सम्प्रदाय

निम्बार्क सम्प्रदाय

संक्षेप में

निम्बार्क सम्प्रदाय निम्बार्काचार्य से चली वैष्णव परंपरा है, जो राधा और कृष्ण की युगल उपासना करती है और जिसका दर्शन द्वैताद्वैत (स्वाभाविक भेदाभेद) है: ब्रह्म, यानी श्रीकृष्ण, जीव और जगत से एक साथ भिन्न भी है और अभिन्न भी। परंपरा इसे चार वैष्णव सम्प्रदायों में सनकादि (कुमार) सम्प्रदाय मानती है, जिसकी गुरु-परंपरा हंस भगवान, सनकादि कुमारों और देवर्षि नारद से निम्बार्क तक आती है। इसकी प्रमुख पीठ राजस्थान में निम्बार्क तीर्थ (सलेमाबाद) है, और ब्रज, विशेषकर वृंदावन, इसका मुख्य क्षेत्र।

आराध्य
राधा-कृष्ण (युगल); पीठ पर श्री सर्वेश्वर (शालग्राम) और श्री राधामाधव
आचार्य
निम्बार्काचार्य (परंपरा में सुदर्शन चक्र के अवतार); बाद में श्रीनिवासाचार्य, केशव काश्मीरी भट्ट
गुरु-परंपरा
हंस भगवान, सनकादि कुमार, देवर्षि नारद, निम्बार्क (परंपरा के अनुसार)
दर्शन
द्वैताद्वैत (स्वाभाविक भेदाभेद)
सम्प्रदाय
सनकादि (कुमार) सम्प्रदाय, चार वैष्णव सम्प्रदायों में
मुख्य ग्रंथ
निम्बार्क का वेदांत-पारिजात-सौरभ (ब्रह्मसूत्र पर) और दशश्लोकी (वेदांत-कामधेनु); श्रीनिवास का वेदांत-कौस्तुभ
मुख्य केंद्र
निम्बार्क तीर्थ, सलेमाबाद (किशनगढ़, राजस्थान); वृंदावन, बरसाना, नंदगाँव, गोवर्धन
तिलक
वैष्णव ऊर्ध्वपुंड्र, सम्प्रदाय के अपने रूप में
मुख्य पर्व
जन्माष्टमी और नंद महोत्सव, राधाष्टमी, गुरु पूर्णिमा

निम्बार्क सम्प्रदाय क्या है

निम्बार्क ब्रह्म को श्रीकृष्ण के रूप में पहचानते हैं, जो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और जगत का अंतिम कारण हैं; उनका ज़ोर साकार ईश्वर और भक्ति पर है। सम्प्रदाय की पीठ के अनुसार सर्वोच्च उपास्य राधा-कृष्ण हैं, और भक्ति सेवा, स्मरण, नाम-संकीर्तन और प्रपत्ति (शरणागति) से की जाती है।

संक्षिप्त इतिहास

परंपरा के अनुसार निम्बार्क का पहला नाम नियमानंद था; उन्होंने ब्रज में गोवर्धन के पास देवर्षि नारद से मंत्र-दीक्षा ली। उनका नाम “निम्ब” (नीम) और “अर्क” (सूर्य) से जुड़ी एक कथा से समझाया जाता है, जिसमें सुदर्शन चक्र नीम के पेड़ पर सूर्य की तरह चमका।

उनका समय विवादित है। परंपरा उन्हें बहुत प्राचीन मानती है; एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन में बिमल कृष्ण मतिलाल सुरेंद्रनाथ दासगुप्त का मत देते हैं कि वे 14वीं सदी के मध्य में हुए, और इंटरनेट एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी उन्हें प्रश्नचिह्न के साथ 13वीं सदी में रखता है। मतिलाल के अनुसार वे शायद बेल्लारी क्षेत्र के निम्ब या निम्बपुर के थे, जबकि परंपरा उन्हें मुख्य रूप से मथुरा से जोड़ती है।

उनके बाद श्रीनिवासाचार्य (वेदांत-कौस्तुभ के लेखक), केशव काश्मीरी भट्ट, पुरुषोत्तम प्रसाद और वनमाली मिश्र जैसे आचार्य हुए। नाभादास के भक्तमाल में “निम्बादित्य” चार सम्प्रदाय-आचार्यों में गिने गए हैं और सनकादि से जोड़े गए हैं। आज अखिल भारतीय निम्बार्काचार्य पीठ, निम्बार्क तीर्थ (सलेमाबाद) के पीठाधीश्वर इस परंपरा के 49वें जगद्गुरु बताए जाते हैं।

विश्वास और साधना

द्वैताद्वैत, या स्वाभाविक भेदाभेद: ब्रह्म जीव और जगत से भिन्न भी है और अभिन्न भी, और यह भेद और अभेद किसी बाहरी उपाधि से नहीं, उसके अपने स्वभाव से है। इंटरनेट एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी के अनुसार निम्बार्क भेद और अभेद, दोनों को बराबर सच मानने के सबसे निकट हैं, और उनके दर्शन में रामानुज की भक्ति-परंपरा का गहरा प्रभाव है।

सम्प्रदाय राधा को कृष्ण से अभिन्न मानकर दोनों की युगल उपासना करता है। निम्बार्क तीर्थ की पीठ पर श्री सर्वेश्वर, एक शालग्राम, को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, और श्री राधामाधव (गोकुलचंद्रमा) पीठ के दूसरे प्रमुख स्वरूप हैं।

प्रमुख केंद्र

अखिल भारतीय निम्बार्काचार्य पीठ राजस्थान में सलेमाबाद (किशनगढ़ के पास) में निम्बार्क तीर्थ पर है। ब्रज इसका मुख्य क्षेत्र है: पीठ वृंदावन, बरसाना, नंदगाँव, गोवर्धन, निम्बग्राम और ब्रज की चौरासी कोस परिक्रमा को अपने पवित्र स्थान बताती है।

स्रोतों में अंतर

  • निम्बार्क का समय: परंपरा उन्हें बहुत प्राचीन मानती है; दासगुप्त (मतिलाल द्वारा उद्धृत) 14वीं सदी का मध्य बताते हैं; इंटरनेट एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी “13वीं सदी?” लिखता है।
  • जन्मस्थान: मतिलाल के अनुसार शायद बेल्लारी क्षेत्र का निम्ब या निम्बपुर; परंपरा उन्हें मुख्य रूप से मथुरा और ब्रज से जोड़ती है।
  • संस्थापक या आचार्य: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन निम्बार्क को सनकादि सम्प्रदाय का संस्थापक कहता है; सम्प्रदाय स्वयं अपनी परंपरा हंस भगवान और सनकादि कुमारों से मानता है, और निम्बार्क को उसमें आगे आया आचार्य।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 4 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

निम्बार्क सम्प्रदाय क्या है?

निम्बार्काचार्य से चली वैष्णव परंपरा, जो राधा-कृष्ण की युगल उपासना करती है और द्वैताद्वैत दर्शन मानती है। परंपरा इसे चार वैष्णव सम्प्रदायों में सनकादि (कुमार) सम्प्रदाय गिनती है।

निम्बार्काचार्य कौन थे?

द्वैताद्वैत दर्शन के आचार्य, जिन्होंने ब्रह्मसूत्र पर वेदांत-पारिजात-सौरभ और दस श्लोकों का दशश्लोकी लिखा। परंपरा उन्हें सुदर्शन चक्र का अवतार और देवर्षि नारद का शिष्य मानती है; उनके समय पर विद्वानों में मतभेद है।

द्वैताद्वैत क्या है?

“द्वैत और अद्वैत, दोनों”: ब्रह्म (श्रीकृष्ण) जीव और जगत से भिन्न भी है और अभिन्न भी, और यह दोनों बातें उसके स्वभाव में हैं। इसलिए इसे स्वाभाविक भेदाभेद भी कहते हैं।

निम्बार्क सम्प्रदाय की पीठ कहाँ है?

अखिल भारतीय निम्बार्काचार्य पीठ राजस्थान में सलेमाबाद (किशनगढ़ के पास) के निम्बार्क तीर्थ पर है। ब्रज, विशेषकर वृंदावन, सम्प्रदाय का मुख्य क्षेत्र है।

इसे सनकादि सम्प्रदाय क्यों कहते हैं?

क्योंकि परंपरा इसकी गुरु-परंपरा हंस भगवान से सनक आदि चार कुमारों (सनकादि), फिर देवर्षि नारद और फिर निम्बार्क तक मानती है। नाभादास के भक्तमाल में भी निम्बादित्य को सनकादि से जोड़ा गया है।

स्रोत

  1. एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन: “Nimbārka” (बिमल कृष्ण मतिलाल, 1987)
  2. इंटरनेट एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी: “Bhedabheda Vedanta”
  3. जगद्गुरु निम्बार्काचार्य पीठ, निम्बार्क तीर्थ (shrijimaharaj.com): मुखपृष्ठ और “सम्प्रदाय”
  4. नाभादास, भक्तमाल, छप्पय 28 और दोहा 29 (archive.org पर “मूल भक्तमाल” संस्करण की गिनती)

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