चालीसाश्रीकृष्ण

कृष्ण चालीसा

रचना: सुन्दरदास (परंपरा अनुसार)

संपादन: SanatanBodh संपादकीय टीमअंतिम अपडेट: 4 स्रोतAI की सहायता से तैयार, स्रोतों से जाँचा गयागलती बताएँ
मंदिर में संध्या आरती: पुजारी के हाथ में पाँच बत्ती वाला पीतल का दीपक, पीछे सजी प्रतिमाएँ और हाथ जोड़े भक्त
चित्र: AI से बनाया गया
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  1. दोहा 1

    बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम। अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥

    हाथ में मधुर बाँसुरी शोभा दे रही है, और शरीर नीले बादल जैसा साँवला है। लाल होंठ मानो बिंबफल हों, और आँखें कमल जैसी मनोहर हैं।

  2. दोहा 2

    पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज। जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

    मुख पूर्ण चंद्रमा और कमल जैसा है, और शरीर पर शुभ पीतांबर सजा है। मन मोहने वाले, कामदेव जैसी छवि वाले महाराज कृष्णचंद्र की जय हो।

  3. चौपाई 1

    जय यदुनन्दन जय जगवन्दन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥

    यदुवंश को आनंद देने वाले, सारे जगत के वंदनीय, वसुदेव और देवकी के पुत्र, आपकी जय हो।

  4. चौपाई 2

    जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥

    यशोदा के पुत्र और नंद के दुलारे, आपकी जय हो। भक्तों की आँखों के तारे प्रभु, आपकी जय हो।

  5. चौपाई 3

    जय नटनागर नाग नथइया। कृष्ण कन्हैया धेनु चरइया॥

    श्रेष्ठ नर्तक (नटनागर) और कालिय नाग को नाथने वाले, आपकी जय हो। गायें चराने वाले कृष्ण कन्हैया, आपकी जय हो।

  6. चौपाई 4

    पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥

    हे प्रभु, फिर से अपने नख पर पर्वत (गोवर्धन) उठा लीजिए। आइए और दीन-दुखियों के कष्ट दूर कीजिए।

  7. चौपाई 5

    बंशी मधुर अधर धरि टेरी। होवे पूर्ण विनय यह मेरी॥

    होंठों पर मधुर बाँसुरी रखकर पुकारिए, ताकि मेरी यह विनती पूरी हो।

  8. चौपाई 6

    आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥

    हे हरि, आइए, फिर से माखन चखिए, और आज भारत की लाज रखिए।

  9. चौपाई 7

    गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥

    गोल गाल और लाल-लाल ठोड़ी है। कोमल मुस्कान सब पर मोहिनी डाल देती है।

  10. चौपाई 8

    रंजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्ती माला॥

    कमल जैसे बड़े-बड़े नेत्र रंग से सजे हैं। सिर पर मोरपंख का मुकुट और गले में वैजयंती माला है।

  11. चौपाई 9

    कुण्डल श्रवण पीतपट आछे। कटि किंकिणी काछन काछे॥

    कानों में कुंडल हैं और सुंदर पीला वस्त्र है। कमर पर घुँघरू वाली करधनी है और काछनी कसी हुई है।

  12. चौपाई 10

    नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छवि लखि सुर नर मुनि मन मोहे॥

    नीले कमल जैसा सुंदर शरीर शोभा देता है। यह छवि देखकर देवता, मनुष्य और मुनियों का मन मोहित हो जाता है।

  13. चौपाई 11

    मस्तक तिलक अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बाँसुरी वाले॥

    माथे पर तिलक है और बाल घुँघराले हैं। हे बाँसुरी वाले कृष्ण, आइए।

  14. चौपाई 12

    करि पय पान, पूतनहिं तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥

    आपने (विष भरे स्तन का) दूध पीकर पूतना को तार दिया, और अघासुर, बकासुर और कागासुर को मारा।

  15. चौपाई 13

    मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भये शीतल लखितहिं नन्दलाला॥

    जब मधुवन में आग की लपटें जल रही थीं, तब नंदलाल के देखते ही वे शीतल हो गईं।

  16. चौपाई 14

    सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥

    जब देवराज इंद्र ने क्रोध में ब्रज पर चढ़ाई की, तो मूसल जैसी मोटी धारों से पानी बरसाया।

  17. चौपाई 15

    लगत-लगत ब्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥

    ब्रज बहने ही वाला था, तब आपने गोवर्धन पर्वत को नख पर उठाकर उसे बचा लिया।

  18. चौपाई 16

    लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मँह चौदह भुवन दिखाई॥

    यशोदा के मन में भ्रम बढ़ता देखकर आपने अपने मुख में उन्हें चौदहों लोक दिखा दिए।

  19. चौपाई 17

    दुष्ट कंस अति उधम मचायो। कोटि कमल जब फूल मँगायो॥

    दुष्ट कंस ने बड़ा उपद्रव मचाया, जब उसने (परंपरा के अनुसार, यमुना के कालिय-दह से) करोड़ों कमल के फूल मँगवाए।

  20. चौपाई 18

    नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥

    तब आपने कालिय नाग को नाथ लिया, और उसके फनों पर अपने चरणों के चिह्न देकर उसे निर्भय कर दिया।

  21. चौपाई 19

    करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥

    गोपियों के साथ रास रचाकर आपने सबकी अभिलाषा पूरी की।

  22. चौपाई 20

    केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥

    आपने कितने ही बड़े-बड़े असुरों का संहार किया, और कंस को बाल पकड़कर पटककर मारा।

  23. चौपाई 21

    मात-पिता की बन्दि छुड़ाई। उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥

    आपने माता-पिता को कारागार से छुड़ाया और उग्रसेन को फिर से राज दिलाया।

  24. चौपाई 22

    महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥

    आप (धरती के नीचे के लोक से) देवकी के मरे हुए छहों पुत्रों को ले आए और माता देवकी का शोक मिटाया।

  25. चौपाई 23

    भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दस सहस कुमारी॥

    आपने भौमासुर (नरकासुर) और मुर दैत्य का संहार किया, और (उसकी कैद से) सोलह हज़ार राजकुमारियों को ले आए।

  26. चौपाई 24

    दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥

    तिनका चीरकर भीम को संकेत देकर आपने उसकी सहायता की, और जरासंध नाम के राक्षस को मरवाया।

  27. चौपाई 25

    असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥

    आपने बकासुर आदि असुरों को मारा और भक्तों के कष्ट दूर किए।

  28. चौपाई 26

    दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूठि मुख डार्यो॥

    आपने गरीब सुदामा के दुख दूर किए, और उनके लाए चावल की तीन मुट्ठियाँ मुँह में डाल लीं।

  29. चौपाई 27

    प्रेम के साग विदुर घर माँगे। दुर्योधन के मेवा त्यागे॥

    प्रेम के कारण आपने विदुर के घर साग माँगकर खाया, और दुर्योधन के मेवे-पकवान छोड़ दिए।

  30. चौपाई 28

    लखी प्रेम की महिमा भारी। ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

    देखिए, प्रेम की महिमा कितनी बड़ी है। ऐसे हैं श्याम, दीनों का भला करने वाले।

  31. चौपाई 29

    भारत के पारथ रथ हाँके। लिए चक्र कर नहिं बल थाके॥

    महाभारत के युद्ध में आपने पार्थ (अर्जुन) का रथ हाँका। आपने हाथ में चक्र उठाया, और आपका बल कभी नहीं थका।

  32. चौपाई 30

    निज गीता के ज्ञान सुनाये। भक्तन हृदय सुधा वर्षाये॥

    आपने अपनी गीता का ज्ञान सुनाया और भक्तों के हृदय में अमृत बरसाया।

  33. चौपाई 31

    मीरा थी ऐसी मतवाली। विष पी गई बजाकर ताली॥

    मीरा (आपकी भक्ति में) ऐसी मतवाली थीं कि परंपरा के अनुसार ताली बजाते हुए विष पी गईं।

  34. चौपाई 32

    राणा भेजा साँप पिटारी। शालिग्राम बने बनवारी॥

    राणा ने पिटारी में साँप भेजा, तो बनवारी (कृष्ण) शालिग्राम बन गए। यह भी मीरा से जुड़ी परंपरागत कथा है।

  35. चौपाई 33

    निज माया तुम विधिहिं दिखायो। उर ते संशय सकल मिटायो॥

    आपने ब्रह्मा को अपनी माया दिखाई और उनके मन का सारा संशय मिटा दिया।

  36. चौपाई 34

    तव शत निन्दा करि तत्काला। जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥

    आपकी सौ बार निंदा कर चुकने पर शिशुपाल तुरंत (आपके हाथों) जीवन से मुक्त हो गया।

  37. चौपाई 35

    जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। दीनानाथ लाज अब जाई॥

    जब द्रौपदी ने पुकार लगाई: हे दीनानाथ, अब मेरी लाज जा रही है,

  38. चौपाई 36

    तुरतहि वसन बने नन्दलाला। बढ़े चीर भये अरि मुँह काला॥

    तब नंदलाल तुरंत वस्त्र बन गए। चीर बढ़ता गया और शत्रुओं का मुँह काला (अपमान) हुआ।

  39. चौपाई 37

    अस अनाथ के नाथ कन्हैया। डूबत भँवर बचावत नइया॥

    ऐसे हैं अनाथों के नाथ कन्हैया, जो भँवर में डूबती नाव को बचा लेते हैं।

  40. चौपाई 38

    सुन्दरदास आस उर धारी। दयादृष्टि कीजै बनवारी॥

    सुन्दरदास मन में आशा रखे हुए हैं। हे बनवारी, उन पर दया की दृष्टि कीजिए।

  41. चौपाई 39

    नाथ सकल मम कुमति निवारो। क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥

    हे नाथ, मेरी सारी बुरी बुद्धि दूर कीजिए और मेरे अपराध जल्दी क्षमा कीजिए।

  42. चौपाई 40

    खोलो पट अब दर्शन दीजै। बोलो कृष्ण कन्हैया की जय॥

    अब पट खोलिए और दर्शन दीजिए। बोलो कृष्ण कन्हैया की जय।

  43. समापन दोहा

    यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि। अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

    चालीसा कहती है कि जो कृष्ण की इस चालीसा का मन से पाठ करता है, वह आठों सिद्धियों, नौ निधियों और चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का फल पाता है।

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अर्थ, स्रोत और दूसरी आरती-चालीसा: sanatanbodh.in/stotra/krishna-chalisa/

संक्षेप में

कृष्ण चालीसा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति है, जो ‘बंशी शोभित कर मधुर’ दोहे से शुरू होती है। इसमें आरंभ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और एक समापन दोहा है। चौपाइयों में पूतना, कालिय, गोवर्धन, सुदामा और द्रौपदी से लेकर मीरा तक के प्रसंग आते हैं। 38वीं चौपाई में कवि सुन्दरदास का नाम है। परंपरा में जन्माष्टमी पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है।

पाठ रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार की छपी पुस्तक ‘51 चालीसा संग्रह’ (2004) और वेबसाइटों के दो अलग-अलग पाठ-परिवारों (भक्ति भारत/द्रिक पंचांग, और वेबदुनिया/sanskritdocuments) से शब्द-शब्द मिलाया गया है। जहाँ छपी पुस्तक का पाठ स्पष्ट है, वहाँ वही लिया गया है; बाकी जगह अधिकतर स्रोतों का पाठ। मुख्य पाठभेद: चौपाई 5 में ‘धरि टेरौ … विनय यह मेरौ’ और ‘मनोरथ मेरो’ भी मिलता है; चौपाई 8 में ‘रंजित’ की जगह ‘राजित’; चौपाई 9 में ‘काछन’ की जगह ‘काछनी’; चौपाई 13 और 36 में ‘भये’ की जगह ‘भै’; चौपाई 24 में छपी पुस्तक के स्कैन में ‘संहारा’ पढ़ा जाता है, जबकि बाकी स्रोत ‘सहारा’ (सहायता) पढ़ते हैं, जो अर्थ से मेल खाता है; चौपाई 26 में ‘मूठि’ की जगह ‘मूंठ’; चौपाई 34 में छपी पुस्तक ‘तव’ (आपकी) पढ़ती है, बाकी स्रोत ‘तब’; चौपाई 37 में कई वेबसाइटों पर ‘अनाथ’ शब्द छूट गया है; चौपाई 40 में ‘की जय’ की जगह ‘की जै’। द्रिक पंचांग पर शुरू के दोहे अधूरे हैं और उनमें शनि चालीसा की पंक्ति ‘करहु कृपा हे रवि तनय’ जुड़ गई है। खेमराज प्रकाशन की ‘श्रीकृष्ण चालीसा’ एक अलग रचना है (‘जय मुकुन्द मधुसूदन प्यारे’)। गीता प्रेस का इस चालीसा का कोई संस्करण नहीं मिला।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कृष्ण चालीसा किसने लिखी?

चौपाई 38 में कवि का नाम सुन्दरदास आता है (‘सुन्दरदास आस उर धारी’), और परंपरा इसे उन्हीं की रचना मानती है। उनके समय या स्थान के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। चालीसा में मीराबाई के प्रसंग आते हैं, इसलिए यह उनके बाद की रचना है।

कृष्ण चालीसा का पाठ कब किया जाता है?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में जन्माष्टमी पर इसका पाठ विशेष रूप से होता है, और कई लोग इसे रोज़ की पूजा में कृष्ण की आरती के साथ पढ़ते हैं।

चालीसा में कृष्ण के किन प्रसंगों का उल्लेख है?

इनमें से कई भागवत पुराण के दसवें स्कंध में हैं: पूतना (10.6), यशोदा को मुख में लोक दिखाना (10.8), ब्रह्मा को माया दिखाना (10.13 और 10.14), कालिय-दमन (10.16), गोवर्धन (10.25), कंस-वध और उग्रसेन को राज (10.44 और 10.45), नरकासुर और सोलह हज़ार राजकुमारियाँ (10.59), शिशुपाल (10.74), सुदामा (10.80 और 10.81), और देवकी के छह पुत्रों को लौटाना (10.85)। कंस का कमल मँगवाना, विदुर का साग, भीम को तिनका चीरकर संकेत देना और मीरा के प्रसंग चालीसा परंपरा से कहती है।

‘आज लाज भारत की राखो’ में भारत का क्या अर्थ है?

चौपाई 6 में कवि कृष्ण से भारत की लाज रखने की प्रार्थना करता है। चौपाई 29 में ‘भारत के पारथ’ का अर्थ अलग है: वहाँ ‘भारत’ महाभारत के युद्ध के लिए आया है, जिसमें कृष्ण ने अर्जुन का रथ हाँका।

स्रोत

  1. परंपरागत पाठ (सुन्दरदास)
  2. रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार: ‘51 चालीसा संग्रह’, आरतियों सहित (2004), पृ. 33 से 36
  3. रणधीर प्रकाशन: आरती-चालीसा संग्रह का दूसरा स्कैन (राजा ऑफसेट प्रिन्टर्स, दिल्ली), पृ. 33
  4. प्रसंग: भागवत पुराण, दशम स्कंध (अध्याय 6, 8, 13, 14, 16, 25, 44, 45, 59, 74, 80, 81, 85)

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