सोमवार की प्रचलित कथा में एक निःसंतान साहूकार सोमवार का व्रत करता है; पार्वती जी के कहने पर शिव जी उसे पुत्र देते हैं, पर केवल बारह वर्ष की आयु का। बारह वर्ष का होने पर काशी में बालक के प्राण चले जाते हैं, और पार्वती जी की विनती पर शिव जी उसे फिर जीवन दे देते हैं। सोलह सोमवार की कथा में पार्वती जी के शाप से रोगी हुआ एक पुजारी सोलह सोमवार का व्रत करके ठीक होता है, और फिर यही व्रत पार्वती जी, कार्तिकेय, उनके मित्र और एक रानी तक पहुँचता है।
रोमन अक्षरों में हिंदी: पढ़ने में मदद के लिए, मशीन से बनी। मूल देवनागरी पाठ ही आधार है।
दूसरी भाषा अभी नहीं खुल सकी। इसी भाषा में पढ़ें, या दोबारा दबाएँ।
हर सुबह तिथि, राहु काल और आने वाले व्रत-त्योहार, WhatsApp पर एक छोटे संदेश में।चैनल फ़ॉलो करें
सोमवार शिव जी का वार माना जाता है, और इस दिन शिव-पार्वती की पूजा करके व्रत रखा जाता है। मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका सोमवार के तीन व्रत बताती है: हर सोमवार का साधारण व्रत, सोम प्रदोष और सोलह सोमवार; तीनों की पूजा एक जैसी है, पर कथा अलग-अलग। इस पन्ने पर पहले दो कथाएँ हैं; सोम प्रदोष की कथा उसके अपने पन्ने पर है।
दोनों प्रचलित कथाएँ हैं: इनके लिए किसी पुराण का अध्याय हमें नहीं मिला। सोलह सोमवार की कथा 1958 की एक छपी पुस्तिका (खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई) में भी है, जिसके संग्रहकर्ता लिखते हैं कि उन्होंने इसे संस्कृत, हिंदी और मराठी की पुरानी हस्तलिखित प्रतियों से सरल हिंदी में लिखा। हमने दोनों कथाएँ छपी पुस्तिकाओं और Drik Panchang से घटना-दर-घटना मिलाकर अपने शब्दों में लिखी हैं; जहाँ कथाओं में अंतर है, वह अंत में "कथा के अलग-अलग रूप" में है।
व्रत और कथा की विधि
- मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका के अनुसार सोमवार का व्रत प्रायः दिन के तीसरे पहर तक रहता है; फलाहार का कोई बँधा नियम नहीं, पर दिन-रात में एक ही बार भोजन किया जाता है। पूजा शिव जी और पार्वती जी दोनों की होती है।
- उसी पुस्तिका के अनुसार प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास) में चंदन, अक्षत, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य, सुपारी, बेलपत्र और जनेऊ से शिव जी की पूजा करके कथा सुनी जाती है। खेमराज की पुस्तिका दिन भर निराहार रहकर संध्या को प्रदोष के समय पार्वती सहित शिव जी की पूजा और "ॐ नमः शिवाय" का जप बताती है।
- गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" (पं. हनुमान शर्मा) के अनुसार सोमवार का व्रत चैत्र, वैशाख, श्रावण, कार्तिक और मार्गशीर्ष में किया जाता है, सबसे अधिक श्रावण में: सुबह स्नान और संकल्प, "ॐ नमः शिवाय" से शिव जी और "ॐ नमः शिवायै" से पार्वती जी की पूजा, फिर एक बार भोजन।
- सोलह सोमवार (खेमराज और मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिकाएँ): आधा सेर गेहूँ के आटे के बिना नमक के रोट या बाटी सेंककर घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाया जाता है, उसके तीन भाग करके भोग लगाया जाता है। एक भाग शिव जी को अर्पित होता है, बाकी प्रसाद के रूप में बाँटा और स्वयं लिया जाता है (बँटवारा पुस्तिकाओं में थोड़ा अलग है, नीचे देखें)।
- सोलह सोमवार पूरे होने पर सत्रहवें सोमवार को उद्यापन होता है: फिर चूरमा बनाकर पूजा, भोग और प्रसाद (दोनों पुस्तिकाएँ); खेमराज की पुस्तिका इसमें अभिषेक, हवन और कथा भी गिनाती है। उद्यापन की पूरी विधि के लिए अपने परिवार की परंपरा या पुरोहित से पूछें।
रोमन अक्षरों में हिंदी: पढ़ने में मदद के लिए, मशीन से बनी। मूल देवनागरी पाठ ही आधार है।
दूसरी भाषा अभी नहीं खुल सकी। इसी भाषा में पढ़ें, या दोबारा दबाएँ।
सोमवार व्रत कथा: साहूकार का बेटा
प्रचलित कथा के अनुसार; Drik Panchang और मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका से मिलाकर। हर सोमवार के व्रत में यही कथा पढ़ी जाती है।
किसी नगर में एक बहुत धनी साहूकार रहता था। वह शिव जी का सच्चा भक्त था और उसके घर किसी चीज़ की कमी नहीं थी, पर उसके कोई संतान नहीं थी। यही दुख उसे दिन-रात घेरे रहता कि इतनी संपत्ति का कोई वारिस नहीं। पुत्र की इच्छा से वह हर सोमवार विधि से व्रत रखता और रोज़ संध्या को शिव मंदिर में शिव जी के आगे दीपक जलाकर प्रार्थना करता।
उसकी भक्ति देखकर एक दिन पार्वती जी ने शिव जी से कहा, "स्वामी, यह साहूकार सच्चे मन से हर सोमवार आपका व्रत और पूजा करता है। इसकी इच्छा पूरी कीजिए।" शिव जी बोले, "देवी, यह संसार कर्म की भूमि है; जो जैसा बोता है, वैसा ही पाता है। पिछले कर्मों के कारण इसके भाग्य में पुत्र नहीं है।" पार्वती जी ने फिर विनती की, "आप तो अपने भक्तों का दुख सदा हरते हैं। यह आपका भक्त है, इसका दुख भी दूर कीजिए।"
तब शिव जी ने कहा, "तुम्हारे कहने से मैं इसे पुत्र का वर देता हूँ, पर वह बालक केवल बारह वर्ष जीएगा।" मंदिर में बैठे साहूकार ने यह बात सुन ली। वह न प्रसन्न हुआ, न दुखी, और पहले की तरह ही नियम से व्रत और पूजा करता रहा।
समय आने पर साहूकार की पत्नी ने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया। घर में मंगल-गीत गाए गए, पर साहूकार मन ही मन बेटे की छोटी आयु की बात जानता था; उसने यह भेद किसी से नहीं कहा। जब बेटा ग्यारह वर्ष का हुआ, तो पत्नी उसके विवाह की बात करने लगी। साहूकार ने कहा, "पहले यह काशी जाकर विद्या पढ़ेगा।"
साहूकार ने अपनी पत्नी के भाई, यानी बालक के मामा, को बुलाया और बहुत-सा धन देकर कहा, "इसे पढ़ने के लिए काशी ले जाओ। रास्ते में जहाँ भी ठहरो, वहाँ यज्ञ कराना और ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देना।" मामा और भांजा इसी तरह यज्ञ और ब्राह्मण-भोजन कराते हुए काशी की ओर चल पड़े।
रास्ते में एक नगर पड़ा, जहाँ उस दिन राजा की बेटी का विवाह था। जो राजकुमार दूल्हा बनकर आया था, उसकी एक आँख नहीं थी, और उसके पिता ने यह बात कन्या के परिवार से छिपा रखी थी। उसे डर था कि सच खुलने पर विवाह टूट जाएगा। साहूकार के सुंदर बेटे को देखकर उसने सोचा कि क्यों न इसी लड़के को दूल्हा बनाकर रस्में पूरी करा ली जाएँ।
उसने मामा से बात की और बहुत धन देने का वचन देकर उसे मना लिया। साहूकार के बेटे को दूल्हे के वस्त्र पहनाए गए और राजकुमारी के साथ उसका विवाह हो गया। पर यह छल लड़के को ठीक नहीं लगा। जाने से पहले उसने राजकुमारी की चुनरी के पल्ले पर लिख दिया: "तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है, पर जिस राजकुमार के साथ तुम्हें विदा किया जाएगा, उसकी एक आँख नहीं है। मैं राजकुमार नहीं, एक साहूकार का बेटा हूँ और पढ़ने के लिए काशी जा रहा हूँ।"
राजकुमारी ने चुनरी पर लिखा पढ़ा तो उस राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया: "मेरा विवाह इससे नहीं हुआ; मेरा पति तो पढ़ने काशी गया है।" सच जानकर राजा ने बेटी को विदा नहीं किया और बारात लौट गई।
उधर मामा और भांजा काशी पहुँच गए। बालक पढ़ाई में लग गया और मामा यज्ञ कराते रहे। जिस दिन बालक बारह वर्ष का हुआ, उस दिन भी यज्ञ हो रहा था। बालक ने मामा से कहा, "आज मेरा जी ठीक नहीं है।" मामा ने उसे भीतर जाकर आराम करने को कहा। वह जाकर लेट गया, और थोड़ी देर में, शिव जी के वचन के अनुसार, उसके प्राण चले गए। मामा ने भीतर जाकर देखा तो वह बहुत व्याकुल हुआ। Drik Panchang की कथा के अनुसार उसने पहले यज्ञ पूरा करके ब्राह्मणों को आदर से विदा किया, और फिर भांजे के लिए रोने लगा।
उसी समय शिव जी और पार्वती जी उधर से जा रहे थे। रोने का स्वर सुनकर पार्वती जी ने कहा, "स्वामी, कोई बहुत दुख में रो रहा है; इसका दुख दूर कीजिए।" वहाँ पहुँचकर पार्वती जी ने बालक को पहचान लिया: "यह तो उसी साहूकार का बेटा है, जिसे आपके वर से जन्म मिला था।" शिव जी बोले, "हाँ देवी, इसकी आयु इतनी ही थी, वह पूरी हो गई।"
पार्वती जी ने विनती की, "प्रभु, इसे और आयु दीजिए, नहीं तो इसके माता-पिता भी इसके बिना नहीं जी पाएँगे। आपके लिए कुछ भी असंभव नहीं।" पार्वती जी के बार-बार कहने पर शिव जी ने बालक को फिर जीवन दे दिया, और वह पहले की तरह स्वस्थ होकर उठ बैठा। फिर शिव-पार्वती कैलास चले गए।
पढ़ाई पूरी होने पर मामा और भांजा यज्ञ कराते हुए घर की ओर लौटे। रास्ते में वही नगर आया जहाँ विवाह हुआ था। वहाँ भी उन्होंने यज्ञ किया, और राजा ने अपने दामाद को पहचान लिया। राजा उन्हें आदर से महल ले गया, खूब सत्कार किया और बहुत-सा धन और दास-दासियाँ देकर बेटी को उसके साथ विदा कर दिया।
घर के पास पहुँचकर मामा पहले खबर देने गया। साहूकार और उसकी पत्नी बेटे की राह देख रहे थे; उन्होंने मन में ठान रखा था कि यदि बेटे के बारे में बुरी खबर आई, तो वे भी नहीं जिएँगे। मामा ने उन्हें बताया कि शिव जी की कृपा से उनका बेटा कुशल से, राजकुमारी बहू और बहुत-से धन के साथ लौट आया है। पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ, फिर दोनों ने आनंद से बेटे और बहू का स्वागत किया, और सारा परिवार सुख से रहने लगा।
कथा कहती है कि जो भी भक्ति से सोमवार का व्रत करता है और यह कथा पढ़ता या सुनता है, उस पर शिव जी और पार्वती जी की कृपा होती है और उसकी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
सोलह सोमवार व्रत कथा
प्रचलित कथा के अनुसार; खेमराज श्रीकृष्णदास की पुस्तिका (1958), मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका और एक तीसरी छपी पुस्तिका से मिलाकर।
एक बार शिव जी और पार्वती जी पृथ्वी पर घूमते हुए अमरावती नाम की सुंदर नगरी में आए (पुरानी पुस्तिका के अनुसार विदर्भ देश में)। वहाँ शिव जी का एक भव्य और मन को शांति देने वाला मंदिर था, और दोनों वहीं ठहर गए। पार्वती जी ने कहा, "नाथ, आइए, आज यहीं चौसर खेलें।" खेल शुरू हुआ।
खेल के बीच मंदिर का पुजारी पूजा करने आया। पार्वती जी ने उससे पूछा, "पुजारी जी, बताइए, यह बाज़ी कौन जीतेगा?" पुजारी बोला, "इस खेल में महादेव जी के बराबर कोई नहीं, इसलिए वही जीतेंगे।" पर बाज़ी पार्वती जी ने जीती। झूठी बात कहने के कारण पार्वती जी ने पुजारी को कोढ़ (कुष्ठ रोग) होने का शाप दे दिया, और शिव-पार्वती वहाँ से चले गए। पुजारी का शरीर रोग से भर गया और वह बहुत दुखी रहने लगा।
कुछ समय बाद स्वर्ग की अप्सराएँ उस मंदिर में शिव जी की पूजा करने आईं। उन्होंने पुजारी से उसके रोग का कारण पूछा, और पुजारी ने सारी बात बता दी। अप्सराएँ बोलीं, "घबराइए नहीं। आप श्रद्धा से सोलह सोमवार का व्रत कीजिए; शिव जी प्रसन्न होकर आपका कष्ट दूर करेंगे।" पुजारी के पूछने पर उन्होंने व्रत और उसके उद्यापन की पूरी विधि बता दी: सोमवार को दिन भर व्रत, संध्या को प्रदोष के समय शिव-पार्वती की पूजा, आटे के चूरमे का तीन भागों में भोग, और सोलह सोमवार पूरे होने पर सत्रहवें सोमवार को उद्यापन।
पुजारी ने श्रद्धा से व्रत किया और अंत में उद्यापन भी किया। व्रत के प्रभाव से उसका रोग चला गया और शरीर पहले जैसा निर्मल हो गया। कुछ दिनों बाद शिव-पार्वती फिर उस मंदिर में आए। पुजारी को स्वस्थ देखकर पार्वती जी ने पूछा, "मेरे शाप से तुम कैसे छूटे?" पुजारी ने हाथ जोड़कर कहा, "माता, अप्सराओं के बताए सोलह सोमवार के व्रत से शिव जी की कृपा हुई और मेरा कष्ट दूर हो गया।"
यह सुनकर पार्वती जी ने भी सोलह सोमवार का व्रत किया। उन दिनों उनके पुत्र कार्तिकेय उनसे रूठकर दूर चले गए थे। व्रत पूरा होते ही कार्तिकेय के मन में अपने-आप माता से मिलने का भाव जागा, और वे लौटकर माता के चरणों में आ गए। उन्होंने पूछा, "माता, ऐसा क्या हुआ कि मेरा मन आपकी ओर खिंच आया?" पार्वती जी ने उन्हें सोलह सोमवार के व्रत की महिमा और विधि बताई।
कार्तिकेय का एक प्रिय ब्राह्मण मित्र बहुत दिनों से कहीं परदेश चला गया था। उससे मिलने की इच्छा से कार्तिकेय ने भी यह व्रत किया, और व्रत पूरा होते ही वह मित्र उनसे आ मिला। मित्र ने इस अचानक मिलन का कारण पूछा तो कार्तिकेय ने व्रत की बात बताई। तब उस ब्राह्मण ने विवाह की इच्छा से यह व्रत किया।
घूमते हुए वह ब्राह्मण एक दूसरे देश में पहुँचा, जहाँ राजा की बेटी का स्वयंवर हो रहा था। राजा ने प्रण किया था कि एक सजी हुई हथिनी जिसके गले में वरमाला डालेगी, उसी से राजकुमारी का विवाह होगा। ब्राह्मण भी स्वयंवर देखने एक ओर जा खड़ा हुआ। हथिनी घूमती हुई आई और उसी ब्राह्मण के गले में माला डाल दी। राजा ने धूमधाम से उसका विवाह राजकुमारी से कर दिया और बहुत धन दिया, और दोनों सुख से रहने लगे।
एक दिन राजकुमारी ने पूछा, "आपने ऐसा कौन-सा पुण्य किया था कि हथिनी ने आपको ही चुना?" ब्राह्मण ने कहा, "मैंने अपने मित्र कार्तिकेय के बताए सोलह सोमवार का व्रत किया था; उसी से तुम मुझे मिलीं।" तब राजकुमारी ने भी एक अच्छे पुत्र की कामना से यह व्रत किया, और समय पर उसके एक गुणी, सुशील पुत्र हुआ।
बड़ा होकर पुत्र ने माता से पूछा कि किस तप से वह उसे मिला। माता ने उसे सोलह सोमवार के व्रत की बात बताई, और उसने राज्य पाने की इच्छा से यह व्रत किया। उन्हीं दिनों एक बूढ़े राजा, जिसकी केवल एक बेटी थी, ने अपनी बेटी का विवाह इसी ब्राह्मण-कुमार से कर दिया, और आगे चलकर राज्य भी उसी को मिला। राजा बनकर भी वह यह व्रत करता रहा।
एक दिन (पुरानी पुस्तिका के अनुसार सत्रहवें सोमवार को, यानी उद्यापन के दिन) राजा ने रानी से कहा कि पूजा की सामग्री लेकर उसके साथ शिव मंदिर चले। रानी स्वयं नहीं गई और उसने सामग्री दासियों के हाथ भिजवा दी। पूजा के बाद आकाशवाणी हुई, "राजा, इस रानी को महल से निकाल दो, नहीं तो तुम्हारा राज्य नहीं बचेगा।" दुखी मन से राजा ने आज्ञा मानी और रानी को महल से विदा कर दिया।
अपने भाग्य को कोसती रानी पैदल चल पड़ी और एक बुढ़िया के घर पहुँची। बुढ़िया ने उसे काम दिया और सूत की गठरी देकर बाज़ार भेजा, पर रास्ते में ऐसी आँधी चली कि गठरी उड़ गई। बुढ़िया ने उसे अपने घर से जाने को कह दिया।
पुरानी पुस्तिका में उसके कष्ट और आगे चलते हैं: वह एक तेली के घर रहने लगी तो तेली के घड़ों का तेल उड़ गया, और तेली ने भी उसे निकाल दिया; एक नदी के किनारे पहुँची तो नदी का पानी सूख गया; एक सरोवर पर गई तो उसका जल पीने लायक नहीं रहा। रानी मन में यही सोचती रही कि यह सब उसके अपने दोष का फल है।
भटकते हुए वह एक आश्रम में पहुँची। वहाँ के गुसाईं जी ने देखते ही समझ लिया कि यह किसी ऊँचे घर की स्त्री है जो विपत्ति में है। उन्होंने कहा, "बेटी, तू मेरी बेटी के समान है; यहीं रह, किसी बात की चिंता मत कर।" रानी आश्रम में रहकर सेवा करने लगी, पर जिस चीज़ को वह छूती, वह खराब हो जाती। गुसाईं जी ने पूछा, "बेटी, किस देव के अपराध से ऐसा हो रहा है?" रानी ने बताया कि उसने पति की बात न मानकर शिव मंदिर में पूजा के लिए जाना टाल दिया था।
गुसाईं जी ने उसके कल्याण के लिए शिव जी से प्रार्थना की और कहा, "बेटी, तू विधि से सोलह सोमवार का व्रत कर।" (पुरानी पुस्तिका के अनुसार गुसाईं जी के तप से प्रसन्न होकर शिव जी स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने बताया कि रानी ने उनका व्रत भंग किया है, और यही व्रत पूरा करने पर उसका पति उसे लेने आएगा।) रानी ने श्रद्धा से व्रत पूरा किया।
व्रत के प्रभाव से राजा को रानी की याद आई और उसने चारों ओर दूत भेजे। दूतों ने रानी को गुसाईं जी के आश्रम में पाया और राजा को बताया। राजा स्वयं आश्रम पहुँचा और गुसाईं जी से विनय से बोला, "महाराज, यह मेरी पत्नी है। मैंने इसे त्याग दिया था; अब इसे मेरे साथ जाने की आज्ञा दीजिए।" गुसाईं जी ने आज्ञा दी, और राजा रानी को लेकर अपने नगर लौटा, जहाँ घर-घर उत्सव हुआ।
इसके बाद राजा-रानी हर वर्ष सोलह सोमवार का व्रत करते हुए आनंद से रहे और अंत में शिवलोक को गए। कथा कहती है कि जो कोई श्रद्धा और विधि से यह व्रत करता है और यह कथा सुनता या सुनाता है, उस पर उमा-महेश्वर प्रसन्न रहते हैं।
कथा के अलग-अलग रूप
- बेटे की आयु: Drik Panchang और मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका में शिव जी बारह वर्ष की आयु देते हैं और बालक ग्यारह वर्ष का होने पर काशी भेजा जाता है; भक्ति भारत की कथा में आयु सोलह वर्ष है और बालक बारह वर्ष का होने पर काशी जाता है।
- वर की बात साहूकार कैसे जानता है: Drik Panchang और मानव विकास फाउंडेशन में वह मंदिर में शिव-पार्वती की बात सुन लेता है; भक्ति भारत में शिव जी उसे स्वप्न में बताते हैं।
- अंत में मानव विकास फाउंडेशन और भक्ति भारत की कथा में उसी रात शिव जी साहूकार को स्वप्न में बताते हैं कि उसके सोमवार व्रत और कथा सुनने से प्रसन्न होकर उन्होंने बेटे को लंबी आयु दी; Drik Panchang की कथा में यह स्वप्न नहीं है।
- राजकुमारी के लिए संदेश: Drik Panchang में चुनरी के पल्ले पर, मानव विकास फाउंडेशन में दुपट्टे पर, भक्ति भारत में ओढ़नी पर लिखा जाता है। Drik Panchang में पहले केवल घुड़चढ़ी और द्वारचार के लिए लड़के को दूल्हा बनाया जाता है, फिर पूरे विवाह के लिए।
- चौसर: मानव विकास फाउंडेशन और भक्ति भारत (दोनों का पाठ एक ही है) में पार्वती जी खेल के बीच पूछती हैं कि कौन जीतेगा और पुजारी महादेव का नाम लेता है; खेमराज की पुस्तिका में पार्वती जी दो बार जीतती हैं, शिव जी हर बार बाज़ी अपनी बताते हैं, और तब पूछने पर पुजारी (जिसे पुस्तिका "गुरव" कहती है) कहता है कि शिव जी जीते।
- खेमराज की पुस्तिका में पुजारी को व्रत बताने वाली एक ही अप्सरा है; बाकी कथाओं में कई अप्सराएँ।
- रानी की भूल: खेमराज की पुस्तिका में सत्रहवें सोमवार को राजा पाँच सेर आटे का चूरमा लेकर चलने को कहता है; रानी इसे कंजूसी समझकर पाँच सेर रुपयों की थाली दासियों के हाथ भेज देती है और स्वयं नहीं जाती। वहाँ आकाशवाणी नहीं, शिव जी संन्यासी (यति) के रूप में आकर रानी को निकालने को कहते हैं, और पुराने मंत्री यह कहकर रोकते हैं कि राज्य तो रानी के पिता का दिया हुआ है।
- खेमराज की पुस्तिका में बूढ़ा राजा स्वयंवर रचाता है, बेटी ब्राह्मण-कुमार को चुनती है, और राजा राज्य सौंपकर तप के लिए वन चला जाता है; बाकी कथाओं में बूढ़े राजा के देहांत के बाद राज्य मिलता है।
- बुढ़िया के यहाँ: खेमराज की पुस्तिका में रूई, बाकी में सूत की गठरी। तेली, नदी और सरोवर वाले कष्ट खेमराज की पुस्तिका और तीसरी पुस्तिका में हैं; तीसरी पुस्तिका में तेल के घड़े चटक जाते हैं, खेमराज में तेल उड़ जाता है। मानव विकास फाउंडेशन और भक्ति भारत में ये प्रसंग नहीं हैं।
- चूरमे का बँटवारा: खेमराज की पुस्तिका में हर सोमवार एक भाग शिव जी की जलाधारी में, एक भाग ब्रह्मचारी बालकों को और एक भाग स्वयं; मानव विकास फाउंडेशन में एक भाग शिव जी को और दो भाग प्रसाद के रूप में बाँटकर स्वयं भी। उद्यापन के चूरमे के लिए खेमराज की पुस्तिका पाँच सेर आटा कहती है, मानव विकास फाउंडेशन और तीसरी पुस्तिका पाव भर।
- खेमराज की पुस्तिका के अनुसार सौराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ भागों में इसी व्रत को "शिव मनसा व्रत" कहते हैं और श्रावण शुक्ल चतुर्थी से कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तक के सोमवारों को रखकर कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को उद्यापन करते हैं। यह स्थानीय रीत है।
कथा के बाद
कथा के बाद शिव जी की आरती "जय शिव ओंकारा" गाई जाती है (मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका में सोमवार की कथाओं के बाद यही आरती है), फिर प्रसाद बाँटा जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सोमवार का व्रत कब से शुरू करें?
गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" के अनुसार सोमवार का व्रत चैत्र, वैशाख, श्रावण, कार्तिक और मार्गशीर्ष में किया जाता है, सबसे अधिक श्रावण में। Drik Panchang के श्रावण सोमवार पन्ने (जिसे वह स्कन्द पुराण के श्रावण माहात्म्य का बताता है) के अनुसार श्रावण शुक्ल पक्ष के पहले सोमवार को संकल्प लेकर व्रत शुरू किया जाता है। सोलह सोमवार के आरंभ पर पुस्तिकाएँ एक बात नहीं कहतीं; अपने परिवार की परंपरा या पुरोहित से पूछ लें।
सोलह सोमवार व्रत क्या है और उद्यापन कब होता है?
लगातार सोलह सोमवार का व्रत, जिसकी कथा ऊपर दूसरी कथा है। पुस्तिकाओं के अनुसार हर सोमवार प्रदोष काल में शिव-पार्वती की पूजा और आधा सेर आटे के चूरमे का तीन भागों में भोग होता है, और सोलह पूरे होने पर सत्रहवें सोमवार को उद्यापन होता है।
सोमवार व्रत में भोजन कब करें?
मानव विकास फाउंडेशन की पुस्तिका के अनुसार व्रत प्रायः दिन के तीसरे पहर तक रहता है और दिन-रात में एक ही बार भोजन होता है। "व्रत-परिचय" पूजा के बाद एक बार भोजन (एकभुक्त) कहती है, और Drik Panchang का श्रावण सोमवार पन्ना रात में एक बार भोजन (नक्त)। शक्ति के अनुसार करें; स्वास्थ्य ठीक न हो तो अपने वैद्य या डॉक्टर से पूछ लें।
सोमवार व्रत कथा किस पुराण में है?
साहूकार के बेटे की कथा और सोलह सोमवार की कथा, दोनों के लिए हमें किसी पुराण का अध्याय नहीं मिला; ये प्रचलित कथाएँ हैं, जो छपी पुस्तिकाओं में चलती आई हैं। गीता प्रेस की "व्रत-परिचय" सोमवार के व्रत की विधि को स्कन्द पुराण का बताती है, और Drik Panchang श्रावण सोमवार की विधि को स्कन्द पुराण के श्रावण माहात्म्य का; ये बातें विधि की हैं, इन दो कथाओं की नहीं।
सोमवार व्रत कथा की PDF कैसे लें?
इस पन्ने पर "प्रिंट / PDF" बटन दबाइए; फ़ोन या कंप्यूटर के प्रिंट विकल्प में "Save as PDF" चुनने पर दोनों कथाएँ PDF बन जाती हैं, बिना बाकी पन्ने के।
स्रोत
- Drik Panchang, "शिव सोमवार व्रत कथा" (drikpanchang.com/vrat-katha/weekdays/somavara/shiva-somavara-vrat-katha.html), 16 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- Drik Panchang, "सावन सोमवार व्रत कथा", श्रावण सोमवार की विधि (drikpanchang.com/vrat-katha/shravana-somavara/shravana-somavara-vrat-katha.html), 16 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- "सोलहसोमवार-व्रतकथा अर्थात् शिवमनसाव्रत-कथा", संग्रहकर्ता पं. सिद्धनाथ शर्मा शास्त्री (भूमिका 1958), खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, मुंबई, संस्करण दिसंबर 2017 (archive.org/details/16-somvar-vrat-katha-khemraj), 16 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- "सप्तवार व्रत, विधि, कथा, आरती", मानव विकास फाउंडेशन, मुंबई (आचार्य अखिलेश द्विवेदी): सोमवार व्रत की विधि, सोमवार व्रत कथा, सोलह सोमवार व्रत कथा (archive.org/details/vrat-katha-book_202601), 16 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- सोलह सोमवार व्रत कथा की एक छपी पुस्तिका का स्कैन (प्रकाशक का नाम नहीं), संकलन "Vrat Katha Book", पृ. 200–203 (archive.org/details/vrat-katha-book), 16 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- "व्रत-परिचय", पं. हनुमान शर्मा, गीता प्रेस, गोरखपुर, परिशिष्ट पृ. 249–250: सोमवार व्रत, श्रावण के सोमवार (archive.org/details/vrat-katha-book), 16 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- भक्ति भारत, "सोमवार व्रत कथा" (bhaktibharat.com/katha/somvar-vrat-katha), 16 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
- भक्ति भारत, "सोलह सोमवार व्रत कथा" (bhaktibharat.com/katha/solah-somvar-vrat-katha), 16 अक्टूबर 2026 को पढ़ी
कुछ गलत लगा? गलती बताएँ
