श्री वैष्णव सम्प्रदाय दक्षिण भारत की वह वैष्णव परंपरा है जो लक्ष्मी (श्री) सहित विष्णु-नारायण की उपासना करती है। इसका दर्शन विशिष्टाद्वैत है और इसके प्रमुख आचार्य रामानुजाचार्य हैं (परंपरा के अनुसार 1017–1137)। परंपरा इसे चार वैष्णव सम्प्रदायों में श्री सम्प्रदाय गिनती है, क्योंकि यह अपनी गुरु-परंपरा विष्णु और लक्ष्मी से आरंभ मानती है। इसमें संस्कृत वेदांत के साथ आळवार संतों के तमिल पद, नालायिर दिव्य प्रबंधम, भी पवित्र माने जाते हैं। इसका सबसे बड़ा केंद्र तमिलनाडु का श्रीरंगम है। रामानुज के बाद यह परंपरा वडकलै और तेंकलै, दो शाखाओं में बँट गई।
- आराध्य
- लक्ष्मी (श्री) सहित विष्णु-नारायण; श्रीरंगम में श्री रंगनाथ, तिरुमला में वेंकटेश्वर
- आचार्य
- नाथमुनि, यामुनाचार्य (आळवंदार), रामानुजाचार्य; बाद में वेदांत देशिक, पिळ्ळै लोकाचार्य और मणवाळ मामुनि
- गुरु-परंपरा
- विष्णु, महालक्ष्मी, विष्वक्सेन, नम्माळवार (शठकोप), नाथमुनि, उय्यक्कोंडार, मणक्काल नम्बि, आळवंदार, पेरिय नम्बि, रामानुज (परंपरा के अनुसार)
- दर्शन
- विशिष्टाद्वैत (जीव और जगत से युक्त एक ब्रह्म)
- मुख्य ग्रंथ
- नालायिर दिव्य प्रबंधम (आळवारों के 4,000 तमिल पद); रामानुज के श्रीभाष्य (ब्रह्मसूत्र पर), वेदार्थ-संग्रह, गीता-भाष्य और गद्यत्रय; पंचरात्र आगम
- मुख्य केंद्र
- श्रीरंगम, कांचीपुरम, श्रीपेरुम्बुदूर (तमिलनाडु); मेलकोटे (कर्नाटक); तिरुमला-तिरुपति; अहोबिल मठ, परकाल मठ (मैसूर)
- तिलक
- परंपरा के अनुसार ऊर्ध्वपुंड्र (नामम्): सफ़ेद मिट्टी की दो खड़ी रेखाएँ, नीचे जुड़ी हुई, और बीच में श्री की पीली या लाल रेखा; वडकलै और तेंकलै के रूप अलग हैं
- मुख्य पर्व
- वैकुंठ एकादशी (श्रीरंगम में मार्गळि मास का 21 दिन का उत्सव), रामानुज जयंती (चित्तिरै मास, तिरुवादिरै नक्षत्र), ब्रह्मोत्सव
श्री वैष्णव सम्प्रदाय क्या है
“श्री” लक्ष्मी का नाम है और आदर का उपसर्ग भी। इस परंपरा में लक्ष्मी को विष्णु से अलग न होने वाली और ईश्वर और भक्त के बीच कृपा की मध्यस्थ माना जाता है, इसीलिए इसका नाम श्री वैष्णव है और लक्ष्मी को इसकी पहली आचार्य गिना जाता है।
इसकी एक पहचान दो धाराओं का मेल है: वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, गीता और पंचरात्र आगम जैसे संस्कृत ग्रंथ, और आळवार संतों के तमिल भक्ति-पद। दोनों को साथ मानने की इस दृष्टि को उभय वेदांत भी कहा जाता है।
संक्षिप्त इतिहास
आळवार तमिलनाडु के विष्णु-भक्त संत थे (परंपरागत रूप से 7वीं–10वीं सदी)। परंपरा सम्प्रदाय की स्थापना 10वीं सदी के नाथमुनि से जोड़ती है, जिन्होंने बारह आळवारों के 4,000 पद नालायिर दिव्य प्रबंधम के रूप में संकलित किए। उनके पोते यामुनाचार्य (आळवंदार) श्रीरंगम के आचार्य हुए।
रामानुज का जन्म श्रीपेरुम्बुदूर में हुआ। कांची में उन्होंने अद्वैत के आचार्य यादवप्रकाश से पढ़ा, पर उपनिषदों के अर्थ पर उनसे मतभेद हुआ। परंपरा के अनुसार वे यामुनाचार्य से कभी नहीं मिले: जब तक वे श्रीरंगम पहुँचे, यामुन का देहांत हो चुका था। यामुन के शिष्य पेरिय नम्बि (महापूर्ण) ने उन्हें पंच-संस्कार दीक्षा दी, और संन्यास लेकर वे श्रीरंगम के आचार्य बने। वहीं उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर श्रीभाष्य लिखा।
एक शैव चोल राजा के विरोध के कारण रामानुज कई वर्ष होयसल राज्य (आज का कर्नाटक) में रहे। वहाँ राजा बिट्टिदेव उनके शिष्य बने और विष्णुवर्धन कहलाए, और उनकी सहायता से मेलकोटे (यादवाद्रि) में तिरुनारायण का मंदिर बना। उन्होंने उत्तर भारत की यात्राएँ भी कीं, जिनमें दासगुप्त मथुरा, वृंदावन, अयोध्या, बदरी, काशी और पुरी गिनाते हैं, और लिखते हैं कि पुरी में उन्होंने एक मठ स्थापित किया। बाद में वे श्रीरंगम लौटे और वहीं उनका देहांत हुआ। दासगुप्त के अनुसार उन्होंने जाति का भेद किए बिना शिष्य स्वीकार किए; उनके अपने एक गुरु, कांचीपूर्ण, ब्राह्मण नहीं थे।
रामानुज के बाद प्रपत्ति (शरणागति) के स्वरूप पर आचार्यों के मत अलग होने लगे। दासगुप्त के अनुसार वेदांत देशिक (वेंकटनाथ, 1268–1369) के समय दो शाखाएँ बनीं: वडकलै (“उत्तरी”, कांचीपुरम की ओर), जिसके आचार्य वेदांत देशिक थे, और तेंकलै (“दक्षिणी”, श्रीरंगम की ओर), जिसके आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य थे और बाद में मणवाळ मामुनि (1370–1443)। दासगुप्त लिखते हैं कि आचार्य स्वयं एक-दूसरे के प्रति सद्भाव रखते थे, और मुख्य अंतर प्रपत्ति की व्याख्या का था, साथ में तिलक जैसे कुछ आचार के अंतर।
विश्वास और साधना
विशिष्टाद्वैत: ब्रह्म एक है और अनगिनत शुभ गुणों से युक्त है। जीव और जगत सच्चे हैं, भ्रम नहीं; वे ब्रह्म का “शरीर” हैं और ब्रह्म उनकी अंतरात्मा, जैसे आत्मा शरीर में रहती है (शरीर-शरीरी भाव)। यह ब्रह्म लक्ष्मी सहित नारायण हैं। मोक्ष में जीव वैकुंठ में भगवान की सेवा करता है और अपना अलग स्वरूप नहीं खोता।
मार्ग भक्ति और प्रपत्ति हैं। भांडारकर के अनुसार रामानुज की भक्ति ईश्वर का निरंतर ध्यान है; प्रपत्ति इस दृढ़ विश्वास के साथ की गई प्रार्थना है कि ईश्वर ही रक्षक हैं और उनकी कृपा पाने का कोई दूसरा उपाय नहीं। दोनों शाखाओं का अंतर एक उपमा से समझाया जाता है: वडकलै बंदरिया के बच्चे की उपमा देती है, जो माँ को स्वयं पकड़े रहता है (भक्त का प्रयास भी चाहिए), और तेंकलै बिल्ली के बच्चे की, जिसे माँ स्वयं उठा ले जाती है (सब कुछ ईश्वर की कृपा से)।
वडकलै संस्कृत वेदों और वेदांत देशिक के ग्रंथों पर अधिक ज़ोर देती है, और तेंकलै आळवारों के तमिल दिव्य प्रबंधम और मणवाळ मामुनि की परंपरा पर; पर दोनों ही वेद और प्रबंधम, दोनों को पवित्र मानती हैं, और दोनों में पंचरात्र आगम के अनुसार पंच-संस्कार दीक्षा होती है। भांडारकर रामानुज-परंपरा के एक लेखक द्वारा उद्धृत उपासना के सोलह प्रकार बताते हैं, जिनमें शरीर पर शंख-चक्र के चिह्न, माथे पर ऊर्ध्वपुंड्र, शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षों की एकादशी का व्रत और भगवान पर तुलसी चढ़ाना शामिल हैं; वे “ॐ नमो नारायणाय” को इस परंपरा का अष्टाक्षर मंत्र बताते हैं।
प्रमुख केंद्र
कावेरी और कोल्लिडम के बीच के द्वीप पर बसा श्रीरंगम का रंगनाथस्वामी मंदिर 108 दिव्य देशों में पहला गिना जाता है और रामानुज का कार्यक्षेत्र था; यह तेंकलै परंपरा का मंदिर है, और परंपरा के अनुसार यहाँ रामानुज का शरीर एक सन्निधि में सुरक्षित है। कांचीपुरम (वरदराज पेरुमाल मंदिर) रामानुज के आरंभिक जीवन और वडकलै परंपरा से जुड़ा है, श्रीपेरुम्बुदूर उनका जन्मस्थान है, और कर्नाटक का मेलकोटे वह स्थान जहाँ वे होयसल राज्य में रहे।
सम्प्रदाय के मठों के प्रमुख जीयर कहलाते हैं। वडकलै के प्रमुख मठों में अहोबिलम (आंध्र प्रदेश) का अहोबिल मठ (1400 के दशक के आरंभ में आदिवण् शठकोप जीयर द्वारा स्थापित), मैसूर का परकाल मठ और श्रीरंगम का आंडवन आश्रम हैं; तेंकलै के प्रमुख मठों में श्रीरंगम, नांगुनेरी के वानमामलै, मेलकोटे के यतिराज मठ और तिरुमला-तिरुपति के जीयर मठ हैं।
स्रोतों में अंतर
- रामानुज का समय: परंपरा और दासगुप्त 1017–1137 (यानी 120 वर्ष की आयु) देते हैं, और भांडारकर जन्म शक 938, यानी 1016 या 1017; जॉन कारमन जैसे आधुनिक विद्वान मंदिर-अभिलेखों के आधार पर 1077–1157 सुझाते हैं।
- वडकलै–तेंकलै विभाजन कब हुआ: दासगुप्त के अनुसार 14वीं सदी में, वेदांत देशिक और पिळ्ळै लोकाचार्य के समय; विकिपीडिया का लेख मतभेद की जड़ 13वीं–15वीं सदी की श्रीरंगम–कांचीपुरम बहस में बताता है और औपचारिक विभाजन कहीं 16वीं, कहीं 18वीं सदी में रखता है। पेट्रीशिया मम्मे के अनुसार बंदर और बिल्ली की उपमा पहली बार 18वीं सदी के तमिल ग्रंथों में मिलती है।
- संस्थापक: परंपरा लक्ष्मी को पहली आचार्य मानती है; विकिपीडिया के अनुसार परंपरागत रूप से स्थापना नाथमुनि (10वीं सदी) से मानी जाती है; और प्रायः सम्प्रदाय को रामानुज के नाम से जाना जाता है, जो इसके प्रमुख दार्शनिक हैं।
- होयसल राज्य में रामानुज का समय: परंपरा 12 वर्ष बताती है; दासगुप्त गोपीनाथ राव का मत देते हैं कि यह लगभग 20 वर्ष था, जिनमें 12 मेलकोटे में बीते; विकिपीडिया 14 वर्ष लिखता है।
- जाति पर दोनों शाखाओं का रुख: भांडारकर तेंकलै को अधिक उदार बताते हैं, और विकिपीडिया के अनुसार कुछ विद्वान (रमन) यही मानते हैं, जबकि दूसरे (सदारंगानी) वडकलै को अधिक उदार मानते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वैष्णव सम्प्रदाय क्या है?
दक्षिण भारत की वैष्णव परंपरा, जो लक्ष्मी सहित विष्णु-नारायण की उपासना करती है और रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत दर्शन मानती है। परंपरा इसे चार वैष्णव सम्प्रदायों में श्री सम्प्रदाय गिनती है।
रामानुजाचार्य कौन थे?
श्री वैष्णव सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य और विशिष्टाद्वैत के व्याख्याता, जिन्होंने ब्रह्मसूत्र पर श्रीभाष्य लिखा। उनका जन्म श्रीपेरुम्बुदूर में हुआ और श्रीरंगम उनका मुख्य केंद्र रहा। परंपरा उनका समय 1017–1137 मानती है; कुछ आधुनिक विद्वान 1077–1157 सुझाते हैं।
विशिष्टाद्वैत क्या है?
रामानुज का दर्शन: ब्रह्म एक है, पर जीव और जगत उसके सच्चे “विशेषण” या शरीर हैं, भ्रम नहीं। इसलिए इसे “विशिष्ट” (गुणों और शरीर से युक्त) ब्रह्म का अद्वैत कहते हैं, और अंग्रेज़ी में qualified non-dualism।
वडकलै और तेंकलै में क्या अंतर है?
मुख्य अंतर प्रपत्ति की व्याख्या का है: वडकलै के अनुसार भक्त का प्रयास भी चाहिए (बंदरिया के बच्चे की उपमा), तेंकलै के अनुसार सब कुछ ईश्वर की कृपा से होता है (बिल्ली के बच्चे की उपमा)। वडकलै वेदांत देशिक और संस्कृत वेदों पर, तेंकलै पिळ्ळै लोकाचार्य, मणवाळ मामुनि और तमिल दिव्य प्रबंधम पर अधिक ज़ोर देती है; तिलक के रूप भी अलग हैं।
श्री वैष्णव का तिलक कैसा होता है?
परंपरा के अनुसार ऊर्ध्वपुंड्र, जिसे तमिल में नामम् कहते हैं: भांडारकर के वर्णन में सफ़ेद मिट्टी की दो खड़ी रेखाएँ, जो नीचे एक आड़ी रेखा से जुड़ी होती हैं, और बीच में हल्दी की पीली या चूने से लाल की गई रेखा, जो श्री (लक्ष्मी) का प्रतीक है। वडकलै और तेंकलै इसे अलग रूपों में लगाते हैं और इसका अर्थ भी कुछ अलग बताते हैं।
स्रोत
- सुरेंद्रनाथ दासगुप्त, A History of Indian Philosophy, खंड 3 (1940), अध्याय 18 “The Viśiṣṭādvaita School” (archive.org)
- रामकृष्ण गोपाल भांडारकर, Vaiṣṇavism, Śaivism and Minor Religious Systems (1913; Collected Works खंड 4, 1929), §46–49 (archive.org)
- विकिपीडिया (अंग्रेज़ी): “Sri Vaishnavism”, “Ramanuja”, “Naalayira Divya Prabandham”
- विकिपीडिया (अंग्रेज़ी): “Ranganathaswamy Temple, Srirangam”, “Cheluvanarayana Swamy Temple”, “Ahobila Mutt”
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