काश्मीर शैव दर्शन, जिसे उसके अपने ग्रंथ त्रिक शास्त्र या त्रिक शासन कहते हैं, कश्मीर में 9वीं सदी के आसपास से विकसित शिव-उपासना और दर्शन की अद्वैतवादी परंपरा है। इसके अनुसार शिव ही एकमात्र सत्य हैं, जो अपनी स्वतंत्र इच्छा से जगत को अपने भीतर, जैसे दर्पण में, प्रकट करते हैं; जीव वास्तव में शिव ही है, पर इसे भूला हुआ है, और मुक्ति इस “पहचान” (प्रत्यभिज्ञा) से होती है। परंपरा इसकी शुरुआत वसुगुप्त को प्रकट हुए शिव सूत्रों से मानती है; सोमानंद, उत्पलदेव, अभिनवगुप्त और क्षेमराज इसके प्रमुख आचार्य हैं।
- आचार्य
- वसुगुप्त, कल्लट, सोमानंद, उत्पलदेव, अभिनवगुप्त, क्षेमराज; 20वीं सदी में स्वामी लक्ष्मण जू
- दर्शन
- अद्वैत: शिव ही एकमात्र सत्य, जीव और शिव एक; मुक्ति प्रत्यभिज्ञा (पहचान) से
- शाखाएँ
- स्पंद शास्त्र (वसुगुप्त, कल्लट) और प्रत्यभिज्ञा शास्त्र (सोमानंद, उत्पलदेव); अभिनवगुप्त ने दोनों को त्रिक में समेटा
- मुख्य ग्रंथ
- शिव सूत्र (77 सूत्र), स्पंद-कारिका, सोमानंद की शिवदृष्टि, उत्पलदेव की ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-कारिका, अभिनवगुप्त के तंत्रालोक, तंत्रसार और ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, क्षेमराज का प्रत्यभिज्ञाहृदयम् और शिवसूत्र-विमर्शिनी
- काल
- लगभग 9वीं सदी से; अभिनवगुप्त की तिथि-युक्त रचनाएँ 990–1015 के बीच
- मुख्य स्थान
- कश्मीर घाटी: श्रीनगर के पास महादेव पर्वत (वसुगुप्त की परंपरा), मगाम के पास भैरव गुफा (अभिनवगुप्त की परंपरा)
काश्मीर शैव दर्शन क्या है
“काश्मीर शैव” नाम इसे दूसरे शैव मतों से अलग पहचानने के लिए दिया गया आधुनिक नाम है। जगदीश चंद्र चटर्जी (1914) के अनुसार इसके ग्रंथ इसे त्रिक शासन, त्रिक शास्त्र या केवल त्रिक कहते हैं, और दर्शन के रूप में यह आदर्शवादी अद्वैत है, इसलिए यह माधव के सर्वदर्शनसंग्रह के “शैव दर्शन” (शैव सिद्धांत) से मूल रूप से अलग है; वहाँ इसका वर्णन “प्रत्यभिज्ञा दर्शन” नाम से है।
त्रिक नाम “तीन के समूह” से है। के. सी. पांडेय के अनुसार इसके दो कारण बताए जाते हैं: इस मत के आगमों में सिद्धा, नामक और मालिनी, ये तीन सबसे प्रमाण माने जाते हैं; और यह तीन त्रिकों की बात करता है: शिव, शक्ति और उनका मिलन; शिव, शक्ति और नर (जीव); और परा, अपरा और परापरा, ये तीन देवियाँ।
संक्षिप्त इतिहास
चटर्जी के अनुसार त्रिक कश्मीर में 9वीं सदी के आरंभ में, या शायद 8वीं सदी के अंत में, प्रकट हुआ। शिव सूत्रों का रचयिता परंपरा स्वयं शिव को मानती है, और ये सूत्र वसुगुप्त को प्रकट हुए। क्षेमराज की शिवसूत्र-विमर्शिनी की कथा में महादेव पर्वत के नीचे रहने वाले वसुगुप्त को स्वप्न में शिव ने बताया कि ये सूत्र एक शिला पर लिखे हैं, जो उनके स्पर्श से पलट जाएगी; चटर्जी लिखते हैं कि वह शिला आज भी “शंकरपाल” (संस्कृत शंकरोपल) नाम से दिखाई जाती है, यद्यपि उस पर कोई लेख नहीं दिखता। कल्लट की स्पंद-वृत्ति में, जो चटर्जी के अनुसार इस कथा का सबसे पुराना रूप है, केवल यह है कि शिव ने स्वप्न में वसुगुप्त को सूत्र सिखाए।
भांडारकर के अनुसार वसुगुप्त के शिष्य कल्लट राजा अवंतिवर्मा के समय में थे, इसलिए वसुगुप्त का काल 9वीं सदी का आरंभ है। प्रत्यभिज्ञा शास्त्र के प्रवर्तक सोमानंद थे, जिनकी रचना शिवदृष्टि है; उनके शिष्य उत्पलदेव की ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-कारिका (चटर्जी के अनुसार 190 श्लोक) ने उनके विचारों को संक्षेप में रखा और आगे चलकर अधिक प्रचलित हुई।
अभिनवगुप्त इस परंपरा के सबसे बड़े आचार्य माने जाते हैं। पांडेय के अनुसार उनकी तिथि-युक्त रचनाएँ सप्तर्षि संवत् 4066 से 4090, यानी 990–91 से 1014–15 ई. के बीच की हैं; तंत्रालोक, तंत्रसार, परात्रिंशिका-विवरण और ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं, और नाट्यशास्त्र पर उनकी टीका भी प्रसिद्ध है। पांडेय कश्मीर में प्रचलित एक परंपरा दर्ज करते हैं, जिसका कोई लिखित आधार उन्हें नहीं मिला, कि अभिनवगुप्त अपने शिष्यों के साथ मगाम के पास की भैरव गुफा में चले गए और फिर दिखाई नहीं दिए। उनके शिष्य क्षेमराज ने प्रत्यभिज्ञाहृदयम् और शिव सूत्रों पर विमर्शिनी लिखी। 20वीं सदी में स्वामी लक्ष्मण जू ने इस परंपरा के अध्ययन और साधना, दोनों को नया जीवन दिया (विकिपीडिया)।
विश्वास और साधना
भांडारकर स्पंद शास्त्र का मत इस प्रकार बताते हैं: ईश्वर को जगत रचने के लिए न किसी प्रेरक कारण (जैसे कर्म) की आवश्यकता है, न किसी उपादान (जैसे प्रधान या माया) की; वे केवल अपनी इच्छा से जगत को अपने भीतर, अपने से अलग जैसा, प्रकट करते हैं, जैसे दर्पण में नगर दिखता है, और दर्पण की तरह उससे अछूते रहते हैं। जीव परमात्मा ही है, पर तीन मलों के कारण इसे नहीं देखता: आणव (अपने को सीमित मानना), मायीय (माया से बने शरीर में रहना) और कार्म (कर्म से उपजा)। ध्यान में परम सत्ता का दर्शन होने पर, जिसे भैरव कहा गया है, मल हटते हैं और जीव मुक्त होता है।
प्रत्यभिज्ञा मत में मार्ग “पहचान” है। भांडारकर इसके ग्रंथों की एक उपमा देते हैं: एक युवती किसी युवक के गुण सुनकर उससे प्रेम करने लगती है, पर जब उसे उसके सामने लाया जाता है तो उसे साधारण व्यक्ति समझती है; जैसे ही उसे बताया जाता है कि यह वही है, वह आनंद से भर जाती है। वैसे ही जीव शिव होकर भी आनंद नहीं पाता, जब तक गुरु के उपदेश से वह अपने भीतर शिव को पहचान न ले।
शिव सूत्र तीन उन्मेषों (खंडों) में हैं, जो मुक्ति के तीन उपाय बताते हैं: शाम्भवोपाय (22 सूत्र), शाक्तोपाय (10) और आणवोपाय (45), कुल 77 सूत्र। भांडारकर माधव का मत उद्धृत करते हैं कि ये दोनों शाखाएँ प्राणायाम जैसे बाहरी अनुशासन को आवश्यक नहीं मानतीं, जैसा दूसरी शैव शाखाएँ मानती हैं।
प्रमुख स्थान
यह परंपरा कश्मीर घाटी की है। विकिपीडिया के अनुसार वसुगुप्त श्रीनगर के शालीमार बाग़ के पीछे हरवान नाले की घाटी में महादेव पर्वत के पास रहते थे; चटर्जी के अनुसार शंकरपाल शिला आज भी घाटी में दिखाई जाती है। पांडेय लिखते हैं कि भैरव गुफा मगाम से लगभग पाँच मील दूर है, जो श्रीनगर और गुलमर्ग के बीच है, और उन्होंने स्वयं वह गुफा देखी थी। आज इसके ग्रंथ अनुवादों और विद्वानों के अध्ययन से दुनिया भर में पढ़े जाते हैं।
स्रोतों में अंतर
- शिव सूत्र कैसे मिले: क्षेमराज के अनुसार शिव ने स्वप्न में बताया और सूत्र एक शिला पर लिखे मिले; कल्लट के अनुसार शिव ने स्वप्न में ही सिखाए; भांडारकर एक तीसरा रूप भी बताते हैं जिसमें सूत्र एक सिद्ध ने प्रकट किए। चटर्जी शिला की कथा को बाद का विकास मानते हैं।
- स्पंद-कारिका: क्षेमराज इन्हें वसुगुप्त की रचना मानते हैं; चटर्जी और भांडारकर के अनुसार इनके रचयिता संभवतः कल्लट हैं, जिन्होंने गुरु से पाया ज्ञान शिष्यों के लिए लिखा। श्लोकों की संख्या भांडारकर 51 और चटर्जी 52 बताते हैं।
- अभिनवगुप्त का समय: पांडेय तिथि-युक्त रचनाओं से 990–91 से 1014–15 ई. का रचना-काल देते हैं, भांडारकर 993–1015; विकिपीडिया जीवन-काल लगभग 950–1016 देता है।
- सोमानंद का समय: भांडारकर उन्हें 10वीं सदी की पहली चौथाई में रखते हैं; विकिपीडिया 875–925 देता है।
- कश्मीर में केवल त्रिक नहीं था: विकिपीडिया के अनुसार 10वीं सदी में कश्मीर के नारायणकंठ और रामकंठ द्वैतवादी शैव सिद्धांत के प्रमुख भाष्यकार थे, इसलिए “काश्मीर शैव” नाम प्रायः केवल अद्वैत त्रिक परंपरा के लिए प्रयोग होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
काश्मीर शैव दर्शन क्या है?
कश्मीर में 9वीं सदी के आसपास से विकसित अद्वैतवादी शैव परंपरा, जिसे उसके ग्रंथ त्रिक कहते हैं। इसके अनुसार शिव ही एकमात्र सत्य हैं, जीव वास्तव में शिव ही है, और मुक्ति इस सत्य की पहचान (प्रत्यभिज्ञा) से होती है।
प्रत्यभिज्ञा का क्या अर्थ है?
“पहचान”: जीव शिव ही है, पर इसे भूला हुआ है; गुरु के उपदेश से जब वह अपने भीतर शिव को पहचानता है, तब उसे शिव का आनंद मिलता है। यह नाम उत्पलदेव की ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-कारिका से आया है।
शिव सूत्र क्या हैं?
काश्मीर शैव दर्शन का मूल ग्रंथ: तीन खंडों में 77 छोटे सूत्र, जिन्हें परंपरा शिव की रचना मानती है और जो वसुगुप्त को प्रकट हुए। इन पर क्षेमराज की विमर्शिनी और भास्कर का वार्तिक प्रसिद्ध टीकाएँ हैं।
अभिनवगुप्त कौन थे?
काश्मीर शैव दर्शन के सबसे बड़े आचार्य, जिनकी तिथि-युक्त रचनाएँ 990–1015 ई. के बीच की हैं। उन्होंने तंत्रालोक, तंत्रसार और ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी लिखे, और नाट्यशास्त्र पर उनकी टीका भारतीय सौंदर्यशास्त्र का प्रमुख ग्रंथ है।
काश्मीर शैव और शैव सिद्धांत में क्या अंतर है?
काश्मीर शैव अद्वैतवादी है: शिव ही सब कुछ हैं और जीव शिव से अलग नहीं। शैव सिद्धांत शिव, जीव और बंधनों को अलग सच्ची सत्ताएँ मानता है। माधव का सर्वदर्शनसंग्रह भी इन्हें “प्रत्यभिज्ञा दर्शन” और “शैव दर्शन”, दो अलग दर्शनों के रूप में रखता है।
स्रोत
- जगदीश चंद्र चटर्जी, Kashmir Shaivaism, भाग 1 (Kashmir Series of Texts and Studies, श्रीनगर, 1914) (archive.org)
- रामकृष्ण गोपाल भांडारकर, Vaiṣṇavism, Śaivism and Minor Religious Systems (1913), §97–99 “Kaśmīr Śaivism” (archive.org)
- कांतिचंद्र पांडेय, Abhinavagupta: An Historical and Philosophical Study (दूसरा संस्करण; पहला 1935), अध्याय 1 और त्रिक पर अध्याय (archive.org)
- शिवसूत्राणि, संस्कृत पाठ, तीन उन्मेषों में सूत्रों की गिनती (sanskritdocuments.org)
- विकिपीडिया (अंग्रेज़ी): “Kashmir Shaivism”, “Trika”, “Shiva Sutras of Vasugupta”, “Abhinavagupta”
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