आरतीशिव

शिव जी की आरती: ॐ जय शिव ओंकारा

परंपरा में: सोमवार

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 1 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
पत्थर के मंदिर में बेलपत्र और धतूरे से सजे शिवलिंग की आरती, सामने नंदी
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. पद 1

    ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

    हे ओंकार स्वरूप शिव, आपकी जय हो। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव हैं, और पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में धारण करते हैं।

  2. पद 2

    एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥

    आप एक मुख (विष्णु), चार मुख (ब्रह्मा) और पाँच मुख (शिव) वाले रूपों में शोभित हैं। हंस पर, गरुड़ पर और बैल (नंदी) पर विराजते हैं।

  3. पद 3

    दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

    आप दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं वाले रूपों में अत्यंत सुंदर लगते हैं। आपके तीनों गुणों वाले रूप देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।

  4. पद 4

    अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी। चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी॥

    आप अक्षमाला (जपमाला), वनमाला और मुंडमाला धारण करते हैं। चंदन और कस्तूरी का लेप शोभित है, और माथे पर चंद्रमा है।

  5. पद 5

    श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥

    आप श्वेत वस्त्र, पीले वस्त्र और बाघ की खाल धारण करते हैं। आपके साथ सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि और भूत-गण रहते हैं।

  6. पद 6

    कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूलधारी। सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥

    आपके हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल हैं। आप सुख देने वाले, दुख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।

  7. पद 7

    ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥

    अविवेकी लोग ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग मानते हैं, पर प्रणव अक्षर ॐ में ये तीनों एक ही हैं।

  8. पद 8

    त्रिगुणस्वामी जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥

    शिवानंद स्वामी कहते हैं कि तीनों गुणों के स्वामी की यह आरती जो कोई गाता है, उसे मनचाहा फल मिलता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/shiv-aarti/

संक्षेप में

“ॐ जय शिव ओंकारा” भगवान शिव की सबसे प्रचलित आरती है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव के मुख, वाहन, वस्त्र और आभूषणों का साथ-साथ वर्णन करके बताया गया है कि ॐकार (प्रणव) में ये तीनों एक हैं। यह सोमवार, सावन के महीने, प्रदोष, महाशिवरात्रि और प्रतिदिन की शिव पूजा में गाई जाती है।

यहाँ आरती के मूल आठ पद दिए गए हैं। कई प्रचलित संस्करणों में चार पद और गाए जाते हैं, जो इन पंक्तियों से शुरू होते हैं: ‘लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा’, ‘पर्वत सोहैं पार्वती’, ‘जटा में गंगा बहत है’ और ‘काशी में विराजे विश्वनाथ’। कहीं पद 4 की दूसरी पंक्ति ‘त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी’, पद 6 की दूसरी पंक्ति ‘जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता’, और अंतिम पंक्ति ‘सुख संपति पावे’ भी मिलती है। गाते समय पहली पंक्ति (टेक) हर पद के बाद दोहराई जाती है।

आरती के बाद प्रायः यह श्लोक बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

“ॐ जय शिव ओंकारा” आरती किसने लिखी?

अंतिम पद में ‘कहत शिवानन्द स्वामी’ आता है। रचयिता के बारे में इससे अधिक प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।

इस आरती में ब्रह्मा और विष्णु का वर्णन क्यों है?

आरती का मूल भाव यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव ॐकार में एक ही हैं, और केवल अविवेकी उन्हें अलग मानते हैं। इसलिए पदों में तीनों के मुख, वाहन, वस्त्र और आयुध साथ-साथ गिनाए गए हैं।

यह आरती कब गाई जाती है?

सोमवार को, सावन के महीने में, प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि पर, और प्रतिदिन की शिव पूजा के अंत में।

इस आरती में कितने पद हैं?

मूल पाठ में आठ पद हैं। कई संस्करणों में चार पद अधिक गाए जाते हैं, जिनका उल्लेख ऊपर टिप्पणी में है।

स्रोत

  1. परंपरागत आरती पाठ

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पाठ का मिलान: drikpanchang.com, bhaktibharat.com, hindi.webdunia.com