पुष्टिमार्ग वल्लभाचार्य (1479–1531) द्वारा स्थापित कृष्ण-भक्ति का वैष्णव सम्प्रदाय है, जिसे वल्लभ सम्प्रदाय भी कहते हैं। “पुष्टि” का शाब्दिक अर्थ पोषण है और यहाँ इसका भाव है ईश्वर का अनुग्रह: इस मार्ग में माना जाता है कि सर्वोच्च भक्ति ईश्वर की कृपा से ही मिलती है, अपने प्रयास से नहीं। इसके आराध्य श्रीनाथजी हैं, गोवर्धन पर्वत उठाए हुए कृष्ण का स्वरूप, जिनका मुख्य मंदिर राजस्थान के नाथद्वारा में है, और इसका दर्शन शुद्धाद्वैत है।
- संस्थापक
- वल्लभाचार्य (महाप्रभुजी), 1479–1531; उनके बाद पुत्र गोपीनाथ और फिर विट्ठलनाथ (गुसाँईजी)
- दर्शन
- शुद्धाद्वैत
- मुख्य ग्रंथ
- भागवत पुराण (विशेषकर दशम स्कंध); वल्लभाचार्य के अणुभाष्य, सुबोधिनी, तत्त्वार्थदीप निबंध और षोडश ग्रंथ
- मुख्य केंद्र
- नाथद्वारा (राजस्थान); ब्रज में गोकुल और गोवर्धन; अनुयायी सबसे अधिक राजस्थान, गुजरात और मुंबई में
- तिलक
- वैष्णव खड़ा तिलक (ऊर्ध्वपुंड्र); इसका ठीक रूप स्रोतों में अलग-अलग बताया गया है
- मुख्य पर्व
- जन्माष्टमी सहित कृष्ण-लीला और ऋतुओं के उत्सव; वल्लभाचार्य और विट्ठलनाथ की जयंती
पुष्टिमार्ग क्या है
पुष्टिमार्ग की उपासना किशोर कृष्ण की लीलाओं पर केंद्रित है, जिनका वर्णन भागवत पुराण के दसवें स्कंध में है। ब्रिटानिका के अनुसार इस मार्ग में सर्वोच्च भक्ति केवल ईश्वर की कृपा (पुष्टि) से मिलती है; अच्छे कर्म या धार्मिक अनुष्ठान जैसे निजी प्रयास आवश्यक नहीं माने जाते। ईश्वर की उपासना उपवास और शारीरिक तप से नहीं, उनसे और उनके संसार से प्रेम द्वारा होती है।
ब्रिटानिका के अनुसार यह सम्प्रदाय उत्तर और पश्चिम भारत, विशेषकर व्यापारी समाज में प्रमुख है, और अपने गुरुओं के प्रति गहरी श्रद्धा के लिए जाना जाता है।
संक्षिप्त इतिहास
वल्लभाचार्य का जन्म 1479 में तेलुगु मूल के एक वैष्णव ब्राह्मण परिवार में, मध्य भारत के रायपुर क्षेत्र में हुआ; एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन और सम्प्रदाय के स्रोत जन्मस्थान चम्पारण्य बताते हैं, और ब्रिटानिका रायपुर के पास चौड़ानगर। उन्होंने 1493 में मथुरा में पहले शिष्य को दीक्षा दी और मथुरा के आसपास का ब्रज क्षेत्र उनके कार्य का केंद्र बना। वहीं गोवर्धन पर्वत पर उन्हें कृष्ण की वह पत्थर की प्रतिमा मिली जिसे श्रीगोवर्धननाथजी, संक्षेप में श्रीनाथजी, कहते हैं; परंपरा के अनुसार श्रीनाथजी स्वयं उनके सामने प्रकट हुए।
उनके दो पुत्र थे, गोपीनाथ (1512–1543) और विट्ठलनाथ (1516–1586), जिन्हें गुसाँईजी कहते हैं। जीवन के अंत में वल्लभाचार्य ने संन्यास लिया और 1531 में वाराणसी में देह त्यागी। उनके बाद पहले गोपीनाथ और फिर विट्ठलनाथ सम्प्रदाय के प्रमुख बने। विट्ठलनाथ के हर पुत्र ने अपनी अलग शाखा और मंदिर स्थापित किया, और इन शाखाओं का नेतृत्व आज भी वंश-परंपरा से चलता है; सम्प्रदाय के प्रमुखों को “महाराज” कहा जाता है। नाथद्वारा का मंदिर 17वीं सदी का है।
विश्वास और साधना
शुद्धाद्वैत: ब्रह्म श्रीकृष्ण हैं, और ईश्वर और जगत एक हैं; जगत को माया या भ्रम नहीं माना जाता। मुक्ति केवल ईश्वर की कृपा से होती है, और उस प्रेम को पाने के लिए भक्त को स्वयं को पूरी तरह ईश्वर को समर्पित (समर्पण) करना होता है।
ब्रह्मसम्बन्ध: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन के अनुसार ब्रज में कृष्ण ने एक दर्शन में वल्लभाचार्य को ब्रह्मसम्बन्ध मंत्र दिया, जिससे जीव का परम ब्रह्म से सीधा संबंध जुड़ता है, और यही मंत्र आज भी सम्प्रदाय की दीक्षा का मुख्य अंग है। सम्प्रदाय की परंपरा यह घटना श्रावण शुक्ल एकादशी की आधी रात, गोकुल में बताती है, और इसका वर्णन वल्लभाचार्य के ग्रंथ सिद्धान्त-रहस्य में मानती है।
सेवा: पुष्टिमार्ग के अनुयायी “पूजा” की जगह “सेवा” शब्द का प्रयोग करते हैं, और मंदिर को “हवेली”, यानी कृष्ण का घर, कहते हैं। ऋतुओं, कृष्ण-लीला की घटनाओं और वल्लभाचार्य और विट्ठलनाथ की जयंती पर विशेष उत्सव होते हैं।
शाखाएँ और परंपरा
विट्ठलनाथ के पुत्रों से सम्प्रदाय की अलग-अलग शाखाएँ बनीं, हर एक का अपना मंदिर; ब्रिटानिका सात पुत्र बताता है और एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन आठ। इनके वंशज आज भी इन शाखाओं का नेतृत्व करते हैं। सम्प्रदाय “अष्टछाप” (आठ छाप) नाम से आठ कवियों को अपना मानता है, जिनमें सूरदास सबसे प्रमुख माने जाते हैं।
प्रमुख केंद्र
नाथद्वारा (राजस्थान, उदयपुर से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर) में श्रीनाथजी का मंदिर सम्प्रदाय का मुख्य मंदिर है। ब्रज में मथुरा, गोकुल और गोवर्धन वल्लभाचार्य के जीवन से जुड़े हैं।
स्रोतों में अंतर
- जन्मस्थान: ब्रिटानिका रायपुर के पास चौड़ानगर बताता है; एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन (रायपुर ज़िला) और सम्प्रदाय के स्रोत चम्पारण्य।
- विट्ठलनाथ के पुत्र: ब्रिटानिका सात पुत्र बताता है, जिनमें से हर एक ने अपना मंदिर स्थापित किया; एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन (आर. के. बार्ज़) आठ पुत्र और आठ शाखाएँ लिखता है।
- उत्तराधिकार: ब्रिटानिका लिखता है कि वल्लभ के बाद विट्ठलनाथ प्रमुख बने; एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन के अनुसार पहले गोपीनाथ और फिर विट्ठलनाथ।
- सूरदास और अष्टछाप: सम्प्रदाय की परंपरा सूरदास को वल्लभाचार्य का शिष्य और अष्टछाप में प्रमुख मानती है; ब्रिटानिका के अनुसार कई इतिहासकार इस संबंध को संदिग्ध मानते हैं, क्योंकि सूरदास के आरंभिक पदों में वल्लभ का उल्लेख नहीं मिलता।
- तिलक: पुष्टिमार्ग के तिलक का रूप (एक खड़ी लाल रेखा, या नीचे जुड़ी दो रेखाएँ) अलग-अलग स्रोत अलग बताते हैं; हमें इसका कोई एक भरोसेमंद वर्णन नहीं मिला।
- देहत्याग का वर्ष: ब्रिटानिका 1531 देता है; सम्प्रदाय का एक स्रोत “लगभग 1530” लिखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पुष्टिमार्ग क्या है?
वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित कृष्ण-भक्ति का वैष्णव सम्प्रदाय, जिसमें माना जाता है कि सर्वोच्च भक्ति ईश्वर की कृपा (पुष्टि) से मिलती है। इसके आराध्य श्रीनाथजी हैं और इसका दर्शन शुद्धाद्वैत है।
पुष्टिमार्ग के संस्थापक कौन हैं?
वल्लभाचार्य (1479–1531), जिन्हें सम्प्रदाय में महाप्रभुजी कहते हैं। उनके बाद उनके पुत्र विट्ठलनाथ (गुसाँईजी) ने सम्प्रदाय को आगे बढ़ाया।
श्रीनाथजी कौन हैं?
श्रीकृष्ण का वह स्वरूप जो पुष्टिमार्ग का केंद्र है। परंपरा के अनुसार श्रीनाथजी गोवर्धन पर्वत पर वल्लभाचार्य के सामने प्रकट हुए; आज उनका मुख्य मंदिर राजस्थान के नाथद्वारा में है।
शुद्धाद्वैत क्या है?
वल्लभाचार्य का दर्शन, “शुद्ध अद्वैत”: ईश्वर और जगत एक हैं, और जगत को माया या भ्रम नहीं माना जाता। मुक्ति केवल ईश्वर की कृपा से होती है।
पुष्टिमार्ग किस सम्प्रदाय से जुड़ा है?
ब्रिटानिका के अनुसार वल्लभाचार्य विष्णुस्वामी के रुद्र सम्प्रदाय के थे, इसलिए पुष्टिमार्ग को चार वैष्णव सम्प्रदायों में रुद्र सम्प्रदाय भी कहा जाता है।
स्रोत
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Vallabha”, “Vallabhacharya”, “Nathdwara”, “Sūrdās”, “Vaishnavism”
- एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन: “Vallabha” (आर. के. बार्ज़, 1987)
- इंटरनेट एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी: “Bhedabheda Vedanta” (वल्लभ और शुद्धाद्वैत)
- इस्कॉन एजुकेशनल सर्विसेज़, “Heart of Hinduism”: “Pushti Marg” (सेवा और हवेली)
- पुष्टि संस्कार (pushtisanskar.org): “Shri Mahaprabhuji Shri Vallabhacharyaji”
- vallabhacharya.guru: श्री महाप्रभुजी का जीवन (ब्रह्मसम्बन्ध, सिद्धान्त-रहस्य)
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