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लक्ष्मी जी की आरती: ॐ जय लक्ष्मी माता PDF डाउनलोड करें
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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/lakshmi-aarti/
“ॐ जय लक्ष्मी माता” देवी लक्ष्मी की सबसे प्रचलित आरती है। इसमें लक्ष्मी जी को जगत की माता, सुख और संपत्ति देने वाली और क्षीरसागर से प्रकट हुई देवी के रूप में याद किया गया है। यह दीपावली के लक्ष्मी पूजन, शुक्रवार और वैभव लक्ष्मी व्रत में, और प्रतिदिन की पूजा में गाई जाती है। इसके रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है।
कुछ संस्करणों में शब्द थोड़े अलग मिलते हैं, जैसे पहले पद में ‘हर विष्णु विधाता’ की जगह ‘हरि विष्णु विधाता’ या ‘हर-विष्णु-धाता’, और अंतिम पद में ‘पाप उतर जाता’ की जगह ‘पाप शमन हो जाता’। कुछ लोग आरती से पहले ‘महालक्ष्मी नमस्तुभ्यं’ श्लोक पढ़ते हैं। गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है।
आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लक्ष्मी जी की यह आरती कब गाई जाती है?
दीपावली पर लक्ष्मी पूजन में, शुक्रवार और वैभव लक्ष्मी व्रत में, शरद पूर्णिमा (कोजागरी) पर, और प्रतिदिन की पूजा के अंत में।
इस आरती के रचयिता कौन हैं?
रचयिता का नाम ज्ञात नहीं है। इसके अंतिम पद में किसी कवि का नाम (छाप) नहीं आता।
“हर विष्णु विधाता” का क्या अर्थ है?
हर यानी शिव, विष्णु, और विधाता यानी ब्रह्मा। आरती कहती है कि ये तीनों देव भी लक्ष्मी जी की आराधना करते हैं। कुछ पाठों में ‘हरि विष्णु विधाता’ मिलता है।
“रत्न चतुर्दश” किसे कहा गया है?
समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों को। पुराणों के अनुसार लक्ष्मी जी भी इसी मंथन में क्षीरसागर से प्रकट हुईं, इसलिए उन्हें ‘क्षीरोदधि-जाता’ कहा गया है।
स्रोत
- परंपरागत आरती पाठ
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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, bhaktibharat.com, hindi.webdunia.com
