व्रत कथा

दत्तात्रेय जयंती की कथा

दत्तात्रेय जयंती: बुधवार, 23 दिसंबर 2026

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 10 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
आश्रम में बरगद के नीचे चटाई पर ध्यान में बैठे भगवा वस्त्रधारी वृद्ध ऋषि, रुद्राक्ष की मालाएँ, पास में घास की कुटिया और जलती अग्नि
चित्र: AI से बनाया गया
संक्षेप में

दत्तात्रेय ऋषि अत्रि और अनसूया के पुत्र हैं। भागवत पुराण (4.1) के अनुसार अत्रि के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने वर दिया, और उनके अंश से सोम, दत्तात्रेय और दुर्वासा जन्मे; दत्तात्रेय विष्णु के अंश हैं। लोक में यह कथा भी प्रचलित है कि त्रिदेव साधु बनकर अनसूया की परीक्षा लेने आए, उन्होंने अपने सतीत्व से उन्हें शिशु बना दिया, और फिर त्रिदेव उनके पुत्र रूप में जन्मे।

दत्तात्रेय जयंती (दत्त जयंती) मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात में। परंपरा के अनुसार दत्तात्रेय का जन्म प्रदोष यानी सायंकाल में माना जाता है, इसलिए पूजा शाम को होती है। जिन पुराणों की कथा नीचे है, उनमें कोई तिथि नहीं दी गई; मार्गशीर्ष पूर्णिमा को जन्म मानना परंपरा है। अपने शहर में पूर्णिमा का समय दत्तात्रेय जयंती के पन्ने पर है।

इस दिन दत्तात्रेय के जन्म की कथा कही जाती है, जिसके दो रूप हैं। पहला भागवत पुराण (4.1.15-33) का है, जिसे हमने संस्कृत में पढ़कर जाँचा; अत्रि-अनसूया के यही तीन पुत्र विष्णु पुराण (1.10) और मार्कंडेय पुराण (अध्याय 17) में भी हैं। दूसरा रूप, अनसूया की परीक्षा वाली कथा, सबसे अधिक सुनाया जाता है; यह इन पुराणों में नहीं है, और दत्त परंपरा के ग्रंथ गुरुचरित्र के चौथे अध्याय में कही जाती है।

व्रत और कथा की विधि

  • सुबह स्नान, दिन भर व्रत, और दत्तात्रेय की मूर्ति या चित्र की फूल, धूप और दीप से पूजा; यह परंपरा है (भक्ति भारत, महाराष्ट्र पर्यटन, विकिपीडिया)।
  • पूर्णिमा पर पूजा प्रदोष काल में की जाती है, क्योंकि परंपरा जन्म सायंकाल में मानती है (आज तक, वेबदुनिया)।
  • इस दिन अवधूत गीता और जीवनमुक्त गीता पढ़ी जाती हैं, जिन्हें परंपरा दत्तात्रेय की वाणी मानती है (स्वामी शिवानंद, विकिपीडिया, आज तक)।
  • महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक में गुरुचरित्र का पारायण होता है। नरसोबावाडी, औदुंबर, माहूर, कारंजा और गाणगापुर जैसे दत्त क्षेत्रों में बड़ा उत्सव होता है (इनक्रेडिबल इंडिया, विकिपीडिया)।

अत्रि का तप और त्रिदेव का वर: भागवत की कथा

भागवत पुराण 4.1.15-33 (संस्कृत पाठ और अंग्रेज़ी अनुवाद, vedabase.io) के अनुसार; वहाँ यह कथा मैत्रेय ऋषि विदुर को सुनाते हैं। नाम का अर्थ भागवत 2.7.4 से है।

विदुर ने मैत्रेय ऋषि से पूछा कि जगत को रचने, पालने और समेटने वाले तीनों देव अत्रि ऋषि के घर पुत्र बनकर कैसे जन्मे। मैत्रेय ने यह कथा सुनाई।

ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र अत्रि को सृष्टि बढ़ाने को कहा। तब अत्रि अपनी पत्नी अनसूया के साथ ऋक्ष पर्वत पर तप करने गए। वहाँ पलाश और अशोक के फूलों से भरा वन था और निर्विंध्या नदी कल-कल बहती थी।

वहाँ अत्रि ने प्राणायाम से मन को साधा और सौ वर्ष तक एक पैर पर खड़े रहे, केवल वायु पर जीकर। मन में वे यही माँगते रहे कि जगत के जिन स्वामी की मैंने शरण ली है, वे मुझे अपने समान संतान दें।

उनके प्राणायाम से उठी अग्नि उनके सिर से निकलकर तीनों लोकों को तपाने लगी। यह देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों उनके आश्रम आए; अप्सराएँ, गंधर्व, सिद्ध, विद्याधर और नाग उनका यश गा रहे थे।

अत्रि ने तीनों को एक साथ देखा, तो एक पैर पर ही आगे बढ़े और धरती पर दंड की तरह लेटकर प्रणाम किया। हंस, गरुड़ और बैल पर बैठे, अपने-अपने चिह्नों वाले तीनों देवों का तेज इतना था कि उनकी आँखें बंद हो गईं। फिर हाथ जोड़कर उन्होंने स्तुति की।

अत्रि ने पूछा: मैंने तो संतान के लिए एक ही भगवान का ध्यान किया था, फिर आप तीनों यहाँ कैसे आए? कृपा करके बताइए, मुझे बड़ा आश्चर्य है।

तीनों देव मुस्कुराए और बोले: तुम्हारा संकल्प सच्चा है, जैसा तुमने चाहा वैसा ही होगा। जिसका तुम ध्यान कर रहे थे, वह हम तीनों ही हैं। हमारे अंश से तुम्हारे जगत-प्रसिद्ध पुत्र होंगे, जो तुम्हारा यश फैलाएँगे। यह वर देकर, पति-पत्नी के देखते-देखते, तीनों देव चले गए।

समय आने पर अनसूया के तीन पुत्र हुए: ब्रह्मा के अंश से सोम (चंद्रमा), विष्णु के अंश से महायोगी दत्त, और शंकर के अंश से दुर्वासा ऋषि। विष्णु पुराण (1.10) भी अनसूया के यही तीन पुत्र गिनाता है और दत्तात्रेय को तपस्वी कहता है।

दत्त नाम का अर्थ भागवत (2.7.4) में है: संतान चाहने वाले अत्रि से प्रसन्न भगवान ने कहा, “मैंने स्वयं को तुम्हें दे दिया” (दत्तो मयाहम्), इसलिए वे दत्त कहलाए। अत्रि के पुत्र होने से वे आत्रेय हैं, और दोनों मिलकर दत्तात्रेय।

भागवत (1.3.11) दत्तात्रेय को भगवान का छठा अवतार गिनाता है: अनसूया की प्रार्थना पर वे अत्रि के पुत्र बने, और उन्होंने अलर्क, प्रह्लाद और अन्य लोगों को आत्मविद्या का उपदेश दिया।

अनसूया की परीक्षा: प्रचलित कथा

प्रचलित कथा के अनुसार, जैसी भक्ति भारत, वेबदुनिया, अमर उजाला और स्वामी शिवानंद (डिवाइन लाइफ सोसाइटी) कहते हैं। गुरुचरित्र के चौथे अध्याय में यही कथा है (वासुदेवानंद सरस्वती के अध्याय-सार श्लोक के अनुसार); वह अध्याय हमने स्वयं नहीं पढ़ा। भागवत, विष्णु और मार्कंडेय पुराण में यह कथा नहीं है।

अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया पतिव्रता के रूप में तीनों लोकों में प्रसिद्ध थीं। एक बार नारद जी ने सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती से उनकी बहुत प्रशंसा की, और कहा कि पतिव्रत में तीनों लोकों में कोई स्त्री अनसूया के बराबर नहीं है।

यह सुनकर तीनों देवियों ने अपने पतियों, ब्रह्मा, विष्णु और शिव, से आग्रह किया कि वे जाकर अनसूया के सतीत्व की परीक्षा लें। उनके हठ पर तीनों देव मान गए।

तीनों देव साधुओं का वेश धरकर अत्रि ऋषि के आश्रम पहुँचे। उस समय अत्रि आश्रम में नहीं थे। अनसूया ने अतिथियों को प्रणाम किया और उनका सत्कार करके भोजन परोसना चाहा।

पर साधुओं ने एक शर्त रखी: वे भिक्षा तभी लेंगे जब अनसूया बिना वस्त्रों के, निर्वस्त्र होकर, उन्हें भोजन परोसें।

अनसूया दुविधा में पड़ गईं: अतिथि को लौटाना धर्म के विरुद्ध था, और यह शर्त उनके पतिव्रत के विरुद्ध। उन्होंने अपने पति का ध्यान किया, और ध्यान में उन्होंने जान लिया कि ये साधु स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं।

तब अनसूया ने अपने पतिव्रत के बल पर उन पर जल छिड़का, और तीनों देव छह-छह महीने के शिशु बन गए। अब वे अतिथि नहीं, उनके बच्चे थे; अनसूया ने माँ की तरह उन्हें दूध पिलाया, भोजन कराया और पालने में झुलाया।

उधर बहुत समय तक पति न लौटे, तो तीनों देवियाँ चिंतित हो गईं। नारद जी ने उन्हें बताया कि उनके पति अत्रि के आश्रम में शिशु बनकर पालने में खेल रहे हैं।

तीनों देवियाँ आश्रम आईं, अनसूया से क्षमा माँगी और अपने पतियों को लौटाने की विनती की। अनसूया का मन पिघल गया, और उन्होंने जल छिड़ककर तीनों देवों को उनका पहला रूप लौटा दिया।

प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने अनसूया को वर दिया कि वे उनके पुत्र बनकर जन्म लेंगे। समय आने पर ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, विष्णु के अंश से दत्तात्रेय और शिव के अंश से दुर्वासा अनसूया के पुत्र हुए। इसी जन्म का दिन दत्तात्रेय जयंती के रूप में मनाया जाता है।

कथा के अलग-अलग रूप

  • मार्कंडेय पुराण (अध्याय 16-17) में यह वर दूसरे कारण से मिलता है। एक ब्राह्मण को मांडव्य ऋषि ने शाप दिया कि वह सूर्योदय होते ही मर जाएगा; उसकी पतिव्रता पत्नी ने कहा कि सूर्य उगेगा ही नहीं, और दस रातों तक दिन नहीं हुआ। देवताओं के कहने पर अनसूया ने उस स्त्री को समझाकर सूर्य को फिर उगाया और उसके मरे पति को फिर जीवित कर दिया। देवताओं ने वर माँगने को कहा, तो अनसूया ने माँगा कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव उनके पुत्र बनें।
  • प्रचलित कथा में शर्त अलग-अलग बताई जाती है: अधिकतर कथाओं में बिना वस्त्रों के भोजन परोसना (भक्ति भारत, अमर उजाला, स्वामी शिवानंद), पर वेबदुनिया में गोद में बिठाकर भोजन कराना।
  • देव शिशु कैसे बने: भक्ति भारत और वेबदुनिया में अनसूया के वचन से; अमर उजाला में अत्रि के कमंडल के जल से; स्वामी शिवानंद के अनुसार पति के चरण धोए जल से।
  • एक पुत्र या तीन: पुराणों और वेबदुनिया में तीन पुत्र हैं (सोम, दत्तात्रेय, दुर्वासा)। स्वामी शिवानंद के अनुसार अत्रि ने लौटकर तीनों शिशुओं को गले लगाया तो वे तीन सिर और छह भुजाओं वाला एक शिशु बन गए; अमर उजाला भी तीनों देवों का दत्तात्रेय के रूप में जन्म बताता है।
  • वर किसने माँगा: भक्ति भारत में त्रिदेव स्वयं वर देते हैं, वेबदुनिया में अनसूया माँगती हैं, और अमर उजाला में त्रिदेव उनकी कोख से जन्म लेने का आग्रह करते हैं।
  • स्वामी शिवानंद की कथा में आरंभ में नारद लोहे का एक चने जैसा दाना तीनों देवियों से भूनने को कहते हैं; वे नहीं भून पातीं, और अनसूया पति के चरणोदक से उसे भून देती हैं। अंग्रेज़ी विकिपीडिया में भी यह प्रसंग है।
  • विल्सन की टिप्पणी के अनुसार वायु पुराण अत्रि के पुत्रों की बिल्कुल अलग सूची देता है; वह पाठ हमने नहीं जाँचा।

कथा के बाद

कथा के बाद प्रदोष काल में दत्तात्रेय की पूजा और आरती होती है, और “श्री गुरुदेव दत्त” का जप किया जाता है (भक्ति भारत)। अपने शहर में पूर्णिमा का समय दत्तात्रेय जयंती के पन्ने पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दत्तात्रेय के माता-पिता कौन थे?

ऋषि अत्रि और उनकी पत्नी अनसूया। भागवत (4.1.15, 33), विष्णु पुराण (1.10) और मार्कंडेय पुराण (17) तीनों के अनुसार अनसूया के तीन पुत्र थे: ब्रह्मा के अंश से सोम (चंद्रमा), विष्णु के अंश से दत्तात्रेय और शिव के अंश से दुर्वासा।

दत्तात्रेय नाम का अर्थ क्या है?

भागवत (2.7.4) के अनुसार भगवान ने अत्रि से कहा, “मैंने स्वयं को तुम्हें दे दिया” (दत्तो मयाहम्), इसलिए वे “दत्त” कहलाए; अत्रि के पुत्र होने से “आत्रेय”। दोनों मिलकर दत्तात्रेय।

क्या अनसूया की परीक्षा वाली कथा पुराणों में है?

भागवत, विष्णु पुराण और मार्कंडेय पुराण में, जिन्हें हमने पढ़ा, यह कथा नहीं है। भागवत में त्रिदेव अत्रि के तप से प्रसन्न होकर आते हैं, और मार्कंडेय पुराण में अनसूया सूर्य को फिर उगाने के बदले वर पाती हैं। परीक्षा वाली कथा लोक में बहुत प्रचलित है और दत्त परंपरा के ग्रंथ गुरुचरित्र (अध्याय 4) में कही जाती है।

दत्त जयंती मार्गशीर्ष पूर्णिमा को ही क्यों मनाई जाती है?

परंपरा के अनुसार दत्तात्रेय का जन्म मार्गशीर्ष पूर्णिमा को प्रदोष (सायंकाल) में हुआ, इसलिए पूजा शाम को होती है। हमने जो पुराण पढ़े, उनमें जन्म की कोई तिथि नहीं दी गई है; यह तिथि परंपरा से है।

दत्तात्रेय के 24 गुरु कौन थे?

भागवत (11.7.33-35) में एक अवधूत ब्राह्मण राजा यदु को अपने 24 गुरु बताते हैं: पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हिरण, मछली, पिंगला नाम की गणिका, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट। भागवत उस अवधूत का नाम नहीं लेता; टीकाकार श्रीधर स्वामी और परंपरा उन्हें दत्तात्रेय मानते हैं।

स्रोत

  1. भागवत पुराण 1.3.11, 2.7.4, 4.1.15-33, 11.7.24-35, 11.9.31-33 (संस्कृत पाठ और ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी का अंग्रेज़ी अनुवाद, vedabase.io)
  2. विष्णु पुराण 1.10 (एच. एच. विल्सन का अनुवाद और टिप्पणी, wisdomlib.org)
  3. मार्कंडेय पुराण, अध्याय 16-19 (एफ. ई. पार्जिटर का अंग्रेज़ी अनुवाद, wisdomlib.org)
  4. वासुदेवानंद सरस्वती: श्रीगुरुचरित्राध्यायसारांशश्लोकाः, श्लोक 4 (sanskritdocuments.org)
  5. Drik Panchang: दत्तात्रेय जयंती 2026, नई दिल्ली
  6. भक्ति भारत: पतिव्रता सती माता अनसूइया की कथा; दत्त जयंती
  7. वेबदुनिया (2014, 2024), अमर उजाला (2019, 2023) और आज तक (2022): दत्तात्रेय जयंती
  8. स्वामी शिवानंद, डिवाइन लाइफ सोसाइटी: Dattatreya Jayanthi; Dattatreya
  9. इनक्रेडिबल इंडिया और महाराष्ट्र पर्यटन: श्री दत्त जयंती; गुरुमंदिर, कारंजा
  10. अंग्रेज़ी विकिपीडिया: Datta Jayanti, Dattatreya, Anasuya, Shri Guru Charitra

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