सम्प्रदाय

शैव सिद्धांत

संक्षेप में

शैव सिद्धांत शिव की उपासना की वह परंपरा है जो 28 शैव आगमों को प्रमाण मानती है और आज मुख्य रूप से तमिलनाडु, दक्षिण भारत और श्रीलंका के शैवों में जीवित है। इसका दर्शन तीन सत्ताएँ मानता है: पति (स्वामी, यानी शिव), पशु (जीव) और पाश (वे बंधन जो जीव को बाँधते हैं), और सिखाता है कि जीव दीक्षा, साधना और शिव की कृपा से इन बंधनों से छूटता है। तमिल परंपरा में वेद और आगमों के साथ नायनार संतों के भजनों का संग्रह तिरुमुरै और 13वीं–14वीं सदी के 14 सिद्धांत शास्त्र इसके ग्रंथ हैं; इनमें 13वीं सदी के मेयकण्डदेव का बारह सूत्रों वाला शिवज्ञानबोधम् आधार-ग्रंथ माना जाता है।

आराध्य
शिव, जिन्हें इस दर्शन में पति (स्वामी) कहा जाता है
दर्शन
तीन सत्ताएँ: पति (शिव), पशु (जीव), पाश (आणव, कर्म और माया के बंधन)
आचार्य
तमिल में मेयकण्डदेव (13वीं सदी), अरुळनंदि शिवाचार्य, उमापति शिवाचार्य; संस्कृत में सद्योज्योति, नारायणकंठ, रामकंठ, अघोरशिव
संत
नायनार (परंपरा के अनुसार 63), जिनमें तिरुज्ञानसंबंदर, अप्पर, सुंदरर और माणिक्कवाचकर प्रमुख
मुख्य ग्रंथ
28 शैव आगम (जैसे कामिक); तमिल तिरुमुरै; 14 सिद्धांत शास्त्र, विशेषकर मेयकण्डदेव का शिवज्ञानबोधम्; अघोरशिव की पूजा-पद्धतियाँ
मार्ग
चर्या (आचरण), क्रिया (पूजा), योग और ज्ञान
मुख्य केंद्र
तमिलनाडु के शिव मंदिर; चिदंबरम (अघोरशिव का मठ); तिरुवावडुतुरै, धर्मपुरम और तिरुप्पनंदाळ के अधीनम् (मठ); श्रीलंका
प्रमुख मंत्र
पंचाक्षर: नमः शिवाय

शैव सिद्धांत क्या है

“सिद्धांत” का अर्थ है स्थापित, प्रमाणित मत। शैव सिद्धांत उन शैवों का दर्शन और पूजा-विधान है जो वेदों के साथ शैव आगमों को शिव की वाणी मानते हैं। दासगुप्त लिखते हैं कि आगम-आधारित शैव मत मुख्य रूप से तमिल देश का है, जैसे पाशुपत गुजरात का, प्रत्यभिज्ञा कश्मीर का और वीरशैव कन्नड़ प्रदेश का। परंपरा 28 शैव आगम गिनती है, जिनमें कामिक प्रमुख है।

तमिल शैव सिद्धांत के ग्रंथ चार धाराओं से हैं: वेद, शैव आगम, नायनार संतों के तमिल भजन (तिरुमुरै) और मेयकण्डदेव और उनके उत्तराधिकारियों के 14 दार्शनिक ग्रंथ, जिन्हें सिद्धांत शास्त्र या मेयकण्ड शास्त्र कहते हैं। भांडारकर के अनुसार तमिल शैव इन्हें अपना पवित्र साहित्य मानते हैं, और जैसे जुलूसों में एक ओर वेद-पाठ होता है, वैसे ही दूसरी ओर देवारम के भजन गाए जाते हैं।

संक्षिप्त इतिहास

विकिपीडिया के अनुसार संस्कृत में सिद्धांत के धर्मशास्त्र को सद्योज्योति जैसे आचार्यों ने व्यवस्थित किया (ऐलेक्सिस सैंडरसन उन्हें लगभग 7वीं सदी का मानते हैं), और 10वीं सदी में कश्मीर के नारायणकंठ और रामकंठ ने इस पर सबसे गहरे भाष्य लिखे। राजा भोज का तत्त्वप्रकाश इसका संक्षिप्त सार है। 12वीं सदी में चिदंबरम के एक मठ के प्रमुख अघोरशिव ने पूजा, दीक्षा, उत्सव और अंत्येष्टि की विधियाँ लिखीं, जिन्हें विकिपीडिया के अनुसार आज भी दक्षिण के अधिकांश वंशानुगत मंदिर-पुजारी (शिवाचार्य) मानते हैं।

तमिल देश में 7वीं से 9वीं सदी के नायनार संतों ने शिव के भजन गाए। भांडारकर के अनुसार तिरुज्ञानसंबंदर 7वीं सदी में हुए, और तंजावुर के राजराजेश्वर मंदिर के एक शिलालेख से पता चलता है कि राजा राजराज (राज्यारोहण 984–85) ने अपने राज्य के उनतीसवें वर्ष से पहले, यानी 1013 से पहले, उनके पदिगम गाने वालों के लिए दैनिक वृत्ति बाँधी थी। इन भजनों को बाद में नम्बि आण्डार नम्बि ने संग्रहों में सजाया, और बाद में शेक्किऴार का पेरिय पुराणम्, नायनारों की जीवन-कथाएँ, इनमें जुड़ा।

दार्शनिक शाखा के रूप में तमिल शैव सिद्धांत 13वीं सदी में मेयकण्डदेव और उनके शिष्यों अरुळनंदि और उमापति के साथ बना। दासगुप्त के अनुसार मेयकण्डदेव का असली नाम श्वेतवन था और वे दक्षिण अर्काट के तिरुवेण्णैनल्लूर के थे; चोल राजा राजराज तृतीय (1216–48) के सोलहवें वर्ष का एक शिलालेख उनके द्वारा स्थापित एक प्रतिमा को भूमि-दान दर्ज करता है। उमापति, जो उनके तीसरे उत्तराधिकारी थे, 1313 में थे। 16वीं–17वीं सदी में तिरुवावडुतुरै, धर्मपुरम और तिरुप्पनंदाळ के अधीनम् बने, जो आज भी परंपरा के बड़े केंद्र हैं।

विश्वास और साधना

भांडारकर के वर्णन में इस मत के तीन तत्त्व हैं: पति, यानी स्वामी (शिव); पशु, यानी जीव; और पाश, यानी बंधन। जीव पर तीन मल (अशुद्धियाँ) हैं: आणव (जीव को सीमित मानने वाला अज्ञान), कर्म और माया। शिव जीवों के कर्मों के अनुसार सृष्टि करते हैं, और उनका शरीर साधारण नहीं, शक्तियों से बना माना जाता है; वे पाँच कृत्य करते हैं: सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव (छिपाना) और अनुग्रह। विकिपीडिया के अनुसार कर्म और साधना से मल हटते हैं, पर मुक्ति अंततः शिव की कृपा से ही होती है।

भांडारकर के अनुसार इस शास्त्र के चार पाद (भाग) हैं: ज्ञान (विद्या), क्रिया (दीक्षा और पूजा की विधि), योग (ध्यान) और चर्या (आचरण)। परम लक्ष्य के लिए गुरु से दीक्षा आवश्यक मानी जाती है। शिवज्ञानबोधम् के संस्कृत पाठ के नौवें सूत्र में ज्ञानी साधक को पंचाक्षर (नमः शिवाय) के ध्यान का निर्देश है।

मंदिर इस परंपरा का केंद्र हैं। दासगुप्त लिखते हैं कि तमिल भजनों का यह “तमिल वेद” आज भी दक्षिण के शिव मंदिरों में गाया जाता है, और भांडारकर के अनुसार हर शैव मंदिर में संबंदर की प्रतिमा पूजी जाती है।

प्रमुख केंद्र

तमिलनाडु के शिव मंदिर, विशेषकर नायनारों के गाए हुए मंदिर, इस परंपरा के केंद्र हैं; चिदंबरम में अघोरशिव का मठ था। विकिपीडिया के अनुसार तिरुवावडुतुरै, धर्मपुरम और तिरुप्पनंदाळ के अधीनम् 16वीं–17वीं सदी में शैव सिद्धांत के प्रचार के लिए बने; धर्मपुरम अधीनम् देवारम और तिरुवाचकम् प्रकाशित करता है और कई शिव मंदिरों की देखरेख करता है। विकिपीडिया के अनुसार यह परंपरा दक्षिण भारत, श्रीलंका और दुनिया भर के तमिल प्रवासियों में फैली है।

स्रोतों में अंतर

  • दर्शन का स्वरूप: भांडारकर और विकिपीडिया इसे द्वैतवादी बताते हैं, और विकिपीडिया मेयकण्डदेव की परंपरा को बहुसत्तावादी यथार्थवाद (ईश्वर, जीव और जगत तीनों सच्चे) कहता है; विकिपीडिया यह भी लिखता है कि कुछ लोग मानते हैं कि आरंभ में यह अद्वैतवादी था। दासगुप्त बताते हैं कि ब्रह्मसूत्र के शैव भाष्यकार श्रीकंठ का मत मेयकण्डदेव से काफ़ी अलग है।
  • मेयकण्डदेव का समय: दासगुप्त राजराज तृतीय के शिलालेख के आधार पर 13वीं सदी के मध्य के आसपास और उमापति (1313) से गिनकर 13वीं सदी के पहले तिहाई का अनुमान देते हैं; वे हयवदन राव का मत भी देते हैं कि वे लगभग 1235 या कुछ पहले थे।
  • तिरुमुरै की गिनती: भांडारकर और दासगुप्त ग्यारह संग्रह गिनते हैं और पेरिय पुराणम् को उनके साथ का अलग ग्रंथ मानते हैं; विकिपीडिया पेरिय पुराणम् को बारहवाँ खंड गिनकर तिरुमुरै को बारह खंडों का बताता है।
  • तिरुमूलर का समय: दासगुप्त उन्हें शायद ईसा की पहली सदी का मानते हैं; विकिपीडिया प्रश्नचिह्न के साथ 8वीं सदी देता है।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 4 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शैव सिद्धांत क्या है?

दक्षिण भारत और श्रीलंका की शैव परंपरा, जो शैव आगमों को प्रमाण मानती है और पति (शिव), पशु (जीव) और पाश (बंधन), इन तीन सत्ताओं का दर्शन सिखाती है। तमिल में इसके ग्रंथ तिरुमुरै के भजन और मेयकण्डदेव के शिवज्ञानबोधम् से शुरू होने वाले 14 सिद्धांत शास्त्र हैं।

पति, पशु और पाश का क्या अर्थ है?

पति स्वामी हैं, यानी शिव; पशु जीव है, जो बंधन में है; और पाश वे बंधन हैं जो उसे बाँधते हैं: आणव (अपने को सीमित मानने वाला अज्ञान), कर्म और माया। साधना का लक्ष्य शिव की कृपा से पाश से मुक्ति है।

मेयकण्डदेव कौन थे?

13वीं सदी के तमिल आचार्य, जिनका बारह सूत्रों वाला शिवज्ञानबोधम् तमिल शैव सिद्धांत का आधार-ग्रंथ है। अरुळनंदि शिवाचार्य उनके शिष्य थे और उमापति शिवाचार्य उनकी परंपरा के प्रमुख लेखक।

तिरुमुरै क्या है?

शिव के तमिल भजनों और शैव संतों की कथाओं का संग्रह। इसके पहले सात भाग, देवारम, संबंदर, अप्पर और सुंदरर के भजन हैं, आठवाँ माणिक्कवाचकर का तिरुवाचकम्, दसवाँ तिरुमूलर का तिरुमंदिरम्, और अंतिम शेक्किऴार का पेरिय पुराणम्। विकिपीडिया इसे बारह खंड गिनता है, भांडारकर पेरिय पुराणम् के अलावा ग्यारह संग्रह।

शैव सिद्धांत और काश्मीर शैव में क्या अंतर है?

शैव सिद्धांत शिव, जीव और बंधनों को अलग-अलग सच्ची सत्ताएँ मानता है, और मुक्त जीव भी शिव के समान होकर उनसे अलग रहता है। काश्मीर शैव (त्रिक) अद्वैतवादी है: जीव वास्तव में शिव ही है और मुक्ति इसकी पहचान (प्रत्यभिज्ञा) से होती है। माधव का सर्वदर्शनसंग्रह भी दोनों को अलग दर्शन, “शैव दर्शन” और “प्रत्यभिज्ञा दर्शन”, के रूप में रखता है।

स्रोत

  1. रामकृष्ण गोपाल भांडारकर, Vaiṣṇavism, Śaivism and Minor Religious Systems (1913), §93 (शैव सिद्धांत के तीन तत्त्व और चार पाद) और §107 (तमिल देश का शैव धर्म) (archive.org)
  2. सुरेंद्रनाथ दासगुप्त, A History of Indian Philosophy, खंड 5 “Southern Schools of Śaivism” (1955), अध्याय 34 (archive.org)
  3. शिवज्ञानबोधसूत्राणि, संस्कृत पाठ (sanskritdocuments.org)
  4. विकिपीडिया (अंग्रेज़ी): “Shaiva Siddhanta”, “Tirumurai”, “Meykandar”, “Nayanars”

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