरा था कि वे स्वयं भी प्राण त्यागने को तैयार हो गए।

उसी समय वहाँ स्फटिक जैसा उजला, रत्नों से जड़ा एक विमान दिखाई दिया, जिसमें तेज से दमकती एक देवी विराजमान थीं। उन्होंने राजा से कहा, "मैं ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना हूँ। मूल प्रकृति का छठा अंश होने से मुझे षष्ठी कहा जाता है। जिनके पुत्र नहीं होते, उन्हें मैं पुत्र देती हूँ।"

देवी भागवत में वे यह भी बताती हैं कि वे स्कंद (कार्तिकेय) की पत्नी और मातृकाओं में प्रमुख हैं, और यह भी कि जन्म और मृत्यु हर प्राणी को उसके कर्म के अनुसार मिलते हैं।

फिर देवी ने बालक को अपने हाथों में लिया और मानो खेल-खेल में उसे जीवित कर दिया।

पर बालक को गोद में लिए-लिए ही वे आकाश की ओर उठने लगीं। उन्होंने कहा कि बालक राजा को तभी मिलेगा जब वे वचन दें कि संसार में उनकी पूजा का प्रचार करेंगे। राजा ने वचन दिया, और देवी ने बालक उन्हें लौटा दिया।

देवी ने बालक का नाम सुव्रत रखा और आशीर्वाद दिया कि वह विद्वान, योगी और यशस्वी होगा।

राजा ने अपना वचन निभाया। उन्होंने स्वयं षष्ठी देवी की पूजा की और सबसे करवाई। तभी से हर महीने की शुक्ल षष्ठी को उनका उत्सव होता है, और शिशु के जन्म के छठे दिन प्रसूति-गृह में, इक्कीसवें दिन, और अन्नप्राशन जैसे बच्चों के संस्कारों में उनकी पूजा की जाती है। ग्रंथ में उनका मंत्र "ॐ ह्रीं षष्ठीदेव्यै स्वाहा" दिया गया है।

ध्यान देने की बात: ब्रह्मवैवर्त और देवी भागवत, दोनों में यह कथा षष्ठी देवी की है; उनमें कार्तिक मास, सूर्य या छठ का नाम नहीं आता। कई कथा-पुस्तकों और वेबसाइटों में लिखा मिलता है कि प्रियव्रत ने यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को की थी; यह बात ग्रंथ में नहीं है। परंपरा ने बाद में इस कथा को छठ से जोड़ा, और छठी मैया की पूजा षष्ठी देवी के रूप में होने लगी।

सूर्यपुत्र कर्ण की सूर्य-उपासना

महाभारत, आदि पर्व 111 और वन पर्व 307 (गांगुली के अंग्रेज़ी अनुवाद की खंड-संख्या) के अनुसार। इसे छठ की शुरुआत कहना लोक मान्यता है।

कर्ण सूर्य देव के पुत्र थे। महाभारत के आदि पर्व के अनुसार वे हर दिन भोर से दोपहर तक सूर्य की उपासना करते थे, तब तक, जब तक धूप से उनकी पीठ तप न जाए। उपासना के समय कोई ब्राह्मण उनसे कुछ भी माँगता, तो वे मना नहीं करते थे।

वन पर्व में वर्णन है कि कर्ण जल से निकलकर दोपहर के समय हाथ जोड़कर सूर्य की स्तुति करते थे। उसी समय ब्राह्मण उनसे दान माँगते थे, और इसी समय इंद्र ब्राह्मण का वेश धरकर उनसे उनका कवच माँगने आए।

लोक में कहा जाता है कि कर्ण घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे, और सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने; इसी से जल में खड़े होकर अर्घ्य देने की छठ की रीति शुरू हुई मानी जाती है। महाभारत के इन प्रसंगों में जल से निकलकर पूजा करने और दोपहर तक उपासना की बात है, पर कमर तक पानी में खड़े रहने का वर्णन नहीं है, और न ही इसे छठ कहा गया है।

द्रौपदी और पांडव

लोक कथा: वेबदुनिया, टाइम्स नाउ नवभारत और हिंदी विकिपीडिया में। इसका आधार महाभारत, वन पर्व 3 (गांगुली अनुवाद) का प्रसंग है।

प्रचलित कथा के अनुसार जुए में अपना राज्य हारकर पांडव वन में चले गए। तब पुरोहित धौम्य की सलाह पर द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा, और इस व्रत के फल से पांडवों को उनका राज्य वापस मिला।

महाभारत के वन पर्व में जो प्रसंग मिलता है, वह इससे अलग है। वनवास के आरंभ में पुरोहित धौम्य ने युधिष्ठिर को सूर्य के 108 नाम सिखाए। युधिष्ठिर ने गंगा के जल में खड़े होकर सूर्य की उपासना की, और सूर्य देव ने उन्हें ताँबे का एक पात्र (अक्षय पात्र) दिया, जिसका भोजन तब तक समाप्त नहीं होता था जब तक द्रौपदी भोजन न कर लें।

यानी ग्रंथ में सूर्य की उपासना युधिष्ठिर करते हैं, द्रौपदी नहीं; और वहाँ षष्ठी, कार्तिक या राज्य वापस मिलने की बात नहीं है। द्रौपदी के छठ व्रत की कथा इसी प्रसंग से जुड़ी लोक मान्यता है।

सीता जी और छठ

लोक मान्यता: अयोध्या वाला रूप वेबदुनिया और हिंदी विकिपीडिया में, मुंगेर वाला रूप ETV भारत और पत्रिका में। किसी जाँचे गए ग्रंथ में यह कथा हमें नहीं मिली।

एक प्रचलित रूप के अनुसार रावण-वध के बाद अयोध्या लौटकर, राम-राज्य आरंभ होने से पहले, श्रीराम और सीता जी ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखा और सूर्य देव की पूजा की।

बिहार के मुंगेर में दूसरी कथा सुनाई जाती है। रावण ब्राह्मण था, इसलिए उसके वध से श्रीराम पर ब्रह्महत्या का दोष माना गया। गुरु वशिष्ठ ने राम और सीता को मुंगेर में ऋषि मुद्गल के आश्रम भेजा। श्रीराम ने कष्टहरणी घाट पर प्रायश्चित का यज्ञ किया। उस यज्ञ में स्त्रियाँ भाग नहीं ले सकती थीं, इसलिए ऋषि मुद्गल ने सीता जी से आश्रम में रहकर छठ का व्रत करने को कहा। सीता जी ने पश्चिम की ओर मुख करके डूबते सूर्य को और पूर्व की ओर मुख करके उगते सूर्य को अर्घ्य दिया।

मान्यता है कि गंगा के बीच एक शिला पर बने सीता चरण मंदिर में उनके चरण-चिह्न आज भी हैं। स्थानीय स्रोत इस कथा को आनंद रामायण से जोड़ते हैं, पर ऑनलाइन मिलने वाले पाठ में यह प्रसंग हमें नहीं मिला। मुंगेर ज़िला प्रशासन की वेबसाइट इन चरण-चिह्नों को सीता जी के गंगा पार करने से जोड़ती है; वह छठ का उल्लेख नहीं करती।

कथा के अलग-अलग रूप

  • कई कथाओं में रानी मालिनी को यज्ञ की खीर दी जाती है (वेबदुनिया); ग्रंथ में "चरु" शब्द है, यानी आहुति का अन्न। ETV भारत के रूप में कश्यप यज्ञ कराते नहीं, उसकी सलाह देते हैं।
  • अधिकतर छपी कथाओं में बारह दिव्य वर्षों के गर्भ की बात नहीं होती, और देवी के बालक को लेकर आकाश की ओर उठने का प्रसंग भी प्रायः छूट जाता है; ये दोनों ब्रह्मवैवर्त पुराण में हैं।
  • लोक में छठी मैया को सूर्य की बहन कहा जाता है। वेबदुनिया इसे मार्कंडेय पुराण से बताती है, पर उसमें ऐसा प्रसंग हमें नहीं मिला। कुछ स्रोत उन्हें कात्यायनी या पार्वती का छठा रूप भी कहते हैं; इसका भी कोई ग्रंथ नहीं दिया जाता।
  • एक प्रचलित व्याख्या है कि सुबह का अर्घ्य सूर्य की पत्नी (शक्ति) उषा को और शाम का प्रत्यूषा को दिया जाता है। इसका कोई ग्रंथ हमें नहीं मिला; संस्कृत शब्दकोशों में "प्रत्यूष" का अर्थ भोर है, शाम नहीं।
  • द्रौपदी की कथा का एक रूप उन्हें रांची के नगड़ी गाँव में एक झरने के पास युद्ध में सहायता के लिए छठ करते बताता है, और एक दूसरे रूप में कुंती लाक्षागृह की घटना के बाद यह व्रत करती हैं। ये दोनों रूप हमें केवल अंग्रेज़ी विकिपीडिया में मिले।

कथा के बाद

सूर्य देव की आरती का पाठ नीचे है। संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के लिए अपने शहर का सूर्यास्त और सूर्योदय छठ पूजा के पन्ने पर है।

सूर्य देव की आरती: ॐ जय सूर्य भगवान

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

छठी मैया कौन हैं?

परंपरा में छठी मैया को षष्ठी देवी माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण और देवी भागवत में षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना, मूल प्रकृति का छठा अंश और संतान देने वाली देवी कहा गया है; देवी भागवत के अनुसार वे स्कंद की पत्नी हैं। लोक में उन्हें सूर्य की बहन भी कहा जाता है, पर इसका आधार कोई ग्रंथ हमें नहीं मिला; यह लोक मान्यता है।

छठ पूजा की कथा क्या है?

सबसे प्रचलित कथा राजा प्रियव्रत की है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार उनकी रानी मालिनी का पुत्र मृत जन्मा; षष्ठी देवी ने प्रकट होकर उसे जीवित किया, उसका नाम सुव्रत रखा, और राजा ने उनकी पूजा का प्रचार किया। इसके साथ कर्ण की सूर्य-उपासना, और द्रौपदी व सीता जी के छठ व्रत की लोक कथाएँ भी सुनाई जाती हैं।

क्या पुराणों में छठ पर्व का उल्लेख है?

हमने जिन ग्रंथों में षष्ठी देवी की कथा जाँची (ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड 43; देवी भागवत 9.46), उनमें कार्तिक, सूर्य या छठ का नाम नहीं है; वे षष्ठी देवी की पूजा हर शुक्ल षष्ठी को और जन्म के संस्कारों में बताते हैं। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य के साथ छठी मैया की पूजा लोक परंपरा है।

क्या द्रौपदी ने छठ व्रत किया था?

यह लोक कथा है। महाभारत (वन पर्व 3) में पुरोहित धौम्य युधिष्ठिर को सूर्य के 108 नाम सिखाते हैं, और युधिष्ठिर की उपासना से प्रसन्न होकर सूर्य उन्हें अक्षय पात्र देते हैं। वहाँ द्रौपदी कोई व्रत नहीं करतीं, और न ही षष्ठी या छठ का नाम है।

स्रोत

  1. ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खंड, अध्याय 43 (षष्ठी देवी की कथा), संस्कृत पाठ sa.wikisource.org पर पढ़ा
  2. देवी भागवत पुराण, स्कंध 9, अध्याय 46 (विज्ञानानंद का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org)
  3. पौराणिक विश्वकोश (वेट्टम मणि): षष्ठीदेवी, wisdomlib.org
  4. महाभारत, आदि पर्व 111, वन पर्व 3 और 307 (गांगुली का अंग्रेज़ी अनुवाद, en.wikisource.org और wisdomlib.org)
  5. वेबदुनिया: छठ पूजा की पौराणिक कथा (2025); कौन हैं छठ मैया (2017)
  6. ETV भारत: छठ पूजा की कथा (पटना, 2022); मुंगेर में माता सीता की पहली छठ (2022)
  7. टाइम्स नाउ नवभारत: छठ पूजा कथा (2024); पत्रिका: छठ पूजा और माता सीता की कथा
  8. मुंगेर ज़िला, बिहार सरकार (munger.nic.in): मनपत्थर (सीता चरण)
  9. हिंदी विकिपीडिया: छठ पूजा; अंग्रेज़ी विकिपीडिया: Chhath
  10. इंडिया टीवी हिंदी (2025): छठ में संध्या अर्घ्य और प्रत्यूषा; wisdomlib.org शब्दकोश: प्रत्यूष
  11. Drik Panchang: छठ पूजा

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