शैव सम्प्रदाय शिव को परम देवता मानकर उनकी उपासना करने वाली परंपरा है, और वैष्णव और शाक्त के साथ आज के हिंदू धर्म के प्रमुख रूपों में गिना जाता है। इसका कोई एक संस्थापक नहीं: इसकी जड़ें वेदों के रुद्र और श्वेताश्वतर उपनिषद् में हैं, और इसमें पाशुपत, शैव सिद्धांत, काश्मीर शैव और लिंगायत (वीरशैव) जैसी कई शाखाएँ हैं। शिवलिंग इसकी पूजा का केंद्र है और भस्म की तीन आड़ी रेखाएँ (त्रिपुंड्र) इसका पहचाना हुआ तिलक।
- प्रमुख देवता
- शिव (रुद्र, महादेव)
- संस्थापक
- कोई एक संस्थापक नहीं
- प्रमुख आचार्य और संत
- लकुलीश (पाशुपत), तमिल नायनार संत, वसुगुप्त और अभिनवगुप्त (काश्मीर शैव), मेयकण्डदेव (शैव सिद्धांत), बसव (लिंगायत)
- दर्शन
- शैव सिद्धांत का द्वैत (पति, पशु, पाश) से काश्मीर शैव के अद्वैत तक, कई मत
- मुख्य ग्रंथ
- वेदों में रुद्र की स्तुतियाँ, श्वेताश्वतर उपनिषद्, शैव आगम, शिव पुराण, तमिल तिरुमुरै, शिव सूत्र, बसव के वचन
- तिलक
- भस्म की तीन आड़ी रेखाएँ (त्रिपुंड्र), बीच में लाल बिंदु के साथ या बिना
- प्रमुख मंत्र
- ॐ नमः शिवाय
- मुख्य पर्व
- महाशिवरात्रि, श्रावण (सावन) मास, सोमवार
शैव सम्प्रदाय क्या है
शैव सम्प्रदाय शिव की संगठित उपासना है। इसमें गृहस्थ भक्त भी हैं, जो मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं और माथे पर भस्म की तीन रेखाएँ लगाते हैं, और संन्यासियों के कई पंथ भी, जिनकी साधना की अपनी परंपराएँ हैं। मंदिरों और घरों, दोनों में शिवलिंग पूजा का मुख्य केंद्र है।
ब्रिटानिका के अनुसार इसमें शैव सिद्धांत जैसे गहरे दार्शनिक मत, लिंगायत जैसे सामाजिक रूप से अलग पंथ, दशनामी संन्यासी और अनगिनत लोक-रूप, सब शामिल हैं।
संक्षिप्त इतिहास
ऋग्वेद में रुद्र की स्तुतियाँ हैं; बाद में “शिव”, यानी कल्याणकारी, उन्हीं का नाम बना। श्वेताश्वतर उपनिषद् (ब्रिटानिका के अनुसार लगभग 400 ई.पू.) में शिव ही एकमात्र सनातन ईश्वर हैं: “एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः”, रुद्र एक ही है, कोई दूसरा नहीं (3.2)। महाभारत और रामायण में भी शिव प्रमुख देवता हैं।
संगठित शैव पंथ पाशुपतों के साथ बना, जिनका आरंभ कुछ इतिहासकार ई.पू. दूसरी सदी में और कुछ ईसा की दूसरी सदी में मानते हैं। उसके बाद पूरे भारत में शिव के मंदिर, उत्सव, संन्यासियों के मठ और तीर्थ फैले। दक्षिण में 5वीं से 9वीं सदी के तमिल शैव संतों (नायनारों) के भजन तिरुमुरै में संकलित हुए; कश्मीर में लगभग 850 ई. के शिव सूत्र से काश्मीर शैव दर्शन शुरू हुआ; और 12वीं सदी में दक्षिण भारत में बसव के वचनों से लिंगायत परंपरा फैली। शैव धर्म जावा, बाली और कंबोडिया तक भी पहुँचा।
विश्वास और साधना
शैव सिद्धांत तीन सत्ताएँ मानता है: पति (स्वामी, यानी शिव), पशु (जीव) और पाश (वे बंधन जो जीव को संसार में बाँधते हैं: अज्ञान, कर्म और माया)। जीव का लक्ष्य इन बंधनों से छूटकर “शिवत्व” पाना है, और इसके चार मार्ग बताए गए हैं: चर्या (सेवा और सदाचार), क्रिया (विधिपूर्वक पूजा), योग और ज्ञान।
काश्मीर शैव (त्रिक) इसके विपरीत अद्वैतवादी है: शिव ही एकमात्र सत्य हैं और जगत के उपादान और निमित्त, दोनों कारण। इसमें तीन तत्त्व माने जाते हैं, शिव, शक्ति और जीव, और मुक्ति इस “पहचान” (प्रत्यभिज्ञा) से मानी जाती है कि परम सत्य और जीव एक हैं।
पूजा में शिवलिंग केंद्र है। नटराज रूप में शिव का नृत्य, शैवों के अनुसार, पाँच कर्मों का प्रतीक है: सृष्टि, पालन, संहार, अपने सच्चे रूप को छिपाना, और वह अनुग्रह जिससे वे भक्त को मुक्त करते हैं।
प्रमुख शाखाएँ
पाशुपत: शिव को परम देवता मानने वाला शायद सबसे पुराना पंथ, जिसका उल्लेख महाभारत में है। इसके अनुयायी लकुलीश (लकुलिन) नाम के आचार्य को शिव का अवतार मानते थे; 10वीं और 13वीं सदी के शिलालेखों में उनका उल्लेख है। इसके उप-पंथ कम से कम 12वीं सदी तक गुजरात और राजस्थान में फले-फूले।
शैव सिद्धांत: दक्षिण भारत का दर्शन, जो मुख्य रूप से नायनारों के तिरुमुरै भजनों पर टिका है; 13वीं सदी के मेयकण्डदेव इसके पहले व्यवस्थित दार्शनिक थे। ब्रिटानिका के अनुसार यह यथार्थवादी और द्वैतवादी है।
काश्मीर शैव (त्रिक या प्रत्यभिज्ञा): शिव सूत्र (परंपरा के अनुसार वसुगुप्त को प्रकट हुए), वसुगुप्त की स्पंद-कारिका, उत्पल का प्रत्यभिज्ञा-शास्त्र (लगभग 900 ई.) और 10वीं सदी के अभिनवगुप्त का तंत्रालोक इसके मुख्य ग्रंथ हैं।
लिंगायत (वीरशैव): केवल शिव को देवता मानने वाले, जो स्त्री-पुरुष सभी गले में छोटा शिवलिंग पहनते हैं। दक्षिण भारत की परंपरा इसे 12वीं सदी के बसव से जोड़ती है, हालाँकि कुछ विद्वान मानते हैं कि बसव ने पहले से चले आ रहे पंथ को आगे बढ़ाया।
दशनामी संन्यासी: शंकराचार्य की परंपरा के दस नामों वाले संन्यासी, जिन्हें ब्रिटानिका शैव संन्यासी बताता है; वे भस्म का त्रिपुंड्र लगाते हैं और 108 रुद्राक्ष की माला पहनते हैं।
प्रमुख केंद्र
बारह ज्योतिर्लिंग शैवों के प्रमुख तीर्थ हैं; उनकी सूची स्रोत के साथ इस साइट के तीर्थ पन्ने पर है। कैलाश पर्वत को शिव का निवास माना जाता है। हिमालयन अकादमी भारत के उत्तर और दक्षिण के अलावा नेपाल और श्रीलंका को भी शैव धर्म के प्रमुख क्षेत्र बताती है।
स्रोतों में अंतर
- लिंगायत के संस्थापक: दक्षिण भारत की परंपरा बसव (12वीं सदी) को संस्थापक मानती है; ब्रिटानिका के अनुसार कुछ विद्वान मानते हैं कि उन्होंने पहले से चले आ रहे पंथ को आगे बढ़ाया। 21वीं सदी में कुछ लिंगायत अलग धर्म के रूप में मान्यता चाहते रहे हैं।
- पाशुपत का आरंभ: कुछ इतिहासकार ई.पू. दूसरी सदी मानते हैं, कुछ ईसा की दूसरी सदी (ब्रिटानिका)।
- शाखाओं की गिनती: हिमालयन अकादमी छह मुख्य शाखाएँ गिनती है (शैव सिद्धांत, पाशुपत, काश्मीर शैव, वीरशैव, सिद्ध सिद्धांत, शिव अद्वैत); ब्रिटानिका पाशुपत, शैव सिद्धांत, काश्मीर शैव, लिंगायत, दशनामी संन्यासी और लोक-रूपों का उल्लेख करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शैव सम्प्रदाय क्या है?
शिव को परम देवता मानकर उनकी उपासना करने वाली परंपरा। इसके अनुयायी शैव कहलाते हैं; इसमें गृहस्थ भक्त, संन्यासी पंथ और पाशुपत, शैव सिद्धांत, काश्मीर शैव और लिंगायत जैसी दार्शनिक शाखाएँ, सब हैं।
शैव सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
कोई एक संस्थापक नहीं। इसकी जड़ें वेदों के रुद्र और श्वेताश्वतर उपनिषद् में हैं; अलग-अलग शाखाओं के अपने आचार्य हैं, जैसे पाशुपत के लकुलीश, काश्मीर शैव के वसुगुप्त और अभिनवगुप्त, शैव सिद्धांत के मेयकण्डदेव और लिंगायत के बसव।
शैव और वैष्णव में क्या अंतर है?
शैव शिव को परम देवता मानते हैं और वैष्णव विष्णु और उनके अवतारों को। पहचान के रूप में शैव आम तौर पर भस्म की तीन आड़ी रेखाएँ (त्रिपुंड्र) लगाते हैं और वैष्णव खड़ी रेखाओं वाला तिलक। दोनों वेदों को मानते हैं, और स्मार्त पंचायतन पूजा में शिव और विष्णु दोनों एक साथ पूजे जाते हैं।
शैव तिलक कैसा होता है?
ब्रिटानिका के अनुसार शैव तिलक आम तौर पर माथे पर तीन आड़ी समानांतर रेखाएँ (त्रिपुंड्र) होता है, बीच में लाल बिंदु के साथ या बिना; कभी-कभी अर्धचंद्र या त्रिशूल का चिह्न भी शैव होने का संकेत होता है।
शैव सम्प्रदाय की कितनी शाखाएँ हैं?
कोई तय संख्या नहीं। हिमालयन अकादमी छह मुख्य शाखाएँ गिनती है: शैव सिद्धांत, पाशुपत, काश्मीर शैव, वीरशैव, सिद्ध सिद्धांत और शिव अद्वैत। ब्रिटानिका पाशुपत, शैव सिद्धांत, काश्मीर शैव, लिंगायत और दशनामी संन्यासियों के साथ अनगिनत लोक-रूपों की बात करता है।
स्रोत
- श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.2
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Shaivism”, “Hinduism: Vaishnavism and Shaivism”, “What festivals involve Shiva and how is he worshipped?”
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Pashupata”, “Shaiva-siddhanta”, “Kashmiri Shaivism”, “Lingayat”, “Alvar” (नायनार), “Dashnami sannyasin”, “tilak”
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका: “Hinduism: Tantric traditions and Shaktism” (शिव सूत्र, त्रिक, बसव के वचन)
- हिमालयन अकादमी (कौआई हिंदू मठ): “The Four Denominations of Hinduism”
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