चालीसाश्रीकृष्ण

राधा चालीसा

रचना: परंपरागत

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 5 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
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  1. दोहा 1

    श्री राधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार। वृन्दाविपिन विहारिणि, प्रणवौं बारंबार॥

    हे वृषभानु की पुत्री श्री राधा, आप भक्तों के प्राणों का आधार हैं। वृंदावन के वन में विहार करने वाली हे राधा, मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ।

  2. दोहा 2

    जैसौ तैसौ रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम। चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम॥

    हे कृष्णप्रिया, सुख की धाम! मैं जैसा भी हूँ, आपका ही हूँ। हे सुंदर, सुख देने वाली, मनोहर राधा, मुझे अपने चरणों की शरण दीजिए।

  3. चौपाई 1

    जय वृषभानु कुँवरि श्री श्यामा। कीरति नंदिनी शोभा धामा॥

    वृषभानु की दुलारी बेटी श्री श्यामा (राधा) की जय हो। कीर्ति की पुत्री, सौंदर्य की धाम, आपकी जय हो।

  4. चौपाई 2

    नित्य विहारिनि श्याम अधारा। अमित मोद मंगल दातारा॥

    आप सदा (श्याम के साथ) विहार करती हैं और श्याम (कृष्ण) का आधार हैं। आप असीम आनंद और मंगल देने वाली हैं।

  5. चौपाई 3

    रास विलासिनि रस विस्तारिनि। सहचरि सुभग यूथ मन भावनि॥

    आप रास-लीला में आनंद लेने वाली और प्रेम-रस फैलाने वाली हैं। सखियों के सुंदर समूह को आप मन से प्रिय हैं।

  6. चौपाई 4

    नित्य किशोरी राधा गोरी। श्याम प्राणधन अति जिय भोरी॥

    गोरी राधा सदा किशोरी (नवयुवती) हैं। वे श्याम के प्राणों का धन हैं और हृदय से अत्यंत भोली हैं।

  7. चौपाई 5

    करुणा सागर हिय उमंगिनी। ललितादिक सखियन की संगिनी॥

    आप करुणा का सागर हैं और आपका हृदय उमंग से भरा है। आप ललिता आदि सखियों की संगिनी हैं।

  8. चौपाई 6

    दिनकर कन्या कूल विहारिनि। कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि॥

    आप सूर्य की पुत्री यमुना के किनारे विहार करती हैं। आप कृष्ण को प्राणों से प्रिय हैं और उनके हृदय को आनंदित करती हैं।

  9. चौपाई 7

    नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं। राधा राधा कहि हरषावैं॥

    श्याम स्वयं प्रतिदिन आपके गुण गाते हैं और ‘राधा राधा’ कहकर प्रसन्न होते हैं।

  10. चौपाई 8

    मुरली में नित नाम उचारें। तुव कारण लीला वपु धारें॥

    वे अपनी मुरली में सदा आपका नाम पुकारते हैं, और आपके लिए ही लीला का रूप धारण करते हैं।

  11. चौपाई 9

    प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी। श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी॥

    आप प्रेम का साक्षात रूप और अत्यंत कोमल हैं। आप श्याम की प्रिया और वृषभानु की दुलारी हैं।

  12. चौपाई 10

    नवल किशोरी अति छवि धामा। द्युति लघु लगै कोटि रति कामा॥

    आप नवयौवना हैं और अपार सौंदर्य की धाम हैं। आपकी कांति के आगे करोड़ों रति और कामदेव की चमक भी छोटी लगती है।

  13. चौपाई 11

    गौरांगी शशि निंदक बदना। सुभग चपल अनियारे नयना॥

    आपका शरीर गोरा है और मुख ऐसा कि चंद्रमा भी फीका लगे। आपकी आँखें सुंदर, चंचल और नुकीली हैं।

  14. चौपाई 12

    जावक युत युग पंकज चरना। नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना॥

    आपके दोनों कमल जैसे चरण महावर (जावक) से रंगे हैं। आपके नूपुरों (पायल) की ध्वनि प्रियतम का मन हर लेती है।

  15. चौपाई 13

    संतत सहचरि सेवा करहीं। महा मोद मंगल मन भरहीं॥

    सखियाँ सदा आपकी सेवा करती हैं और मन में महान आनंद और मंगल भरती हैं।

  16. चौपाई 14

    रसिकन जीवन प्राण अधारा। राधा नाम सकल सुख सारा॥

    आप रसिक भक्तों के जीवन और प्राणों का आधार हैं। राधा का नाम सब सुखों का सार है।

  17. चौपाई 15

    अगम अगोचर नित्य स्वरूपा। ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा॥

    आपका स्वरूप नित्य है, जिस तक पहुँचना कठिन है और जो इंद्रियों से परे है। ब्रज के राजा (कृष्ण) दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।

  18. चौपाई 16

    उपजेउ जासु अंश गुण खानी। कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी॥

    चालीसा कहती है कि आपके अंश से गुणों की खान करोड़ों उमा (पार्वती), रमा (लक्ष्मी) और ब्रह्माणी उत्पन्न हुई हैं।

  19. चौपाई 17

    नित्य धाम गोलोक विहारिनि। जन रक्षक दुख दोष नसावनि॥

    आप नित्य धाम गोलोक में विहार करती हैं। आप भक्तों की रक्षा करती हैं और उनके दुख और दोष मिटाती हैं।

  20. चौपाई 18

    शिव अज मुनि सनकादिक नारद। पार न पाँइ शेष अरु शारद॥

    शिव, ब्रह्मा (अज), सनक आदि मुनि, नारद, शेषनाग और सरस्वती (शारदा) भी आपकी महिमा का पार नहीं पाते।

  21. चौपाई 19

    राधा शुभ गुण रूप उजारी। निरखि प्रसन्न होत बनवारी॥

    राधा शुभ गुणों और उज्ज्वल रूप वाली हैं। उन्हें देखकर बनवारी (वनमाला धारण करने वाले कृष्ण) प्रसन्न हो जाते हैं।

  22. चौपाई 20

    ब्रज जीवन धन राधा रानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥

    राधा रानी ब्रज के जीवन का धन हैं। उनकी असीम महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता।

  23. चौपाई 21

    प्रीतम संग देइ गलबाँही। बिहरत नित वृन्दावन माँही॥

    प्रियतम (कृष्ण) के गले में बाँहें डाले आप सदा वृंदावन में विहार करती हैं।

  24. चौपाई 22

    राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा। एक रूप दोउ प्रीति अगाधा॥

    राधा ‘कृष्ण’ कहती हैं और कृष्ण ‘राधा’। दोनों एक ही रूप हैं और उनका प्रेम अथाह है।

  25. चौपाई 23

    श्री राधा मोहन मन हरनी। जन सुख दायक प्रफुलित बदनी॥

    श्री राधा मोहन (कृष्ण) का मन हर लेती हैं। वे भक्तों को सुख देने वाली हैं और उनका मुख सदा खिला रहता है।

  26. चौपाई 24

    कोटिक रूप धरें नंद नंदा। दर्श करन हित गोकुल चंदा॥

    आपके दर्शन के लिए गोकुल के चंद्रमा, नंद के नंदन (कृष्ण) करोड़ों रूप धारण करते हैं।

  27. चौपाई 25

    रास केलि करि तुम्हें रिझावें। मान करौ जब अति दुख पावें॥

    वे रास-क्रीड़ा करके आपको प्रसन्न करते हैं, और जब आप रूठ जाती हैं (मान करती हैं) तो बहुत दुखी होते हैं।

  28. चौपाई 26

    प्रफुलित होत दर्श जब पावें। विविध भाँति नित विनय सुनावें॥

    आपके दर्शन पाकर वे खिल उठते हैं और तरह-तरह से सदा आपसे विनती करते हैं।

  29. चौपाई 27

    वृन्दारण्य विहारिनि श्यामा। नाम लेत पूरण सब कामा॥

    वृंदावन के वन में विहार करने वाली हे श्यामा, चालीसा कहती है कि आपका नाम लेने से सब कामनाएँ पूरी होती हैं।

  30. चौपाई 28

    कोटिन यज्ञ तपस्या करहू। विविध नेम व्रत हिय में धरहू॥

    चाहे करोड़ों यज्ञ और तपस्या करो, और मन में तरह-तरह के नियम और व्रत धारण करो,

  31. चौपाई 29

    तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें। जब लगि राधा नाम न गावें॥

    फिर भी, चालीसा कहती है, जब तक भक्त राधा का नाम नहीं गाता, तब तक श्याम उसे नहीं अपनाते।

  32. चौपाई 30

    वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा। लीला वपु तब अमित अगाधा॥

    राधा वृंदावन के वन की स्वामिनी हैं। आपका लीला-रूप असीम और अथाह है।

  33. चौपाई 31

    स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा। और तुम्हें को जानन हारा॥

    स्वयं कृष्ण भी आपका पार नहीं पाते, तो और कौन आपको जान सकता है?

  34. चौपाई 32

    श्री राधा रस प्रीति अभेदा। सादर गान करत नित वेदा॥

    श्री राधा और प्रेम-रस एक ही हैं, उनमें कोई भेद नहीं। वेद भी आदर से सदा इसका गान करते हैं।

  35. चौपाई 33

    राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं। ते सपनेहु जग जलधि न तरिहैं॥

    चालीसा कहती है कि जो राधा को छोड़कर केवल कृष्ण को भजेंगे, वे सपने में भी संसार-सागर पार नहीं करेंगे।

  36. चौपाई 34

    कीरति कुँवरि लाड़िली राधा। सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा॥

    कीर्ति की लाड़ली बेटी राधा का स्मरण करने से, चालीसा के अनुसार, संसार की सारी बाधाएँ मिट जाती हैं।

  37. चौपाई 35

    नाम अमंगल मूल नसावन। त्रिविध ताप हर हरि मनभावन॥

    राधा का नाम अमंगल की जड़ को नष्ट करने वाला, तीनों प्रकार के ताप (शरीर के, दैवी और सांसारिक दुख) हरने वाला और हरि के मन को भाने वाला है।

  38. चौपाई 36

    राधा नाम लेइ जो कोई। सहजहि दामोदर बस होई॥

    चालीसा कहती है कि जो कोई राधा का नाम लेता है, दामोदर (कृष्ण) सहज ही उसके वश में हो जाते हैं।

  39. चौपाई 37

    राधा नाम परम सुखदाई। भजतहिं कृपा करहिं यदुराई॥

    राधा का नाम परम सुख देने वाला है। उसे भजते ही यदुराज (कृष्ण) कृपा करते हैं।

  40. चौपाई 38

    यशुमति नन्दन पीछे फिरिहैं। जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं॥

    जो कोई राधा का नाम स्मरण करेगा, यशोदा-नंदन (कृष्ण) उसके पीछे-पीछे फिरेंगे।

  41. चौपाई 39

    रास विहारिनि श्यामा प्यारी। करहु कृपा बरसाने वारी॥

    रास में विहार करने वाली प्यारी श्यामा, हे बरसाने वाली राधा, कृपा कीजिए।

  42. चौपाई 40

    वृन्दावन है शरण तिहारी। जय जय जय वृषभानु दुलारी॥

    मैं वृंदावन में आपकी शरण में हूँ। हे वृषभानु की दुलारी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो।

  43. समापन दोहा

    श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम। करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥

    श्री राधा सबकी स्वामिनी हैं और घनश्याम (कृष्ण) रसिकों के स्वामी। मेरी कामना है कि मैं सदा श्री वृंदावन धाम में निवास करूँ।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/radha-chalisa/

संक्षेप में

राधा चालीसा श्री राधा की स्तुति है, जो ‘श्री राधे वृषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार’ दोहे से शुरू होती है। इसमें आरंभ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। इसमें राधा को वृषभानु और कीर्ति की पुत्री, वृंदावन में विहार करने वाली और श्रीकृष्ण की प्राणप्रिया कहा गया है। परंपरा में राधा अष्टमी और जन्माष्टमी पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

यहाँ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के ‘51 चालीसा संग्रह’ (छपी पुस्तक) का पाठ लिया गया है और उसे द्रिक पंचांग, भक्ति भारत और वेबदुनिया के पाठ से शब्दशः मिलाया गया है। वर्तनी में छोटे अंतर हैं, जैसे ‘वृषभान/वृषभानु’, ‘प्रणवौं/प्रणवों’, ‘बनवारी/बनबारी’। मुख्य पाठभेद: दोहा 1 में छपी पुस्तक में ‘वृन्दावनविपिन’ है, बाकी स्रोतों में ‘वृन्दाविपिन’; चौपाई 12 में पुस्तक ‘जावक युग युग’ पढ़ती है, बाकी ‘जावक युत युग’; चौपाई 18 में पुस्तक ‘पार न पायें’; चौपाई 24 में भक्ति भारत ‘दर्शन करन’; चौपाई 32 में पुस्तक ‘सारद गान करत’ (शारदा गाती हैं) पढ़ती है, जबकि बाकी तीनों स्रोत ‘सादर गान करत’। छपी पुस्तक में चौपाई 8 की दूसरी पंक्ति और चौपाई 9 की पहली पंक्ति छूट गई हैं; ये पंक्तियाँ बाकी तीनों स्रोतों से ली गई हैं। पाठ में कवि का नाम नहीं आता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राधा चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

इसमें 40 चौपाइयाँ हैं। आरंभ में दो दोहे और अंत में एक दोहा है।

राधा चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी (राधा अष्टमी), जन्माष्टमी और ब्रज के उत्सवों पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

राधा चालीसा किसने लिखी?

पाठ में किसी कवि का नाम नहीं आता, और रचयिता किसी प्रामाणिक स्रोत से ज्ञात नहीं है।

चालीसा में राधा के माता-पिता कौन बताए गए हैं?

पिता वृषभानु और माता कीर्ति (‘कीरति’)। चौपाई 1 में राधा को ‘वृषभानु कुँवरि’ और ‘कीरति नंदिनी’ कहा गया है, और चौपाई 39 में ‘बरसाने वारी’।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), पृ. 221–224
  3. द्रिक पंचांग: श्री राधा चालीसा
  4. भक्ति भारत: राधा चालीसा
  5. वेबदुनिया: श्री राधा चालीसा

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