षटतिला एकादशी की कथा पद्म पुराण (उत्तर खंड) में है। उसमें पुलस्त्य मुनि दाल्भ्य ऋषि को माघ मास की यह विधि बताते हैं, जिसमें तिल का छह तरह से उपयोग होता है, और फिर श्रीकृष्ण नारद को एक ब्राह्मणी की कहानी सुनाते हैं। वह बहुत व्रत करती थी पर कभी अन्न या भिक्षा नहीं देती थी; भिक्षु बनकर आए भगवान को उसने मिट्टी का ढेला दिया। स्वर्ग में उसे अन्न से खाली घर मिला, और देव-पत्नियों से षटतिला एकादशी का व्रत जानकर उसे करने पर ही उसका घर धन-धान्य से भरा।
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षटतिला एकादशी माघ कृष्ण एकादशी (पूर्णिमांत पंचांग; अमांत पंचांग में पौष कृष्ण) को आती है। “षट्” का अर्थ है छह और “तिल” तिल: इस दिन तिल के छह उपयोग बताए गए हैं, और दान, विशेषकर तिल और अन्न के दान, पर इस कथा का ज़ोर है। पूजा के बाद यह कथा पढ़ी या सुनी जाती है।
पद्म पुराण के उत्तर खंड में यह अध्याय दो भागों में है: पहले पुलस्त्य मुनि की बताई विधि, फिर श्रीकृष्ण की सुनाई ब्राह्मणी की कहानी। हमने दोनों को संस्कृत मूल और देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद से मिलाकर, और Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक से तुलना करके, अपने शब्दों में लिखा है। गीता प्रेस की एकादशी पुस्तक में इस अध्याय की विधि तो है, पर ब्राह्मणी की कहानी नहीं है।
व्रत और कथा की विधि
- पद्म पुराण के अनुसार माघ मास आने पर स्नान करके, इंद्रियों को वश में रखकर, काम, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, लोभ और चुगली छोड़कर भगवान का स्मरण किया जाता है।
- ग्रंथ गोबर में तिल और कपास मिलाकर 108 पिंडियाँ बनाने को कहता है; ISKCON की पुस्तक और Drik Panchang के अनुसार इन्हें होम में अर्पित किया जाता है।
- एकादशी को स्नान करके भगवान की पूजा, श्रीकृष्ण के नामों का कीर्तन, उपवास, रात को जागरण और होम। अगले दिन चंदन, अगर और कपूर से पूजा और खिचड़ी का भोग।
- कुम्हड़े, नारियल या बिजौरे से अर्घ्य दिया जाता है; ये न हों तो सुपारी से। अर्घ्य के श्लोक का भाव है: हे कृष्ण, आप दयालु हैं और बेसहारों का सहारा हैं; संसार-सागर में डूबे हम पर प्रसन्न होइए, और लक्ष्मी जी के साथ यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए।
- फिर ब्राह्मण को जल का घड़ा, छाता, जूते और वस्त्र, सामर्थ्य हो तो काली गाय, और तिल से भरा पात्र दान किया जाता है।
- तिल के छह उपयोग, जिनसे इसका नाम षटतिला है, ग्रंथ एक श्लोक में गिनाता है: "तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी। तिलदाता च भोक्ता च षट्तिलाः पापनाशनाः॥" अर्थात तिल मिले जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से होम, तिल मिला जल, तिल का दान और तिल का भोजन; ग्रंथ कहता है कि ये छह पाप नष्ट करते हैं। (गीता प्रेस में अंतिम शब्द "षट्तिला पापनाशिनी" है।)
पुलस्त्य मुनि और दाल्भ्य ऋषि
पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 42 का पहला भाग (गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय 44); संस्कृत मूल, देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद और गीता प्रेस के हिंदी अनुवाद से मिलाकर।
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा, "जगन्नाथ, माघ मास के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है? उसका नाम और उसकी विधि मुझे विस्तार से बताइए।" श्रीकृष्ण बोले, "नृपश्रेष्ठ, वह षटतिला नाम से प्रसिद्ध है और सब पापों का नाश करती है। उसकी वह पाप हरने वाली कथा सुनो, जो मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्य ने दाल्भ्य ऋषि को सुनाई थी।"
दाल्भ्य ने पूछा, "ब्रह्मन्, मृत्युलोक में आकर जीव ब्रह्महत्या जैसे बड़े पाप करते हैं, दूसरों का धन हरते हैं और दूसरों की विपत्ति पर मोहित होते हैं। वे नरक जाने से कैसे बचें? कृपा करके बताइए कि बिना कठिन श्रम के, थोड़े-से दान से ही पाप कैसे शांत हो सकते हैं।"
पुलस्त्य बोले, "महाभाग, तुमने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। यह गुप्त बात विष्णु, ब्रह्मा और इंद्र जैसे देवताओं ने भी किसी को नहीं बताई, पर तुम्हारे पूछने पर मैं बताता हूँ।" फिर उन्होंने माघ मास की वह विधि बताई जो ऊपर "व्रत और कथा की विधि" में दी गई है: संयम, गोबर-तिल-कपास की पिंडियाँ, एकादशी का उपवास, कीर्तन, जागरण और होम, अगले दिन की पूजा और अर्घ्य, और ब्राह्मण को दान।
पुलस्त्य ने आगे कहा कि दान किए हुए तिल बोने पर जितने पौधे उगें, उतने हज़ार वर्ष तक दाता स्वर्ग में सम्मान पाता है; और तिल के छह उपयोग, जिनके कारण यह एकादशी षटतिला कहलाती है, पापों का नाश करते हैं।
दान न करने वाली ब्राह्मणी की कथा
पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 42 का दूसरा भाग; संस्कृत मूल और देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद से, Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक के रूपों से मिलाकर। गीता प्रेस की पुस्तक में यह भाग नहीं है।
देवर्षि नारद ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, "महाबाहु कृष्ण, षटतिला एकादशी के व्रत से कैसा फल मिलता है? यदि आप प्रसन्न हैं, तो उसकी कथा सहित मुझे बताइए।" श्रीकृष्ण बोले, "नारद, मैंने जो अपनी आँखों से देखा, वही बताता हूँ, सुनो।"
"बहुत पहले मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदा व्रत और देव-पूजा में लगी रहती, महीने-महीने भर उपवास करती और मेरी भक्त थी। उपवासों से उसका शरीर बहुत दुर्बल हो गया था। वह देवताओं, ब्राह्मणों और कन्याओं को भक्ति से घर जैसी बड़ी चीज़ें तक दान कर देती थी, और कठिन तप करती थी। पर उसने कभी किसी भिक्षुक को भिक्षा नहीं दी, न ब्राह्मणों को भोजन कराकर तृप्त किया।"
"बहुत समय बाद मैंने सोचा: व्रतों से इसका शरीर तो शुद्ध हो गया है, और शरीर को कष्ट देकर इसने मेरी उपासना की है, पर इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, जिससे जीवों को सच्ची तृप्ति मिलती है। यह सोचकर मैं कपाल-धारी भिक्षु का रूप लेकर मृत्युलोक में आया और भिक्षा-पात्र लेकर उससे भिक्षा माँगी।"
"उसने पूछा, ‘ब्रह्मन्, तुम कहाँ से आए हो और कहाँ जाओगे?’ मैंने फिर कहा, ‘सुंदरी, भिक्षा दो।’ इस पर उसने बड़े क्रोध से मेरे ताँबे के पात्र में मिट्टी का एक ढेला डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग लौट गया।"
"बहुत समय बाद वह तपस्विनी अपने व्रतों के प्रभाव से सदेह स्वर्ग आई। मिट्टी के ढेले के दान से उसे वहाँ एक सुंदर घर मिला, पर उसमें अन्न का एक दाना न था। घर में कुछ भी न देखकर वह बाहर निकली और बड़े क्रोध में मेरे पास आकर बोली, ‘मैंने अनगिनत व्रतों, कठिन तपों और उपवासों से जगत के पालनहार की पूजा की, फिर भी हे जनार्दन, मेरे घर में कुछ भी दिखाई नहीं देता।’"
"मैंने उससे कहा, ‘अपने घर जाओ। देवताओं की पत्नियाँ कौतूहल से तुम्हें देखने आएँगी। जब तक वे तुम्हें षटतिला एकादशी का पुण्य न सुनाएँ, तब तक दरवाज़ा मत खोलना।’"
"वह लौट गई। कुछ समय बाद देव-पत्नियाँ आईं और बोलीं, ‘शोभने, हम तुम्हें देखने आई हैं, दरवाज़ा खोलो।’ उसने कहा, ‘यदि मुझे देखना है, तो पहले सच-सच षटतिला एकादशी के व्रत का पुण्य बताओ, तभी मैं दरवाज़ा खोलूँगी।’ उनमें से कोई कुछ न बोली; पर फिर एक देव-पत्नी ने, उस मानवी को देखने की इच्छा से, षटतिला का व्रत बता दिया।"
"तब उसने दरवाज़ा खोला। देव-पत्नियों ने देखा कि वह न देवी है, न गंधर्वी, न असुरी, न नाग-कन्या, बल्कि एक मानवी है, जैसी उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी। देव-पत्नियों के बताए अनुसार उसने षटतिला एकादशी का व्रत किया, जो भोग और मोक्ष दोनों देता है। उसी क्षण उसे सुंदर रूप और कांति मिली, और उसका घर धन, अन्न, वस्त्र, सोने-चाँदी और हर सुख-सामग्री से भर गया।"
कथा के अंत में सीख दी गई है: मनुष्य को लालच में नहीं पड़ना चाहिए और धन होते हुए कंजूसी नहीं करनी चाहिए; अपनी सामर्थ्य के अनुसार तिल और वस्त्र दान करने चाहिए। ग्रंथ के अनुसार षटतिला का उपवास करने वाले को जन्म-जन्म तक आरोग्य मिलता है और दरिद्रता, कष्ट और दुर्भाग्य नहीं आते; विधि से योग्य व्यक्ति को दिया दान सब पापों का नाश करता है।
कथा के अलग-अलग रूप
- गीता प्रेस की एकादशी पुस्तक में षटतिला का अध्याय तिल के छह उपयोगों पर समाप्त हो जाता है; उसमें ब्राह्मणी की कहानी नहीं है। कहानी पद्म पुराण के संस्कृत पाठ, देशपांडे के अनुवाद, Drik Panchang और ISKCON की पुस्तक में है।
- पिंडियाँ बनाने और व्रत का नियम लेने का नक्षत्र स्रोतों में अलग है: संस्कृत पाठ में आषाढ़ (पूर्वाषाढ़ा) या मूल नक्षत्र, गीता प्रेस में आर्द्रा या मूल, Drik Panchang में उपले पुष्य नक्षत्र में और व्रत मूल नक्षत्र में, और ISKCON की पुस्तक में पूर्वाषाढ़ा।
- गोबर के बारे में संस्कृत पाठ “भूमि पर न गिरा हुआ” कहता है, और ISKCON की पुस्तक भी ज़मीन छूने से पहले लेने को कहती है; गीता प्रेस और देशपांडे “भूमि पर पड़ा हुआ” पढ़ते हैं।
- Drik Panchang में ब्राह्मणी के घर के साथ एक आम का पेड़ भी है, और भगवान किसी विशेष वेश का उल्लेख किए बिना भिक्षा माँगते हैं; ISKCON की पुस्तक में वे शिव के अनुयायी जैसे कपाल-माला वाले भिक्षु बनते हैं और ब्राह्मणी बूढ़ी है। Drik Panchang में ब्राह्मणी की पूरी कहानी पुलस्त्य के कथन के भीतर आती है, और ISKCON की पुस्तक युधिष्ठिर वाले प्रसंग के बिना सीधे दाल्भ्य और पुलस्त्य के संवाद से शुरू होती है।
- ISKCON की पुस्तक में देव-पत्नियाँ पहली बार कुछ नहीं बतातीं और बाद में लौटकर बताती हैं। ISKCON की पुस्तक यह कथा भविष्योत्तर पुराण की बताती है; हमने इसे वहाँ नहीं जाँचा।
कथा के बाद
कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती और एकादशी माता की आरती गाई जाती है, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार तिल, अन्न और वस्त्र का दान किया जाता है। व्रत अगले दिन द्वादशी को पारण के समय खोला जाता है; अपने शहर का पारण समय षटतिला एकादशी के पन्ने पर है।
एकादशी माता की आरती: ॐ जय एकादशी माताअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
षटतिला एकादशी की कथा किस पुराण में है?
पद्म पुराण के उत्तर खंड में। संस्कृत विकिस्रोत और देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह अध्याय 42 है, और गीता प्रेस के संस्करण में अध्याय 44 (वह तिल वाले श्लोक को 44.24 बताता है)।
षटतिला एकादशी में तिल के छह उपयोग कौन-से हैं?
पद्म पुराण के अनुसार: तिल मिले जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से होम, तिल मिला जल, तिल का दान और तिल का भोजन।
षटतिला एकादशी की कथा की सीख क्या है?
कि व्रत और तप के साथ दान भी ज़रूरी है। कथा की ब्राह्मणी ने बहुत उपवास किए, पर अन्न नहीं दिया, इसलिए स्वर्ग में उसका घर खाली मिला; ग्रंथ कहता है कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार तिल, अन्न और वस्त्र दान करें।
षटतिला एकादशी व्रत कथा कब पढ़ें?
परंपरा में एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के बाद, आरती से पहले।
स्रोत
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 42, संस्कृत विकिस्रोत (अध्याय संख्या संस्करण के अनुसार बदलती है)
- पद्म पुराण, उत्तर खंड, अध्याय 42, एन. ए. देशपांडे का अंग्रेज़ी अनुवाद (मोतीलाल बनारसीदास; wisdomlib.org)
- गीता प्रेस, गोरखपुर: एकादशी-व्रत का माहात्म्य, संकलन राधेश्याम खेमका, पृ. 19–21 (केवल विधि; ब्राह्मणी की कहानी नहीं)
- ISKCON की Ekadasi पुस्तक का पाठ: षटतिला एकादशी (iskcondesiretree.com)
- Drik Panchang: षटतिला एकादशी व्रत कथा (हिंदी और अंग्रेज़ी), drikpanchang.com
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