सम्प्रदाय

माध्व सम्प्रदाय (ब्रह्म सम्प्रदाय)

संक्षेप में

माध्व सम्प्रदाय मध्वाचार्य (आनंदतीर्थ, 13वीं सदी) से चली वैष्णव परंपरा है। इसका दर्शन द्वैत है, जिसे इसके अनुयायी तत्त्ववाद कहते हैं: केवल विष्णु स्वतंत्र हैं, और जीव और जगत सच्चे होते हुए भी उन पर निर्भर हैं और उनसे सदा भिन्न रहते हैं। परंपरा इसे चार वैष्णव सम्प्रदायों में ब्रह्म सम्प्रदाय मानती है। इसका मुख्य केंद्र कर्नाटक का उडुपी है, जहाँ मध्वाचार्य द्वारा स्थापित श्रीकृष्ण की पूजा आठ मठों (अष्ट मठ) के स्वामी बारी-बारी से दो-दो वर्ष करते हैं; इस हस्तांतरण को पर्याय कहते हैं।

आराध्य
विष्णु (नारायण, वासुदेव) और उनके अवतार, विशेषकर कृष्ण; उडुपी में श्रीकृष्ण
आचार्य
मध्वाचार्य (जन्म का नाम वासुदेव; पूर्णप्रज्ञ, आनंदतीर्थ), उनके संन्यास-गुरु अच्युतप्रेक्ष; बाद में पद्मनाभतीर्थ, जयतीर्थ, व्यासतीर्थ, वादिराज तीर्थ, राघवेंद्र तीर्थ
गुरु-परंपरा
हंस (नारायण), ब्रह्मा, सनकादि, दुर्वासा, फिर कुछ आचार्य और अच्युतप्रेक्ष होते हुए मध्व (परंपरा के अनुसार)
दर्शन
द्वैत (तत्त्ववाद)
सम्प्रदाय
ब्रह्म सम्प्रदाय, चार वैष्णव सम्प्रदायों में
मुख्य ग्रंथ
मध्व के 37 ग्रंथ (सर्वमूल), जिनमें ब्रह्मसूत्र-भाष्य, अनुव्याख्यान, गीता-भाष्य, दस उपनिषदों के भाष्य, महाभारत-तात्पर्य-निर्णय और भागवत-तात्पर्य-निर्णय; जयतीर्थ की न्याय-सुधा, व्यासतीर्थ का न्यायामृत
मुख्य केंद्र
उडुपी का श्रीकृष्ण मठ और अष्ट मठ; पाजक (जन्मस्थान, परंपरा के अनुसार); उत्तरादि मठ, व्यासराज मठ और राघवेंद्र मठ
तिलक
परंपरा के अनुसार गोपीचंदन की दो खड़ी सफ़ेद रेखाएँ, नाक के ऊपर जुड़ी हुई, बीच में एक काली रेखा और उस पर लाल-सा बिंदु; कंधों और शरीर पर शंख-चक्र की मुद्राएँ
मुख्य पर्व
उडुपी का पर्याय (हर दूसरे वर्ष), मध्व नवमी (माघ शुक्ल नवमी), कृष्ण जन्माष्टमी, मकर संक्रांति, नवरात्र और विजयादशमी, गीता जयंती

माध्व सम्प्रदाय क्या है

मध्व के मत में सत्ता के दो वर्ग हैं: स्वतंत्र तत्त्व, जो केवल ईश्वर (विष्णु) हैं, और अस्वतंत्र तत्त्व, यानी जीव और जड़ जगत, जो सच्चे हैं पर ईश्वर पर निर्भर हैं। जगत भ्रम नहीं है, और जीव मोक्ष में भी ईश्वर से एक नहीं होता। इसी कारण यह दर्शन द्वैत कहलाता है, और इसके अनुयायी इसे तत्त्ववाद, यानी “यथार्थ का सिद्धांत”, कहते हैं।

सम्प्रदाय में वायु देवता का विशेष स्थान है: उन्हें ईश्वर और जीवों के बीच का माध्यम माना जाता है। मध्व ने अपने कुछ ग्रंथों में स्वयं को वायु का तीसरा अवतार कहा है, हनुमान और भीम के बाद; परंपरा भी उन्हें ऐसा ही मानती है।

संक्षिप्त इतिहास

बी. एन. के. शर्मा के अनुसार मध्व का जन्म उडुपी से लगभग आठ मील दक्षिण-पूर्व में पाजक गाँव में एक तुळु ब्राह्मण परिवार में हुआ, और उनका पहला नाम वासुदेव था। लगभग सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने अच्युतप्रेक्ष से संन्यास लिया और पूर्णप्रज्ञ नाम पाया; बाद में मठ के प्रमुख बनने पर वे आनंदतीर्थ कहलाए। उनके गुरु अद्वैत परंपरा के थे; मध्व ने शंकर के अद्वैत से अलग अपना मत रखा, और बाद में अच्युतप्रेक्ष ने भी उसे अपना लिया।

उन्होंने दक्षिण में तिरुवनंतपुरम, कन्याकुमारी, रामेश्वरम और श्रीरंगम की यात्रा की, और उत्तर में बदरीनाथ की। परंपरा के अनुसार बदरी में वे वेदव्यास से मिले और उनकी प्रेरणा से ब्रह्मसूत्र-भाष्य लिखा। उडुपी लौटकर उन्होंने अपने मठ में श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित की, जो अनुयायियों का केंद्र बनी। प्रतिमा के मिलने की कथा परंपरा में कई रूपों में मिलती है, जिनमें सबसे प्रचलित यह है कि वह द्वारका की ओर से आए जहाज़ में गोपीचंदन के ढेले के भीतर मिली।

शर्मा के अनुसार जीवन के अंतिम वर्षों में मध्व ने उडुपी में कृष्ण की पूजा के लिए आठ संन्यासी शिष्य नियुक्त किए, और उनकी शिष्य-परंपराओं से उडुपी के अष्ट मठ बने: पलिमारु, अदमारु, कृष्णापुर, पुत्तिगे, शिरूर, सोदे, काणियूरु और पेजावर। ये चार जोड़ों (द्वंद्व) में गिने जाते हैं। परंपरा के अनुसार माघ शुक्ल नवमी को मध्व लोगों की दृष्टि से ओझल हो गए; यह दिन मध्व नवमी के रूप में मनाया जाता है।

आठों मठों के स्वामी बारी-बारी से दो-दो वर्ष श्रीकृष्ण मठ के प्रधान पुजारी रहते हैं, और यह क्रम पलिमारु से आरंभ होकर पेजावर पर पूरा होता है। सत्ता का यह हस्तांतरण पर्याय कहलाता है और सम वर्षों में 18 जनवरी के तड़के एक बड़े उत्सव के साथ होता है। शर्मा के अनुसार यह व्यवस्था अपने आज के रूप में 16वीं सदी में सोदे मठ के वादिराज तीर्थ ने बनाई; उससे पहले की, मध्व की बनाई व्यवस्था में बारी दो-दो महीने की थी।

मध्व के शिष्य पद्मनाभतीर्थ की परंपरा से उडुपी के बाहर के मठ चले, जिनमें उत्तरादि मठ, व्यासराज मठ और राघवेंद्र मठ प्रमुख हैं (इन्हें मिलाकर मठत्रय कहा जाता है)। जयतीर्थ और व्यासतीर्थ इसके प्रमुख दार्शनिक हुए। कन्नड़ में भक्ति-गीत गाने वाले हरिदास, जैसे पुरंदरदास और कनकदास, इसी परंपरा से जुड़े थे; उडुपी के “कनकन किंडी” झरोखे की कथा कनकदास से जुड़ी है।

विश्वास और साधना

पाँच भेद: मध्व के महाभारत-तात्पर्य-निर्णय के पहले अध्याय के अनुसार जगत सच्चा है और उसमें पाँच भेद सदा रहते हैं: ईश्वर और जीव का, जीव और जीव का, ईश्वर और जड़ का, जड़ और जड़ का, और जीव और जड़ का। जीवों में स्वभाव और योग्यता का क्रम भी माना जाता है, जिसे तारतम्य कहते हैं, और यह भिन्नता मुक्त जीवों में भी बनी रहती है।

दासगुप्त के अनुसार मध्व के मत में मोक्ष केवल भक्ति से और ईश्वर की कृपा से मिलता है, और भक्ति का अर्थ है ईश्वर की महिमा के पूरे ज्ञान के साथ उनसे प्रेम। उडुपी के मठों में कृष्ण की पूजा मध्व के तंत्रसार में बताई विधि से होती है। शर्मा के अनुसार मध्व ने अनुयायियों के लिए एकादशी के कठोर उपवास पर ज़ोर दिया और यज्ञ में जीवित पशु के स्थान पर आटे से बने पशु (पिष्टपशु) का विधान किया।

प्रमुख केंद्र

उडुपी का श्रीकृष्ण मठ सम्प्रदाय का केंद्र है; आठों मठ इसके चारों ओर हैं, और पास में अनंतेश्वर और चंद्रमौलीश्वर के मंदिर हैं। श्रद्धालु श्रीकृष्ण के दर्शन नौ छेदों वाली खिड़की, नवग्रह किंडी, से करते हैं। पाजक में, परंपरा के अनुसार, मध्व का पैतृक घर आज भी सुरक्षित है। उडुपी के बाहर उत्तरादि, व्यासराज और राघवेंद्र मठ सम्प्रदाय के बड़े केंद्र हैं, और भांडारकर के समय (1913) अनुयायी मुख्यतः कर्नाटक के ज़िलों और गोवा से दक्षिण कन्नड तक के तट पर बसे थे।

स्रोतों में अंतर

  • मध्व का समय: बी. एन. के. शर्मा 1238–1317 को सबसे संतोषजनक मानते हैं, और विकिपीडिया के अनुसार अधिकतर स्रोत यही देते हैं; कुछ स्रोत 1199–1278 देते हैं (1894 का दक्षिण कन्नड ज़िला मैनुअल जन्म “लगभग 1199” लिखता है); भांडारकर और दासगुप्त मठों की सूची के शक 1119 को जन्म का वर्ष मानकर जन्म 1197 और देहांत लगभग 1276 रखते हैं।
  • जन्मस्थान: शर्मा और विकिपीडिया पाजक बताते हैं; 1894 का दक्षिण कन्नड मैनुअल और भांडारकर (इम्पीरियल गज़ेटियर के आधार पर) उडुपी तालुक का कल्याणपुर, और दासगुप्त लिखते हैं कि जन्मस्थान रजतपीठ शायद कल्याणपुर था। शर्मा कल्याणपुर को स्पष्ट रूप से ग़लत कहते हैं।
  • अष्ट मठ और पर्याय किसने बनाए: विकिपीडिया के लेख और 1894 का मैनुअल आठ मठ मध्व द्वारा स्थापित बताते हैं; शर्मा के अनुसार मध्व ने आठ संन्यासी नियुक्त किए और मठ उनकी परंपराओं से बाद में बने, और दो-दो वर्ष का पर्याय 16वीं सदी में वादिराज तीर्थ ने आरंभ किया (पहले बारी दो महीने की थी); विकिपीडिया का वादिराज पर लेख भी उन्हें पर्याय व्यवस्था का संस्थापक कहता है।
  • श्रीकृष्ण प्रतिमा की कथा: उडुपी मठ पर विकिपीडिया का लेख गोपीचंदन के ढेले में मिलने की बात कहता है और मध्व पर लेख द्वारका से आने की; 1894 का मैनुअल परंपरा के अनुसार लिखता है कि प्रतिमा अर्जुन की बनाई थी और तुळुनाडु के तट पर टूटे जहाज़ से मध्व को मिली।
  • गुरु-परंपरा: माध्व परंपरा हंस (नारायण), ब्रह्मा, सनकादि और दुर्वासा से अच्युतप्रेक्ष तक की सूची देती है, जिसमें शर्मा लगभग चार सौ वर्ष का अंतराल बताते हैं; गौड़ीय आचार्य बलदेव विद्याभूषण की प्रमेय-रत्नावली कृष्ण, ब्रह्मा, नारद और व्यास से मध्व तक की परंपरा देती है। दासगुप्त के अनुसार बलदेव की सूची जयतीर्थ के बाद माध्व मठों की सूचियों से मेल नहीं खाती।
संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 6 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

माध्व सम्प्रदाय क्या है?

मध्वाचार्य से चली वैष्णव परंपरा, जो विष्णु (विशेषकर कृष्ण) की उपासना करती है और द्वैत (तत्त्ववाद) दर्शन मानती है। परंपरा इसे चार वैष्णव सम्प्रदायों में ब्रह्म सम्प्रदाय गिनती है; इसका मुख्य केंद्र कर्नाटक का उडुपी है।

मध्वाचार्य कौन थे?

द्वैत दर्शन के आचार्य, जिनका जन्म उडुपी के पास हुआ और जिन्हें पूर्णप्रज्ञ और आनंदतीर्थ भी कहते हैं। उन्होंने ब्रह्मसूत्र, गीता और उपनिषदों पर भाष्य समेत 37 ग्रंथ लिखे और उडुपी में श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित की। उनके समय पर दो मत हैं: 1238–1317 और 1199–1278।

द्वैत या तत्त्ववाद क्या है?

मध्व का दर्शन: केवल विष्णु स्वतंत्र हैं, और जीव और जगत सच्चे होते हुए भी उन पर निर्भर हैं। ईश्वर, जीव और जड़ के बीच पाँच भेद सदा रहते हैं, और जीव मोक्ष में भी ईश्वर से एक नहीं होता।

उडुपी के अष्ट मठ और पर्याय क्या हैं?

पलिमारु, अदमारु, कृष्णापुर, पुत्तिगे, शिरूर, सोदे, काणियूरु और पेजावर, ये आठ मठ उडुपी के श्रीकृष्ण मठ की पूजा और प्रबंध बारी-बारी से दो-दो वर्ष सँभालते हैं। एक मठ से दूसरे को यह भार सौंपना पर्याय कहलाता है, जो सम वर्षों में 18 जनवरी को होता है।

गौड़ीय वैष्णव और इस्कॉन का माध्व सम्प्रदाय से क्या संबंध है?

गौड़ीय परंपरा, जिसमें इस्कॉन है, अपनी गुरु-परंपरा व्यासतीर्थ की शिष्य-परंपरा के माधवेंद्र पुरी और ईश्वर पुरी के माध्यम से मध्व से जोड़ती है और इसलिए स्वयं को ब्रह्म-माध्व सम्प्रदाय की शाखा मानती है। कुछ विद्वानों ने इस संबंध पर प्रश्न उठाए हैं, और दोनों के दर्शन भी अलग हैं।

स्रोत

  1. बी. एन. के. शर्मा, History of the Dvaita School of Vedānta and Its Literature, अध्याय 3 (“Life of Madhva”) और अध्याय 17 (अष्ट मठ) (archive.org)
  2. सुरेंद्रनाथ दासगुप्त, A History of Indian Philosophy, खंड 4 (1949), अध्याय 25 “Madhva and his School” (archive.org)
  3. रामकृष्ण गोपाल भांडारकर, Vaiṣṇavism, Śaivism and Minor Religious Systems (1913; Collected Works खंड 4, 1929), माध्व पर अनुच्छेद, §52 तक (archive.org)
  4. Madras District Manuals: South Canara (1894), अध्याय 4 (archive.org)
  5. न्यूज़ कर्नाटक, 17 जनवरी 2026: “Udupi to host Paryaya Mahotsava as Shiroor Matha assumes charge” (18 जनवरी को पर्याय)
  6. विकिपीडिया (अंग्रेज़ी): “Madhvacharya”, “Udupi Sri Krishna Matha”, “Paryaya”, “Ashta Mathas of Udupi”, “Vadiraja Tirtha”

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