सम्प्रदाय

श्रीकुल (शाक्त परंपरा)

संक्षेप में

श्रीकुल शाक्त परंपरा की वह धारा है जो देवी की उपासना उनके सौम्य, सुंदर और कल्याणकारी रूप में करती है, जिन्हें ललिता, श्री या त्रिपुरसुंदरी कहा जाता है। शाक्त तंत्र-परंपरा देवी-उपासकों को “कुलों” में बाँटकर देखती है, और आज मुख्य बँटवारा दो का है: श्रीकुल, जो देवी के मनोहर रूप पर केंद्रित है, और कालीकुल, जो काली जैसे उग्र रूपों पर। यह परंपरा का वर्गीकरण है, किसी एक संगठन या गुरु-गद्दी का नाम नहीं। श्रीकुल की सबसे प्रसिद्ध धारा श्रीविद्या है, जिसमें देवी की उपासना उनकी प्रतिमा, श्रीविद्या मंत्र और श्रीचक्र (श्रीयंत्र) से होती है; आज यह मुख्य रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित है।

आराध्य
ललिता त्रिपुरसुंदरी (षोडशी, कामेश्वरी, राजराजेश्वरी), शिव के साथ
प्रमुख धारा
श्रीविद्या; उसके भीतर कौल और समय मार्ग
उपासना के तीन रूप
प्रतिमा (ललिता का रूप), मंत्र (श्रीविद्या मंत्र, 15 या 16 अक्षरों का) और यंत्र (श्रीचक्र)
मुख्य ग्रंथ
वामकेश्वर तंत्र (नित्याषोडशिकार्णव और योगिनीहृदय), तंत्रराज तंत्र, ब्रह्माण्ड पुराण का ललितोपाख्यान और ललिता सहस्रनाम, त्रिपुरा उपनिषद्, सौंदर्यलहरी
व्याख्याकार
लक्ष्मीधर (समय मार्ग), भास्करराय (18वीं सदी)
क्षेत्र और केंद्र
दक्षिण भारत (तमिलनाडु, केरल) और श्रीलंका के तमिल क्षेत्र; कांचीपुरम की कामाक्षी; शृंगेरी और कांची के शांकर मठों से जुड़े साधक
मुख्य पर्व
नवरात्रि; विकिपीडिया के अनुसार श्रीविद्या परंपराएँ चैत्र (वसंत) नवरात्रि त्रिपुरसुंदरी को समर्पित करती हैं

श्रीकुल और कालीकुल: “कुल” का अर्थ

कुल का अर्थ है परिवार या वंश। डगलस ब्रूक्स बताते हैं कि भास्करराय ललिता सहस्रनाम की अपनी टीका में “कौल” शब्द को कुल से जुड़ा बताते हैं, यानी जो गुरु-वंश और अपने परिवार से मिलता है; इस अर्थ में श्रीकुल का अर्थ है कल्याणकारी देवी का परिवार।

तेउन गौद्रियान के अनुसार कौल परंपरा में उपासना सिद्धांततः तीन भागों में बँटती है, इस आधार पर कि कौन-सी शक्ति परम मानी जाती है: श्री (त्रिपुरा), काली और तारा। बंगाल में काली और तारा का भेद लगभग मिट गया है, और आज का प्रासंगिक बँटवारा श्रीकुल और कालीकुल का है: पहला देवी के सौम्य और सुंदर पक्ष पर केंद्रित है, दूसरा उनके भयावह रूप पर। गौद्रियान लिखते हैं कि श्री की उपासना सबसे पहले व्यवस्थित हुई और उसका प्रतीक-विधान सबसे विकसित है, और गुरु शिष्य के स्वभाव के अनुसार दोनों में से किसी एक मार्ग की दीक्षा देता है।

ब्रूक्स के अनुसार श्रीकुल और श्रीविद्या एक ही नहीं हैं: श्रीकुल ग्रंथों में ऐसा बहुत कुछ है जिसका श्रीविद्या की साधना से संबंध नहीं, पर श्रीविद्या इस धारा का सबसे प्रसिद्ध और सबसे व्यवस्थित रूप है।

संक्षिप्त इतिहास

ब्रूक्स के अनुसार श्रीकुल तंत्रों का आरंभ कश्मीर में खोजा जाता है, और संस्कृत का सबसे पुराना और प्रमुख श्रीकुल तंत्र वामकेश्वर तंत्र है, जो नित्याषोडशिकार्णव और योगिनीहृदय, इन दो भागों से बना है; गौद्रियान इन्हें उसी विद्वत् परंपरा का बताते हैं जिससे काश्मीर शैव दर्शन के महान ग्रंथ निकले। ब्रूक्स यह भी बताते हैं कि तिरुमूलर के तमिल तिरुमंदिरम् के एक पद में 15 अक्षरों वाले श्रीविद्या मंत्र का संकेत है। विकिपीडिया (ब्रूक्स के आधार पर) के अनुसार श्रीकुल 7वीं सदी तक दक्षिण भारत में एक प्रभावी धारा बन चुका था।

ब्रूक्स के अनुसार दक्षिण भारत की श्रीविद्या ने कश्मीर के ग्रंथ-संग्रह को अपनाकर और बढ़ाकर, और दक्षिण के ब्राह्मण समाज के आचार-विचार से मिलाकर अपनी अलग परंपरा बनाई, और उसके दो सबसे महत्वपूर्ण लेखक जन्म से उत्तर भारतीय थे: लक्ष्मीधर, जो परंपरा के अनुसार ओडिशा के राजा प्रतापरुद्र गजपति के दरबार में थे और केवल “समय” आचार के समर्थक थे, और भास्करराय, 18वीं सदी के एक महाराष्ट्रीय विद्वान, जो तंजावुर के राजा के संरक्षण में तमिलनाडु में बस गए।

विश्वास और साधना

ब्रूक्स के अनुसार श्रीविद्या देवी के तीन रूपों से उपासना करती है: स्थूल रूप, यानी ललिता की प्रतिमा; सूक्ष्म रूप, यानी श्रीविद्या मंत्र; और परा रूप, यानी श्रीचक्र, एक ज्यामितीय यंत्र जिसके केंद्र में नौ परस्पर गुँथे त्रिकोण हैं, जो देवी द्वारा जगत की सृष्टि के प्रतीक माने जाते हैं। ललिता परम शक्ति हैं, पर सदा अपने साथी शिव के साथ, जो चेतन और नित्य सत्ता के प्रतीक हैं। विकिपीडिया के अनुसार श्रीचक्र दो आयामों में (रेखाचित्र या धातु पर उकेरा) या त्रि-आयामी पिरामिड जैसे “श्रीमेरु” के रूप में बनता है, और दक्षिण के मंदिरों में प्रायः स्थापित मिलता है।

श्रीविद्या के भीतर दो मार्ग हैं: कौल और समय। ब्रूक्स के अनुसार लक्ष्मीधर का समय मार्ग उन बातों को अस्वीकार करता है जिन्हें ब्राह्मण आचार आपत्तिजनक मानता है, जैसे पंचमकार, जबकि भास्करराय कौल मार्ग के प्रमुख व्याख्याता हैं; आज की श्रीविद्या में अधिकांश मतभेद इसी कौल-समय भेद को लेकर हैं। विकिपीडिया के अनुसार श्रीकुल में देवी का हर रूप, सौम्य हो या उग्र, ललिता का ही रूप माना जाता है।

ललिता सहस्रनाम, जो अपने समापन वाक्य के अनुसार ब्रह्माण्ड पुराण में हयग्रीव और अगस्त्य के संवाद का अंश है, इस परंपरा का सबसे प्रसिद्ध स्तोत्र है, और ब्रूक्स के अनुसार श्रीविद्या मंत्र उसमें छिपे रूप में भी है। सौंदर्यलहरी को परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है।

क्षेत्र और केंद्र

आज श्रीकुल मुख्य रूप से दक्षिण भारत में है। विकिपीडिया (ब्रूक्स के आधार पर) के अनुसार यह केरल, तमिलनाडु और श्रीलंका के तमिल क्षेत्रों में शाक्त धर्म का प्रमुख रूप है। ब्रूक्स के अनुसार दक्षिण में ललिता को कांचीपुरम की कामाक्षी से एक माना जाता है, जिनकी प्रतिमा ललितोपाख्यान और ललिता सहस्रनाम के वर्णन से लगभग मिलती है; ललितोपाख्यान कहता है कि ललिता ही कांची में कामाक्षी के रूप में प्रकट हुईं। कांची की शांकर परंपरा आज कामाक्षी मंदिर की देखरेख करती है, और कई साधक अपने को शृंगेरी या कांची की शांकर पीठों से जोड़ते हैं।

स्रोतों में अंतर

  • कुलों की गिनती: गौद्रियान तीन कुल बताते हैं, श्री, काली और तारा, जिनमें बंगाल में काली और तारा लगभग एक हो गए हैं; विकिपीडिया और मैकडैनियल दो मुख्य धाराएँ बताते हैं, दक्षिण का श्रीकुल और उत्तर-पूर्व का कालीकुल।
  • कौन पुराना: मैकडैनियल के अनुसार कालीकुल को प्रायः पुरानी परंपरा माना जाता है, यद्यपि श्रीकुल अपना मूल वेदों तक ले जाता है, और वे गौद्रियान और गुप्त को उद्धृत करते हैं कि कालीकुल साहित्य का आरंभ श्रीकुल से पहले तक जाता है; गौद्रियान यह भी लिखते हैं कि श्री की उपासना सबसे पहले व्यवस्थित हुई।
  • सौंदर्यलहरी के रचयिता: परंपरा पूरा ग्रंथ, या कम से कम अंतिम इक्यावन श्लोक, आदि शंकराचार्य के मानती है; ब्रूक्स बताते हैं कि सुधाविद्योदिनी टीका का लेखक इसे अपने पिता प्रवरसेन की रचना कहता है, और इससे जुड़े कुछ शाक्त ग्रंथों को वे 8वीं सदी के शंकर के बहुत बाद का मानते हैं।
  • लक्ष्मीधर का समय: ब्रूक्स (1992) उन्हें ओडिशा के राजा प्रतापरुद्र गजपति के दरबार में रखते हुए “15वीं सदी” लिखते हैं; विकिपीडिया “16वीं सदी” लिखता है।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रीकुल क्या है?

शाक्त परंपरा की वह धारा जो देवी की उपासना उनके सौम्य और सुंदर रूप, ललिता त्रिपुरसुंदरी, में करती है। इसकी सबसे प्रसिद्ध धारा श्रीविद्या है, और आज यह मुख्य रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित है।

श्रीकुल और कालीकुल में क्या अंतर है?

श्रीकुल देवी के सौम्य, मनोहर रूप ललिता त्रिपुरसुंदरी पर केंद्रित है और दक्षिण भारत में प्रबल है; कालीकुल काली, तारा जैसे उग्र रूपों और दस महाविद्याओं पर केंद्रित है और बंगाल, असम और पूर्वी भारत में प्रबल है। यह शाक्त परंपरा का अपना वर्गीकरण है; दोनों में देवी ही परम हैं।

श्रीविद्या क्या है?

श्रीकुल की सबसे प्रसिद्ध साधना-परंपरा, जिसमें ललिता त्रिपुरसुंदरी की उपासना तीन रूपों से होती है: उनकी प्रतिमा, श्रीविद्या मंत्र और श्रीचक्र। इसमें कौल और समय, दो मार्ग हैं। “श्रीविद्या” नाम देवी के मंत्र का भी है, जो गुरु से दीक्षा में मिलता है।

श्रीचक्र (श्रीयंत्र) क्या है?

ललिता त्रिपुरसुंदरी का यंत्र, जिसके केंद्र में नौ परस्पर गुँथे त्रिकोण और बिंदु हैं। श्रीविद्या में इसे देवी का परा (सर्वोच्च) रूप माना जाता है; यह रेखाचित्र, धातु पर उकेरे यंत्र या त्रि-आयामी “श्रीमेरु” के रूप में बनता है।

त्रिपुरसुंदरी कौन हैं?

श्रीकुल की परम देवी, जिन्हें ललिता, षोडशी, कामेश्वरी और राजराजेश्वरी भी कहते हैं। दस महाविद्याओं में भी वे षोडशी या त्रिपुरसुंदरी के रूप में गिनी जाती हैं, और दक्षिण में उन्हें कांची की कामाक्षी से एक माना जाता है।

स्रोत

  1. डगलस रेनफ़्रू ब्रूक्स, Auspicious Wisdom: The Texts and Traditions of Śrīvidyā Śākta Tantrism in South India (SUNY Press, 1992), भूमिका और अध्याय 1–2 (archive.org)
  2. डगलस रेनफ़्रू ब्रूक्स, The Secret of the Three Cities: An Introduction to Hindu Śākta Tantrism (University of Chicago Press, 1990), पृ. 15–16 (archive.org)
  3. तेउन गौद्रियान, Hindu Tantrism (संजुक्ता गुप्त, डिर्क यान होन्स और तेउन गौद्रियान, ब्रिल, लाइडेन, 1979), भाग 1, अध्याय 1, पृ. 46 (archive.org)
  4. डेविड किंसली, Tantric Visions of the Divine Feminine: The Ten Mahāvidyās (University of California Press, 1997) (archive.org)
  5. ललिता सहस्रनाम स्तोत्र, समापन वाक्य: “इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डे श्रीहयग्रीवागस्त्यसंवादे …”
  6. विकिपीडिया (अंग्रेज़ी): “Shaktism” (Srikula), “Shri Vidya”, “Tripura Sundari”

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